1 मेरी बात
अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले भारत में जिन प्रबु( व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबु( हैं? वे दक्षिण के साईं बाबा, केरल की अम्मा, आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी। स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था। बस पुरोहित रामप्रसाद जी कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार खिंचा चला आता है। केरोल ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता।
हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमक च्मतेवदद्ध हैं।
स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने।
उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदमकद्ध करा सकते है?“
स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण छोटा है, पति ग्रेग है, नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।“
वह चुप रही।
वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही।
स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“
वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“
स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हंै, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते है।
पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती है, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है। मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है।
नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ है।वही मृत्यु है, वही जन्म है। वही भव है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी सम झाने के लिए कहा गया है द्ध।
तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना हो जाता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ उसे कोई संशय नहीं है। बु(ि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरु(वह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जो ‘औरा है, वह सकारात्मक है। वह वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।‘दाइ विल बी डन’ उसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु का कारण मन ही है। बंधन औरऔर मोक्ष भी मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में रिलीव होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता हैं
अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले भारत में जिन प्रबु( व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबु( हैं? वे दक्षिण के साईं बाबा, केरल की अम्मा, आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी। स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था। बस पुरोहित रामप्रसाद जी कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार खिंचा चला आता है। केरोल ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता।
हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमक च्मतेवदद्ध हैं।
स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने।
उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदमकद्ध करा सकते है?“
स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण छोटा है, पति ग्रेग है, नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।“
वह चुप रही।
वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही।
स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“
वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“
स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हंै, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते है।
पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती है, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है। मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है।
नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ है।वही मृत्यु है, वही जन्म है। वही भव है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी सम झाने के लिए कहा गया है द्ध।
तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना हो जाता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ उसे कोई संशय नहीं है। बु(ि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरु(वह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जो ‘औरा है, वह सकारात्मक है। वह वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।‘दाइ विल बी डन’ उसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु का कारण मन ही है। बंधन औरऔर मोक्ष भी मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में रिलीव होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता हैं
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