Wednesday, March 2, 2011

गुरू:वाणी तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती?

”तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती?






हाँ, देह जब तक है, उसका अपना स्वाभाविक नियम रहेगा।मृत्यु वह तो प्रकृति का नियम है। समुद्र के किनारे हवा के झौकों लकड़ियाँ आ जाती है। इक्कट्ठी हो जाती है। समय पर फिर हवा के थपेड़ों से अलग-अलग हो जाती है। यह मिलना, बिछुड़ना, प्रकृति का अपना नियम है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

मृत्यु ज्ञानी की भी होती है, जो नहीं जानता है , उसकी भी। संसार की उपस्थिति वाह्यमन में है और संस्कार नाभि में रहता है। वहीं अंतर्मन है, जो निरन्तर विराट से होने वाले प्रवाह से जुड़ा रहने के कारण उत्प्रेरित रहता है संसार उसके धक्केां से, उन लहरों से के धक्कांेे से से स्पंदित होकर, यही मन मस्तिष्क को गति देता है। यही कारण है कि एक ही घटना की अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाँ होती है।



फिर साधना क्या है?

कुछ नया नहीं है। शरीर के माध्यम से की गई कोई भी विधि वहा्रँ कारगर नहीं है।यह तो मन के द्वारा मन को ही नियंत्रित करने की कला है। हाँ, शरीर की बनावट व बुनावट सबकी अलग है। इसलिए इसके लिए कोई एक रास्ता नहीं है। इसीलिए मैं किसी को भी ध्यान नहीं सिखाता। ध्यान तो सिखाने की चीज नहीं है। यह तो अपने आप हो जाता है। मन जब वर्तमान में रहने लगता है तब मन का भटकाव कम हो जाता हे। वह जहाँ है, वहीं हैं, यही ध्यान है। ध्यान तो अपने आप पाया जाता है। यह जीवन और जगत से काटकर सिखाने की चीज नहीं है। मैंने ”अंनत यात्रा“, में इस बात पर स्पष्ट लिखा है उसे लोग पढ़ते ही नहीं है।

मैं बहुत पहले रमण महर्षि के आश्रम गया था।

वहाँ मौन सत्संग होता था। वे आते थे और शांत बैठे रहते थे। लोग आते थे और सामने कतार में पंक्तिब( बैठे रहते थे। उनके प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते थे। वहाँ मैंने पाया था, नियांत्रित मन कितना शक्तिशाली होता है।



क्या यह अन्तर्मन ही आत्मा है?



आत्मा भी दिया हुआ शब्द है। यह कोई स्थाई इकाई नहीं है। आत्म कहो या अन्र्तमन, वह भी निरन्तर बदलने वाला है। यहाँ सब बदल रहा है। विराट से जुड़ा रहने के कारण यह अंतर्मन जहाँ शक्तिशाली है, वही यहाँ लहरों के निरन्तर स्पंदन है। लहर भी क्या स्थाई होती है? निरन्तर बनती -बिगड़ती है? संस्कार बीज है। यही कारण है, जब मन नियांत्रित होता है, तब यह सं स्कार रूपी बीज भुनने लग जाता है। इसकी अंकुरण क्षमता समाप्त होने लगती है। जब तक संस्कार है , मन का भटकाव रहेगा। मन का नियंत्रण तथा संस्कारो की शु(ि एक साथ होती है। एक सधता है, दूसरे अपने आप सधने लग जाता है। यही जीवन का उद्देश्य है।



साधना के नाम पर मेरा यही कहना है, यहाँ कुछ भी स्थार्ई नहीं है। सब बदल रहा है। मेरे विचार भी आपको अच्छे लगंे। स्वीकारे नहीं तो छोड़दें। हाँ, एक बात जरुर कर सकते है, जहाँ आप का शरीर है, वहाँ आपके प्राण सदा रहतेहै, पर मन वहाँ नहीं रहता। उसको वहाँ लाना ही साधना है। मन और प्राण की वास्तविक युति ही वास्तविक योग है। इसलिए यहाँ करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह तो रहने की कला है। जहाँ आप हांे, जो भी कार्य कर रहे हो, काम









तो आज काी दुनिया में करना ही होगा। जीवन यापन भी करना हे, धन की जरुरत होती है। बस जहाँ हम हैं, वही मन रहे। उसका भटकाव कम से कम रहे। शुरु-शुरु में कठिनाई आती है। लोगों ने बहुत गलत समझा रखा है।यह तो बहुत जटिल मार्ग है। ये करो - वो करो, कर्मकांड की भूल -भुलैया है। मैंने रास्ते सभी देखे, प्रयोग किए, प्रकृति निरन्तर मार्गदर्शन करती रही । सबमें सरल और सीधा यही रास्ता है , निरंतर वत्र्तमान में रहो।

जो गया , वह गया, जो अभी नहीं आया पता नहीं, पर मन हमेशा भूत काल को ही वत्र्तमान में ही ढकेलता रहता है। बहुत पहले सबको एक सत्तूवाली कहानी सुनाई थी। वह हांडी लाकर तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। अपनी शादी भी कर लेता हे। बच्चे होजाते हैं। बच्चे पर गुस्सा करता हैं। मन कल्पना में उड़ान भरता रहता हैं , अचानक वत्र्तमान में खुद की लात से ही सत्तू की हांडी टूट जाती है।



रास्ता इतना सरल और सीधा है। विश्वास ही नहीं होता। वर्तमान में रहना, वर्तमान में ही सम्भव है। गीता में कहा गया है ” क्ष्प्रिं भवति धर्मात्मा,“। यह धर्मात्मा वही है, जो वर्तमान में है। वहाँ न अतीत का दबाव है, न स्मृतियाँ है, न कोई विचारणा है, न कोई अवधारणा है, शांतमन ही शक्तिशाली होता है। जब वह किसी भी क्रिया के साथ लगता है, सफलता मिलती है, यही योग की स्थिति है। तो क्या हम इसे पाने में असमर्थ हैं? यह वर्तमान में रहने की क्षमता हमारी अपनी ही है,जिसे हमने खो दिया है।इसको पाना ही धर्म है, यही आध्यात्म है और यह अभी इसी जीवन में संभव है। जो निरन्तर वर्तमान में है, वही ध्यानी है, वही शांत सजगता है। उसी को तुम लोग जाग्रति;म्दसपहीजमकद्ध कहते हो। शरीर तो जैसा सबका है, उसका भी वैसा ही रहेगा। हाँ, शांत मन, प्रसéाता, संतोष, उसकी कुछ-कुछ पहचान बता सकते हैं। वैसे तुम लोगों ने नियम -कायदे बनाए होंगे वो तुम जानो।











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