Monday, June 14, 2010

संस्कृति ः अवधारणा

संस्कृति ः अवधारणा
संस्कृति क्या है? यह प्रश्न आज सर्वाधिक विवादास्पद है। परन्तु अप संस्कृति क्या है, इसे परिभाषित किया जाना सरल हो गया है। बाजारवाद से मोहासक्त होते जा रहे व्यक्ति के भीतर आत्मघाती आत्म केन्द्रिकता, अजनबीपन, अमानवीयता का घुन व्यक्ति-जीवन को इतना खाली करता जा रहा है कि उसके पास उसका हृदय भी है,... वह इससे अनभिज्ञ हो गया है। विचार ही विकार है,... विकार मस्तिष्क की उपज है,... वहाँ की संपत्ति बुद्धि है। बुद्धि का विस्तार व्यापक तथा घना होता जा रहा है, जितना व्यक्ति बुद्धिमान होता है, उतना ही वह संवेदनहीन भी होता जाता है,... यह एक स्वाभाविक विकास है। ... वहां उसके पास और कुछ करने को बहुत समय रहता है,... पर अपने भीतर ‘रागात्मकता’ का विकास करने का अवकाश ही नहीं है।
अपसंस्कृति, प्रकृति के विरूद्ध खड़ी होती है, प्रकृति और बुद्धिमता का विरोध है। मनुष्य जितना बुद्धिमान होता जा रहा है, उतना ही वह प्रकृति का विध्वंस कर रहा है। यही अप- संस्कृति है। यह प्रकृति के प्रतिकूल खड़ी होती है, इसकी उपसंपदा है,विकृति, विनाश,यह बुद्धिजन्य ज्ञान की विकृतियों पर खड़ी होती है,जो सभ्यता का छिछला छोर होता है। यह व्यक्ति को तुच्छ, संकीर्ण, लोभ और दिशाहीन बनाती है। जब हम कहते हैं, वह व्यक्ति सुसंस्कृत है, तब आशय होता है व्यक्ति के पास आदर्श है, जीवन मूल्य है। वह समाज को उर्जावान तथा आस्थावान बनाने में समर्थ है, वैसे विचार रखता है।यह संभव है, व्यक्ति सभ्य हो, लेखक भी हो , पर सुसंस्कृत हो यह आवश्यक नहीं है।
यहां यह अवधारणा, संस्कृति को मूल्यपक्षता से सन्निहित करती है। जहां यह है वहीं संस्कृति है। संस्कृति मनुष्य जाति का वह ‘सामान्य; है जो उसके अनुभव जगत की सत्ता पर आधारित है। संस्कृति के लिए व्यक्ति और समाज का अधिक बुद्धिमान तथा सभ्यता का दास होना अनिवार्य नहीं है, सभ्यता बुद्धिजन्य ज्ञान पर आधारित है।
दरअसल हमारे यहां शब्दों की छेड़छाड़ बहुत है, अपने लाभ के लिए हम शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। अंग्रेजी भाषा और ईसायत का गहरा संबंध है। हमारे यहां ‘धर्म’ शब्द है, वहां रिलीजन है, जिसका अर्थ मजहब होता है। हमारे यहाँ संस्कृति शब्द है, उनके यहां ‘कल्चर’ शब्द है।
इस प्रकार ‘कल्चर’ शब्द संस्कृति का समानार्थी शब्द नहीं है। संस्कृति शब्द में ही उसका निहितार्थ निहित है। संस्कृति व्यक्ति और समाज को मूल्यवत्ता प्रदान करती है। उसे समाज में उपादेयता सौंपती है, व्यक्ति और समाज के भीतर अन्तर्सम्बन्धों में सामंजस्य लाती है।
हमारे यहाँ हमने सभ्यता को संस्कृति का पर्याय मानकर ही गांव के मुकाबले शहर को, दलित के मुकाबले  सवर्ण को, स्त्री के मुकाबले पुरुष को सुसंस्कृत करार दिया है। सभ्यता को ही मूल्यवान मानने के कारण हम आदिवासियों का ही शहरीकरण करना चाहते हैं। उन्हें संस्कृति की मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। प्रायः ग्रामीण अंचलों के लिए, लोकभाषा तथा लोक संस्कृति शब्द बनाया गया है। ‘लोक’ क्या है? क्या ग्रामीणजन, आदिवासी ही लोक हैं। अगर ग्रामीण जन में लोक निवास करता है, तो शहरीजन के पास तो मात्र सभ्यता है, वहां तो संस्कृति की धारा कभी की सूख चुकी है?
जहाँ लोक हैं, वही संस्कृति है, जहां लोक है, वहां हृदय है, वहां संवेदना है। वहां मानव है, संभव है, वहां सभ्यता भी हो, पर सभ्यता की दासता  नहीं है। सभ्यता दैनिक जीवन जीने की एक कला है, सामग्री देने वाली व्यवस्था है, बस,... परन्तु जहां संस्कृति है, वह मानव जाति की अनुभवात्मक यात्रा का सामान्य सुरक्षित है। जिसमें बौद्धिक- शारीरिक श्रम, जीवन मूल्य, संस्कार, उसकी आध्यात्मिक चेतना के प्रयास उसकी अनुभव कला सभी सुरक्षित है। दर्शन की परिभाषा में महर्षि कणाद के वैशोषिक दर्शन के आधार पर वह उसका ‘सामान्य’ है। संस्कृति-अतीत की परंपरा में सुरक्षित रखती है, वर्तमान में जीना सिखाती है, तथा भविष्य के लिए आदर्श सौंपती है,... जीने की कला संभलाती है। जिस प्रकार वैशेषिक दर्शन में विशेष की अवधारणा है, उसी प्रकार, संस्कृति, सामान्य होते हुए भी अपने प्रकार में वर्गों के भीतर, समुदाय के भीतर जाकर, क्षेत्रीय रंगों में भी अभिव्यक्त होती है। यह उसका आंचलिक पसारा है।
सभ्यता को ही ‘संस्कृति’ मानते रहने के कारण हमारे यहां शासक वर्ग का व्यवहार तथा आचरण ही कृत्रिम-‘सांस्कृतिक होता चला गया है। ... मध्यकाल में संत मत के प्रचार-प्रसाद के साथ असभ्य व्यक्ति, अशक्त व्यक्ति की विराटता का दिग्दर्शन पहली बार हुआ था। यहां शासकों की संस्कृति से हटकर सामान्य जन की संस्कृति, उसका विश्वास मूल्यवान बना था। असामथ्र्य को, वंचित को आप असभ्य कह सकते हैं, परन्तु संस्कृति विहीन नहीं। मूल्य रहित नहीं, वह भी अपनी झोंपड़ी में, अपने परिवार के साथ वहीं संतोष पाता है, जो राजमहल में भी संभव  नहीं हो?
यहां हम सभ्यता, सभ्य और असभ्य शब्दों को संस्कृति की परिधी से बाहर जाकर विवेचित करना चाहते हैं। संस्कृति, मनुष्यता का वह सामान्य है, वह बोधक तत्व है, जो उसे इतिहास की परंपरा में इतिहास बोध सौंपता है। यह उसकी अपनी आंतरिक पूँजी है,यह उसकी श्रम के प्रति निष्ठा है, जिसके लिए उसे बाजार से जाकर कुछ खरीदना नहीं है, यह उसकी आंतरिक संवेदना है, जो सूक्ष्म है, व्यापक है, सघन है, जो उसके भीतर एक तरलता लाती है, जो उसकी हृदय की उपसंपदा है... साहित्य-कला का जन्म व उसकी सिद्धि सहृदय या कवि की हृदय की मुक्तावस्था में ही है,तो श्रमिक के श्रम की उपलब्धि उसके नवीन अध्यवसाय में है।
जिस प्रकार से संप्रदाय, धर्म नहीं है,... कर्मकांड आध्यात्म नहीं है, संस्कृति की धरती पर ही धर्म का वृक्ष खड़ा होता है। धर्म की परिभाषा है, जिसका वरण होता है, जो वरण करता है, धर्म वह धारणा, जो व्यक्ति इतिहास बोध से जन्म के साथ धारण कर लेता है। परंपरागत उसके विश्वास, उसके संस्कार जो उसे बेहतर इन्सान बनाने की ओर ले जाते हैं,।संप्रदाय सौंपा जाता है, यह बाह्य बुनावट है, जो उसे उसकी पहचान कराती है। एक धर्म में अनेक संप्रदाय हो सकते हैं, होते हैं, पर संस्कृति में उसके रंग-रूप, स्थानीय, क्षेत्रीय  आधार सभी की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से  हो सकती है, होती है, पर अप-संस्कृति उसका कोई हिस्सा नहीं है, यह सभ्यता और असभ्यता के बीच की कड़ी है। असभ्यता, का संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। संस्कृति, मानवीय है, वह आदर्श और व्यवहार का अपने आचरण के द्वारा संयोजन करना सिखाती है।
आज सांस्कृतिक पश्चिमीकरण के हथियार के रूप में  बाजारवाद का सबसे बड़ा हमला ‘संस्कृति’ की जड़ों पर हो रहा है। सांप्रदायिकता भी ‘संस्कृति’ की जड़ों में दीमक डालने का प्रयास करती है। यह संप्रदाय विशेष की संस्कृति के नाम पर प्रचारित करती है। उधर शासक वर्ग भी अपने अनुसार संस्कृति को परोसने का प्रयास करते हैं। इसकी पहली पहचान भाषा के स्तर पर होती है, हिन्दी भाषा के स्थान पर, मातृ भाषा के स्थान पर, अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व, सभ्यता की देन हैं, यहां बुद्धिगत बढ़ता व्यवसाय है। इसका संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध बाजारवाद है। टी.वी. पर बढ़ते सीरियल, सामाजिक विघटन को मूल्यांकित करने का प्रयास यह भी सभ्यता का ही एक परिचय है।
एक सुसंस्कृत व्यक्ति या समाज, असभ्य भी हो सकता है, सभ्यता, शिक्षा व प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल होने से जुड़ी हुई है। संस्कृति का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह मनुष्य की मनुष्य होने की पहचान है, यह उसकी अपने परिवेश, अपनी प्रकृति के साथ संतुलित सामंजस्य रखने की भावना है।

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