उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
Friday, October 2, 2009
कविता,
उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,
यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,
हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै
दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना
सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै
भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।
पूज्य स्वामीजी
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़पूज्य स्वामीजी द्वारा लिखितअनन्त यात्रा“ उपन्यास की तीसरी कड़ी प्रेषित है
सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
”कहां से आये हो ?“
”जम्बू द्वीप से“
”राज्य ? राजधानी ?“
”?“
”नाम बताओ ?“
”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
”पेशा ?“
”?“
”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
उत्तर-नदारद
”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।
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सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर अन्नतआकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
”कहां से आये हो ?“
”जम्बू द्वीप से“
”राज्य ? राजधानी ?“
”?“
”नाम बताओ ?“
”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
”पेशा ?“
”?“
”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
उत्तर-नदारद
”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।
Wednesday, September 30, 2009
1
बीसंवी सदी के प्रारंभ में अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।
त
बीसंवी सदी के प्रारंभ में अंग्रेजी सल्तनत का सूर्य अस्त नही हो रहा था, बल्कि उसके मध्यान्ह की प्रखरता के कारण विश्व की अधिक से अधिक जनसंख्या त्रस्त एवं क्षुब्ध थी। इसी बीच एक संभ्रान्त तथा अंगेज परस्त परिवार में मेरा जन्म हुआ। इस जमाने में ईसाई स्कूलों में अंगे्रजी माध्यम से पढ़ाई करना जहां बड़े भाग्यवानों के लिए सुरक्षित माना जाता था, वहां समाज में भी ऐसे बालक के प्रति बड़ा सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। पितृविहिन तथा माता से अलग किया पाकर निकटतम रिश्तेदारों ने मुझे अपनाया और एक ख्याति प्राप्त स्कूल में भर्ती करके उस जमाने की अच्छी से अच्छी शिक्षा के साथ उच्च सामाजिक स्तर तथा प्रतिष्ठा का जीवन जीने के लिए श्रेष्ठतम साधनो का प्रबंध मेरे लिए किया।
परिणाम होना था वही हुआ। ईसा मसीह के लुभावने उपदेश, बाईबल की रोचक तथा मन की गहरी पकड़ करने वाली कथाएं पढ़ भाव विभोर होकर धीरे धीरे मन वचन और कर्म से ईसाइयत मेरे रोम रोम में व्याप्त हो गई। परन्तु मेरे पैनी दृष्टि वाले अभिभावकों से मेरी मानसिक स्थिति ओझल न हो सकी तथा ईसाइयत का प्रभाव कम करने के लिए समानांतर वैदिक शिक्षा एवं सनातन संस्कारों को पुनस्र्थापित करने का पूरा प्रयास किया गया। परन्तु मैं परस्पर विरोधी संस्कार एवं विचारधाराओं के पाटों में पिसता हुआ भी ऐसी विचित्र दशा को पहुंच गया जहां मेरा वास्तविक स्वरूप एक तीसरे ही रूप में प्रकट होने लगा। एक तरफ जहां मन अत्यन्त शुद्ध निर्मल व पवित्र हुआ वहीं बा्रह्म व्यवहार, मेरे अभिभावकों को नास्तिक संस्कारहीन तथा परिवार, समाज, धर्म एवं देश के प्रति असम्मानजनक भासित होने लगे।
मेरी अपनी स्थिति से मैं कभी संतुष्ट नही हुआ। इस संसार को समझने तथा देश के अनेक दारूण दुखों से ग्रसित मेरे देशवासियों के कष्टों का निवारण किस प्रकार हो, इसका उपाय किसी चमत्कारिक शक्ति से अभिप्रेरित होकर करने लगा।
अनेक धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, नाम, जप, मंत्र जप तथा यौगिक क्रियाएं प्रकाश के स्थान पर भयानक अंधकार को और दौड़ने लगी। सभी प्रयास धीरे धीरे समाप्त प्रायः हुए। मन निराशा के गर्त में डूब गया और.............और................तब।
एक दिन एक विचित्र घटना घटी। हमारे पड़ौस में रहने वाली छः वर्षीय कमला बड़े जोर जोर से अपने पूर्व जन्म की घटनाएं कहने लगी। दस बीस कोस किसी देहात में उसका वृद्ध पति आज भी मौजूद था। चार लड़के दो लड़कियां तथा पोते पोतियों से भरा पूरा संसार आज भी उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। उत्कंठावश अनेक सत्यान्वेषितों ने सही पता तथा अन्य जानकारी कमला से लेकर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश की तथा कुछ दिनों बाद कुछ बातें सही किन्तु बहुत कुछ गलत होने के निर्णय दिया। अनेक दिनों की चर्चा के बाद घटना भूतकाल में विलीन हो गई।
पाश्चात्य संसार और शिक्षा के कारण पुनर्जन्म पर मेरा विश्वास नहीं था। मैंने अपनी बुद्धि अनुसार कमला को मानसिक रूप से विकृत बताया इस विषय पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं समझी व घटना को भूलने का प्रयास करने लगा।
परन्तु न मालूम क्यों, पुनर्जन्म हो सकता है या नहीं यह विचार दिन रात मेरे मन में चक्कर काटने लगा।
मेरे एक मित्र अर्जुनदेव से घंटों इस विषय पर वाद विवाद होता रहा तथा एक ग्रंथ ”योग वशिष्ठ“ की अनेक घटनाएं सुना सुना कर उसने मुझे पुनर्जन्म के सिद्धान्तों पर विश्वास करने के लिए बाध्य करने का प्रयास किया। अचानक एक दिन जबकि मैं मात्र बारह वर्ष का किशोर था, संध्या समय अर्ध मूच्र्छित अवस्था में पहुंच कर मैंने एक विचित्र अनुभव किया।
क्या वह एक स्वप्न था या वास्तविकता इसका आज तक निर्णय नहीं कर पा रहा हँू ? तथापि पाठकों के सम्मुख उस घटना को यथावत रखने का प्रयास कर रहा हँू।
त
पूज्य स्वामीजी
”अनंत यात्रा“
कृति एवं कृतिकार
यह कृति मात्र लघु उपन्यास ही नहीं है, वरन-अद्भुत साधन ग्रन्थ है। यह एक आख्यायिका है। वृतान्त योगवशिष्ठ के रानी चूड़ाला प्रसंग पर आधारित है।योगवशिष्ठ में यह साधारण कथा रानी चूड़ाला के माध्यम से व्यक्त हुई है कि वह किस प्रकार अपने पति राजा शिखिध्वज को जो योग साधना के आकर्षण में घर छोड़कर वन को चले जाते हैं, आत्मोपलब्धि करवाती है। इस कथा सूत्र के माध्यम से पूज्य स्वामीजी ने साधारण जन तक ”साधना रहस्य“ को पहुंचाया है।
यह ”अनंत यात्रा“ है। मनुष्य की सहज आकांक्षा सुख एवं शांति की है। वह अपने जीवन को किस प्रकार, किस उपाय से व्यवस्थित कर जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करे, यह उसकी सनातन जिज्ञासा है। धर्म, साधना, योग, तंत्र आदि सदैव से मनुष्य की जिज्ञासा को उत्प्रेरित करते रहे है। यह कृति इन्हीं चिरंतन प्रश्नों का मात्र उत्तर ही नहीं देती है, वरन जीवन और जगत की सहज व्याख्या भी करती है। कथा नायक एक बालक है। उसका मित्र अर्जुन देव है, जो कि उसका ही प्रतिरूप है। इस आख्यायिका के प्रवेश में, अर्जुनदेव को समझना आवश्यक है। वह सांसारिक मन है, जो तमस का प्रतिरूप है। नीलकंठ साधक मन है, जो अनन्त की यात्रा पर गतिशील है। जीवन के पार क्या है ? अचानक आई बेहोशी में यह बालक अपने आपको एक दीर्घ स्वप्न में अतीत की किसी माया नगरी में पाता है। उसका मित्र अर्जुनदेव भी साथ ही है। वह वहां भी चपल है। नायक स्वप्न गाथा में वह अपने आपको नीलकंठ के रूप में पाता है।
नीलकंठ को कार्य सौंपा जाता है कि वह राजा शिखिध्वज का पता लगाकर आये। राजा शिखिध्वज, योग साधना के आकर्षण में राज्य, घर, परिवार छोड़कर अरण्य मे चले गये हैं नीलकंठ कई यात्राओं के बाद, जहां वह साधना के रहस्यों को समझता है, वहीं राजा शिखिध्वज से मिलता है। वह पाता है कि राजा शिखिध्वज जिस साधना पथ पर अग्रसित हुए हैं, वहां उन्हें मात्र निराशा ही प्राप्त हुई है। रानी चूड़ाला, नीलकंठ के साथ राजा शिखिध्वज से मिलने निकलती है तथा उन्हें वह सहज साधना सौंपती है। जिससे राजा शिखिध्वज आत्मोपलब्धि पाकर पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। एक सन्यासी के द्वारा ”गृहस्थ जीवन“ का अभिनन्दन तथा ”स्त्री गरिमा“ का रेखांकन अपने आप में अद्भुत परिकल्पना है।
स्वामीजी संन्यासी हैं। दंडी सन्यासी। पूर्व नाम भालचन्द्र। लगभग चालीस वर्ष से राजस्थान के इस सुदूर अंचल में झालावाड़ जिले की बकानी उप तहसील के ग्राम मोलक्या में रह रहे हैं। पहले गुरूकुल चलाया था। अब वह भी राज्य सरकार को सौंपकर सहज वटवृक्ष की तरह हर पथिक को शांत छाया प्रदान कर रहे है। कभी महाराष्ट्र से आये थे। अहिन्दी भाषी। पर अब लगता है, यहां के ग्रामीण समुदाय से जैसे अभिन्न हो गये है। अठहत्तर वर्षीय स्वामीजी ने इस आयु में यह कृति क्यों लिखी है। इस प्रश्न का उत्तर ही यह कृति है।
आखिर वेदांत साधना क्या चीज ? क्या उसके लिए अरण्य चिंतन ही मार्ग है। जीवन भर धर्म व आध्यात्म के गूढ़ प्रश्नों से हुआ साक्षात्कार ही इस कृति का केन्द्र है। स्वामीजी प्रयोग धर्मी है। उनकी प्रयोगशीलता, कठोर अनुशासन से होकर गुजरी है। जो आरोपित नहीं होकर सहज है। रानी चूड़ाला निर्देशित करती है- सतत् अभ्यास, तीव्र लगन और स्वयं कृपा ही, साधक को साध्य से अभिन्न करने में समर्थ है। साधना जब तक ”पर“ पर केन्द्रित है, बाहर ही भटकाती है। यह ”पर“ गुरू भी है। ”ईश्वर“ भी है। वेदान्त की साधना निज का उद्घाटन है। वह बाहर नही भीतर है। तब उसके लिए ”पर“ कृपा नहीं स्वयं कृपा आवश्यक है। निजता की खोज ही विराट से जोड़ती है। ”विराट“ शब्द स्वामीजी की मौलिक उद्भावना है। ”रानी चूड़ाला“ के माध्यम से स्वामीजी यहां ”ब्रह्म“ के समानार्थी इस विराट की उद्भावना को रेखांकित करते हैं। वहीं वे ”अन्तर्मन“ के रूप में एक नई प्रस्तुति दे रहे हैं। नीलकंठ और अर्जुनदेव एक दूसरे के प्रतिरूप है। नदी के दो तल है। ऊपर और नीचे, जल दोनों तरफ है। चेतना का ऊपरी अस्तर अर्जुनदेव है, निचला नीलकंठ है। यह अन्तर्मन सदैव विराट से संयुक्त रहता है। संस्कार शब्द यहां एक नई व्याख्या के साथ आया है, जो कि अत्यंत गत्यात्मक उपकरण है। यह अन्तर्मन के समीप है। यही ”वैयक्तिक विभिन्नताओं का कारण है।“ जो विराट है, वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है तथा अन्तर्मन उससे सदैव संयुक्त रहता है। फिर साधना क्या है ? स्वामीजी कहते हैं, हम अलग है ही कहां, पर उसका अहसास नही है। यह ज्ञान होना ही आत्म ज्ञान है।
इस आख्यायिका के माध्यम से आघ्यात्म के गूढ़ प्रश्नों को सरल व सहज भाषा में स्वामीजी ने मात्र व्यक्त नही किया है, वरन् सत्य का जो ‘कुंभ’ शास्त्रों की दुरूह शब्दावली से ढका हुआ था, उसके आवरण को हटा दिया है। कर्म और ज्ञान पर आधारित साधना ही वेदांत की धरोहर है। शरीर कर्म से संयुक्त रहे और चेतना अज्ञान के कल्मष से मुक्त हो यही अनन्त यात्रा है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है, वरन् सीधा साक्षात्कार है। जिसके लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। ”वेदान्त दर्शन“ का यही अनुपम संदेश है। ”शिप्रं भवति धर्मात्मा“ यही पूज्य स्वामीजी की मंगल वाणी है।
स्वामीजी की मातृभाषा मराठी है। यह उनकी हिन्दी में पहली कृति है। अठहत्तर वर्ष की आयु में इस कृति का सृजन चमत्कार ही कहा जा सकता है। भाषा स्वामीजी की ही है। उसमें किसी प्रकार का संशोधन, सम्पादन कर्ता ने नही किया है। उसके मूल स्वरूप को बनाये रखा गया है।
उन सभी के लिए जो साधना पथ पर हैं तथा जो जीवन और जगत के रहस्यों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, यह कृति अपने आप में अमृत वाणी है। साधकों का पथ प्रशस्त हो, वे सुख एवं शांति इसी जीवन में प्राप्त करे, यही अनन्त यात्रा की उपलब्धि है।
त
कृति एवं कृतिकार
यह कृति मात्र लघु उपन्यास ही नहीं है, वरन-अद्भुत साधन ग्रन्थ है। यह एक आख्यायिका है। वृतान्त योगवशिष्ठ के रानी चूड़ाला प्रसंग पर आधारित है।योगवशिष्ठ में यह साधारण कथा रानी चूड़ाला के माध्यम से व्यक्त हुई है कि वह किस प्रकार अपने पति राजा शिखिध्वज को जो योग साधना के आकर्षण में घर छोड़कर वन को चले जाते हैं, आत्मोपलब्धि करवाती है। इस कथा सूत्र के माध्यम से पूज्य स्वामीजी ने साधारण जन तक ”साधना रहस्य“ को पहुंचाया है।
यह ”अनंत यात्रा“ है। मनुष्य की सहज आकांक्षा सुख एवं शांति की है। वह अपने जीवन को किस प्रकार, किस उपाय से व्यवस्थित कर जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करे, यह उसकी सनातन जिज्ञासा है। धर्म, साधना, योग, तंत्र आदि सदैव से मनुष्य की जिज्ञासा को उत्प्रेरित करते रहे है। यह कृति इन्हीं चिरंतन प्रश्नों का मात्र उत्तर ही नहीं देती है, वरन जीवन और जगत की सहज व्याख्या भी करती है। कथा नायक एक बालक है। उसका मित्र अर्जुन देव है, जो कि उसका ही प्रतिरूप है। इस आख्यायिका के प्रवेश में, अर्जुनदेव को समझना आवश्यक है। वह सांसारिक मन है, जो तमस का प्रतिरूप है। नीलकंठ साधक मन है, जो अनन्त की यात्रा पर गतिशील है। जीवन के पार क्या है ? अचानक आई बेहोशी में यह बालक अपने आपको एक दीर्घ स्वप्न में अतीत की किसी माया नगरी में पाता है। उसका मित्र अर्जुनदेव भी साथ ही है। वह वहां भी चपल है। नायक स्वप्न गाथा में वह अपने आपको नीलकंठ के रूप में पाता है।
नीलकंठ को कार्य सौंपा जाता है कि वह राजा शिखिध्वज का पता लगाकर आये। राजा शिखिध्वज, योग साधना के आकर्षण में राज्य, घर, परिवार छोड़कर अरण्य मे चले गये हैं नीलकंठ कई यात्राओं के बाद, जहां वह साधना के रहस्यों को समझता है, वहीं राजा शिखिध्वज से मिलता है। वह पाता है कि राजा शिखिध्वज जिस साधना पथ पर अग्रसित हुए हैं, वहां उन्हें मात्र निराशा ही प्राप्त हुई है। रानी चूड़ाला, नीलकंठ के साथ राजा शिखिध्वज से मिलने निकलती है तथा उन्हें वह सहज साधना सौंपती है। जिससे राजा शिखिध्वज आत्मोपलब्धि पाकर पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। एक सन्यासी के द्वारा ”गृहस्थ जीवन“ का अभिनन्दन तथा ”स्त्री गरिमा“ का रेखांकन अपने आप में अद्भुत परिकल्पना है।
स्वामीजी संन्यासी हैं। दंडी सन्यासी। पूर्व नाम भालचन्द्र। लगभग चालीस वर्ष से राजस्थान के इस सुदूर अंचल में झालावाड़ जिले की बकानी उप तहसील के ग्राम मोलक्या में रह रहे हैं। पहले गुरूकुल चलाया था। अब वह भी राज्य सरकार को सौंपकर सहज वटवृक्ष की तरह हर पथिक को शांत छाया प्रदान कर रहे है। कभी महाराष्ट्र से आये थे। अहिन्दी भाषी। पर अब लगता है, यहां के ग्रामीण समुदाय से जैसे अभिन्न हो गये है। अठहत्तर वर्षीय स्वामीजी ने इस आयु में यह कृति क्यों लिखी है। इस प्रश्न का उत्तर ही यह कृति है।
आखिर वेदांत साधना क्या चीज ? क्या उसके लिए अरण्य चिंतन ही मार्ग है। जीवन भर धर्म व आध्यात्म के गूढ़ प्रश्नों से हुआ साक्षात्कार ही इस कृति का केन्द्र है। स्वामीजी प्रयोग धर्मी है। उनकी प्रयोगशीलता, कठोर अनुशासन से होकर गुजरी है। जो आरोपित नहीं होकर सहज है। रानी चूड़ाला निर्देशित करती है- सतत् अभ्यास, तीव्र लगन और स्वयं कृपा ही, साधक को साध्य से अभिन्न करने में समर्थ है। साधना जब तक ”पर“ पर केन्द्रित है, बाहर ही भटकाती है। यह ”पर“ गुरू भी है। ”ईश्वर“ भी है। वेदान्त की साधना निज का उद्घाटन है। वह बाहर नही भीतर है। तब उसके लिए ”पर“ कृपा नहीं स्वयं कृपा आवश्यक है। निजता की खोज ही विराट से जोड़ती है। ”विराट“ शब्द स्वामीजी की मौलिक उद्भावना है। ”रानी चूड़ाला“ के माध्यम से स्वामीजी यहां ”ब्रह्म“ के समानार्थी इस विराट की उद्भावना को रेखांकित करते हैं। वहीं वे ”अन्तर्मन“ के रूप में एक नई प्रस्तुति दे रहे हैं। नीलकंठ और अर्जुनदेव एक दूसरे के प्रतिरूप है। नदी के दो तल है। ऊपर और नीचे, जल दोनों तरफ है। चेतना का ऊपरी अस्तर अर्जुनदेव है, निचला नीलकंठ है। यह अन्तर्मन सदैव विराट से संयुक्त रहता है। संस्कार शब्द यहां एक नई व्याख्या के साथ आया है, जो कि अत्यंत गत्यात्मक उपकरण है। यह अन्तर्मन के समीप है। यही ”वैयक्तिक विभिन्नताओं का कारण है।“ जो विराट है, वह सर्वत्र सब जगह व्याप्त है तथा अन्तर्मन उससे सदैव संयुक्त रहता है। फिर साधना क्या है ? स्वामीजी कहते हैं, हम अलग है ही कहां, पर उसका अहसास नही है। यह ज्ञान होना ही आत्म ज्ञान है।
इस आख्यायिका के माध्यम से आघ्यात्म के गूढ़ प्रश्नों को सरल व सहज भाषा में स्वामीजी ने मात्र व्यक्त नही किया है, वरन् सत्य का जो ‘कुंभ’ शास्त्रों की दुरूह शब्दावली से ढका हुआ था, उसके आवरण को हटा दिया है। कर्म और ज्ञान पर आधारित साधना ही वेदांत की धरोहर है। शरीर कर्म से संयुक्त रहे और चेतना अज्ञान के कल्मष से मुक्त हो यही अनन्त यात्रा है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है, वरन् सीधा साक्षात्कार है। जिसके लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। ”वेदान्त दर्शन“ का यही अनुपम संदेश है। ”शिप्रं भवति धर्मात्मा“ यही पूज्य स्वामीजी की मंगल वाणी है।
स्वामीजी की मातृभाषा मराठी है। यह उनकी हिन्दी में पहली कृति है। अठहत्तर वर्ष की आयु में इस कृति का सृजन चमत्कार ही कहा जा सकता है। भाषा स्वामीजी की ही है। उसमें किसी प्रकार का संशोधन, सम्पादन कर्ता ने नही किया है। उसके मूल स्वरूप को बनाये रखा गया है।
उन सभी के लिए जो साधना पथ पर हैं तथा जो जीवन और जगत के रहस्यों का साक्षात्कार करना चाहते हैं, यह कृति अपने आप में अमृत वाणी है। साधकों का पथ प्रशस्त हो, वे सुख एवं शांति इसी जीवन में प्राप्त करे, यही अनन्त यात्रा की उपलब्धि है।
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Thursday, July 16, 2009
ेेआज का समय और हम
ेेआज का समय और हम
जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।
- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।
वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।
किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।
‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।
याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो। प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।
जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।
- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।
वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।
किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।
‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।
याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो। प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।
Monday, July 13, 2009
पूज्य स्वामीजी
1
समर्पण का पथ
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
प्रकृति ने जो दिया है
जो सौंपा है
श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।
योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है। संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
पहला संघर्ष- काम से
काम के विरूद्ध रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
इसीलिए योगी जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया। शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत साधना मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना कोई पाप नहीं है।
होना यही चाहिए- यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का ही है, शिव और शक्ति का मिलन है यहाँ
किसके खिलाफ जाना है?
किससे कब लड़ना है?
- उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
उपयोग करो
रूपांतरण करो
- जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
समग्र स्वीकार
मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
जाल सनातन से रहा है
किससे छुटकारा
मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
जब सब जगह परमात्मा है
तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
- सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है। हम सब इसरंगमंच के पात्र है
जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।
,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
-सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
.. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या, पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
समर्पण का पथ
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
प्रकृति ने जो दिया है
जो सौंपा है
श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।
योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है। संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
पहला संघर्ष- काम से
काम के विरूद्ध रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
इसीलिए योगी जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया। शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत साधना मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना कोई पाप नहीं है।
होना यही चाहिए- यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का ही है, शिव और शक्ति का मिलन है यहाँ
किसके खिलाफ जाना है?
किससे कब लड़ना है?
- उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
उपयोग करो
रूपांतरण करो
- जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
समग्र स्वीकार
मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
जाल सनातन से रहा है
किससे छुटकारा
मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
जब सब जगह परमात्मा है
तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
- सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है। हम सब इसरंगमंच के पात्र है
जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।
,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
-सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
.. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या, पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।
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