Thursday, January 28, 2010

हमारा व्यवहार

आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
    संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
    हमारी चाय पीने की आदत है।
    चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
    इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
    वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
    इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
    इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
    मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
    इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के    आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
   
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को  इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
        मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी  है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
    बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
    प्रकृति का भी यही नियम है।
    प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
    प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
    जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
    और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते  रहते है।
    और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
    याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
    उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
    पहला कत्र्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
 आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
    इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
    साधना का सार ,यही है,    अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
    साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
    और उसी के साथ बताया  है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
    परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
    इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
    तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
    कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
    यह बात जरा कठिन है।
    काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
    वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
    बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
    उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चैबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
    तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
    यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
    मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
    इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।

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