Wednesday, November 13, 2013

अध्याय-5 गुरु गीता

अध्याय-5 गुरु गीता
शक्कोतीहैव  यः सोढुं प्राक्शरीर विमोक्षणात्।
काम क्रोधोÚवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ।।5-23


”जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, अर्थात् काम, क्रोध को जिसने सदा के लिए जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोक में योगी है, और वही सुखी है।“

गीता के पांचवे अध्याय को, कर्म सन्यास कहा गया है। पूर्ववर्ती अध्यायों का समाहार यहां हुआ है। अर्जुन की शंका है कि आपने कर्म सन्यास तथा निष्काम कर्मयोग दोनों की प्रशंसा की है, मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है, यह नहीं कहा। इसके पूर्व भगवान उसे स्वयं ही स्वधर्म की खोज हेतु प्रेरित कर आए हैं। वे अपनी ओर से उसे कोई एक निश्चित समाधान नहीं दे रहे हैं।
‘कर्म सन्यास’ कर्म का त्याग नहीं है। कर्म का जगत एक बड़ा स्वप्न का जगत है, बस एक सीरियल चल रहा है, ... इससे अधिक नहीं, ... तब कर्म छूट जाता है। जो कर्ता है वह यहां है नहीं, स्वामीजी कहा करते थे- वह न करते हुए भी करता है। शारीरिक क्रियाएं तो यथावत होंगी, ... पर मन सक्रिय तभी होगा, जब अंतःप्रेरणा उठती है। अन्यथा मन निष्क्रिय पड़ा रहता है। तब कर्म अपने आप गिर जाता है। हां, फिर भीतर से प्रेरणा अपने आप उठती है, ... विवेक कार्य करवाता है। पर अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है। न श्रेय न प्रेय। बस प्रकृति ने चाहा तो उसके कार्य में सहयोग हो गया। बस! कोई आकांक्षा नहीं होती।

‘निष्काम कर्म में कर्म के छोड़ने व छूटने पर बल नहीं है। यहां फलाकांक्षा पर जोर नहीं है। जो भी कार्य सामने आया है, मन को पूरी तरह से वहां रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए- तब जो मन भटकता है, वहां फलाकांक्षा में जाता है वह रुक जाता है। फलाकांक्षा भीतर से प्रेरणा नहीं बनती। कर्म एक खेल बन जाता है। बस करना है। करते रहना है। निष्काम कर्म कोई अवधारणा नहीं है। जीने की कला है। यहां कल के लिए स्थगन नहीं है। आज और अभी जो हो सकता है, कर देना चाहिए। इसी क्षण जीना है, वहां फल की आकांक्षा, छोड़ देनी चाहिए। आज में अभी में जीने की कुशलता आनी चाहिए। क्योंकि आज और अभी में तो कर्म है फल हमेशा भविष्य में आता है। पर जहां फलाकांक्षा पहले आ जाती है, वहां कर्म ही स्थगित होता जाता है।
इसी प्रसंग कोे स्पष्ट करते हुए भगवान ने कहा है-
ज्ञेयः स नित्य संन्यासी यो  न द्वेष्टि न काति’।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो  सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5-3

”जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह निष्काम कर्म को उपलब्ध हो जाता है।“
यहाँ हमने इस श्लोक को बाद में रखा है। काम का तात्पर्य है, आकर्षण, तथा द्वेष है, विकर्षण। सकारात्मकता तथा नकारात्मकता, एक ही धागे के दो मुंह है। हम दिनभर या तो कर्म किसी खिंचाव से करते हैं, या पलायन में करना चाहते हैं। विरोध में करते हैं, असहयोग में करते हैं। ... ये दो ही हमारे कर्म की प्रेरणा होती है। पर भगवान कहते हैं- तीसरी शक्ति भी होती है। अंतःप्रेरणा, जहां निष्कामता होती है। फलाकांक्षा नहीं होती है। यह मात्र शाब्दिक व्यायाम नहीं है।
कभी कोशिश करें, ... जब भी व्यक्ति अपने भीतर के राग को, द्वेष को जान जाता है, तब उसकी उर्जा जो रहती है, वह बाहर कीे खूंटियां उखड़ने पर सीधी भीतर उतरती है। कर्म तो वहां भी होना है। पर अब न किसी को जीतना है, न किसी को प्रभावित करना है। बस जो भी कार्य सामने आया है, ... पूरा मन उसी में डूब जाता है। प्राप्त होता है शांत मन। एक आनंद। एक भीतरी प्रसन्नता। तुम्हारा काम है, और हम कर सकते हैं, बस इतना ही बहुत है। तुम्हारी खुशी के लिए नहीं कर रहे, तुम्हारी नाराजगी की फिकर नहीं, बस महत्वपूर्ण बात यही है, हम कर सकते हैं, इसीलिए कर रहे हैं, यह भी गारंटी नहीं है, कल भी करेंगे, ताकत उसकी है, उसकी इच्छा है, इसीलिए कर पा रहे हैं। तब बोध जगता है।

... जाना, ... जहां तक भीतर राग था, ... वही तक द्वेष था। संबंधों में तनाव था। बाहर अपेक्षा बनी हुयी थी। उससे क्रोध की परत चढ़ती जाती थी। जब भीतर की दहलीज पर पांव रखा, ... तो पाया, ... जगत वही है, लोग वही हैं, पर अब कुछ बदला बदला सा है, संबंध सरल और सहज हो गए हैं। यहां कुछ भी बाह्य के प्रदर्शन के लिए नहीं होता है। न वस्त्र बदलते हैं, न वेशभूषा,पर भीतर मौलिक परिवर्तन की ओर हम बढ़ आते हैं। अब तुमसे कोई अपेक्षा नहीं है,नमस्ते नहीें  कर रहे  हो,बहुत अच्छी बात है, यह उपेक्षा भी नहीं है, जो बाहर घट रहा है, अब वह स्मृति का अंग नहीं बन पारहा है, चिंतन के लिए अवकाश भी नही है।
स्वामीजी कहा करते थे- जो भी कार्य हो, मन को पूर्णरूपेण वहीं ले जाओ, ... वहीं आनंद है। कोई विपरीत भावना नहीं। कर्म ही आनंद है, जिसे अभी जो कर्म है, उसमें आनंद मिल रहा है, ... उसे हर काम में आनंद प्राप्त होगा, ... वह राग-द्वेष के आकर्षण से बाहर निकल आएगा। कार्य के प्रारम्भ से लेकर अंत तक मन की एक ही अवस्था बनी रहे, यही ध्यान है। न यहां कुछ हारा जाता है न यहां कुछ जीता जाता है, बस यही ध्यान रहे। इस महारास में में हमारा नृत्य बढ़िया हो, पर दूसरे का खेल हमारे कारण से खराब नहीं हो जाए। यही ध्यान है। यह ध्यान सिखाया नही जाता, यह तो स्वयं, सीखा जाता है।

‘योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः
सर्वभूतात्मभूतात्मा   कुर्वन्नपि न लिप्यते।।7।
”वश में किया हुआ है शरीर, जितेन्द्रिय तथा विशुद्ध अतःकरण वाला,एवं संपूर्ण प्राणियों के आत्मरूप परमात्मा में एकीभाव हुआ  निष्काम कर्मयोगी कर्मकरता हुआ भी लिपायमान नहीं होता।
शरीर उसी के नियंत्रण में रहता है, जिसका अंतःकरण शु( है। स्वामी जी सदैव चित्त की शु(ि पर बल देते थे।  वे कहा करते थे- भीतर जितनी निर्दोषता आती है, उतनी ही आत्मा सबल होती जाती है।
अंतःकरण की अशुद्धि ... क्या है? जहां दूसरे का प्रभाव है। दृश्य का चिन्तन है, वही अंतःकरण अशुद्ध हो जाता है। दूसरे का चिन्तन, पराधीन बना देता है। हम जिसका चिन्तन करते हैं, वह स्वामी हो जाता है। हम गुलाम। जितने भीतर विचार होंगे, उसनी ही अशुद्धियां होगी। विचार ही विकार है। निर्विकारता मंें ही परम शुद्धि है।
इसी क्रम में ही भगवान ने जहां निष्काम कर्म योगी के, आचरण को परिभाषित किया है, वही अन्त में समाहार करते हुए कहा है-
जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है-
पूज्य स्वामीजी यहां तितिक्षा शब्द का प्रयोग करते थे। ‘तान तितिशस्व भारतः’ वे कहा करते थे, बड़े-बड़े योगियों के पतन होते देखे हैं। माया भ्रम भी है। माया भी शक्ति है, जो सम्मोहित कर देती है। साधारणजन, थोड़ी ऊंचाई से गिरता है, परन्तु योगी का पतन बहुत ऊंचाई से होता है। वह अंत समय तक इस अवस्था को बनाए नहीं रख पाता। शक्ति का वेग सहन करना सरल नहीं है। जब गंगाजी उतरी तो भगवान शिव को अपने मस्तक पर झेलना पड़ा। विकारों के वेग अंत समय में जब इन्द्रियां शिथिल हो जाती है, तब तेजी से उभरते हैं। बीज कितना भी भुना जावे, ... परन्तु उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त नहीं होती है। अनुकूल, खाद, बीज, धरती, हवा पाकर फिर अंकुरित हो सकता हैं। क्योंकि तब शक्ति जो जगती है, उसके वेग को शरीर सहन नहीं कर पाता है। या तो शरीर छूट जाता है, या शरीर में विकार तेजी से उपजते हैं। जो भी दुर्बलता रह गई हो, वह उछाला मारती है।
भगवान ने यहां यही कहा है- काम और क्रोध के वेग को सहन करने में  वह समर्थ है। काम की पूर्ति के लिए दूसरे का होना अनिवार्य है। दूसरा सुख देगा, वही काम है। और मेरे इस लक्ष्य में बाधा आती है, वहां क्रेाध पैदा होता है। ‘काम’ के पूरा होने पर, तृप्ति नहीं आती। विषाद आता है। कालिमा आती है, हताशा आती है, क्यों?
जब भी हमारी कोई इच्छा पूर्ति होती है, कुछ ही देर बाद पुनः कामना उठते ही व्याकुलता आ जाती है। इसके वेग से बाहर जाया जाए, जो अपने जीवन में इस वेग को सहन करने में समर्थ हैं, वही येागी है, वही सुखी हैं।

... प्रश्न है, जीवन दुखमय है, हम दुखी हैं?
भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं, काम से मुक्ति नहीं हो सकती, वह जीवनेच्छा है .... क्रोध भी स्वाभाविक वृत्ति है। आप वृत्तियों  का नाश नहीं कर सकते। ये प्रकृति की देन है। पर हां, इनकेे वेग को सहन किया जा सकता है।
साधक के गुणों में दम, शम, जहॉं उसका इन्द्रियों पर नियंत्रण है। इन्द्रियॉं हैं , पर वे विषयों के अधीन नहीं हैं, मन नियंत्रित हे, जब उसक   भीतर उपरति पैदा होती है। बाह्य की दासता कम हो जाती है। बाह्य का चिंतन कम होने से बाह्य की दासता चली जाती हे। यह एकक्रम है, तब उसके भीतर तितिक्षा पैदा होती है। दुख् और सुख के वेग को वह समान रूप से झेल लेता हे। मन कंपायमान नहीं होता। स्वामीजी कहा करते थे। भीतर बर्फ हो जाना है, ... स्पंदन उठेंगे, ... पर लहर नहीं बन पावेंगी, ... कंपन भीतर से आते हैं। अनवरत आते हैं। अंतर्मन विराट से जुड़ा है। विराट अत्यधिक शक्तिशाली है, परम  है। अंतर्मन भी उतना ही शक्तिशाली है। वहीं संस्कार है। जो भाव रूप में है। अहर्निश धक्का लगते हैं। कई बार हम वह कुछ कर जाते हैं, जिसके लिए बाद में पछताते हैं कि मुझसे तो अदृश्य ने करवा लिया। हम ही वेग को सहन नहीं कर पाते हैं। दूसरा वेग बाहर आ रहा है, निरंतर। इन्द्रियां मन के द्वारा हर विषय भोग के प्रभाव को ‘छाप’ की तरह, बिम्ब की तरह भीतर भेजती रहती है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां चट्टान की तरह होना है, लहरें आवें, टकरावें, टकरा टकराकर लौट जावें, हम बहंे नहीं। यही तितीक्षा है। जो अपने इस जीवनकाल में काम और क्रोध के इस वेग को सहन करने में समर्थ है, वही योगी है, वही सुखी है।

जीवन जीने की कला
जीवन जीने का तरीका या तो स्वामी/मालिक की तरह  रहे या याचक की तरह।
स्वामी /मालिक, यह जीवन वर्तमान में ही संभव है। किसी आशा में नहीं, विचारणा का दासत्व नहीं हो, ...  जहां तुम जीवन को ले जाना चाहो, ...  बागडोर तुम्हारे हाथ में हो।
 जो गुलाम है, दास है, ...  वहां मन खींचकर ले जाता है, मन को इन्द्रियां खींचती है, इन्द्रियों को विषय खींचते हैं।
दोनों विपरीत धाराएं हैं, ...  गुलाम के जीवन में विषयों की प्रमुखता रहती है,  इन्द्रियां विषय में खींचकर ले जाती है, ...  विवेक भी इन्द्रियों को समर्पित हो जाता है।

स्वामीजी कहा करते थे- गीता को कृष्ण की आंख से पढ़ो, ...  कृष्ण की तरह बोलो, ...  अर्थ बदल जाएगा, ...  कभी सोचो। रथ तो एक ही है, ...  प्रवाह दो है। जहां सारथी कृष्ण है, वहां अर्जुन, ...  जो टेढ़ा मन है, वह सीधा होकर लौटता है, ...  परन्तु अगर जहां अर्जुन सारथी हो, वहां क्या होता है, वहां कृष्ण भी अर्जुन की तरफ चल देता है, जीवन की धुरी बदल जाती है। संसार ही प्रमुख हो जाता है।
 साधना क्या है, करना क्या है?
 चित्त तो चंचल है, ...  अर्जुन है, जो टेढ़ा है, उसे पहले सीधा करना है, इसे रोकना कठिन है, ...  मन का कभी नाश नहीं हो सकता, ...  हां इसकी गति की धारा बदल सकती है, ...  यह जो पहले बाहर जा रहा था, ... अब इसे भीतर आना है, ...  बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की ओर, ...  पर पहले इसे सीधा होना है-
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त को मेघावी पुरुष उसी प्रकार सरल, सीधा बनाता है जिस प्रकार बाण चलाने वाला बाण को।
 चित्त की चंचलता, एक तथ्य है, बोध है, यह जाना गया है, जब यह जाना जाता है, बोध बनता है, अनुभवन में आता है, मात्र सूचना नहीं रहती, ...  वहां जीवन के साथ जो आशाएं बांध रखी थीं, वे टूट जाती है, खालीपन अचानक साथ आ जाता है। यही जागरण है। जो जाना गया है, वह सीधा है, प्रत्यक्ष है। जहां क्षणभंगुर का उलझाव छूट जाता है, वहां जो बचता है, वह शाश्वत है, वह कहीं गया थोड़े ही था, बस क्षण भंगुर की दौड़ में उलझ गया था, दृष्टि से ओझल हो गया था।

यहां विकार दिख रहा है, उसे छिपाना नहीं, उसके साथ बहना नहीं, उसे न्यायोचित ठहराने का प्रयास नहीं, बस उसे जान लेना है, ...  इससे ही सरलता अपने आप लग जाती है। अहंकार तभी पैदा होता है, जब जो है, उसे छिपाया जाता है।
जो यह जानता है, जो अपने को ही साक्षी करके, अपने आपको उघााड़ देता है,  खोल देता है, कुछ भी बाकी नहीं रहता। उसे सत्य अपने आप उद्घाटित कर देता है। सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है। दूसरा कोई नहीं। वही मेघावी है।
जीवन में सफलता का राज, आकांक्षा रहित हो जाना है। जिसको भी पाने की दौड़ में जाते हैं वह उतना ही दूर चला जाता है। जो होना है, वह चाह से नहीं होता है, जो हो रहा है उसी के साथ राजी हो जाओ, न भविष्य में जाना, न भूत का चिंतन करना, ... वर्तमान को स्वीकार करते जाना ही सार है।
 स्वामीजी कहा करते थे, याचक नहीं बनना, ...  मांगने वाला छोटा होता है, यह ठीक नहीं है, ...  जब तक भिखारी बने रहोगे, ...  तुम दूसरों के पीछे लगे रहोगे,  तुम्हें संताप ही मिलेगा,दूसरों के पीछे जाना छोड़ दो, ...  जिसे प्राकृतिक विधान से आना है, अपने आप आएगा, ...  मांगने वाले का हाथ हमेशा हीन भावना देता है। मांगना छोड़ते ही व्यक्ति उसी क्षण मालिक हो जाता है। स्वामी बन जाता है।
 मैंने जाना, यह मैं बरसों से सुनता रहा, ...  पर जानते हुए भी नहीं जाना गया, ... मालिक बनने की कामना पैदा हो गई, ...  जाना भीतर याचक है, ...  और स्वामी बनने की चाह, जाना मैंने अपने भीतर विरोधाभास को पैदा किया। तथ्य है याचक ... हैं,  बस मांगते ही रहे, कामना रही, छूटना चाहिए, विरोधाभास रहा। नौकरी के समय यह द्वन्द्व बना रहा। हर छोटी सी चीज के लिए मांगना जरूरत ही नहीं आदत सी बन गई। अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा। बाहर से तो मजबूती बनी रही पर भीतर ही भीतर पोलापन भी आता गया। स्वामीजी कहते थे- भीतर ठोसपन होना चाहिए। जो याचक हैं, वह भीतर पोला रहता है।

जाना- तथ्य जो है, ...  वह तभी ज्ञान बनता है जब उसे सीधा देखा जाता है, बिना अवधारणा के, उससे रत्तीभर भी हटा नहीं जाता। न भटकना, न भिन्न जाना, तब जो है, जो होना चाहिए, इस विरोधाभास की यात्रा छूट जाती है। जिसे छूटना है, वह स्वाभाविक रूप से छूटता चला जाता है।
यह जो चित्त है, जो हर पल जहां चाहे वहां झट से चला जाता है, इसका संतुलन किस प्रकार पाया जाए
 शास्त्र में कहानी आती है। प्रजापति ने तीन अक्षर सौंपे थे ‘द’ ... देवताओं को, मनुष्य को, तथा राक्षसों को, तीनों के पृथक अर्थ बन गए। एक अर्थ ‘द’ से दमन भी बन गया। इन्द्रियों का दमन, संभवतः यह अर्थ बहुत बाद में प्रचलित हुआ। दमन इन्द्रियां जो द्वार है, उस द्वार से अंतर्मुखता की प्राप्ति के मार्ग पर चलना है। एक रास्ता बाहर जाता है। दूसरा भीतर आता है।
भगवान बुद्ध ने कहा है- ऐसे चित्त का दमन करना श्रेष्ठ है, दमन किया हुआ चित्त सुखदायक है-
यह दमन... रूपांतरण है, इन्द्रियां रहेंगी उनकी संवेदनशीलता समाप्त नहीं होती है, पर वे अब भीतर की यात्रा पर सहयोगी है।
इसी क्रम में भगवान बुद्ध ने कहा है-
इस चित्त को जो संयम करते हैं, वे ही ‘‘मार’’ के बंधन से मुक्त होते हैं-
 चित्त जो है, ... तीनों गुणों से मिलकर बना है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसी स्थल पर स्पष्ट निर्देशित किया है- कि यहां दमन नहीं, संतुलन पाना है। ‘‘मम माया दुरत्या,’’ ...  इसको पार वही पा सकता है, ...  जो इन गुणों के संतुलन को जान जाता है। तीनों ही गुण आवश्यक है। तमस आधार है। रजस गति है। सत- संतुलन है। जहां यह‘संयम’ है, ...  वही इस प्रकृति के जाल को काट पाता है। सबसे गंभीर हैै, आकांक्षा, वह अंतिम समय जगती है। इस संतुलन का पाने का  आधार है, उपेक्षा, ... तब मन स्वतः निष्क्रिय होकर रह जाता है। वह बहा नहीं पाता।
भगवान बुद्ध कहते हैं- जिसका चित्त अस्थिर है, जो सद्धर्भ को नहीं जानता है, जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है, उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
 जिसका हाथ कांप रहा है, वह वस्तु को नहीं पकड़ सकता है। यही हालत मेरी थी। यह करना है, या वह करना है, मन डांवाडोल रहा। स्वामीजी कहा करते थे- पहले बहुत सारी आकांक्षाएं होगी। बहुत जगह मन जाएगा, फिर उसे एक जगह आना होता है, पर मन तो गति है, वह स्थिर नहीं हो सकता, तब वह  गति अंतर्मुखी हो जाती है।
पहली स्वीकृति इस चित्त की अस्थिरता की थी। अशांत मन। उद्विग्न। तब जाना मन की शांति और शांत मन में भेद है। मन की शांति तो नींद की गोली खाकर भी आ जाती है। स्वामीजी कहते थे- भीतर बहुत संग्रह भरा पड़ा है, ...  असंगत, ...  जब वर्तमान में रहना शुरू होगा तब यह संग्रह बाहर भी निकलेगा, ... और धीरे-धीरे नियमित भी होता जाएगा, ...  अभी तो सब सारा सामान जैसे गोदाम में  भरा होता है, ऐसा पड़ा है। अस्थिरता ही मलिनता है।
यह जानना ही महत्वपूर्ण है- यह जानना अपने पास अपने भीतर ले आता है। सारी साधना का सार- निज में ही निजता से शुरू होता है। जब भीतर ज्ञान उपजता है, तब आत्मकृपा प्राप्त होती है। यही श्रद्धा है, ...  जो उपसंपदा में प्राप्त होती है। भगवान बुद्ध का वचन है- जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती है।
भगवान बुद्ध ने आंतरिक यात्रा के पड़ाव सौंपे हैं। ‘चित्त की स्थिरता, ... मन जब स्थिर होता है, तब वह शुद्ध भी हो जाता है। चित्त की शुद्धि के लिए प्रयास मत करो, स्थिरता ही साधन है। जब यह स्थिरता बढ़ती है। तब अज्ञान तिरोहित होता है। तब बाहर का भटकाव कम होने लगता है। दासता जाती है। इसके पूर्व संतुलन प्राप्त होता है। संयम दृढ़ होता है। शरीर भी रहेगा, इन्द्रियां भी रहेगी, विषय भी रहेंगे, मन भी रहेगा, बुद्धि भी होगी, विवेक भी होगा। पर अब विवेक के नियमन में इन्द्रियां रहेगी। जब विवेकी चाहेगा, भगवान बुद्ध ने उसे मेघावी कहा है। तब मन चलेगा, वरना मन  तो रहेगा, पर निष्क्रिय रहेगा। इस स्थिति को भगवान ने ज्ञान का जागरण कहा है, ...  तब श्रद्धा पैदा होती है। विश्वास सदा दूसरे के प्रति होता है। श्र(ा स्वयं के प्रति होती है। यह शक्ति है। यही आत्मकृपा है। तब ‘बोध’ का प्राकट्य है। निरंतर जो भी जाना गया है, उसका आदर होता है, वह आचरण में ढलता है, हम बोध के समीप होते जाते हैं।
मैंने अपना अध्ययन किया,
मेरे भीतर क्या है, ...  जो मुझे अशांत कर जाता है, ... भीतर सचमुच दासता है। .... अचानक विचार शृंखला शुरू होती है, और मैं ही विचार को ताकत दे देता हूं।
वह विचार मूर्त होकर और ताकत पाकर, ...  अभिव्यक्ति की सीमा रेखा तक आ जाता है, ... शब्दों से भी बह जाता है, जहां अवरोध खड़ा किया, ...  वह लौटता तो है, पर दूसरा विचार आ जाता है, बाहर इन्द्रियां है। उनसे बाहर विषय की सत्ता है।
विषय, ...  बाहर है, यही दृश्य है, जिसका चिन्तन निरंतर होता रहता है, यही चिन्तन दासता सौंपता है, ... गुलाम मन इन विषयों में निरंतर भटकता रहता है.
भीतर छिपा हुआ क्रोध है, ...  उसके नीचे आसक्ति है, ...  उसके नीचे अहंकार है, ...  जरा सी बाधा हुई, ...  विचारणा फूट पड़ती है।
 आप नहीं जानते हैं, प्रवाह में बहे चले जाते हैं, ... तब कठिनाई नहीं होती है। कठिनाई तभी होती है, जब भूल, यह जानते हुई कि यह गलती है, हो रही है, तब क्या किया जाए? जाना, ...  सारा प्रयास भूल से बचने के लिए ही होता रहा। कहीं गलत न हो जाए, ...  भीतर यही प्रतिक्षण रहा। यही कारण है, भीतर ठोसपन नहीं आ पाया, ... होना चाहिए था, मालिक की तरह रहा जाए, मन नियंत्रण में हो, संयम में हो, संतुलन में हो, ... पर मन ही प्रभावी रहा। वह खींचता पूरा अस्तित्व उसके साथ चला जाता। इसी कारण भीतर भय भी आ गया। पाया भीतर जिस मौलिक परिवर्तन की चाह थी, ...  वह नहीं हो पाई। स्वामी शरणानंद जी कहा करते थे- अचाह पद, ...  चाह ही नहीं हो। जाना, जीवन की दिशा सही की ओर चलने की होनी चाहिए, जो सही है, वही विवेकी है।

भूूल से बचने की तरफ जाना, अपने आपको तर्क के आधार पर न्यायोचित ठहराते रहना , नकारात्मक सोच है। सोच विधायी रहे। ईष्या से बचने पर ध्यान रहे, ध्यान प्रेम पर रहे। परनिन्दा से बचने के लिए, ध्यान आत्मप्रशंसा पर न रहे। क्रोध से बचने के लिए ध्यान, शांति पर रहे। गलतियां न हो, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है सही होना शुरू हो जाए। संतुलन व्यवहार में हो। अनावश्यक उत्तेजना न हो। जो भी हो, जहां बोला जा रहा है, सुना जा रहा है, बोधपूर्वक हो, सजगता में हो, सही हो,
... जाना, अपने भीतर जाना, ... चित्त अस्थिर है, ... यह भी जाना, जैसे दीया जल रहा हो उसकी ज्योति झिलमिलाती है, तो चारों ओर प्रतिबिम्ब भी हिलते रहते हैं। भीतर ऐसा ही कंपता रहता है,  मन। सुना था- ज्योति को ठहरा दो- छायाएं ठहर जाएंगी। पर कैसे? कांपता हुआ चित्त- जहां लहरें एक के बाद एक अनेक उठती जा रही है, ... वे कैसे रुके। पानी-हवा का स्पर्श पाकर लहरें उठा देता है। ... शांत सरोवर, कैसे हो?
सवाल यही था, ...  होना ऐसा ही चाहिए। भीतर कंपन बंद हो जाएगा तो फिर छायाएं भी कांपती नहीं आएंगी। भीतर मन डांवाडोल है, ...  विचारणा का प्रवाह निरंतरता में है, ...  शास्त्र कहता है, ज्योति को ठहरा दो, ...
 कंपन के उठते ही, वह विचार रूप में ढले, वहां अपना सहयोग मत दो, पर वह मन की आदत है, उसी ने खड़ा किया है, ...  वह उसे ताकत देता है, ...  तब जो दूसरा मन है जो दृष्टा है, उसे ताकत दो, वह देखे, इतनी तीक्षणता से देखे कि उसके ताप से वह कंपन नहीं चित्त के दर्पण पर विलीन हो जाए।
गहरी श्वास, पर तभी ध्यान... आती हुई...जाती हुई... एक पूरे वर्तुल पर ध्यान रहा तो कंपन उठने रुक जाते हैं, ... पर तीन-चार गहरी श्वास के वर्तुल के साथ ही कंपन तेजी से आने लगते हैं, ... यहां ध्यान रहे, ... सजगता रहे, ... तो भीतर की ज्योति कांपती कम हो जाती है।
... भगवान बुद्ध ने यहां किसी आरोपित कल्पना को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है, जान लो, तथ्य को, यह है, जानने का उपाय है, स्थिर हो जाओ। उन्होंने ध्यान उपाय बताया है।
‘‘जिसके चित्त में राग नहीं है, और इसलिए जिसके चित्त में द्वेष नहीं है, जो पाप-पुण्य से मुक्त है, उस जाग्रत पुरुष को भय नहीं।’’
अभय- जहां भय और निर्भय दोनों खो जाते हैं।
कौन आदमी अभय को प्राप्त होता है, जिस चित्त में राग नहीं। उस चित्त में द्वेष नहीं होता।
राग-संबंध किसी से है, ऐसी आशा है सुख मिलेगा। किसी दूसरे से सुख मिलेगा दूसरी आकांक्षा है। राग भीतर कपड़े का गीलापन है, जहां धूल ठहर जाती है। ... राग वह रंग है, जो दृश्य का प्रभाव होते ही चित्त पर ठहर जाता है। द्वेष किसी दूसरे से दुख मिल रहा है, इसका अनुभव है।
जिसके चित्त में राग नहीं है- जिसने यह सोचना ही बंद कर दिया है कि किसी दूसरे से सुख मिलेगा। जो जाग गया है। जहां भी दूसरा है, उस दूसरे से सुख मिल सकता है वहां राग है।
जिसने इस सत्य को जान लिया कि दूसरे से सुख नहीं मिलेगा, उसकी दिशा तब मुड़ती है, तब बहिर्मुखता से वह अंतर्मुखी होता है। वह द्वार से भीतर की ओर लौटता है। बाहर तो सुख नहीं मिला, भीतर लौटूं। जिसने जान लिया सुख मेरा भीतर है। फिर वहां द्वेष को जगह नहीं है। अपेक्षा ही दुख का कारण है। जिनसे जितनी अपेक्षा होती है उनसे उतना ही दुख मिलता है। लेकिन अगर अपेक्षा छोड़ दी जाए तो क्या दूसरा दुख देने में समर्थ हो सकता है?
शायद मेरी गलती यही रही। दूसरों से अपेक्षा बढ़ती ही चली गई। दूसरों से मांग बढ़ती ही गई। स्वयं को खो दिया, ... दूसरों ने आकर चेतना पर अतिक्रमण कर लिया, ... उनकी ही बातें, उनके विचार, ... रात को भी सोने नहीं देते। स्वप्न भी उनके, ... असंख्य, ... जाना अपेक्षा छोड़ते ही, भीतर आत्मविश्वास लौटता है। भीतर की दूसरों से मांग कम होते ही, ... भीतर एक खालीपन सा हो जाता है। जाना- किसी से कुछ मिलता नहीं है, तब दूसरा दुख देने वाला भी चला जाता है। हम दूसरे का आश्रय यह मन ही देता है। अपेक्षा में उसको जीवंतता मिलती है। अगर सुख किसी सेे नहीं मांगा जाए तो कोई दुख भी देने में समर्थ नहीं है। तब भीतर का खालीपन आत्मविश्वास से भर जाता है। वहीं संतोष उपजता है। जो हारे का हरिनाम नहीं , वास्तविक अपना धन होता है।

भगवान बुद्ध का वचन है- मन की आकांक्षा दुष्कर है, वह कभी मरती नहीं। जीवन में संतोष नहीं आता।
अभय वहीं उपस्थित होताहै, जिसने जान लिया जो तुम्हारा है , वह तुम्हारा है, मांगने की कोई जरूरत नहीं। जो तुम्हारा  ही नहीं है, कितना भी मांगो, तुम उसके मालिक नहीं हो सकते। हम परमात्मा से संसार मांगते हैं, हमारा सारा कर्मकांड  हमें भिखारी  बनाने में तत्पर है। जिस दिन यह दिखाई पड़ जाता है, उसी क्षण याचक खो जाता है। अभय पैदा हो जाता है।
...शास्त्र का यहां वचन है- साधक के पास एक ही हथियार  है, ज्ञान का, होश का, प्रज्ञा का। उसी के साथ वासना को तिरोहित किया जा सकता है। जिससे भी लड़ना हो होश से लड़ना। भीतर यह जाना , वहॉं क्रोध है, दबा हुआ, मौका पाते ही बाहर आ जाता है, उस क्रोध को अब दबाना कोई उपाय नहीं है। क्रोध को देखना, क्रोध के प्रति जगना, होश बनाए रखना.पाया... क्रोध की जड़ तो कामना में है, चाह है, चाह की आपूर्ति में बाधा आते ही क्रोध उफन जाता है। जाना, मूर्च्छा में, बेहोशी में वृत्तियों का पसारा होता है... होश में आते ही पसारा सिमट जाता है।

...मैंने जाना, मेरे भीतर विषाद की जड़ यह क्रोध ही है। यही व्यक्तित्व बन गया है। उठते ही लहर को जाना, ... वह नदी न बन जाए, प्रपात न बन जाए, मन जो इसे सहयोग दे रहा था, उसको नहीं जाना, ... पाया क्षणिक सा कंपन ध्यान न देने पर प्रपात बन जाता है। यह बेहोशी ही, मन की चंचलता का रहस्य है। सजगता आने पर वृत्तियों सिमटने लग जाती है। इस स्थल पर ‘सजगता’ पाने के लिए-क्या किया जाए?

शास्त्र का वचन है- सबसे अधिक बुराई गलत मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है गलत मार्ग- स्वयं को न देखकर, शेष सब दिशाओं में भटक जाना। भीतर न खोजकर बाहर देखना, अपने घर न आकर बाहर भीख मांगना। होश, जागृति, ध्यान उसके पीछे सबसे अधिक भलाई सही मार्ग पर लगा हुआ चित्त करता है। जिसका मन हमेशा दूसरे में रहता है, वही पाप में है।

एक ही साथ खोज लेने योग्य है- अपने बोध के साथ, अपने आप को जानना। संत कबीर ने कहा था, ”आए थे हरि भजन को औटन लगे कपास“।
सजगता में अपने आपको, अपने  साथ खोजना ही ध्यान है। दूसरे के साथ खोजना ही विचार है। विचार में सदा दूसरे की याद बनी रहती है। विचार बाहर की भीड़ के प्रतिबिम्ब हैं। विचार जो तुम्हारे साथ नहीं है उनको साथ मान लेने की कल्पना है, ध्यान में बिल्कुल अकेलापन है, अपने ही साथ, बस। बात सीधी सी है, जब भी हम विचार में होते हैं, हम दूसरे के साथ ही होते हैं। जब अपने साथ होते हैं, वहॉं विचार गिर जाते हैं। पाप दूसरों के साथ भटकना है।

सही मार्ग- अपनी तरफ लौटना। भीतर की तरफ लौटना। जहां विचार छूटते जाते हैं।
मैंने अपनी स्थिति पर विचार किया, अन्वेषण किया।
पाया, ... मेरी दुर्बलता जो समय हाथ में आया है, जो क्षण उपलब्ध है, उसे बस कल के लिए छोड़ता रहा। जीवन को समग्रता में जी नहीं पाया। मैं दूसरों के साथ ही चलता रहा। जो नहीं करना था ,वही किया। कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच एक महीन सी रेखा है। हम अनुकरण में वही सब करते रहजे हैं, जिसका बाहर विरोध करते हैं। पत्नी है, संतान हैं, या तो उनकी दासता है, या संघर्ष है। अधिकांश समय उनके ही चिंतन में चला जाता है। यही वह जाला है, हम जिसे मकड़ी की तरह अपने ही थूक से बनाते हैं, अंत में उसी में उलझकर रह जाते हैं। देहांत और मृत्यु का भेद यही है। देहांत तो केवल शरीर का नाश है। संस्कार और भी सघन होकर मन के साथ रह जाते हैं। हम जिसका चिन्तन करते हैं, उसके ही गुलाम होजाते हैं। फिर उसी के बारे में ही सोचते रहते हैं।

जाना- पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- वर्तमान में रहो। ये शब्द मात्र सूचना की तरह रहे, भीतर नहीं उतर पाए।
जाना जीवन की कला यही है। इस एक क्षण को भी कैसे जिया जाए। कैसे जीवन की समग्रता यहां आ जाए। इस एक क्षण में गहराई से उतर जाना ही, जीवन जीने कला है। यहां जो भूत और भविष्य में जो ले जाता है, वह मन है, वह विचार है,   वह अनुपस्थित है। वर्तमान में रहना, इसी क्षण को पूरा जिया जाए, समग्रता में। इस एक क्षण में भी गहराई में वहीजाग्रत है, जो समग्र जीवन में है। उसे आज में, अभी में प्राप्त करना ही,  जो जीवन क्षण भंगुर है, उसमें  इस जीवन की  वास्तविक पहचान है। ... यही जानना बोध है। क्षण में उतरना ही ध्यान है। यह समय में प्रवेश की कला है।

Monday, November 11, 2013

श्री गुरुगीता चौथा अध्याय

श्री गुरुगीता चौथा अध्याय

सांख्य निष्ठा का अर्थ है, वह तुम्हारे पास ही है, कहीं बाहर जाना नहीं है। उसके लिए कोई प्रयास नहीं करना है। यह बात तर्क से समझ में नहीं आती। हम बचपन से कुछ ना कुछ करते ही रहना चाहते हैं। मेरा हर सवाल यही खत्म होता था, ‘हमें क्या करना है? स्वामीजी ने न सत्संग करा रहे थे, न ध्यान सिखा रहे थे, ... वे अप्रयत्न समझाने की चेष्टा कर रहे थे। यहां भीतर तक संग्रह जमा था। बहुत पढ़ा था, सूचनाएं असंख्य थीं, ...इसका अहंकार था। बिना कुछ किए क्या कुछ पाया जा सकता है। स्वामीजी कहा करते थे- पाना क्या है? यह सवाल ही गलत है। जिसे पाना है, वह तुम्हारी स्वाभाविक अवस्था है, जिसे सहजावस्था भी कहा जा सकता है।
हम पूछते थे, ”आपको कुछ परिवर्तन दिखाई देता है?“
वे हॅंस कर रह जाते थे, ”अभी तो बहुत संग्रह जमा है।“
हम उनसे चाहते क्या हैं, यह भी नहीं पता था, बस एक विश्वास था , वे हमारे साथ हैं, हमारा अशुभ नहीं होगा?एक प्रकार का लोभ था, शॉर्टकट भयमुक्त होने का।
वे यही कहते थे, ‘‘करने की क्या जरूरत है, सिर्फ जानना ही पर्याप्त है। जानते ही सब हो जाता है। शरीर के द्वारा की गई कोई विधि वहां तक नहीं ले जाती। गुरु भी, ईश्वर भी,  जो जाना या माना जाता है, वह माया में ही है। वह तो परिवर्तनशील है। केवल सत्य ही सत्य को प्रकट कर सकता है।’’
फिर क्या किया जाए?
स्वामीजी का एक ही उत्तर रहता था। ”वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास रखा जाए, बस बहुत छोटी सी विधि है।“
‘सांख्य कहता है- जो कुछ भी किया जाता है, वह बाहर होता है, बहिर्मुखता में है, हम जिसे खोज रहे हैैंं, वह भीतर है। वह तो अंतर्मुखी होकर ही पाया जा सकता है, ... भीतर जाने का रास्ता बहुत विरल है, ... वहां कर्म नहीं पहुंचता। वहां अकर्म का सहारा लेना होता है। जहां क्रिया में अहंकार होता है, वहां कर्म बनता है, जहां अहंकार रहित क्रिया है, वहां अकर्म घटता है।
... स्वामीजी कहा करते थे- तेरी इच्छा पूरी हो, जो हो रहा है, उसे होने देना है। सहजावस्था में जहां भी जो घट रहा है, वहां प्रतिक्रिया न हो, प्रायः हम प्रतिक्रिया को ही क्रिया जानते हैं। चाहे दुःख आ रहा है या सुख, दोनों ही स्वीकार है। जो भी घट रहा है, उसके लिए हम राजी हैं। यह कहना सरल हे। बाहर जो घट रहा है, उसे सीरियल की तरह देखते रहो, कोई प्रतिक्रिया नहीं हो। पर क्या हम क्रिया नहीं करेंगे? क्रिया के लिए आप स्वतंत्र हैं, जहॉं क्रिया के साथ मन रहा वहॉं क्रिया स्वतः निर्दोष हो जाती है।  परन्तु हम हमेशा प्रतिक्रिया में ही तो रहते हें। क्योंकि हमारा मन वहॉं अत्यधिक सक्रिय रहता है। लगातार विचारणा का दबाग बना रहता है।

‘वीतरागभयक्रोधा मन्मया भामुपाश्रिताः।
बहवो  ज्ञानतपसा  पूता मावमागताः।। 4-10
‘राग भय और क्रोध से रहित, अनन्य भाव से मेरे में स्थित वाले, मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष, ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
‘राग-चित्त पर पड़ी हुआ वासना की छाप है, ... विराग होना है, राग के विपरीत विराग होता है, वीतराग... राग से, विराग से दोनों से पार हुआ। उसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो भी नाटक में रोल मिला है, वह उसे बढ़िया करेगा। उसका कोई चयन नहीं है। आसक्त, विरक्त, तीसरा है अनासक्त। वीतराग का अर्थ हुआ, जो कहीं बंधा हुआ नहीं है। राग को तो भूल जाते हैं, पर विराग का दंश हटाए नहीं हटता है। वह छाया की तरह ग्रहण लगा देता है। यहां तक द्वन्द रहता है। पर जहां वीतरागता है, वहां वह इस द्वन्द से बाहर है। भगवान यहां कह रहे हैं- जो वीतराग हो जाता है, जो मेरे-तेरे के भाव से उठ जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
भगवान का स्वरूप है, विराट, ... वह उसी विराट में समा जाता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- बाह्यमन का अंतर्मन में लय हो जाता है, अंतर्मन विराट के समीप है। वह उसी में है, ... वह उसी का अंश हो जाता है, तभी उस महान शक्ति का पता लगता है। यही ज्ञान है। वह पलायन में नहीं है। वह काष्ठवत नहीं है।
‘अनन्य भाव से मेरे में स्थिति वाले जो मुझ से अपने आपको भिन्न नहीं मानते। कहाजाता है, ”तेरा तुझको सौंपत क्या लागे मेरा,“ यहॉं जो मेरा था वही तेरा होगया है। यहां संकल्प जो जगा था, उसका भी समर्पण हो जाता है, वहीं अनन्य भाव है, ...मात्र श्रद्धा शेष रह जाती है। ”बीन भी हूॅं तुम्हारी रागिनी भी हूॅं। शरणागति वहीं तक है, जहां दूसरा भी है।  पर  यहां तो दूसरे का पूरा अभाव हो गया है।
जब तक बाह्य मन सक्रिय रहता है, अहंकार रहता है। मैं बचा रहता है। उसका ‘अंतर्मन’ में लय होना ही समर्पण है। बाह्यमन बहुत उपाय तलाश करता है। वह किसी न किसी बहाने बाहर भटकाता रहता है। उसका अहंकार बाह्य का सहारा पाकर ही खड़ा होता है। भगवान ने इसी श्लोक में- विधि को स्पष्ट भी किया है- साधना, किस प्रकार की हो, जहां ज्ञान का आधार तो हो,  पर अहंकार का नहीं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। 4-11
हे, अर्जुन! जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं (भी) उनको वैसे ही भजता हूं। इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान मनुष्य गण सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण वर्तते हैं-
पूज्य स्वामी जी का यह प्रिय श्लोक था। वे कहा करते थे- ‘ज्ञानी कुछ नहीं करता, पर नहीं करते हुए भी करता है। प्रकृति उसके सारे प्रबन्ध को स्वयं संभाल लेती है। उनके साथ रहकर जाना था, ... मानो अदृश्य सदैव पथ प्रदर्शित कर रहा हो।
... जैसा हम होते हैं, वैसे ही अनुगूंज हमारे पास आती महसूस होती है, इसे बुद्धि के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है, ... पर  वही होता है, घटता है, जैसी आवाज हम में होती है, वैसी ही अनुगूंज हमारे पास आ जाती है, जो चित्र हम बनाते जाते हैं, ... एक कोई महान दर्पण है, ... वह सारी गतिविधियों को वापिस भेजता चला जाता है। हम एक भला कदम आगे बढ़ाते हैं, दूसरी तरफ से उतने ही कदम हमारी तरफ बढ़ते हैं। यही स्थिति अमंगल भावना की भी है। हम जैसा बोते जा रहे हैं, वैसी ही फसल तैयार होती जा रही है।
भगवान कह रहे हैं- जो जिस रूप में मुझे भजता है, मैं भी उसको वैसे ही भजता हूं। स्वामीजी इसे प्राकृतिक विधान कहा करते थे- वे कहा करते थे- प्रकृति में कहीं भी गलत नहीं है, हमें पता नहीं है, ... हमारी अज्ञानता है, बस, लेकिन वहां अन्याय नहीं होता है।
कई महिनों से मैं अशांत था, ... क्यों, पता नहीं, ... संभवतः सभी के प्रति जो भी परिचित रहे, एक अजीब प्रकार की नाराजगी मन में आती रही। स्वामीजी कहा करते थे- मन फिरकनी की तरह है, ... बाह्य का बल लगा वह घूमती जाती है, ... उसके घूमने से विचार पैदा होते हैं, ... विचारों से फिरकनी घूमती जाती है, उसे बल मिलता जाता है, .पर बाह्यका बल हटते ही फिरकनी गिर जाती हैै।.. पर तब यह वाक्य मात्र सूचना ही दे रहा था।
अचानक जब भीतर मुड़ा, अपने आपको देखा, तो पाया, नकारात्मकता का दबाव इतना बढ़ गया है कि बस मन घूमता ही रहता है, वह भी दूसरों के द्वारा आहत किए गए  क्षणों के बोझ से।
तब अचानक यह श्लोक सुनाई पड़ा, ... एक अनुगूंज स्वप्न में हुयी।
जो मेरे को जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूं। ... भगवान भजते हैं, वह तो सब जगह है, ... बाहर-भीतर, ... मैं जिसको जिस रूप में देख रहा हूं, वह भी मुझे उसी रूप में देख रहा है। ‘प्रेम न हाट बिकाय, ... मेेरे भीतर का प्रेम का स्रोत सूखता चला गया था। मेरे भीतर वही तो सुनाई पड़ रहा है, जो मैं बाहर देख रहा हूं। मेरा ही सोचा हुआ, मेरा ही देखा हुआ, मेरा ही जाना हुआ, ... सब दिशाओं से मेरेे ही पास तो लौट रहा है।
यह आत्म स्वीकृति गहरी थी।
विराट कोई अवधारणा नहीं है। वह तो सत्य है, जीवन्त। दोष मेरा ही था। मैं मात्र सूचनाओं का संग्रह ही करता रहा। मेरे चेहरे से मेरी प्रसन्नता भी चली गई। एक खिन्नता ही व्याप्त हो गई। मैं मात्र जिन्दगी में जो घटियापन था, उसे ही स्याही सोख्ते की तरह संजोता रहा।  प्रकृति ने बार-बार बुलाया ,वहाँ की रमणीयता में भी नहीं खोपाया, मात्र अपने मन में व्याप्त होती लहरों की अनुगूंज ही सुनता रहा। और हर बार हर लहर के साथ तैरता रहा। उसे सातत्य देता रहा। मैं और लहर दोनों एकरस हो गए। मैं ही कंकड़ फेंकता, लहर उठती, उसके साथ दूर तक  चला जाता। जब बाहर के हर संवेदन के प्रति तटस्थ होता चला गया। तब जाना- ‘स्मृति पाप क्यों है? भगवान के वचन, अचानक उतरे, भीतर तक उतरते चले गए, मैं उसको वैसे ही भजता हूं।
भजन, हृदय से होता है, वह भी नहीं है। जहां हर लहर के प्रति संग नहीं रहना होता। एक तटस्थता आने लगती है। वहीं दृष्टा भाव है। वह जब जगता है, तब पता लगता है, बाहर कहीं खूंटियां नहीं है। खूंटियां भीतर ही है।
... अब यह जानना मात्र सूचना नहीं थी। यह शास्त्र वचन नहीं रहा। यह मेरा अपना सच था, ... दुःख पाया, क्योंकि बाहर दुःख भेजता रहा। दूसरों के प्रति उपेक्षा रखी, ... वही दुख ही वापिस लौटकर मेरे पास आया। डाक की तरह, रचना जैसे लौटती है। प्रकाशन योग्य नहीं समझी गई।
प्रेम आता ही कैसे, ... दिया कहां था? जो हम देते हैं, ... हमारे पास तो दो हाथ है, पर विराट के करोड़ों हाथ है। हम कितना देंगे, ... क्या दे सकते हैं, पर जब वह विराट लौटाता है, तब यह सचमुच पता नहीं था। वह कई गुना होकर लौटता है।
स्वामीजी कहते थे- हमें प्रकृति के कार्य में सहयोग करना है। प्रकृति ने हरेक को उसकी योग्यता के अनुसार सामर्थ्य देकर भेजा है। यहां उपभोग नहीं, दुरपयोग नहीं, सदुपयोग होना है। जब हम प्रकृति को कुछ सोंपते हैं, ... प्रकृति उदार है, वह नहीं रखती है, वह तो कई गुना लौटा देती है।
आइने में देखता था, ... मेरा चेहरा ही सख्त हो गया है। शरीर में दर्द आ गया है। भीतर क्रोध है। बाहर सबके प्रति क्रोध का भाव उपजता है, अहंकार किसी को अपने पास ठहरने नहीं देता। जाना जो भीतर धुंवा उठ रहा था, वही बाहर भी जा रहा था। जो जब लौटता है, विषाक्त, जहां प्रेम नहीं, मात्र एक उपेक्षा, तब भी यह यहीं जाना कि यह तो मेरा ही धन था, जो बाद में मय ब्याज लौटा है।
बचपन में, मैं आश्वस्त था, न तो इतना ज्ञान था, न ज्यादा सूचनाओं का संग्रह था। बस, जो कुछ कहना है, बाहर परमात्मा है या नहीं पता नहीं, ... पर वह है सुनता है, उससे कह दिया, ... शायद यही प्रार्थना रही होगी, ... बैठा रहता था, ... इतना आश्वस्त था कि मेरे पास उत्तर आएगा। कई बार मंदिर जाता था, ... दूर बैठ जाता था, ... अगर ऊपर का फूल नीचे दाएं गिर गया तो मेरी बात सुनी गई है, अन्यथा नहीं, ... देखता था, ... कई बार फूल उसी आधार पर नीचे आ जाता था, ... बाद में देखता था, जो चाहा था वैसा घट गया, ... क्यों? तब मुझे मेरी प्रार्थना पर भरोसा था। बचपन में घर से दूर था, ... एक संवाद था। जो कहना है, उसे परम परमात्मा से कह दो। धीरे-धीरे, बुद्धि बढ़ती गई, प्रार्थना भी छूट गई। सचमुच वह अनुभूति भी विदा हो गई। भीतर बस एक जला हुआ विषाक्त मन रह गया। जहां बस धुंवा ही उठता था।
जब मन शांत होने लगता है, ... तब उपजता है, उत्तर भीतर से आ रहा है। मैंने लगाई अर्जी, जैसी दाता की मर्जी, ... यही पूर्वाभास है। यह होना है या नहीं, ... स्वतः बोध होने लग जाता है। पर उसके लिए धैर्य चाहिए, ... अपार, भीतर की हर गंदगी के प्रति तीव्र अनुभवन, ... सफाई पूरी हो, कहीं भी वह ठहर जाए, अब उसके प्रति कोई आग्रह नहीं, बस एक तटस्थता, प्राप्त विवेक का आदर, जो गलत माना जा रहा था, ... उसे रोकने में सहायक है, ... वरना कुम्हार के चाक की तरह नए-नए बर्तन हर क्षण बनते चले जा रहे हैं।

न मां कर्माणि लिम्पति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति  कर्मभिर्न स बध्यते।। 4.14
भगवान ने यहां अपने बारे में कहा है- कर्मों के फलों में मेरी कोई स्पृहा नहीं है, इसलिए मेरे को कर्म लिपायमान नहीं करते।
-कर्मों के फल में स्पृहा नहीं है। आकांक्षा ही नहीं है। फल की आकांक्षा हो तो खेल भी कर्म बन जाता है। स्वामीजी कहा करते थे- यहां पाने को कुछ भी नहीं है, ... बस जो अनावश्यक है, उसका छूटता जाना है, परमात्मा ने यह सृष्टि क्यों रची, बस एक खेल है, इससे अधिक नहीं, यह अनादि है, ... चल रहा है, जिस दिन खेल रुक जाएगा, सृष्टि ही रुक जाएगी। परमात्मा जो बस रच रहा है। जो भी रचा हुआ है, वहां वहीं है।
स्वामीजी जब कहते थे- ‘वर्तमान में रहो, तब हम सुन लेते थे। पर रहे तो भविष्य में ही। घूम-फिर कर सवाल अपने भविष्य के सुख का ही पूछते थे। जाना, मात्र सुन लेते थे, ... पर रहते तो भविष्य में ही, या फिर भूत में।
बड़ा मजा है, भविष्य में जिया नहीं जाना। शरीर तो वर्तमान में रहता है पर मन सपनों में खोया रहता है। फल हमेशा कल में आता है। कर्म हमेशा वर्तमान में ही होता है।
पर अगर आज मैंने दुःख को रचा है, तो कल वही हाथ में आएगा। इस सत्य पर विश्वास नहीं था।
हम यही सोचते हैं, ज्योतिषी के पास जाते हैं, वह कहता है आज जो खाली पन है, वह कल भर जाएगा, वह अंगूठी देता है, वह सपने देता है। हम यह भूल जाते हैं। जो आज खाली है, उदास है, वह मात्र सपनों में ही कल अपनी आकांक्षा की पूर्ति देख रहा है। कल जब हिसाब लगेगा तो बस एक बड़ा खालीपन ही हाथ में आएगा।
आज के साथ जीना ही साधना है, ‘कल के साथ जीना मात्र सपनों में होता है। ‘वर्तमान’ ही बहुमूल्य है, भगवान कहते हैं- ‘मेरे भीतर कल की कोई स्पृहा नहीं है।
‘स्वामीजी“, ने चूड़ाला आख्यान पर एक साधना परक वृतांत लिखा था। नाम रखा था- अनंत यात्रा, ... परमात्मा भी क्षणजीवी है। हर क्षण में वह है। अपनी संपूर्ण गहराई के साथ, ... वही क्षण अनंत है। एक क्षण भी अनंत के द्वार खोल देता है। यह यात्रा, ... बाहर नहीं जाती है। जब मन ठहरता है, उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं मिलता, तब वह अनंत की ओर मुड़ जाता है। यहीं अंतर्मुखता है। यहां पर बस वर्तमान है, कहीं कोई , कल नहीं है। कोई अगला क्षण नहीं है। अगला हर क्षण, कल में किसी आकांक्षा को लेकर उपजता है।
भगवान कह रहे हैं- जो इस बात को समझ लेता है, वह मेरे स्वरूप को समझ लेता है। वह भी मेरे स्वरूप को पा लेता है।
अनंत का मार्ग क्या है? फल की कोई लालसा नहीं। कोई आकांक्षा नहीं। जो कर रहे हैं, ... बस वही है। कर्म ही पर्याप्त है, ... कर्म बस एक खेल बन जाए।
‘वर्तमान’ क्या है, ... एक तेजी से फिसलता क्षण, जहां भविष्य हर पल भूत में बदल जाता है। हम उसे पकड़ नहीं पाते, ... उसका साक्षी होना कठिन है। परमात्मा का वर्तमान अनंत है, पर हमारा, ... हमें इसी क्षण में हो रहे कार्य को ही साथ लेकर वर्तमान में रहना सीखना होगा। क्रिया तो है, पर उसके साथ कोई चिन्तन नहीं है। कोई फलाकांक्षा नहीं। कोई स्पृहा नहीं। जो भविष्य की ओर ले जाती है, वह स्थगित, तब मात्र वर्तमान बच जाता है। वहां कर्म तो है, ... पर मन वहां निष्क्रिय है, और जो शक्ति कर्म करा रही है, वह सजग है, ... भीतर का कोलाहल ही भविष्य की ओर झांकने को निरंतर धकेलता रहता है।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं  च विकर्मणः।
अकर्मणश्च  बोद्धव्यं  गहना कर्मणोे गतिः।।4.17
कर्म की गति अगाध है, ...
भगवान ने इसके पूर्व कहा है, कर्म क्या है, अकर्म क्या है, ऐसे इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित होता है।
जहां हम प्रतिक्रिया में होते हैं, दूसरे से संबोधित होते हैं, वहां त्मंबजपवद होता है। वह प्रतिकर्म है। कर्म वही होता है, जो दूसरे को केन्द्र में रखकर  नहीं किया जाता है। यहां स्वामित्व अपना है। असमर्थता अकर्म नहीं है। अकर्म है- जहां भीतर का कर्ता मात्र साक्षी है। उसका अहंकार तिरोहित हो गया है। कर्म सहजावस्था है। दूसरे की प्रतिक्रिया में नहीं है। निषिद्ध कर्म वे हैं, जो करने योग्य नहीं है।
 कौन है, जो, जो भी मिल जाए, जो चाहना है, वह पूरी हो जाए फिर भी असंतुष्ट रहता है कुछ ना कुछ मांग बनी रहती है? क्या मैं तो वह  नहीं हूॅं?
पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- ‘मैं कितना  तुम्हें संतुष्ट करने  की चेष्टा करूं पर मांग तो कभी किसी की पूरी होती नहीं है, रोज नई मांग कौने में उठ खड़ी होती है।
जो मिले, उससे संतुष्ट हो जाए, कोई नई लहर नहीं,... तो चित्त ही विदा हो जाताहै। चित्त का स्वभाव है नई-नई मांग पैदा करते रहना। मिलते ही किसी दूसरी मांग को खड़ा कर देना। चित्त तो सदा से ही असंतुष्ट है, ... असंतोष के साथ ही मन खड़ा होता है। संतोष के आते ही चित्त विदा हो जाता है। होना यही चाहिए मांग कम से होती जाए, जो पूरी हो रही है, वहां संतोष हो, जो पूरी होने वाली नहीं है, उनका पता अपने आप लग जाता है, उन्हें छूट जाने दें। जहां अपेक्षा है, वहां असंतोष है। जो मिल गया, वही बहुत है। पर होता विपरीत है, जो नहीं मिला है, उसके लिए मन भटकता रहता है, जो मिल गया है, उसको देखने की भी फुरसत नहीं होती है।
भगवान कहते हैं- जो मिल जाए उसमें जो संतुष्ट है, तथा द्वन्द से पार है जो ,  द्वन्द से पार होना कठिन है। यह मन का स्वभाव है। वह दो काम एक साथ कर सकता है। वह स्वयं दुश्मन को खड़ा कर सकता है, उसके साथ तर्क- वितर्क कर सकता है। वह उसकी भाषा भी बना सकता है, उसे भी तर्क दे सकता है। खुद का बचाव भी कर सकता है। यही द्वन्द है।
मेरे पांव में दर्द था। घर से बाहर खड़ा था एक नीम हकीम आ गया। वह दर्द की दवा के लिए कह रहा था। उत्सुकता जगी। उसने पांव देखा। बोला, पिंडली में खून जमा है। आप कहो तो देख ले। दर्द बहुत था, ... दिखा दिया, ... उसने एक यंत्र निकाला, ... फिर एक पैकेट जिसमें ‘स्टरलाइज नीडिल थी, ... हल्का सा पंच किया, ... पंप लगाया, जब हटाया तो वहां पर खून की बूंदें आ गईं थी, ... उसने, कंेची से, उन बूंदों को हटाया, ... मक्खन की तरह कुछ वहां था, ... बोला, यह जमा हो गया है, निकाल दिया है।
पाया, दर्द वहां नहीं था, ... पांव जो भारी था, ... हल्का हो गया था। पर मैं उसे धन्यवाद भी नहीं दे पाया। तत्काल मन ने कहा, यह कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई, ... कुछ और बीमारी हो गई तो, मन ने जो किया था उसका दूसरा हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा हो गया था। वह कह रहा था- टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लंे, ... अगर आप पूरा पंच करवालेंगे, ... तो फिर कभी दर्द नहीं होगा, पर मन अब पूरी तरह से जो हुआ उसके विरोध में आ चुका था, ... टिटनेस का इंजेक्शन लगवा लिया। वह दूसरे दिन भी आया। दर्द कैसा है, वह बार-बार पूछता रहा। पर मन अब उसके विरोध में जा चुका था।
जाना मन कभी भी एक तरफ सौ टका खड़ा  नहीं होता। एक हिस्सा निरन्तर दूसरे के विरोध में खड़ा रहता है। यही द्वन्द्व है। जाना मैं हमेशा दो रास्तों पर चलता रहा हूं, एक मन  होना चाहता हूॅं, मुश्किल यही है, वह जो दूसरा है, वह और मजबूत हो जाता है।
भगवान कहते हैं- ‘
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।ं4.--22
”अपने आप जो कुछ  प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहने वाला,हर्षादि द्वंद्वों से अतीत हुआ, ईर्ष्या से रहित,सिद्धि और असिद्धि में समत्व भाव वाला पुरुष कर्मों को करके भी नहीं देखता है।“
द्वन्द्वातीत, द्वन्द्व से बाहर, जो दो, के बाहर होता है, वही कर्म के बंधन से मुक्त होता है।
स्वामीजी कहा करते थे- थिंक वन्स डीसाइड वन्स, नेवर हेव ए सैकन्ड थॉट...
....एक बार सोचो, निर्णय करो, ... फिर दुबारा मत सोचो। पर जाना, निर्णय के बाद भी विचारणा का वेग तेजी से आता है। आक्रमण सा हो जाता है। निर्णय करने वाला मन, अपने बचाव में हारता, टूटता सा रहता है। तो फिर मन तो द्वन्द्व से बाहर नहीं आ सकता, ... फिर जो मन से बाहर है, जो मन को भी जानता है, वही हो सकता है। जहां तक विकार है। वे द्वन्द्व के भीतर ही हैं। लेकिन जो साक्षी हैं, दृष्टा हैं, वह बाहर जा सकता है।
 द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा   योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाक्ष्च  यतयःसंशितव्रताः।।4-28
दूसरे ईश्वर अर्पण बुद्धि से द्रव्य लगााने वाले हैं।वैसे ही कई पुरुष स्वधर्म पालनरूप तपयज्ञ को करने वरले हैं।कई अष्टांगयोगरूप योग को करने वाले हैं। दूसरे अहिंसा तीक्ष्ण व्रतों से युक्त, ,यत्नशील पुरुष भगवान के नाम का जप, तथा भगवत प्रप्ति विषयक ग्रन्थों का अध्ययनरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।
भगवत् प्राप्ति विषयक शास्त्रों का अध्ययन रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।
स्वाध्याय यज्ञ- स्व और अध्ययन। स्वयं का अध्ययन। स्वाध्याय का अर्थ है। रमण महर्षि की यही साधना थी। वे कहा करते थे- ‘अपने आपको जानो।’ दूसरा कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। हमारा व्यवहार भी बुद्धि से संचालित होता है। वहां बाहर जो भी है, एक पर्दा होता है। हम ही अपने आपको जान सकते हैं।
सच है, हम भी कभी अपने भीतर नहीं जाते। डर लगता है। तत्काल मन दूसरों को बीच में ले आता है। दृश्य का चिन्तन प्रारंभ हो जाता है। हम दूसरों से अपने बारे में जानना चाहते हैं। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्षों को सामने लाते हैं। बहुत ही कठिन होता है, अपने आपको अकेले में ले जाना, और फिर भीतर की सीढ़ियां उतरना।
अपने बारे में अपनी सही पहचान ही, आत्मविश्वास पैदा करती है। मुझ पता है मैं क्या हूं, क्या मेरे दोष हैं, क्या गुण हैं? दुनिया मेरे बारे में कुछ भी सोचती रहे, कहती रहे, मैं कहीं भी प्रतिक्रिया में नहीं हूं। न मैं प्रतिकर्म में हूं, न निषिद्ध कर्म में हूं, ... मैं मात्र अकर्म में हूं। स्वाभाविक अवस्था में हूं।
पर होता इसके विपरीत है। मैं भी अपने बारे में जो बाहर से जाना गया है। उतना ही जान पाता हूं। स्वाध्याय का अर्थ है, दर्पण के सामने में ही हूं। दूसरों ने मेरे बारे में क्या सोचा है, सोच रखा है, यह मेरे लिए व्यर्थ है, ... मेरी पहचान है, ... जहां मैंने अपने ऊपर पत्थर रख रखा है, वह है दमन का, ... मैं तो मात्र कठपुतली हूं, नचाने वाला मेरा संग्रह है, संस्कार है। उसे मैं नहीं जानता, अगर भूले-भटके, ... स्वप्न में भी वह विचारणा आती है, तो मैं उसे सीधे नहीं देख पाता, ... तुरंत दबाने का प्रयास करता हूं। जाना मेरे भीतर क्रोध बचपन से ही दबा पड़ा था, ... सांप की तरह वह मौके ब मौके फन लेकर खड़ा हो जाता था। जाना, मैं ही क्रोध हूं। भीतर भय था, ... हर नई आने वाली परिस्थिति से भय। पूज्य स्वामीजी ने पत्र में लिखा था- ‘तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, भविष्य में ऐसा नहीं होगा, “... मैं नहीं जान पाया, ... वे भीतर तक दबी राख को हटा रहे थे।
स्वाध्याय का दूसरा कदम अपने आपको, अपने आप में खोलते जाना है। जाना, अपने आपको अकेले में ले आना ही ध्यान में उतरने की पहली तैयारी होती है। क्योंकि हम सुबह से शाम तक जहां बाहर दूसरों के साथ होते हैं, वही सपनों को भी दूसरों को साथ ले आते हैं। अकेलापन, ... एकान्त, जहां भीतर भीड़ नहीं हो। सिर्फ आप हैं, ... तब भीतर का कपाट खुलता है। वहां मेरा भय था, ... क्रोध था, दमित, एक ठोस रूप ले चुका था।
... यह जानना ही, सीधा साक्षात्कार ही, प्रगति का पथ होता है। हम जिसे छोड़ना चाहते हैं, वह स्वतः छूटता जाता है। यह परिवर्तन बाहर तक आ जाता है। हमारी जो छवि बाहर हमने दिखा रखी है, वह भी टूटने लगती है। सहज स्वाभाविक अवस्था में हम आ जाते हैं।
भीतर मन जो हमेशा सक्रिय रहता है, ... वहां अब विचार के उठते ही, उसके संग जाने की, साहचर्य देने की आदत पर विराम भी लगना शुरू होता है। तब भीतर जो अकेलापन  है,वह सघन होने लगता है। जैसे गर्मी में कंबल ओढ़ रखा हो, तो पसीने में शरीर नहा जाता है, उसी प्रकार भीतर स्वाध्याय की गर्मी होती है। बाहर के अनावश्यक बोझे अपने आप उतरने लग जाते हैं।
जाना, अपने विकारों को लेकर सत्य के सामने नहीं जाया जा सकता है। विचार ही विकार हैं। विचार झड़ने लगते है, तो विकार भी गिरने लगते हैं। स्वाध्याय ही वह पथ है, ... जो बाहर दिखाई नहीं पड़ता, पर सीधा भीतर की यात्रा पर ले जाता है। यहां जानना ही प्याज के छिलकों का उतरते जाना है।
इसी श्लोक में स्वाध्याय यज्ञ के साथ पूरक विधि आई है। ‘ईश्वर-पथ’ ... स्मरण बना रहे। स्वाध्याय- परमात्म ज्ञान विषयक ग्रन्थों का अध्ययन भी है। परन्तु भगवान ने जिस विधायी विधि का संकेत दिया है, ... वह परमात्मा के प्रति निरंतर स्मरण का भाव। जीवन का उद्देश्य- ‘परमात्मा की महान शक्ति का इसी जीवन में अनुभव प्राप्त करना है, ... यही सुमिरन है। ‘वह’ है। इस्लाम में पांच बार नमाज़ की जाती है। भले ही पांच मिनट की हो। पर उसकी याद का अहसास हमेशा बना रहे।
तपोयज्ञाः
स्वधर्म पालनरूप तप यज्ञ करने वाले हैं।
‘स्वधर्म का सत्य क्या है? मुझे क्या करना है? यह सवाल जन्म से उत्तेजना देता रहा। ज्योतिषी से यही पूछते हैं, ... सफलता कहाँ मिलेगी, ... प्रायः अनुसरण में जीवन चला जाता है। पीछे मुड़कर देखों तो यही पता लगता है, ... बाहर की दुनिया में भले ही सफलता मिली हो, पर भीतर अशांति है, एक खीझ हैं।
... तो जाना.... कहीं गाड़ी पटरी से नीचे उतर गई है। जब प्राध्यापक था, तब एक ही शौक था खूब पढ़ा जाए, ... पर तब सामाजिक, आर्थिक दबाव तंग करने लगे, प्रशासनिक सेवा में आ गया। पर वहां प्राप्त सफलताओं के बीच, जिम्मेदारी पूरी होने के साथ ही फिर भी भीतर अशांति बढ़ती रही, ... तब जाना, कहीं स्वधर्म के पथ से रास्ता विलग हो गया है। छूट गया है।
क्योंकि हर यात्रा की उपलब्धि आनंद है। संतोष है। वह जीवन में नहीं है, तो जीवन व्यर्थ है।
जाना, ... जो हो गया है, वह होना ही था। वह भी अनेक जन्मों का संकल्प था, ... सब अपने आप होता गया। पर अब जब जिम्मेदारियां पूरी हो गई है, ... तब अशांति क्यों? तनाव क्यों? अब तो पुनः सही रास्ते पर आया जा सकता है। जाना तब स्वधर्म की खोज केन्द्रस्थ हुई।
स्वामीजी कहा करते थे, जिस कार्य को करने में शांति मिलेे, संतोष मिले, भीतर प्रसन्नता का भाव उठे, ... वही रास्ता है। दूसरों की देखा-देखी मत करो। अपनी आवश्यकता को खुद समझो, सामर्थ्य प्रकृति ने सोंपा है। जो कार्य पूरा होना  है, अपने आप होगा, नहीं होना है तो भीतर से प्रेरणा आती है। पर हम अनसुना कर जाते हैं। दूसरे कहते हैं- आपने पूरा प्रयास नहीं किया। थका डालते हैं। इससे हताशा आती है। स्वधर्म की पहचान अपने आप होती है।
जाना, ... अनुभव हुआ। जब अपने घर की तरफ आया, ‘‘लौटकर आया आज मैं द्वार पर, ...तो भीतर सब के प्रति अनुग्रह का भाव जगा। भीतर एक प्रेम जगा। समग्रता में स्वीकारने का भाव जगा।
अपि चेदसि पापेम्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।।4-36
”यदि तू पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो निसंदेह ज्ञान रूपी नौका से तू पार हो जाएगा, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि, संपूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
स्वामीजी के यहां,  किसी व्यक्ति के ,किसी प्रकार के, किसी के बाह्य आचरण को लेकर कोई चर्चा नहीं हो पाती थी, ... कई बार उनके नीतिगत व्यवहार को लेकर  लोग आलोचना भी करते थे। पर उनके पास एक ही उत्तर रहता था- बस मौन। वे नैतिक दृष्टि से किसी के व्यवहार की आलोचना नहीं करते थे, ... हां ज्ञान की एक झलक, अंधेरे को, अज्ञान को हटा देती है। वह उसे रास्ते पर जाने को कहते थे, संस्कार जो भीतर संग्रह है, वह कोई वस्तु नहीं है, मात्र स्पंदन है, ... कर्म भाव रूप में ही जमा होते हैं। जो जमा होने का आधार होता है, वही उनके विसर्जन का भी बन सकता है। यह संग्रह जमा होता रहता है, अज्ञान से। ज्ञान का आगमन, अज्ञान का तिरोभाव है।
 ज्ञान से संस्कार निर्मिति क्षय  होती हैं। अज्ञान जो संस्कार का जनक है, उसके समाप्त होते हैं, यह प्रक्रिया रूक जाती है। अज्ञान ही संग्रहित करता जाता है। फिर कल्पना के सहारे से हर स्पंदन, विचार में तथा विचार से कर्म में ढलता जाता है। नई-नई कामनाएं पैदा होती जाती है। अज्ञान की स्मृति तथा अज्ञान की कल्पना, दोनों के बीच का सेतु वर्तमान है, वह यहां खो जाता है। जब आप वर्तमान में रहने लगते हैं, तब यह पुल पर होता हुआ प्रवाह रूक जाता है। वर्तमान, निरन्तर भविष्य को अतीत में बदलता जाता है। यहां अगर साक्षी भाव जग गया, ... तो वह प्रवाह रूक जाता है। यह तत्क्षण होता है। भगवान ने कहा है- ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’। ज्ञान के प्रकाश में अंधेरा अपने आप सरक जाता है। जहां अंधेरा है, वहां भय है, वहां मोह है, वहां अज्ञान है। जहां ज्ञान है, वहां मैं भाव चला जाता है। वहां अहंकार चला जाता है। वहां संस्कार बनने की प्रक्रिया अपने आप रूक जाती है।
‘स्वामीजी कहा करते थे- ज्ञानी भी कर्म करता है, पर वह नहीं करता हुआ भी करता है, उस पर दायित्व नहीं होता, प्रकृति उसे यंत्र की तरह चलाती है। वहां अहंकार नहीं होता।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च   संशयात्मा विनश्यति
नायं  लोको ऽस्ति  न परो न सुखं संशयात्मनः।  4-40
”संशययुक्त पुरुष के लिए न तो सुख है न यह लोक है न परलोक अर्थात यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए नष्ट हो जाते हैं।“
भगवान कह रहे हैं- संशय से भरा हुआ व्यक्तित्व विनाश को प्राप्त हो जाता है। संशय पैदा होता है, मन में। एक दुविधा सी बनी रहती है। अनिर्णय। द्वन्द। निर्णय  सही किया या गलत। संशय आत्मा में नहीं हो सकता। वह तो मन में ही होता है, लेकिन जो मन के ही धरातल पर है, मन में ही उलझा हुआ है, जिसकी यात्रा बहिर्मुखता में है, वह आत्मा शब्द का प्रयोग तो कर सकता है, पर वह उसे जानता ही नहीं है। आत्मानुभव उसका है ही नहीं। वह मन को ही ”माम“ मानता है। अहंकार ही उसका स्वरूप हो जाता है।
भगवान कह रहे हैं, ऐसा व्यक्ति मन को ही आत्मा मानने वाला विनाश को प्राप्त होता है। क्योंकि मन, संशयात्मक है, कोई निश्चय नहीं। कांपता हुआ हाथ। वहां आत्मविश्वास अपने आप गिर जाता है। अनिर्णय बना रहता है। दूसरा ही धकेलता है।
मेरा स्वयं का ‘मन’ ऐसा ही है। यह जाना। एक बात पर ठहरता नहीं। निर्णय होने के बाद भी विकल्प खुला रहता। पूज्य स्वामी जी का पत्र बार-बार पढ़ता रहा- ‘आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, क्यों? भीतर मन निरंतर द्वन्द में रहता है। संशय ग्रस्त है। उन्होंने कहा था, एक बार सोचो बार-बार नहीं, निर्णय लो, ... पर आप्त वाक्य आचरण में नहीं आ पाया था। बार-बार कांपते हाथ से लोटा उठाता, ... लोटा गिर जाता। प्रयोग किया, ... भीतर के कंपन को जानने का प्रयास किया, ... हाथ थिर हुआ, ... तब जाना, भीतर की स्थिरता आते ही, मन का यह या वह में निरन्तर भटकाव रूक जाता है। निर्णय हो गया, जो होगा, देखा जाएगा। सीना खोलकर सामना करेंगे, बस।
जाना, स्वयं की असफलताओं, तथा दुःखों के बीच जाना, चित जब संशय में भर जाता है, तब विनाश ही प्राप्त हुआ। शुरू-शुरू में निर्णय गलत भी हुए, ... पर उससे आत्मविश्वास डिगा नहीं। मैं ही जिम्मेदार हूं, यह बोध ताकत दे गया।
स्वामी जी कहा करते थे, ... किसी भी व्यक्ति का पतन मात्र उसके अनिर्णय से होने लगता है।यही कार्पण्य दोष है। कुछ करेगा, ...तो सही होगा या गलत, ... दोनों ही स्थितियों में उसकी शक्ति क्रियारत रहेगी। पर अकर्मण्य का तो कोई भविष्य ही नहीं होता है।
संशय से भरे चित्त की सबसे बड़ी कठिनाई, वह स्वयं होता है। अवसर आता है। जीवन में अवसर एक या दो ही आते हैं। पर संशयग्रस्त तब सोचता ही रह जाता है, अवसर उसे ही छोड़कर चल देता है।
तस्मादज्ञानसंभूत हृत्स्थं  ज्ञानसिनात्मनः
छित्त्वैनं संशयं   योगमातिष्ठोत्तिष्ठ  भारत।।4-42
हृदय में स्थित इस अपने संशय को ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके- भगवान, इस संशय से मुक्ति का उपाय बता रहे हैं-
‘समत्व बुद्धि रूप योग को पाकर-संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल।
संशयात्मा विनाश्यति, ... जो संशयग्रस्त है, उसका विनाश होता है। फिर अपनी इस अनिर्णय की स्थिति से कैसे बाहर आ जाए। पहले आदत हो गई थी- ताले को लगाकर, दुबारा जांचता था, कहीं खुला तो नहीं रह गया। अपने ऊपर भरोसा नहीं आ पाया था। चाबी कार की कार में ही रह गई, ... बाहर गेट बंद कर दिया। लॉक हो गई। कर्म और मन की युति नहीं थी। सब मानो यांत्रिक होता हो। स्वामीजी ने टोका था- बोले जहां शरीर हो वहां मन को रखो, बस इतनी सी साधना है। अनावश्यक सोचना बंद करो, आदत तुम्हारी है, ... तुम आदतों के गुलाम नहीं हो। जिसे तुमने बनाया है, तुम उसे हटा सकते हो। संकल्प लो बस।
समता का अर्थ है- जहां द्वैत गया। यह या  वह गया। यहां आत्मकृपा उपजती है। आत्मविश्वास घना होता है। एक तटस्थता भीतर आती है। जिसे आप साक्षी भी कह सकते हैं। वहां सजगता पैदा हो जाती है।
बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जगता है। विवेक का जागरण मात्र उसका आदर होता है। वह आकर जब मार्ग प्रशस्त करता है, वहां सामर्थ्य का सदुपयोग होना शुरू हो जाता है।
बुद्धि समता को तभी प्राप्त होती है, जब वह ‘निश्चयात्मक’ होती है। उसका डांवाडोल होना रुक जाता है, न वह पाप में है न पुण्य में, न सत में, न असत में, द्वन्द्व से पार चला जाता है, वहां मात्र साक्षी बचा रहता है।
... तब विवेक जगता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे- ‘बिनु सत्संग विवेक न होई, ... सत्संग, ... निरन्तर स्वाध्याय से प्राप्त उपलब्धि है, जब हम अपने ‘स्व’ से जुड़ जाते हैं। पराश्रय पूरा चला जाता है। वहीं आत्मकृपा है। यह विवेक एक तलवार है। वही संशय को काट देता है। क्योंकि वहां बुद्धिस्थिर होते हुए विवेक में ढल गई है। उसका डांवाडोल रहना छूट गया है। वही ज्ञान की तलवार है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध होती है तब वह विवेक में ढल जाती है। तब ज्ञान का उदय होता है, जहां बुद्धि डांवाडोल होती है, वहां अज्ञान उपजता है।
संभवतः तीस साल तक मैं बस सवाल ही पूछता रहा।
संभवत, एक सिद्ध गुरु के पास रहकर, ... नदी पर घाट के पत्थर की तरह भीगता हुआ भी सूखा ही रह गया।
वे कहा करते थे- एक ही बात को बार-बार क्यों पूछते हो?
क्या, संशयग्रस्त मन था, ... बुद्धि डांवाडोल थी। यह विश्वास ही नहीं था, कि जाना किधर है, ... ‘परधर्म’ का लोभ, उसका अनुसरण, स्वधर्म से वंचित करता जा रहा था, ... प्रश्न भी मात्र जिज्ञासा पूर्ति के लिए थे, ...” पर आज जब, लौटकर आया आज में द्वार पर, खड़ा-खड़ा पूछता, कि बाहर ही रहू, या भीतर चलूं,“ ... तो संशयग्रस्त मन फिर टोकता है, ... रोकता है, ... तब श्री भगवान की गीता, फिर द्वार पर आकर यही कहती है जो भगवान ने अर्जुन से कहा- ‘‘संशय को ज्ञान रूप तलवार से काट डाल, काट डाल, अब बाहर को प्रणाम कह, जिधर मुंह किया था उधर पीठ कर, जहां पहले पीठ थी, उधर मुंह कर ले, बस, ... जाना कहीं नहीं है। रास्ता वहीं है। बस दिशा ही बदलनी है। तू चल तो सही।





























Friday, November 8, 2013

श्री गुरु गीता तीसरा अध्याय


श्री गुरु गीता तीसरा अध्याय



लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।ं3
दो ही प्रकार की निष्ठा है, समभाव में स्थिति एक ही है, इसे दो प्रकार से पाया जा सकता है।
ज्ञान योग से- कर्मयोग से। सांख्य व योग।
सांख्य की निष्ठा है- सत्य ,सिर्फ ज्ञान से ही पाया जा सकता है। कुछ और करना जरूरी नहीं है। श्रम की, साधना की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि जो भी खोया है, वहां केवल  उसकी विस्मृति हो गई है। करने का कोई प्रश्न ही नहीं है।
योग- की मान्यता है, बिना किए कुछ भी नहीं हो सकेगा। योग का कहना है, अज्ञान को हटाने के लिए श्रम करना होगा, ... यहां अंधेरा है, दिया जलाया, वह गया, ... पर यहां दूसरी बात है, आदमी कर्म की शृंखला से बंधा हुआ है, स्वतंत्रता पाने के लिए उसे जंजीरों को हटाना होगा, चाहे जंजीरे, लोहे की हों या सोने की हों।
इसी प्रकार पुरुष भी दो ही प्रकार के हैं।बहिर्मुखी और अंतर्मुख्ीी
‘क्षर- नाशवान संसार, अक्षर-अविनाशी स्वरूप।
संसार की प्राप्ति में सम रहना, कर्मयोग है। क्षर से विमुख होकर, अक्षर में स्थित. होना ज्ञान योग है। परन्तु यह भी माना गया, क्षर और अक्षर से अन्य उत्तम पुरुष भी है, जो परमात्मा के नाम से जाना जाता है। वह क्षर से अतीत है, अक्षर से उत्तम है। वह पुरुषोत्तम है। वह विराट है।  ऐसे परमात्मा की शरण में जाना-शरणागति है। कबीरजी ने समझाना चाहा,”बूॅंद समानी समुद में यह तत कहो न जाइ“, यह तीसरी अवस्था है, यह भी बाद में आई।
... सांख्य निष्ठा और योग निष्ठा- दोनों साधकों की निष्ठा है। जहां दोनों में संसार है, और मैं हॅ्रूं, इसका अनुभव होता ैहैै। परन्तु भक्तियोग में है- भगवान है। उन्हें मानकर  वह अपने आपको समर्पित कर देना होता है। सांख्य तथा योग में विवेक साधन तत्व है, ... उसकी प्राप्ति ही साध्य से अभिन्न करवाती है, परन्तु भक्तियोग में श्रद्धा की प्रमुखता है। मानना ही समर्पण का आधार है।

जानना भी सन्देह रहित होता जाता है, जो जाना गया है, वह ज्ञान का आधार बनता है। सत्य से ही सत्य को प्रकट किया जा सकता है, ... जो भी माना गया है, ... वह जानने के आलोक में सत्यापित होता है, यह मानना, शत-प्रतिशत सन्देह रहित होता है। सांख्य व योग-साधन साध्य है, पर भक्तियोग भगवान और उनकी कृपा पर निर्भर है। जैसे चुंबक के पास आने पर लोहे के कण अपने आप खिंचने लगते हैं। वे चुंबक केगुण भी लेलेते हैं, वही अवस्था यहॉं है,स्वामीजी कहा करते थे, भक्ति ओढ़ने की चादर नहीं है। यह तो सौ टका अपने आपको खो देना है।
‘मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है, न कर्मों के त्याग मात्र से सिद्धि को प्राप्त होता है। साधक के लिए कर्म करना स्वाभाविक है। निष्काम भाव से कर्म करने पर ही कर्मयोग की सिद्धि प्राप्त होती है। प्रयत्ल ही कर्मयोग का साधन है। प्रयत्न किए बिना कोई रह नहीं सकता।
... मनुष्य के अंतःकरण में कर्म करने का वेग रहता है, वह ध्यान से अपने अंतःकरण का अवलोकन करे, ... हर विचार उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, क्या करना है, क्या नहीं करना है, यही उसकी दुविधा है, बिना किए वह एक क्षण भी ठहर नहीं पाता है।

उसे इस वेग को शांत करना है, ... यह स्वाभाविक अवस्था है। यह वेग साधक के लिए, कामना का त्याग करके, ... कर्तव्य कर्म करने से होता है। कामना अंतःकरण से उठती है, अगर कामना कर्म के साथ रहेगी, ... तो यह वेग आगे और आगे ढकेलता रहेगा। कामना तभी निःशेष होती है, जब वर्तमान में रहकर कर्म किया जाए। मन को पूरी तरह कर्म के साथ रखा जावे, कामना आगे-पीछे के चिन्तन में ही विद्यमान रहती है।

कर्मयोग का आचरण करने वाला मनुष्य, कर्मों को करते हुए भी निष्कर्मता को प्राप्त होता है।

... हम जो भी करते हैं, हमारी कामना पहले आती है, सही या गलत इसकी चिन्ता नहीं है, तर्क से उसे न्यायोचित बनाने का आग्रह पीछे आता है। ज्ञान की निष्ठा का आधार, प्राप्त जीवन में विवेक का आदर है। जहां विवेक का आदर होता है, वहां जो गलत है, वह अपने आप छूटने लग जाता है। तर्क गिर जाता है, अपने आप को जस्टीफाई करने की आदत छूट जाती है। तब स्वाभाविक रूप से ‘सामर्थ्य’ का सदुपयोग होने लगता है।

क्या सांख्य की निष्ठा में कर्म का अभाव हो जाता है? क्या ज्ञानी के लिए कर्म की आवश्यकता नहीं है? स्वामीजी कहा करते थे- ‘अभिनय ऐसे करो जैसे वास्तविक हो, और जीवन ऐसे जीयो जैसे अभिनय कर रहे हो, ... वे परमहंस के जीवन से ‘घोष’ प्रसंग को सुनाते थे। किस प्रकार ईश्वरचन्द विद्यासागर ने ‘घोष’ के अभिनय से क्रोधित होकर अपना जूता फेंक दिया।घोष ने सिर झुकाकर ग्रहण किया था कि यह मेरे अभिनय का पुरुस्कार है। ज्ञानी के लिए कर्म सहज हो जाता है। वह मात्र निमित्त रह जाता है, उसका कर्ता भाव चला जाता है, उसके लिए कृत्य लीला बन जाता है।

ये दो निष्ठाएं सहज और स्वाभाविक है।
दर्शन में, सांख्य व योग को एक ही साथ रखा जाता है। जीवन जीने की कला यही है। दोनो ही जीवन में आवश्यक हैं। वर्तमानमें रहने पर दोनो ही निष्ठाएॅं एक साथ सध जाती हैं।
मनुष्य का चित्त दो विभिन्न प्रकारों से देखा जाता है, वह बर्हिमुखी है, या अंतर्मुखी है। चाहे योग से आवे या सांख्य से, ... स्वाभाविक अवस्था में उसे अंतर्मुखी होना पड़ता है। इसीलिए, दोनों में वास्तविक विरोध न होते हुए भी, साधक की प्राप्त स्थिति के आधार पर दोनों ही प्रकार के मार्ग जो हैं, वे एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं।। एक बाहर जाकर भीतर लौटता है, वहां कुछ ना कुछ करना है, करना होता है। दूसरा सीधा अंतर्मुखी होता है।

बहिर्मुखी व्यक्ति जो है, जो कर्मयोगी है, ... उसके लिए ‘निष्कर्मता’ पाने के लिए ‘एकाग्रता सहायक होगी। अन्तर्मुखी व्यक्ति के लिए ध्यान सहायक होगा। धर्म- जिसे उसने धारण किया है, जो उसकी धारणाा है, ... यहां बहिर्मुखी व्यक्ति एकाग्रता को साधन रूप में पाकर, निष्कर्मता को प्राप्त होगा, ... अन्तर्मुखी व्यक्ति ध्यान के उपाय से ‘विवेक को प्राप्त होगा’, ... छूटना दोनों ही साधनों का लक्ष्य है, जो अस्वाभाविक है, वह अपने आप छूटता चला जाता है।
... स्वामीजी कहा करते थे, मनुष्य, मिश्रित होता है, प्रकृति के तीनों गुण उसमें है, ..कहीं. कुछ ज्यादा है, तथा कहीं कुछ कम है। हर मनुष्य दूसरे मनुष्य से अलग होता है। एक ही औषध हर रोग के लिए नहीं होती है। साधन का चुनाव, हर व्यक्ति अपना वरण है, ... यही उसकी पहली पहचान है। दूसरे के बारे में जानने का प्रयास मत करो, अपने आपको जानो, तब अपनी स्वाभाविक मांग का पता लगता है।
सभी मार्गों पर एक साथ नहीं चला जाता। आजकल जैसे परीक्षा में सफलता पाने के लिए  पासबुक’ लिखी जाती है। उसी प्रकार सरलीकृकृत साधनाएं चल पड़ी हैं। जो न तो खुद कहीं पहुंचे हैं, परन्तु सबको एक साथ सब कुछ देना चाहते हैं, ... रास्ते अलग-अलग होते हैं, पर पहुंचते एक ही मुकाम पर हैं, यह सच है। पर चयन तो एक ही रास्ते का करना होगा। थोड़ा इसका लिया, थोड़ा उसका लिया, ... कहीं के नहीं रह गए।
‘गीता का महत्त्व यही है इसमें सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए सभी प्रकार के मार्गों की विवेचना मिलती है, ... कहीं तुलना नहीं है, ... भगवान ने जहां भी जिस मार्ग की बात कही है, उसे उसकी पूर्णता पर विकसित किया है, ... व्याख्याकारों ने अपने-अपने ढंग से अपनी बात को पूरी गीता पर लागू कर दिया है।
जब साधक ध्यान में उतरता है, ... विवेक का आश्रय लेता है, ... तब बाहर का छूटना शुरू होता है, ... वह भीतर की दुनिया में प्रवेश पाता है, ... विचारों की संख्या कम होते-होते, विकार भी गिरने शुरू हो जाते हैं। चित्त सरोवर पर लहरें उठने जब बंद होती है, ... तब वह पाता है, खालीपन, एक स्पेस, ... विचार और विचार के बीच का अंतराल बढ़ता चला जाता है, ... नेति-नेति यहां वह जिस उपलब्धि को पाता है, वहां शांत मन, निर्विकारता में है। शून्य है।
... कर्मयोगी, का आधार, ... कर्म को निष्कर्मता में ढालते हुए, ... मन की स्थिरता को प्राप्त करना होता है। अहंकार का गलन सेवा में होता है। वह संपूर्ण सामर्थ्य का सदुपयोग सेवा में कर रहा है, जगत की प्रासंगिकता उसके लिए दूसरी है, वह भोग के लिए न होकर योग के लिए कर रहा है, ... यहां वह जिस उपलब्धि को पाता है वह ‘पूर्णता’ है।
... वह बाहर के साथ एक होकर, एक ही तत्व को सब जगह पाता है। ‘सियाराम मय सब जग जानी, ... यह योग की उपलब्धि है।
पहुंचना एक ही जगह है, ... पाना सत्य ही है। पर मार्ग अलग हैं, एक को दूसरे से मिला देने से, कोई ‘शॉर्टकट नहीं मिलता है। हॉं दोनो मार्ग एक दूसरे के पूरक हैं, एकाग्रता और ध्यान का अंत सजगता में होता हैं। दरअसल जो सजग है, वही भक्त है, भक्ति किसी दूसरे की नहीं होती।
भगवान ने यहां जिस मार्ग की ओर संकेत किया है, वह महत्वपूर्ण है-
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य  पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धि  समधिगच्छति।ं4।

‘कर्मों के न करने पर निष्कर्म प्राप्त नहीं होता है, नहीं कर्मों के त्यागने से सिद्धिकी प्राप्ति होती है।
‘निष्क्रियता, निष्कर्म नहीं है। कर्तारहित कर्म ही निष्कर्म बनता है, कर्म तो होगा ही उससे बच पाना कठिन है, पर कर्ता रहित होना संभव है। भगवान जिस सूत्र पर बल दे रहे हैं, वह असंभव नहीं है। प्रकृति करवा रही है, उसकी इच्छा पूरी हो, ... लीला है, अनेक आप्त वचन हो सकते हैं, ... पर मैं कर रहा हूं, इस कर्तापन से बचा जा सकता है, ... दुनिया अपनी रफ्तार से चल रही है, ... हम मात्र निमित्त हो सकते हैं। प्रकृति हमें अपने हाथ का यंत्र बना सकती है, ... उसी की ओर से एक अनंत वेग आता है हम तो मात्र इस ‘वेग’ में बहते दिखाई पड़ते हैं। जो कुछ भी हो रहा है, एक नियत क्रम में है, ... यह बोध रहे, यही तुम्हें बस करना है, तेरे द्वारा हो रहा है, तू करने वाला नहीं है, फिर कर्म ‘निष्कर्म’ में बदल जाता है।

न हि कश्चित्क्षणमपि  जातुतिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।ं5।
‘परवशता’ कर्म करने में है। बिना कर्म किए कोई एक क्षण भी रह ही नहीं सकता है।
कर्म, जीवन जीने की अपरिहार्यता है। कर्म को बदलने की चेष्टा व्यर्थ है। हांॅ-कर्ता का रूपांतरण हो सकता है। हम भीतर जैसे है, वह वास्तविकता है। हम भीतर गलत होते तो हमारा कर्म भी गलत होगा, ... कर्म का आधार, ‘मैं’ है, यह मेरा है, ... इस मैं का ‘‘माम’’ में रूपांतरण, साधना है।
सारा श्रम इस ‘मैं’ और ‘मेरे“ को घना करने में जाता है। कर्मयोगी का यह ‘’मैं गिरता है, सेवा से, सांख्य योगी का ध्यान से। जो इस ‘मेरे’ को सहारा देते हैं वे मित्र है, जो इस ‘मेरे’ का विरोध करते हैं, वे शत्रु होते हैं। जब यह मेरा विदा होता है, तब सब गिर जाता है, ... तब कर्म ‘‘‘दाई विल बी डन’’’ की तरह बदल जाता है।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्
इन्द्रियार्थान्विमूढसत्मा  मिथ्याचारः स उच्यते।।6।

परन्तु जो व्यक्ति इन्द्रियों को हठ से रोककर, इन्द्रिय भोगों का मन से चिन्तन करता है, वह मूढ़ है, पहले भी दूसरे अध्याय में भगवान ने कहा है-‘भीतर से रस’’ का विसर्जन ही साधना का सार है। हठयोग के आधार पर जो इन्द्रियों पर बलात दमन रखा जाता है। उसे श्रेयस्कर नहीं माना है। ...क्रिया और कर्म का बुनियादी भेद, ... क्रिया के साथ कर्ता के जुड़ते ही कर्म बनता है, ... अहंकार क्रिया के साथ जुड़ते ही उसे  वह कर्म बना देता है। जिसका भोग स्वाभाविक है, ... गहराई से विचार करे, तो हमारी सारी क्रियाएं कर्म ही है। निद्रा में स्वप्न भी, कर्म ही है। वहां जीवेषणा कृत्य करवाती है।
 श्वास हम लेते हैं, या वह स्वाभाविक है, रुक जाए तो शरीर ही गिर जाए, ... यह जो निसर्ग है, ... यह किसका है, ... उसे ही हम परमात्मा कहते हैं। बाह्यमन जुड़ता है, अंतर्मन से अंतर्मन निरंतर विराट से जुड़ा रहता है, वहां से निरंतर चैतन्य का प्रवाह आता है। वह अंतर्मन पर संचित ‘संस्कार पंुज को धक्का देता रहता है, ... यही सृजन का रहस्य है। ... वहां मात्र सृजनशीलता है, जो निरंतर सृजनरत है। एक क्षण भी रुक जाए तो सृष्टि समाप्त हो जाए।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मज्ञोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।
- जो मनुष्य मन से इन्द्रियों पर नियंत्रण करके आसक्ति रहित होकर समस्त इन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है- वही श्रेष्ठ है।
भगवान कहते हैं, वही श्रेष्ठ है, जो इन्द्रियों से लड़ता नहीं है, बल्कि मन को ही रूपांतरित कर लेता है वह इन्द्रियों को मारता नहीं है। अपने आपको देखा- लगा वासना, ... तृष्णा आगे-आगे जाती है, पीछे-पीछे इन्द्रियां जाती है। मन, इन्द्रियों के माध्यम से ही तो भोगता है। इस तरफ विषयासक्त मन है, उसके-पीछे इन्द्रियां है। सामने स्थूल इन्द्रियां दिखाई पड़ती है।
भगवान कहते हैं, मन ही मूल कारण है, उसका रूपांतरण ही श्रेष्ठ है।
पर इन्द्रियां का संयमन कैसे हो?  रास्ता जो बताया गया है,, दमन किया जाए। इन्द्रियां जो मांॅगती हैं, उससे उन्हें वंचित करें, इनसे उपद्रव होता है। एक दूसरे प्रकार के पाखंड का जन्म होता है।
‘सिद्धान्ततः यहां यह कहा जाता है कि मन से इन्द्रियों को वश में करने का तात्पर्य है कि विवेकवती बुद्धि के द्वारा मन और इन्द्रियों का स्वयं से कोई संबंध नहीं है, ऐसा अनुभव करना, ... आसक्ति रहित होकर कर्म करना ही साधन है, जो यह संयम देता है।
. प्रश्न था ,क्या.. यह एक सामान्य चिन्तन परक अवधारणा नहीं है?
व्यवहारिक सत्य है- वासना एक छाया सी, ... भीतर प्रवेश करती है, वह दिखाई नहीं पड़ती है पर इन्द्रियां उसके अनुसरण में चल देती है। मन को भी हम नहीं जानते हैं, हां उसके क्रियाकलापों से उसका अनुभव होता है, कोई शक्ति हमारे भीतर है।
हां, कभी-कभी, हमारे भीतर हमारी ही शक्ति उपजती है, ... वह भी हमारे भीतर है, वह हमारे मन को भी देखती है, ... हमारी वासना की उठने वाली लहर को भी देखती है, ... वह विवेक के कोने से उठती है, वही हमारा अंतःकरण है। यह मनोवैज्ञानिक अचेतन मन नहीं है। इस अंतःकरण में जहां बुद्धि भी शुद्ध हो जाती है, ... वहां यह उपजता है। यह हमारा संकल्प है, ... संकल्प कोई दमन नहीं होता है, यह हमारी स्वाभाविक अवस्था है। यह हमारे अपने होने का बोध है।
... संकल्प के उठते ही, ... बाहर से जो लहर दस्तक देती है, वह रुक जाती है। दुबारा उठती है उसकी तीव्रता कम हो जाती है। आपकी ताकत ही शरीर की कमजोरी है। आपकी कमजोरी, शरीर का दबाव है, ... इस अनुभव को हम कर सकते हैं।
स्वामीजी कहा करते थे- सामान्य मनुष्य शरीर की शक्ति से कार्य करता है, उससे बेहतर बुद्धिमान मनुष्य बुद्धि से कार्य करता है, ... तथा आत्मवान, संकल्प से कार्य करता है। जिस व्यक्ति के पास यह संकल्प है, वह श्रेष्ठ है।
तभी वह अवस्था आती है, मन से इन्द्रियों का नियमन हो जाता है, इन्द्रियों का अपना स्वतंत्र आग्रह नहीं होता है, उनको जहां लगाना चाहे, वहां वे लग जाती है, और जहां से उनको हटाना चाहे, हट जाती है। सामान्यतः हम इन्द्रियों के अनुशासन में रहते हैं, इसलिए हम शरीर से अधिक का अनुभव नहीं पाते, ... आत्म अनुभवन संकल्प की यात्रा है।
साधन यात्रा में यह महत्वपूर्ण उपसंपदा है।
हम जिसे मन कहते हैं, ... वह साधारणतया हमारी कामनाओं का, आकांक्षाओं का समूह ही होता है ऐसा हम मानते हैं। हम आइने में अपने शरीर को देखते हैं। चित्त के दर्पण पर अपने आप को देखें। वहां मात्र विचारों का, विकारों का समूह है। वही हमारा मन है। यह मन जिस भी इन्द्रिय के साथ लगता है, ... वह बाहर चला जाता है। इन्द्रियां द्वार है, इस द्वार से भीतर भी आया जाता है।
द्वार पर यह चौकीदार, मन, ... मन का दूसरा हिस्सा रहता है। जब यह एकाग्रता से दो का एक होता है। जब यह साधारणतया अवलोकन में, यह देखता है, दूसरा बाहर जाता है। धीरे-धीरे बाहर जाने वाला रुक जाता है। तब यह एक सजगता में ढल जाता है।
पहले चरण में इस ‘एकमन’ को पाना होता है, ... फिर यह एक मन, ... अंतर्मुखी होकर, अंतर्मन में समर्पित हो सकता है, ... वासनाओं तथा आकांक्षाओं का समूह एकदम समर्पित नहीं हो सकता।
... इसका प्रारंभ हो सकता है-
...
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।

 तू शास्त्र विधि से नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है, जो करना है, उसे होशपूर्वक करना है। पूज्य स्वामीजी का आप्त वचन है- ‘जो भी क्रिया हो मन को पूर्ण रूपेण वहीं रखना चाहिए, किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।’
जो अनिवार्य है, वह होशपूर्वक हो।
शास्त्र सम्मत स्वधर्म, ... शास्त्र सम्मत, ... जो परम्परागत दाय है, जो जाना गया है, जो आधार है, वह स्वधर्म जो प्राप्त हुआ है।
... संकल्प, विधायी कदम है। सकारात्मक शक्ति है। दमन में, ... मन ने पैदा किया है, मन ही उसे दबा रहा है, एक संघर्ष है, वहां उसे दोनों तरफ से रस आ रहा है। वही पैदा करता है, वही दबाता भी है।
पर संकल्प, विधायी क्षण है। नई शक्ति उस सजगता में पैदा होती है। यह आकांक्षाओं, और कामनाओं का पंुज नहीं है। वह एक किरण की तरह होता है।
भगवान कृकृष्ण इसी बात को आगे समझाते हुए कहते हैं-
‘‘बंधन के भय से भी कर्मों का त्याग करना योग्य नहीं है, ... कर्तव्य पालन के लिए किए जाने वाले कर्मों से अन्यत्र कर्मों में लगा हुआ यह म नुष्य बंधता है।;3-9द्ध
- जो आदमी कर्मों के बंधन से बचने के लिए भागता है, ... वह उल्टे कर्मों के बंधन से बंध जाएगा। पलायन व्यर्थ है, भागना व्यर्थ है। कर्म से कोई अगर बंधन से छूटने के लिए भागता है तो व्यर्थ है। कर्म में कोई बंधन नहीं है। कर्म मेरा है। यही बंधन है। भगवान कृष्ण कह रहे हैं- पलायन व्यर्थ है,कर्म में कोई बंधन नहीं है। कर्म मेरा है, यही बंधन है।
यज्ञ का सामान्य अर्थ, कर्तव्य पालन से लिया जाता है। कर्तव्य पालन की आधारभूमि अनासक्ति है। जहां आसक्ति है, वहीं बंधन है, ... यज्ञ-कर्म का ही पर्याय है, पर कर्म वह अन्य प्रकार है। जहां वह कर्ता नहीं है। वह निमित्त मात्र है। यहां वह मात्र इस खेल में, एक खिलाड़ी रह गया है। बंधता वही है, जहां अहंकार होता है। जहां खँूटा ही उखड़ गया, ... वहां बांधने वाला भी नहीं होता है। जहां कर्म परमात्मा का है। यह बोध बांधता नहीं है, यह कोई मौखिक मान्यता नहीं है। यह पूरे मन से उठती है।तब यज्ञ कर्म हो जाता है।

परमात्मा कहाँ है?
सृष्टि तो दिखाई पड़ती है, सृष्टा उसी में ही कहीं पीछे छिया है। गीता यहां कहती है प्रजापति ब्रह्मा ने सबको रचा- वह रचना तो आज भी वैसे ही हो रही है, हर क्षण विराम नहीं आया, ...परमात्मा मात्र सृजन है, ... सृजनात्मकता है, ... फिर हम कैसे अपने आपको बचा सकते हैं?
कर्म तो करना है, यज्ञ रूप स्वधर्म को पाना है, ... बस करते जाना है, करने वाला भी पता नहीं लगे, ... फिर धीरे-धीरे ‘वह’ ‘‘जो  है’ै, वही करने वाला बन जाता है। जब अंतर्मन इस देह का स्वामित्व संभाल लेता है। बाह्यमन का अंतर्मन में लय ही अंतर्मुखता की उपसंपदा है। यह सधे। पर यहां पलायन नहीं। भागना नहीं।
स्वामीजी कहा करते थे- कर्मयोगी बनो। संकल्प जगे, ... फिर संकल्प भी खो जाता है, ‘दाई विल वी डन’ , ... जैसी तेरी मर्जी, ... पर हाथ अब ‘उसके’ हाथ हो जाते हैं। भगवान कृष्ण यही कह रहे हैं, कर्म से मत भाग, कर्म को ही यज्ञ बना ले। जहां तेरी इच्छा पूरी हो, सब तेरा है, ... कोई और नहीं कोई गैर नहीं, यह भावना दृढ़ हो जाती है, वहां बंधन स्वतः बिखरते जाते हैं।
श्रेयः परम वाप्स्यथ (3-11)
‘तुम परम कल्याण को प्राप्त होओगे- भगवान ककृष्ण का यह आप्त आशीर्वाद है।
... सृष्टि के प्रारंभ में, ... प्रजापति ने कहा था, ‘... तुम लोग कर्तव्य के द्वारा सबकी वृद्धि करो यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को पूरा करने वाला होवे, ... तुम देवताओं को उन्नत करो देवता तुम्हे उन्नत करे, ... इस प्रकार एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होओगे।’

.. यह आप्त वचन है, साधारणतया यह माने जाने लगा है कि यह अतिश्योक्ति है तथा इसी प्रकार कर्मकांडी लोग देवी-देवताओं के नाम यज्ञ करके, यजमानों की कामनाओं को भी प्रज्ज्वलित करते रहते हैं।
... गीता के तीसरे अध्याय के , 10 और 11 श्लोक एक साथ एक क्रम में है। यहां सहज स्वाभाविक गणित है, ... जहां तक परमात्मा के सृजनकर्ता होने का प्रश्न है, ... वहां यह सृष्टि किसी विशेष कारण से सृजित नहीं हुई है, ... यह हो गई है। सहज स्वाभाविक क्रम है, ... भारतीय अवतार वाद की परिकल्पना में इसे सहज क्रम में समझाया गया है। पूज्य स्वामीजी इस अवतारवाद का आधार इसी सहज विकास क्रम के रूप में लेते थे।
... परमात्मा का यह सृजन अहंकार रहित है। वहां मैं पन नहीं है। परमात्मा है, वहां महान ऊर्जा है, गति है, गति के कारण ही सृजन भी है, विनाश भी है, ...वहां मात्र सृजनात्मकता है, ... यज्ञ शब्द महत्वपूर्ण है। परमात्मा के हाथों से दिया गया कर्म, ... यहां मेरा कुछ भी नहीं है, ... कर्म तो होगा, पर अब उसकी प्रेरणा का स्रोत उसका अहंकार नहीं है। जब वह अपने लिए कुछ भी नहीं करता, तब वह बंधन में भी नहीं बंधता।
यहां दूसरा वाक्य इसी के साथ जुड़ा है, जब हम शुभ कार्य में अपनी अहंता को छोड़कर, संलग्न होते हैं, तब हमें प्रकृति की महान शक्ति का सहारा अपने आप प्राप्त होता है, ... वे शक्तियां ही देवता है। जब अशुभ कर्म करते हैं, ... तब तमोगुणी शक्तियां साथ हो लेती है, ... परमात्मा के हाथों से उसके संकल्प से जब कार्य प्रारंभ होता है तब प्राकृतिक विधान से, अलौकिक शक्तियों का सहयोग अपने आप प्राप्त होने लगता है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। तब वह परम कल्याण को प्राप्त होता है।
पचन्व्यात्म कारणात् (3-13)
पापी लोग अपने शरीर पोषण के लिए ही पकाते है। वे तो पाप को ही खाते हैं।
पुनः भगवान कृष्ण ने ‘यज्ञ’ विधान को केन्द्र में रखकर, जीवन जीने की कला पर संकेत किया है।
यज्ञ द्वारा बुलाए हुए देवता लोग तुम्हारे लिए बिना मांगे ही प्रिय भोगों को देंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष इनके लिए बिना लिए ही भोगता है वह निश्चय चोर है-
यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग, अपने शरीर पोषण के लिए ही पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं-
पहली बात स्पष्ट है- यज्ञ रूपी कर्म से दिव्य शक्तियां जो चाहिए, ... जो अपरिहार्य है, वे सब दे देती है।
... दिव्य शक्तियां, ... परमात्म भाव है, उसके लिए अपना हृदय खोलना पड़ता है। स्वामीजी कहते थे- तब प्रकृति स्वयं योग-क्षेम वहन कर लेती है। कुछ नहीं करना पड़ता। सब अपने आप हो जाता है। जहां करने का बोझ है, वहां अहंकार है। प्रकृति स्वयं मार्गदर्शन करती है, ... व्यवस्था अपने आप होती जाती है। हममें अपने प्रति आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है।

... हां, मांगना नहीं चाहिए, ... जो मांगता है, वह छोटा होता है। स्वामीजी ने बचपन में एक वृद्ध साहित्यकार जो किताब छपवाने बंबई आए थे, उनकी सेवा की थी। उन्होंने कहा था, ... मांगो क्या चाहते हो? वो समझे कुछ रुपये मांगेंगे। स्वामीजी ने कहा था- ‘याचक नहीं बनूं, पिता विहीन, मातृ सुख से वंचित, छोटे बालक की तब यह भावना थी। वे कहा करते थे- ‘प्रार्थना- याचना नहीं होती। ... कभी मांगना मत।“
‘क्यों हम जब मांगते हैं, हम बहुत छोटे हो जाते हैं, अपनी ही नजरों में नीचे गिर जाते हैं। ... एक भय हमें जकड़ लेता है, ईश्वर है, हमारा भरोसा है, तो जो हमें मिलना है, अपने आप स्वाभाविक क्रम में प्राकृतिक विधान से प्राप्त होगा। ... यज्ञ परमात्मा को समर्पित जो कर्म है, ... वहां वह अकेला नहीं होता। समस्त शुभ उसके साथ हो जाता है।
... भगवान कह रहे हैं- देवता लोग तुम्हारे लिए बिना मांगे ही प्रिय भोगों को दे देंगे, ... बिना मांगे ही। भगवान के इतने बड़े आश्वासन के बाद भी हम याचक बने रहते हैं। मात्र स्वाहा-स्वाहा को यज्ञ मान बैठे हैं।

‘प्रकृति के जो साधन, ... साधारणजन के कार्य आते हैं, उन्हें पोषण देते हैं, उसे व्यर्थ में अपने को समर्पित करके, अपनी अहंकार की तुष्टि पाना ‘यज्ञ’ नहीं है। यज्ञ परमात्म भाव से उन्हें समर्पित किया गया कर्तव्य कर्म है, ... जब यह भावना होती है। तब देवता बिना मांगे, ... प्रिय भोग दे देते हैं।
... स्वामी जी कहा करते थे, ... जब हम गलत होते हैं, तभी मांगते है, ... जानते हैं हममें कमी है, तब हम आश्रय की तलाश में भटकते हैं। अगर हम सही है, तो प्रकृति या तो हमारी आवश्यकता की पूर्ति कर देगी, ... या हमें बता देगी कि हमारा संकल्प पूरा होने वाला नहीं है, ... प्राकृतिक विधान के विपरीत है। भगवान यहां यही कह रहे हैं- बिना मांगे, ... यज्ञ रूपी कर्म में जो संलग्न होता है, उसे दिव्य शक्तियां बिना मांगे दे जाती है।
... इसी साधन सूत्र में भगवान, ... इस सिद्धि को बनाए रखने के लिए स्पष्ट करते है- जो मिला है, दैवी शक्तियों ने दिया है, उसे बांटो, ... वह मात्र तुम्हारा ही नहीं है। जितना हम बांटते हैं, उतना ही वह बढ़ता जाता है, जितना सिकोडे़गे वह सड़ने लगेगा। ... भगवान कह रहे हैैं जो बांटता नहीं है, वह चोर है। प्राप्त सामर्थ्य को अपने ही तक सीमित कर लेना, मात्र अपने लिए ही उपभोग करना, यह चोर का कर्म है। ... तुमने बांटना नहीं सीखा, तो तुम अपने ही दुश्मन हो, ... तुम्हें और मिल सकता था, तुम्हारी कृपणता से वह द्वार बंद हो गया है।
‘‘... यहां भगवान कह रहे हैं- जो पहले बांट देता है, ... फिर जो बचता है, उसे अपना भाग मान लेता है वह श्रेष्ठ पुरुष है, यहां अधिकार दूसरे को दिया जाता है। जो पहले का कर्तव्य होता है, वह दूसरे का अधिकार अपने आप बनता है। आज व्यवस्था दूषित हो गई है। हम अधिकार, अपना हिस्सा पहले चाहते हैं, या तो बांटना नहीं चाहते, या जो किसी काम का नहीं है, वह देना चाहते हैं।
और जो मात्र अपने पोषण के लिए अपने स्वार्थ के लिए ही जीवित हैं, ... वे पापी हैं, वे पाप को ही खाते हैं। जिस मनुष्य में स्वार्थ बुद्धिजितनी ज्यादा होती है, उसके कर्म भी उतने ही दूषित होते हैं। यहां भगवान ने अपने लिए कर्म करने वालों की निन्दा भी की है। अपने लिए, स्वार्थ बुद्धिसे किए गए कर्मों से वह इतना पाप संग्रह कर लेता है कि वह कटता ही नहीं है।

पुनः यज्ञ की प्रतिष्ठा में कहा गया है-
अन्नाÚवन्ति भूूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुभ्दवः।ं14।

संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्मों से निष्पन्न होता है।
कर्मों को तू वेद से उत्पन्न जान, वेद को अक्षर ब्रह्म से प्रकट हुआ, इसीलिए यह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ ;कर्तव्य-कर्म में प्रतिपादित है।
स्वामीजी ने अपने अंतिम प्रवचन में, ‘पर्यावरणीय संकट पर प्रकाश डाला था। वे इस पर्यावरण के संकट को आध्यात्मिक धरातल पर व्याख्या कर रहे थे। उनका कहना था, ‘आज का सबसे बड़ा संकट इस प्रदूषण का है-
भारतीय मनीषा ने, प्रकृति के साथ साहचर्य रखा है।” आत्मवत सर्वभूतेषु सर्वभूतेषु हितै रतः“, की भावना है। यहां प्रकृति के साथ जीना, एक कला है। उनके आश्रम में जब वे बाहर से आते थे, पशु-पक्षी सभी मानो उनके आने की सूचना पा चुके हो।
... वे कहा करते थे, हम अलग कहां है, यह संपत्ति परमात्मा की है, कोई उसे अपना मानकर एक जगह संग्रहित कर लेता है, ... तो वह अपराधी है, इसी प्रकार प्रकृति और हमारा साहचर्य है। एक ही परिवार है।
... अन्न भी हमारी चेतना का एक अनिवार्य अंग है, वह मात्र पदार्थ ही नहीं है। उसी से चेतना स्वरूप ग्रहण करती है। अन्न भी जीवंत है। अन्न से प्राण तत्व का गहरा संबंध है। अन्न आता है, वृष्टि से, और यह वर्षा कहां से आती है? ... शास्त्र कहते हैं, वर्षा का और हमारी भावनाओं का, कृत्य का भी गहरा संबंध है। जब पाप बढ़ता है। तब अकाल आता है। ... प्रकृति और मनुष्य के बीच आंतरिक संबंध है। उसी का नाम पर्यावरण है। यह मात्र पेड़ काटना, ... या शोर या प्रकाश का प्रदूषण ही नहीं है। यहां यह एक आंतरिक संगति है। हम सब परस्पर जुड़े हुए हैं। यही ब्रह्म का एकात्म शरीर है। कहीं कोई पृथकता नहीं है।

‘यज्ञ का अर्थ है, ... कर्तव्य कर्म से हुआ जीवन, परमात्मा को समर्पित जीवन, ... जब ऐसा जीवन जिया जाता है, तब प्रकृति भी अपनी ओर से जो स्वाभाविक मांग है उसे पूरा करती है।
... ऐसा कर्म, भगवान कर रहे हैं, ऐसे कर्म को तू ‘वेद’ से उत्पन्न जान। .... और इससे आगे बढ़कर कहा गया है- वेद अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इससे यह सर्वव्यापी परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।
‘ऐसे कर्म को तू वेद से उत्पन्न जान। वेद का अर्थ है ज्ञान। एक तो कर्म वह है जो ज्ञान से उत्पन्न हुआ है। दूसरा कर्म वह है जो अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। अज्ञान से उत्पन्न हुआ कर्म वह है, जहां कर्ता व अहंकार दौनो मौजूद हैं। जहां मैं कर रहा हूं। यह भाव बना रहता है, जहां अज्ञान है, वहां अहंकार होता है जिस कर्म से संताप पैदा हो, दुःख पैदा हो, वह अज्ञान से पैदा कर्म है। ... जहां अहंकार मिटा, ... वहां खालीपन रह जाता है, ... विचार जहां है, वहां अहंकार है, ... वहां विकार है, ... जहां विचार गिरा, वहां कर्ता गिर गया, वहां मात्र कर्म ही रह जाता है। वही ज्ञान है। वही परमात्म भाव है।

एवं प्रवर्तितं चक्र्रं नानुवर्तयतीह  यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।ं16।

मोघं पार्थ स जीवति- वह व्यर्थ ही जीवन जीता है
जीवन किस प्रकार जिया जाए, वहां उसके लिए प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग एक आधार है, ‘स्वधर्म शब्द में यह अभिप्रेत है। भगवान कृष्ण ने ‘चातुवर्ण’ की स्थापना पर बल दिया है। आज की परिस्थिति में जहां शब्दों का अवमूल्यन हो चुका है, वहां पांच हजार वर्ष पूर्व ‘वर्णर्’ शब्द से क्या अभिप्रेत था, कहना सहज नहीं है, वर्ण स्वाभाविक संस्कार धर्मिता है, जो लेकर मनुष्य पैदा होता है, ... प्रकृति में दो पत्तियां भी एक जैसी नहीं होती हैं, प्राप्त सामर्थ्य के आधार पर ही ‘चतुर्वण’ की योजना थी, ... यह एक दूसरे से श्रेय या अश्रेय रूप नहीं था, ... एक समान आधार पर विकसित होने की योजना थी, ... इसी आधार पर ‘स्वधर्म’ की स्थापना भी, उसका मूल्य था।
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भगवान ने श्लोक 16, 17, 18 में ‘सृष्टिचक्र’ के आधार पर आश्रम व्यवस्था पर संकेत किया है, साधक के लिए इसका निर्वहन प्राकृतिक विधान के अनुसार है, यह योजना भी उसके विकास के लिए ही है।
जो इस प्रकार नहीं चलता है, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला अघायु (पापमय जीवन जीने वाला) मनुष्य संसार में व्यर्थ ही जीता है।
... जैसे रथ के पहिए का छोटा सा अंश भी टूट जाने पर, रथ में सवार व्यक्ति पीड़ित हो जाते हैं। उसी प्रकार समष्टि सृष्टि चक्र है, सभी संबंधित है, व्यष्टि और समष्टि पृथक नहीं है।
ऐसा मनुष्य जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है, वह व्यर्थ ही जीता है। इससे पूर्व भगवान ने इस प्रकार के मनुष्य को- ‘‘वह चोर ही है, ... वह पाप का ही खाता है और यहां अघायु कहा हैं।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमोप्नोति पूरुषः।19।

इससे तू अनासक्त हुआ निरंतर कर्तव्य कर्म कर-
इसलिए तू कर्म से मत भाग, पाप मय कर्म भी मत कर, यज्ञ ;कर्तव्य कर्म से प्रेरितद्ध परमात्मा को समर्पित करते हुए, कर्म कर।
वह कर्म किस प्रकार हो सकता है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे-‘निरंतर वर्तमान में रहो, ... यही एक मात्र साधन मैंने साठ वर्ष से अधिक की साधना से पाया है। वर्तमान में जो भी कर्म हो, मन को पूर्णरूपेण वहीं रखने का प्रयास करो। किंचित मात्र भी विपरीत मत जाने दो।
कर्म हम दो प्रकार से करना जानते हैं-
‘आसक्ति’ या ‘विरक्ति’ या तो चिपक जाएंगे या छोड़ भागेंगे। या मुंह उस तरफ करेंगे या मुंह फेर लेंगे। अनासक्त तीसरा अर्थ है। स्वामीजी कहा करते थे- ‘दर्पण की तरह हो जाओ, ... सामने व्यक्ति आया, प्रतिबिम्ब बना, वह गया, बिम्ब गया। दर्पण कुछ भी भीतर नहीं ले जाता। अनासक्त दोनों तरफ जाता है। जा सकता है। परन्तु बंधता कहीं भी नहीं है। ‘कमल दल वत’, स्वामीजी कहा करते थे- कीचड़ में कमल की तरह।

लोग स्वामीजी को रूपये भेंट करते थे, वे न तो ग्रहण करते थे न ही अस्वीकार करते थे। सौ का नोट है या दस रूपये का, कुछ पता नहीं, कई बार तो देख भी नहीं पाते थे- लोग रूपया भेंट कर चले जाते थे, ... उन्होंने जेब में रखा। जब सब गए, तुरंत कुरता उतारा और जेब खाली कर दी, ... जहां जाना है भेज दिया, दे दिया, ... झोला व जेब वैसे ही खाली। दोनों तरफ उपेक्षा, व किसी से अपेक्षा नहीं। यह उनके साथ रहकर ही सीखा। न राग न विराग, वीतराग। न किसी प्रकार का आकर्षण न विकर्षण, बस मात्र स्वाभाविक अवस्था। वे इसे दर्पण से तुलना करते थे।
स्वामीजी के पौराणिक पात्रों में प्रिय पात्र जनक थे। वे राजा जनक की अनेक कहानियां सुनाते थे- उनका एक पांव आग पर रखा रहता था, दूसरे पर सुंदर महिलाएं मालिश करती थीं, न वह सुख में थे, न दुख में, ... अनासक्ति योग उनके पास था। शुक्र देव भी उनसे ही ज्ञान लेने गए थे।
भगवान यहां कह रहे हैं, ... जो अनासक्त है, ... उसके भीतर मौलिक परिवर्तन स्वाभाविक रूप से हो जाता है। वहां स्वयं प्रकृति अपनी संपूर्ण सुंदरता से उसके भीतर अभिव्यक्त हो जाती है। उसका कर्म लोकमंगल को समर्पित हो जाता है। यहां बलपूर्वक ‘सेवा’ नहीं होती। आचरण ही सेवामय हो जाता है। इसलिए हमें चाहिए, ... हमारा जीवन अनासक्त हो, हम अनासक्ति में प्रवेश करे। निरंतर वर्तमान में रहने से, यह अनासक्ति स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है। जनक ने कहीं भी पलायन का संदेश नहीं दिया है।
... संकेत यही है कि वास्तविक कर्म वहीं शुरू होता है, जिस दिन वह दूसरों के लिए शुरू होता है। स्वामीजी ने इसीलिए एक ही बात बार-बार कही है कि निरंतर वर्तमान में रहो, और शरीर सेवा कार्य में लगा दो। हम अपने परिवार के लिए काम करते हैं, ईमानदारी से देखे, कर्तव्य कर्म करते हैं, या व्यापारी की तरह अपने फर्ज को नियोजित करते हैं?

जहां प्रेम होता है, वहां मात्र दिया जाता है। लिया नहीं, अपने आपको निःशेष कर देना ही प्रेम है। परन्तु यहां तो मोल-तोल लगा रहता है। स्वामीजी कहा करते थे- अपने लिए जीना कोई जीना है, इस उम्र में जब मुझसे चला भी नहीं जाता, ... फिर भी जाता हूँ, ... अपनी हर सांस दूसरों के लिए है, ... मुझे अपने लिए क्या करना है? पर जानता हूं जब तक प्रकृति कराना चाहेगी, मुझे करते ही रहना है।
... जो अपने लिए जीता है, उसका जीवन उसके लिए ही बोझा हो जाता है। जब वह पूरा भर गया है, ... या पूरा खाली हो गया है, ... बात एक ही है, कहीं से पकड़ो, ... तब वह निर्भार हो जाता है, भीतर का रस उसकी जड़ों को सिंचन करने लगता है, यह रस परमात्मा के यहां से फूटता है, नई कौंपले आती है।
भगवान श्लोक 26 से 30 तक पुनः ज्ञानी के लक्षणों को समझाते हैं।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।। 28।
गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानी पुरुष संपूर्ण गुण गुणों में ही बर्त्तते हैं ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता है।
ज्ञानी पुरुष कभी भी किसी के मार्ग पर अतिक्रमण नहीं करता, उसकी मान्यताओं को नहीं तोड़ता है। अपने आपको आरोपित नहीं करता। ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ, वैसा ही करावेे-
- स्वामीजी कहा करते थे- सामान्य जन हमारी बातों को बहुत ध्यान से देखता है। उसके मन में अश्रद्धा न आवे। वह कर्म से विरत न हो, इसका ध्यान रखो। सच तो यह है कि ज्ञानी के लिए, बहुत से सामान्य व्यक्तियों के रूचि के क्रियाकलाप व्यर्थ हो चुके हैं, वह स्वयं बोध के स्तर पर उठ चुका है, ... परन्तु लोक जहां वह रह रहा है, उसे उसकी मान्यताओं का ध्यान रखना है।
स्वामी जी को देखा है, वह पूछने पर ही उत्तर देते थे। सामान्य जन उनसे सामान्य जीवन के सवाल, उलझनें, परिवार की समस्याओं को लेकर आते थे, वे कभी भी कहीं आध्यात्म की चर्चा भी नहीं करते थे।
कई बार तो लोग बस उनके पास, कुटिया में बैठकर चले जाते थे। न वे पूछते थे- ‘क्यों आए? न वे कुछ कह पाते थे।
‘यही समझाते थे- ‘कभी किसी की भावना का मजाक मत बनाना, ... तुम कुछ कहना चाहते हो, जब तक वह न पूछे, उसकी जिज्ञासा न जगे, ... चुप रहना। हर जगह छाता लेकर जाना जरूरी नहीं है।

... तुम किसी को गलत कहकर, उससे गलत से हटा सकते हो, पर उसे सही पथ पर नहीं ला सकते, जब तक वह नहीं चाहे। अनासक्त को किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है, पर वह छोड़ देगा तो जो आसक्ति में वे भी उसके अनुसरण में छोड़ बैठे तो ज्यादा अहित होगा। तथाकथित सन्यासियों ने अहित ज्यादा ही किया है।
गुणा गुणेषु वर्तन्ते
... भगवान कृकृष्ण ने इसी अध्याय में जीवन यात्रा पर कि- क्यों कैसे घटता है, सूक्ष्म विवेचन किया है-
‘संपूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए हुए हैं, ... अहंकार से मोहित हुए अंतःकरण वाला पुरुष मैं कर्त्ता हूं ऐसे मान लेता है-
... प्रकृति के गुण, ... प्रकृति गुणमयी है। यह दैवी है। यही देने वाली है। मनुष्य मानता है मैं करता हूं, उसका कर्ताभाव बना रहता है, ... कभी कर्म से अलग होकर देखंे, ... पता लगता है उसको ऐसा ही घटना था, ... ऐसा ही घटा है, हम मात्र दर्शक रह गए हैं। प्रकृति करवाती है, ... हम जब उसकी धारा में नहीं होते, प्रतिकूल जाना चाहते हैं, धारा एक कोने में उठाकर फेंक देती है।

स्वामीजी कहा करते थे, ... निरन्तर वर्तमान में रहने से, धीरे-धीरे सामान्य भविष्य का ज्ञान होने लगता है, ... यह कार्य होगा या नहीं, भीतर से अंतःप्रेरणा आ जाती है। स्वप्न मार्गदर्शक होने लगते हैं। प्रकृति के ऊपर सब भार सौंप कर निरंतर कर्मरत रहो। जो कार्य वर्तमान में आया है, पूरी तरह उसमें डूब जाओ, ... वही तुम्हें सोंपा गया है।
ज्ञानी वही है, जो इस अहंभाव से हट गया है कि वह कर रहा है। वह जानता है उससेे कराया जा रहा है, वह तो अदृश्य के हाथाांें एक यंत्र है।
‘‘गुण-विभाग और ‘कर्म-विभाग’ को जानने वाला ज्ञानी पुरुष संपूर्ण गुण गुणों में ही वर्तते हैं, ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता-
- प्रकृति गुणमयी है। सत, रज, तम गुण प्रकृति जन्य है। इन तीनों गुण का कार्य होने से प्रकृति त्रिगुणामयी है। शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, प्राणी पदार्थ सब गुणमय है। यही गुण विभाग कहलाता है, इनसे होने वाली क्रिया कर्म विभाग कहलाती है।
गुणों की सत्ता, संस्कार में है। वे ही व्यक्ति को व्यक्ति के बीच की दूरी को बना देते हैं। ये गुण और कर्म निरंतर परिवर्तनशील है, जो चीज आज है, वह कल नहीं रहेगी, ... जो प्रकृति की इस निरंतर परिवर्तनशील गति को जान लेता है, वह ज्ञानी है। वह जानता है, गुण ही गुणों में विकसित हो रहे हैं।
जीने का यह भी एक तरीका है, ... ‘मैं’ अब केन्द्र में नहीं रहा। मेरी अधिकारिता गई, ... मैं यह जान गया हूं, मैं मात्र एक तरंग हूं,ँ ... विराट के महासमुद्र से उठी हुई लहर है, ... उसकी इच्छा ही मेरी स्वतंत्रता है, ...
जो व्यक्ति यह जान लेता है, जीवन गुणों के हिसाब से बह रहा है, विकसित हो रहा है, ... और कर्म भी उसी आधार प्रकट हो रहा है, ... वह जो जान लेता है, वही अनासक्ति में प्रवेश कर जाता है।
‘गुणों की सत्ता’, व्यवहारिक सत्य है, ‘गुण ही व्यक्ति  जीवन में संग्रहित करता है, इन्द्रियां जो भी विषय भोगती है, नहीं भोग पाती है उसका प्रभाव मन ग्रहण कर लेता है तथा वह ‘छाप’ भीतर संग्रहित होती चली जाती है, जिसे संस्कार कहा जाता है। विराट की महाशक्ति से तरंगित होकर, आधार पाकर, वह संस्कार गुणों का पंुज, ... निरंतर प्रवाहित होता है, ...
 बाहर से भीतर, भीतर से बाहर निरंतर कर्म प्रवाह बहता है,यह कोई वस्तु नहीं है,मात्र भाव हैं ..., पूरा जीवन ही निकल गया, भीतर जाने का रास्ता ही नहीं मिला, मन एक दीवार की तरह जो बाहर से तरंग उठी , उसे हजारों लहरों में  वापिस भेज देता है, खुद ही पिता है, खुद ही पुत्र बन जाता है। वही पैदा करता है, वही भटकाता है। और जो भीतर से कंपन उठा, उसे तरंग बनाकर मस्तिष्क तक निरंतर भेज रहा है। जीभ तो मानो उसी की दास है। जाना रास्ता बहुत ही सूक्ष्म है, संकरा है। अचानक ही वह ठहरेगा, वह तो गति है, विचार तो उसकी पहचान है। क्षण के क्षणांश में ही दीवार अचानक एक सूराख दे जाती है। मन ही विपरीत होजाता है। वह क्षण ही वर्त्तमान है। वर्तमान ही वह कला है, जहां वह इन गुणों के प्रभाव से बच पाता है। वह दृष्टा हो जाता है। अनासक्ति में प्रवेश कर जाता है।
तब उसका ‘मैं’ पन छूटने लगता है, ... वह जान जाता है, वह एक प्रवाह में तिनके की तरह है, ... वह कर्ता से स्वयं कर्म बनकर प्रवेश पाना चाहता है।

‘मयि  सर्वाणि कर्माणि संन्यास्याध्यात्म चेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगत ज्वर।।30।

तू विवेकवती बुद्धि के द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को मेरे अर्पण करके, कामना, ममता और संतापरहित होकर यद्ध( कर-
विगत ज्वर, सब प्रकार के भय को छोड़कर, सब प्रकार के कंपन को छोड़कर मुझमें समर्पित होकर
स्वामीजी ने बार-बार, इस ‘गीता के’ ‘माम’ पर ध्यान दिलाया है। ‘माम’ भगवान कृष्ण यहां नहीं हैं। यहां ‘माम’ जो विराट, परमात्मा यहां वह सब जगह है। ... वह परमात्मा है, ... जब ज्ञानी, ... उस ‘मैं’ को जान लेता है, जहां उसका ‘अहंकार’, उसका बाह्यमन, अंतर्मुखी होता हुआ अंतर्मन में डूब जाता हैै, तब ‘माम’ का बोध होता है, वह ‘माम’ परमात्मानुभव है।
... संकल्प ही समर्पण होता है, संकल्प तक आते-आते विगत ज्वर( आलस्य रहितद्ध) अनिर्णय की स्थिति, से छूटना होता है।
 ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते त्रेऽपि कर्मभिः।।31।
‘ जो कोई भी मनुष्य दोष बुद्धि से रहित और श्रद्धा से युक्त सदा ही मेरे इस मत के अनुसार वर्तते हैं, वे पुरुष संपूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं-
- यहां भगवान कह रहे हैं - जो मैंने कहा है- श्रद्धापूर्वक हृदय से अंगीकार करके जो जीता है और कर्म करता है, वह समस्त कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
- जो मैंने कहा है- भगवान ने ‘माम’ शब्द का पुनः प्रयोग किया है। ‘माम यहां ब्रह्मनिष्ठ गुरु है, जिन्होंने अनासक्त भाव से उस परमात्म भाव को अपने भीतर जाना है, ...वे मार्गदर्शन कर रहे हैं।
परन्तु हम हमेशा संदेह साथ रखते हैं, श्रद्धा विश्वास नहीं है। विश्वास सदा अंधा होता है। कहीं कोने में संदेह छुपा रहता है। वह न तो अपना जाना होता है, मात्र औपचारिक माना होता है, ... भीतर किसी प्रकार का अविश्वास न रह जाए।
शत-प्रतिशत खाली हो जाए। संदेह रहित इस अवस्था में श्रद्धा उपजती है। स्वामीजी ने इसे आत्मकृपा है। यह दूसरे से नहीं आती। अपने भीतर से पैदा होती है। यहां विश्वास किसके प्रति है, यह पता नहीं है, पर अविश्वास कहीं नहीं है, बस वह है, यही श्रद्धा है। यहां सोच खत्म हो जाता है। सोच वहीं तक जाता है, जहां तक आप पक्ष-विपक्ष में उतरते हैं, यहां विचार ही गिर जाता है, जो तर्क से पार शेष बचती है, वह श्रद्धा है।
भगवान ने यहां ‘श्रद्धा’ पर बल दिया है।
बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध होती है, तब विवेक जगता है। तब मन अंतर्मुखी होता हुआ, अपने मूल निवास स्थान की ओर  आना चाहता है, तब अचानक वह हृदय पर आकर ठहरता है, यहां पर आकर सारे विकार छूट जाते हैं।
यह हृदय है, यह बायलोजिकल हृदय नहीं है, यह आंतरिक जगह है, जहां जो शक्ति पैदा होती है, उसका नाम प्रेम है, वह दूसरों को अनुभव होता है, उसके पास  स्वयं मंे आत्मकृपा होती है। सघन आत्मविश्वास होता है। इसीलिए ही कहा जाता है कि ज्ञान मस्तिष्क की संपदा है, ध्यान हृदय की।
वह स्वाश्रय में स्थित रह जाता है।
... विवेक में, विचार शुद्ध रह जाता है। विवेक का जब आदर होता है, साधक विवेकी में ढल जाता है, वहां पतन की गुंजाइश नहीं होती है।  प्राप्त जीवन में विवेक का अनादर ही पतन की ओर लेजाता है। विवेक अलौकिक है, जहां तक विचार है, वहां तक या तो आसक्ति है, या विरक्ति है, जहां दोनों की अपेक्षा है, समभाव है, वहां अनासक्ति है, ... अनासक्ति जब निरंतरता में ढलती है, तब अंतर्मुखता प्राप्त होती है, ... तब विवेक में प्रवेश होता है।
... इस विवेकी का अगला पडाव जहॉं होता है, मात्र उसके भीतर श्रद्धा रह जाती है। एक तरलता, एक एक्य का भाव, ... यहां पर आकर जिसे छूटना होता है, वह छूटता चला जाता है। ‘‘मैं ’’,भाव वहां तक साथ जाता है, जहां तक यह बोध रहता है, मैं कर रहा हूं। जहां बस ‘वह’ रह जाता है। स्वामीजी के शब्दों में प्रकृति सब कराती है, उसी का योग-क्षेम रहता है, करना तो है, पर वह करवाए जाती है, ... यहां हो रहा है, किया नहीं जा रहा है, वहां जो शेष बचता है, वह श्रद्धा रहती है। जहां विवेक है, वहां बुद्धिचातुर्य नहीं रहता, वहां अपने आपको न्यायोचित ठहराने का आग्रह नहीं होता, ... जहां विवेक भी छूट जाता है, वहां श्रद्धा रह जाती है, श्रद्धा उस विराट तक पहुंचने की साधन है, ... श्रद्धा उस विराट की महान शक्ति भी है, ... इसकी पहचान भीतर साधक में आनंद भाव है, ... दूसरों में  उसका आकर्षण है, ... एक चुम्बक की तरह, ... प्रकृति का गुरुत्वाकर्षण, ... वहां अपने आप उपस्थित हो जाता है। क्या यही भक्ति नहीं है?
पुनः भगवान इस तीसरे अध्याय के समापन के समय, अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण साधना क्रम को परिभाषित कर रहे हैं-
इन्द्रियस्येन्द्रिस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थ्तिौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपथिनौ।।34
इसीलिए सभी इन्द्रियों के भोगों में स्थित जो राग-द्वेष है। उन दोनों के वश में नहीं होवे क्योंकि इसके वे दोनों ही शत्रु हैं।
जो राग से भी परे हैं, द्वेष से भी परे हैं, जीवन जो है, वह द्वन्द में है, सुख-दुख, लाभ-हानि, यश-अपयश, जीवन-मरण दोनों साथ आते हैं। एक आगे है, तो दूसरा पीछे है। हम चाहते हैं, जो शुभ है वह जीवन में रहे, अशुभ न हो, ... पर यह संभव नहीं है। अशुभ की कल्पना ही भयभीत कर देती है।
... अर्जुन क्या करे? ज्ञानी क्या करे? ... भगवान कह रहे हैं, ... तू दोनों के वश में मत आना, ... एक के साथ ही मत रहना, ... दोनों को एक जैसा स्वीकार कर ले। यह बात दूसरे अध्याय में आई है। दुख में अनुद्विग्न मत होना। सुख की लालसा में स्पृहा नहीं हो। ज्ञानी दोनों को ही स्वीकार कर लेता है। यही ज्ञान है। वह एक से चिपटता नहीं है। एक को बचाना नहीं चाहता। जो हो रहा है, प्रकृति के गुणों के आधार पर हो रहा है। वह मात्र साक्षी है। गवाह है कि ऐसा घट गया। जीवन में दोनों ही आते हैं। वह किसी एक की स्पृहा में नहीं रहता। यही उपेक्षा, यही वीतरागता है, यही वर्तमान में रहना है, जो है, जैसा है, स्वीकार है, वह आलस्य में नहीं है, प्रमाद में नहीं है। पलायन में नहीं है, निरंतर कर्मरत है, वह अनासक्त है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म अति उत्तम है अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है। दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
गीता का यह श्लोक, सर्वाधिक चर्चित, व विवादास्पद रहा है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे, ... स्वधर्म की खोज अपने अस्तित्व की खोज है। रमण महर्षि का यह आप्त साधन सूत्र था;मैं कौन हूं? ... यह मैं की खोज ही स्वधर्म तक लाती है।
... हम जो जन्म से पाते हैं, जिस परिवार में हमारा जन्म होता है, उसकी मान्यताएं हमारी हो जाती है। हम उस धर्म को अपना मान लेते हैं। कट्टर धार्मिक हो जाते हैं। दूसरे के धर्म से विद्वेष तक करते हैं।
परन्तु हमारे यहां माना गया है, प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से अलग है, उसकी निजता है, उसके विकास का, कार्य करने का, अपना तरीका है, वह अपनी निजता में जीना चाहता है, वही उसका सुख है, जब वह उससे हट जाता है, तब दुखी होता है।
... स्वधर्म का मतलब है, उसकी आन्तरिक प्रकृति क्या है, वह उसकी अपनी संस्कार पंूजी पर निर्भर होती है। उसका अपना मूल स्वभाव है, स्वामीजी कहा करते थे- आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धि, स्वाभाविक अवस्था को पाना हैं, स्वधर्म, ... व्यक्ति की उसकी अंतः प्रकृति है, ... एक बीज का भंडार है, ... जो कि अपनी स्वाभाविक स्थिति को चाहता है, ... वहां आने पर उसे शांति मिलती है, ... संतोष प्राप्त होता है, उसका जो सामर्थ्य है, ... यहां उसका पूरा प्राकट्य होता है।
... परन्तु होता इसके विपरीत है। समाज में अनुकरण, भेड़चाल कभी भी अपने आप से जुड़ने का मौका नहीं देती। सामाजिक व्यवस्था, बाहर ही बाहर भटकाती है। बाहर का आकर्षण, प्रेय का और श्रेय का बहुत जबर्दस्त होता है। हम परधर्म को ओढ़ते ही रहते हैं।
मुझे ही नहीं पता था, मुझे क्या करना है, ... मैं प्राप्त बुद्धि का प्रयोग कर अपना रास्ता तलाश करता रहा। प्रकृति ने कभी बाधाएं हटाई, तो कभी बाधाएं खड़ी कर दी, ... जो चाहते थे, वह नहीं मिला। स्वामी विवेकानंद, परधर्म की तलाश में थे, मामूली सी भी नौकरी नहीं मिली, प्रकृति ने परमहंस के सानिध्य में ले गई।उनका जो सामर्थ्य था, जो बीज था। उसका विकास दूसरी दिशा में हुआ, ... वह उनके स्वधर्म की प्राप्ति थी।

हर प्राणी का अपना स्वभाव है, जब यह उसे प्राप्त होता है। तब वह अपने स्वधर्म से जुड़ जाता है।
भगवान यहां कह रहे है- जो तेरा धर्म हो पहले उसकी खोज कर, दूसरे के गुणसहित धर्म से भी अपना  गुण रहित धर्म अति उत्तम है। तू पता लगा, तेरा सामर्थ्य क्या है? तू क्या हो सकता है, संभावना क्या है, फिर उसी के लिए प्रयास कर, ... तेरा संतोष तुझे तेरे लिए स्वाभाविक मांग पूरी करेगा, वह तेरी तुष्टि होगी।
परधर्म से बचना होगा, ... भले ही वहां तत्काल सफलता मिले, धन मिले, यश मिले, पर वह भयावह है, वह आत्मा को खोकर मिलती है। पराश्रय नर्क है। दूसरे को आदर्श मानकर उस जैसा बनने की ललक, परधर्म है, भगवान कह रहे हैं- यह भयावह है। स्वामीजी कहा करते थे-” मैंने कभी किसी को शिष्य नहीं बनाया,( इससे मिलने वाले बहुत खुश होते थे)  मैं नहीं चाहता आप मेरी नकल करंे, पर आपकी मुझ पर श्रद्धा है, मेरी बातें सही मानते हैं, तो एक बार प्रयोग करें, सही लगे आगे बढं़े, नहीं तो छोड़ दें।“ पर आगे की बात जब सधती है तब शिष्यत्च अपने आप उतर जाता है। इस पर विश्वास आना ही कठिन था। हम आगे  की बात सुनकर भी अज्ञानी बने रहे।
 हर व्यक्ति की साधना का पथ उसका अपना है, उसे बनाना है, यह उसकी मांग के अनुसार होगा, दूसरे का अनुकरण भयावह है। स्वधर्म का रास्ता आपको बनाना है, परधर्म का रास्ता बना-बनाया मिलता है, हम स्वधर्म खो बैठे हैं। हमारे शब्द भी दूसरों के हैं। कपड़ों तक में नकल है। हमारी अपनी मौलिकता खो गई है। स्वधर्म की वापसी, प्रसाद की प्राप्ति है, दिव्य प्रसाद, जिसे अंतःकरण की प्रसन्नता भी कहते हैं।

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।ं 36।
अर्जुन पूछ रहा है--हे कृष्ण फिर यह पुरुष बलात्कार से लगाए हुए के सदृश न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित हुआ पाप का आचरण करता है
यह मनुष्य किसकी प्रेरणा से पाप कर्म करता है। हम नहीं चाहते हैं, फिर भी गलत हमसे हो जाता है। हम प्रायश्चित, पश्चाताप की आग में झुलसते रहते हैं।
भगवान ने अर्जुन की इस जिज्ञासा के समाधान में कहा है, ‘रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला, महापापी है, इस विषय में तू इसको वेरी जान।
राग से काम उत्पन्न होता है, और काम से राग बढ़ता है। सांसारिक पदार्थों को सुखदायी मानने से राग पैदा होता है, ... इससे अंतःकरण में उनका महत्व दृढ़ हो जाता है, फिर इन्हीं पदार्थों को संग्रह करने की इच्छा तीव्र होती है। पुनः कामना पैदा होने से राग दृढ़ होता जाता है, ... यह एक चक्र है, इससे निवृति नहीं होती है, ... मेरा मनचाहा हो, ... यही काम है। आज यही सिखाया जाता है, ... तीव्र इच्छा करो, ... तुम उसे पा सकते हो, ... आकाश भी छोटा है, ... जाओ, ... पदार्थों की इच्छा, सुख की इच्छा, आसक्ति यह सब काम के ही रूप हैं।
... पाप कर्म, ... जाना, अनुभव किया, कामना के वशीभूत होकर ही होता है, ... विवेक यहां घूमिल हो जाता है, बुद्धि भी तमस में डूबा जाती है, मन, इंन्द्रियों के अनुशासन में चला जाता है, ... इन्द्रियां, आदत की गुलामी में चली जाती है, ... पाप और पापी दोनों एक रूप हो जाते हैं। काम में बाधा होने पर क्रोध होता है, ... कामना ही पापों का मूल है। कामना की पूर्ति पर लोभ होता है, बाधा होने पर क्रोध होता है, ... बाधा पहुंचाने वाला बलशाली होता है तो भय होता है।

... बहुत सोचा, जब कामना ही नहीं होगी तो संसार का कार्य चलना रूक नहीं जाएगा? क्या कामना करने से ही पेट भर जाता है, उसके लिए श्रम होता है, क्रिया करनी होती है, संसार का कार्य, वस्तुओं तथा क्रियाओं से चलता है, कामना से नहीं। कर्म बाहर होते हैं। कामना भीतर चलाती रहती है। अनावश्यक धक्का देती है। जो वस्तु कर्म के अधीन है, वह कामना से कैसे प्राप्त हो सकती है? कामना न चाहते हुए भी दुख आता है, रोग आता है, शोक आता है, ... अनुकूलता भी कर्मों का फल है, चाहे वे वर्तमान के हों या अतीत के हो।

... क्या कामना से छूटा जा सकता है? एक कामना हटती है, पूरी होती है, दूसरी आ जाती है। वह निरंतर बनी नहीं रती, एक मिटती है, दूसरी आ जाती है, ... उपाय यही है, नयी कम होने लग जावें, तो पुरानी अपने आप पूरी होकर मिटती चली जाती है।
‘कामना का जन्म’ अंतःकरण में होता है, यह उसका सहज स्वभाव है, ... वे सरोवर पर उठने वाली तरंगें है, निरंतर उठ रही है, ... स्वामीजी कहा करते थे, ... यहां मन का बर्फ हो जाना है, ... बर्फ में तरंगे नहीं उठती, ... कामना को उठते ही देखें।
(1) जो कामना पूरी हो सकती है, शरीर की, परिवार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए है, उसे पूरा करो।
े (2) जो कामना भले ही दूसरों की हो, आपके द्वारा करने का सामर्थ्य है उसे पूरा कर दें।
 (3) जो आप करना चाहते हैं, सामर्थ्य नहीं है, उसे प्रकृति पर छोड़ दे, ... स्वाभाविक क्रम में पूरा होता है, नहीं तो अच्छा है, तेरी इच्छा पूरी हो, उसे परमात्मा पर छोड़ना बेहतर है।
... भगवान ने इससे पूर्व स्पष्ट कहा है- गुणा गुणेषु वर्तन्ते, ... गुण ही गुणों का विकास करते हैं। प्रकृति गुणमयी है। यह देने वाली है। इसके पार जाना अत्यंत कठिन है। प्रकृति के तीन गुण है, सत, रज, तम। आधुनिक विज्ञान  ने भी पदार्थ के खंड-खंड करते हुए इन तीन गुणों को इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रोन रूप में चिन्हित किया है। तम आधार है। स्थिरता का तत्व है। स्थैतिक ऊर्जा है। सब कुछ इसी पर टिका है। यह अवरोधक शक्ति है। दूसरी शक्ति रज है, जो गति है, तमस रोकता है, रजस गति देता है। यही शिव और ब्रह्मा है। तीसरी शक्ति सत है, यह दोनों शक्तियों के बीच संतुलन रखती है।
... भगवान कह रहे हैं- यहां जो भी घट रहा है, ... मेरी माया है, जो गुणमयी है। वह इन तीनों शक्तियों का खेल है। सब कुछ इनके द्वारा ही हो रहा है।
... अर्जुन का सवाल है, हम नहीं चाहते हैं, फिर भी पाप कर्म क्यों हो जाता हैं? हमसे कौन करवा लेता है।
... भगवान इसी प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं- प्रत्येक गुण की अपनी शक्ति है, इसका उपयोग अनुकूल और प्रतिकूल हो सकता है। क्रोध तमोगुणी कहा जाता है। यह भी एक शक्ति है। इसके विपरीत प्रेम की शक्ति है, तथा विवेक की शक्ति है... जब हम नकारात्मक शक्तियों का सहारा लेते हैं, हम अपने जीवन नर्क बुला लेते हैं। जब हम विधायी शक्तियों के साथ होते हैं, घर हमारा स्वर्ग हो जाता है। ... जहां दोनों शक्तियों के पार जाने की संभावना बनती है, जहां निर्विकारता होती है वहां हम दोनों ही विकारों से बाहर हो जाते हैं। विकार का अर्थ है- विकसित होने का भाव, जो दोनों शक्तियों को संतुलित कर लेता है, वही ‘पार’ हो सकता है।

मैंने अपने आपको देखा, ... क्रोध स्वभाव ही बन गया था। ... पाया मन ही क्रोध को पकड़ लेता है। जहां भी मौका मिले, ... थोड़ी सी भी जगह मिले, मन तुरंत उधर झुक जाता था। सौ में से निन्यानवे यही काम हुआ, एक गलत था, मन वहीं अटक जाता था। तब जाना, मन की भी पकड़ने की आदत हो गई थी। कोई भी विकार हमारे बिना पकड़े टिक नहीं पाता है। हम ही उसे पकड़कर ताकत देते हैं। बार-बार उसी का चिन्तन करने से वह मजबूत होता जाता है।
... भीतर जहां से यह तरंग उठती है, शब्द बनने से पहले, हृदय में हलचल होती है। कंठ पर दबाव पड़ता है, अगर रोक लिया तो चेहरा तो तनता है, पर लहर भीतर लौट जाती है, परन्तु अगर मध्यमा के पार बैखरी पर आकर शब्द मिल गए तो फिर अपना नियंत्रण नहीं होता है। हर लहर की अपनी सीमा है, वह प्रारंभ में हर स्पंदन की तरह होता है, ... हम ही उसे ताकत देते हैं, उस स्पंदन को तरंग, तरंग से प्रवाह, तथा नदी बना देते हैं। मैंने जाना, ... मैं ही उसे भीतर भीतर सहयोग देता था, ... मेरे सहयोग से ही वह ‘स्पंदन’ तरंग बन रहा था। मेरी पहचान, क्रोधी की हो गई थी, ... मैं अपना मूल स्वभाव खो बैठा था। यह स्पंदन भीतर से उठता है, ... जहां जाने-अनजाने अनेक भोगों की छाप हम संचित करते चले जाते हैं। वही संस्कार है। जहां भुक्त-अभुक्त असंख्य वासनाओं के बीज आड़े-तिरछे संग्रहित हैं। इसलिए यह भी पता नहीं चलता कि भीतर कौन सा प्रवाह चल रहा है। हम मात्र कठपुतली की तरह इस प्रवाह में डूबते-तिरते रहते हैं।

ये स्पंदन, गति हमसे ही पाते हैं, हमारा ही सहयोग इन्हें नदी की तीव्र धारा में बदल देता है। भगवान यहां बार-बार यही समझा रहे है। तुम ही विकारों में उतरने के डूबने के जिम्मेदार हो। यह प्रकृति का नियम है। दैवी ह्येेषा गुणमयी, ... अगर हम इन नियमों को समझ लेते हैं। अपने ज्ञान का हिस्सा बनाते हैं, तो हम वर्तमान को उपलब्ध होने लगते हैं, ... हम विवेकी होते हैं। लेकिन अगर हम निरंतर आसक्ति को अपने भीतर पालते जाते हैं, ... कामनाओं के दास बने रहते हैं तब हमारा संग्रह बलवती होता चला जाता है। और यह संग्रह निरंतर उठने वाली प्रकृति की महाशक्ति से जो गुणमयी है, आघात पाकर, ... मन को उत्प्रेरित करता रहता है। हम बार-बार वही करते चले जाते हैं, जिसके लिए हम कहते हैं, ... हमसे कोई अदृश्य शक्ति यह सब करवा रही है।
‘संस्कार’ बहुत बड़ा बीज भंडार है, जहां हम निरंतर संग्रह करते चले जाते हैं। यह भी नहीं जानते कि वह वृक्ष कितना बड़ा बन जाएगा, ... शक्तियां भीतर है, वे अनुकूल वातावरण मिलते ही बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया में सहयोग करती है।
भगवान कृष्ण का साधकों यही सूत्र है कि- ‘ये जो तीन गुण हैं, इनको जो साध लेता है, ... संतुलन पा लेता है, वही इनसे पार जा सकता है, यह दुरत्या है। अत्यधिक कठिन तो है, पर असंभव नहीं है। यह ‘माम’ शब्द ‘परमात्मा’ का सूचक है। जिसके समस्त कृत्य निष्काम भाव से होने लग गए हैं। जिसने जीवन का इनका संतुलन पाया है वही ‘नट’की तरह रस्सी से पार चला जाता है, अन्यथा पतन होना स्वाभाविक है।


धूमेनाव्रियते वर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनोवृतो गर्भस्तथा  तेनेदमावृतम्।ं38
जैसे धुएं से अग्नि और मैल से दर्पण ढक जाता है, वैसे ही ज्ञान,  इस ”काम“ से ढका हुआ है।
अग्नि तो है, पर धुंए ने ढंक रखा है। दर्पण तो है पर धूल में उसकी शक्ति खो गई है, ज्ञान सभी के पास है। जो अज्ञानी है, उसके भीतर भी ज्ञान है, पर वह इस काम के प्रभाव से अनभिज्ञ है। भगवान यहां कह रहे हैं- जैसे धुंवा आग को घेर लेता है, उसी प्रकार वासना मन को घेरे हुए हैं- वासना ही वस्त्र का वह गीलापन है जो धूल के कणों का आकर्षित करताहै, वह गीलापन है, जो धुंआ उठाता है। वासना पैदा होती है, ... यह मुझे चाहिए, ... यह मेरे पास नहीं है। आज मिल जाए, कल फिर दूसरी चाहिए, ... यह वह आग है, बुझती नहीं है, यह हमेशा जहां से उठती है, वहां खालीपन छोड़ देती है। इसका पूरा झुकाव जो नहीं है, वहां है, इसलिए जो है, जो हमेशा प्राप्त है उस पर ध्यान आने ही नहीं देती है, आत्मा सदा वर्तमान में है। वासना कल में है। शरीर हमेशा वर्तमान में है, मन भी उसी के साथ रहे। यही साधन तत्व है।

सुमिरन, स्मरण है आत्मा का, ... जब यह सधता है, तब वासना से विस्मरण होना शुरू होता है, ... ध्यान का अर्थ होता है, जो है वहां रहंे, पर ध्यान हमेशा जहां वासना जाती है, वहां चला जाता है। तब घर की वापसी नहीं होती। भटकाव बढ़ता जाता है। ध्यान जहां शरीर है, जहां कर्म है, वहीं मन है, वहीं ध्यान है। वर्तमान में रहना उपलब्ध हो जाता है।
भगवान कह रहे है, जैसे धुंवे से आग छिप जाती है, वैसे ही वासना हमारे भीतर ज्ञान को ढक लेती है, जहां धुंवा है, वहां आग भी है, ... ज्ञान हमारे ही भीतर है, हमें कहीं जाना नहीं है, बस यह जो वासना का धुंवा छाया हुआ है, इसे हटाते रहना है। दूसरा उदाहरण दर्पण का दिया है, दर्पण के सामने कितने भी लोग आए वह किसी की छाप अपने भीतर नहीं ले जाता है, पर हम जो भी भोग होते हैं, उसकी छाप संग्रहित करते चले जाते हैं। यही बीज, हमारा संस्कार बनता चला जाता है। ... यह बनता है, चिन्तन से। अगर मन क्रिया के साथ ही सौ टका रहे तो फिर विषय का चिन्तन नहीं होता। स्मृति उपेक्षित हो जाती है। दर्पण की धूल हमारी वासना की परत है। जो उसकी क्षमता को ढक लेती है।
... वासना की धूल से, ... भीतर की छाप भी उभर नहीं पाती है, ...धूल हटे तो जो है, जो भीतर का शुद्धतम स्वरूप है, उसका प्रतिबिम्ब उजागर हो, पर हो नहीं पाता है।
वासना- दृश्य का चिन्तन है। यह पराधीनता सौंपता है। पराधीनता ही पाप है। वासना हमेशा याचक बनाती है। गुलामी सौंपती है।
गीता के तीसरे अध्याय के ये श्लोक, साधन सूत्र हैं पूज्य स्वामीजी ने इन श्लोकों को समझाते हुए, मनुष्य की जो विवेक हीनता है, ... उस पर गहराई से संकेत किया है।
... इस काम के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ;(विवेक) ढका हुआ है, ... इन्द्रियां, मन और बुद्धि  इसकेे वास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके इस जीवात्वा को मोहित करता है।

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञान नाशनम्।ं41।
तू, इन इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विज्ञान को नाश करने वाले इस (काम) पापी को निश्चयपूर्वक मार।
... काम का निवास स्थान कहाँ है, भगवान कृष्ण कह रहे है, वह पदार्थों में, इन्द्रियों में, मन में, बुद्धि में, अहंकार में, दिखाई पड़ता है। ये काम के वास स्थान कहलाए जाते हैं।
... चेतन तत्व का इस जड़ तत्व से जो समन्वय है, जो तादात्म्य है, वहां काम है, ... काम भुुक्त-अभुुक्त वासना बीजों के रूप में संस्कार केन्द्र में रहता है। वह अंतर्मन के समीप है, अंतर्मन पर उसी की धूल है, ... वही इस आत्म तत्व पर छाया हुआ धुवंे का गुबार हैं। यही ‘मैं पन’ हैं। माना हुआ संबंध है, ... यहीं कामना रहती है। इसी से प्रकृति की गुणात्मक शक्ति के द्वारा समस्त कार्य होेते हैं। कामना ही बंधन है। इसी कामना के कारण जो वह नहीं करना चाहता है, वह कर बैठता है।

... इस कामना की पूर्ति में बाधा पहुंचने पर क्रोध होता है, बाधा न पहुंचे कामना पूर्ति हो जाती है, तो फिर लोभ पैदा होता है, लोभ से मोह पैदा होता है।
... कामना पैदा क्यों होती है, जाना, ... मैं अपनी आदत से बहुत कुछ करता रहा, आदतें ही नियंत्रित करती है, वे ही चलाती है। वे ही प्रभावशाली है। आदत से ही इन्द्रियाँ जुड़कर शासक बन जाती है। तत्काल मन भी उसमें लग जाता है। बिना मन की सहायता से इन्द्रिय भोग नहीं कर सकती है। जब इन्द्रिय के साथ मन लग जाता है, तब सही गलत को सही करने के लिए बुद्धि भी उसमें लग जाती है। इस तरह कामना प्रभाव डालती है, बुद्धि के नीचे गिरने से विवेकहीनता अपने आप आ जाती है।
भगवान कृष्ण कह रहे हैं, इन्द्रियां, मन यही काम के वासना के वास स्थान है, ... यहीं से प्रवाह उठता है, जो बहाकर ले जाता है। तू पहले इन पर नियंत्रण पा। ‘मार’ शब्द का अर्थ, इन्द्रियों से असहयोग तक हो गया, गलत अर्थ निकल गया। यहां स्पष्ट है कि नियंत्रण पाना है। यहां इन्द्रियां तो सीढ़ी है, जो द्वार है, उसका सदुपयोग होना है। प्रवाह नीचे भी जाता है, दूसरा प्रवाह है, विषय इन्द्रियों में डूब जाए, इन्द्रियां मन में डूब जाए, इन्द्रिया बुद्धि में, बुद्धि विवेक में, तब चेतना का रूपांतरण प्रारंभ हो जाता है।

स्वामीजी कहा करते थे- मालिक और नौकर का संबंध याद रखना। जहां मालिक सो जाता है वहां सेवक ही अपने आपको मालिक बताता है, बस मालिक का जगना, होश में आना ही पर्याय है, ... हमने विषयासक्त होकर, इन्द्रियों को मालिक बना दिया है, ... उसका नाश नहीं करना है, मन तो उर्जा है, उसका कभी नाश नहीं हो सकता, हां उसकी गति परिवर्तित हो सकती है।
... जो निरंतर वर्तमान में है, वह निर्विकारता में होता हुआ भी कर्मरत रहता है। ... उसकी इन्द्रियों का नाश नहीं होता, ... वे भी रहती हैं। उनकी  संवेदनशीलता  जीवन्त होती है, ... परन्तु वे उसकी आज्ञा में रहती है।
स्वामीजी के पास रहकर जाना था, ‘ग्यारह बजे के आसपास भोजन नहीं आया तो वे भोजन करना भी भूल जाते थे, ... याद ही नहीं आती थी, ... थाली में से बस एक रोटी, थोड़ा चावल, दाल ली, बस,  न मिठाई न फल, ... लेते ही नहीं थे। थाली में से बाहर निकाल कर रख देते थे। सामने व्यक्ति आया है, ... पर संबंध टूटा हुआ है, ... आंखें देखती है, ... पर पहचान नहीं है, वह दो-तीन बार बोलता है, शब्द भीतर जाते हैं, तब अचानक संबंध जुड़ते ही संवाद शुरू हो जाता है।

‘यह भी एक स्थिति है, जीवन्त है। जहां विषय इन्द्रियों में डूब जाते हैं। इन्द्रियां मन में डूब जाती है, मन बुद्धि में, बुद्धि विवेक में, विलीन हो जाती है। स्वामीजी की भाषा में, यहां प्रकृति स्वयं कार्य व्यवहार संभाल लेती है। सवाल पूछा भीतर से रेडीमेड आन्सर आता है। सोचना नहीं पड़ता। जाना... यह शास्त्रगत व्याख्या नहीं है, ... ऐसा भी जीवन जिया जाता है, जहां आचरण ही धर्म की, शास्त्र की व्याख्या कर देता है, ... भगवान जो कह रहे हैं, वह श्रद्धा के भीतर ही मोती की तरह उपजता है।
‘भगवान कृष्ण यहां कह रहे हैं-
‘शरीर अथवा विषयों से,  इन्द्रियां परे हैं, इन्द्रियों से विषयों का ज्ञान होता है, विषयों से इन्द्रियों का नहीं, इन्द्रियां मन को नहीं जानती, मन इन्द्रियों से परे हैं। इन्द्रियांे की पहचान मन से होती है। मन बुद्धि को नहीं जानता, ... बुद्धि मन से परे है। बुद्धिका स्वामी अहंकार है। मैं कहता हूं, यह मेरी बुद्धिहै, यह मैंने जाना है। बुद्धि भी यंत्र है, स्वामी अहंकार है। यह अहंकार है, इसका निवास संस्कार में है, इसका एक छोर जड़ है, दूसरा चेतन है। बाह्यमन जहां संसार को छूता है वहीं अंतर्मन विराट को छूता है, इस संस्कार में ही काम का निवास है। इस अहंकार के कारण से, ... उसके साथ तादात्म्य कर लेने के कारण से जो चेतन है वह भी अपने आपको भोक्ता मान लेता है, चेतन ही सुखी-दुखी होता है।
... गीता में भगवान ने दूसरे अध्याय में कहा है- यही वह रस है, जिसकी निवृति उस परम के साक्षात्कार से होती है। यही स्वामीजी का संकेत सूत्र- बाह्यमन का अंतर्मन में विलीन होना है। इससे, उसके पूर्व संस्कार निःशेष हो जाते हैं। काम बीज दग्ध हो जाता है। भुने हुए बीज की तरह उसकी अंकुरण क्षमता खो जाती है।
जो जाग्रत है, वहां बुद्धि से मन नियंत्रित रहता है, मन से इन्द्रियां नियंत्रित रहती है। आवश्यकता होने पर ही विषयों से संबंध जुड़ता है। संबंध जुड़ता है चिंतन से, जहां चिंतन नहीं होता है, ... सामान्य स्थिति में इन्द्रियां चलाती है, उन्हें विषय निरंतर खींचते रहते हैं। आज का बाजार, निरंतर प्रचार से विषयों की ओर खींचता रहता है। विषयों की मानकर, बुद्धि उसकी तरफ दौड़ रही है।

एवं बुद्धेः परं बुद्घ्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रंु महाबाहो काम रूपं दुरासदम।ं43।

अपनी शक्ति को समझकर दुर्जय काम रूप शत्रु को मार।
यह तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक की आज्ञा है- बुद्धि से परे अपनी आत्मा को जानकर, बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके दुर्जय कामरूप शत्रु को मार।
अपनी शक्ति परमात्मा की ही शक्ति है, मन से इन्द्रियों को वश में कर, बुद्धि से मन को वश में कर, बुद्धि को विवेक के हाथों सौंप दे, बुद्धि जब शत-प्रतिशत विकार रहित हो जाती है, तब वह विवेक में ढल जाती है। विवेक परमात्मा की पहली किरण है, तब तू इस दुर्जय वासना के बाहर आ जाएगा।
पूज्य स्वामीजी ने, ... अनंत यात्रा में कुंभ से नीलकंठ को कहलाया है, ... तुम्हारे विवेक जाग्रत हो जाए, यही मेरा लक्ष्य है। शायद इसके बाद मेरा यह शरीर रहे भी या नहीं, महत्वपूर्ण है।
गुरु के जीवन की उपसंपदा, शिष्य को विवेक की प्राप्ति कराना है, जहां विवेकी जगता है वहां गुरु शिष्य में लीन हो जाता है। गुरु ज्ञान ही है, वहां गुरु जगता है।
... यह यात्रा भीतर की है, दो ही प्रवाह है, या तो हम बाहर जाएं, विषयों के अधीन अपने आपको सौंप दे, ... या भीतर आएं परमात्मा के हाथों अपने आपको सौंपे।
इन्द्रियां बलवती है, ... पर बहुत गहराई में जाने के बाद जाना, ... इन्द्रियां आदत की गुलाम होती है। जर्दा खाने वाला कहीं भी हो, जहां उसने दूसरे को हथेली पर चूना मसलते देखा, उसका हाथ उसकी तरफ अपने आप मुड़ जाता है। इन्द्रियों की अपनी सत्ता नहीं है या तो मन के हिसाब से चलो, या आदत के अनुसार, विषय के आकर्षण में। दो ही रास्ते हैं।
जब हम इन्द्रियों के अधीन हो जाते हैं,तब मन स्वाभाविक रूप से नीचे उतर जाता है। यहां मन की हुकूमत नहीं है, वह इन्द्रियों के अधीन कार्य करता है। जब अड़चन आती है, कोई गलत कहता है, तब बु(ि भी नीचे आकर न्यायोचित ठहराती है। यह एक प्रवाह है।

हां, जब वर्तमान में होते हैं, सजग होते हैं।

भीतर उठते ही वासना के, बाह्य के किसी आकर्षण से उठे दबाव में मन को नहीं रहने दें, ध्यान जाता है। बुद्धि तत्काल वहां आ जाती है, वहीं सजगता है, तरंग जो उठी है, आदत वश है, इन्द्रियों के दबाव से है तो वापिस लौट जाती है, ... क्योंकि बुद्धि का स्पर्श पाते ही मन जो ताश के महल खड़े करता है कल्पना पैदा करता है, अनावश्यक विचारणा का प्रवाह पैदा करता है, उसकी यह अपनी शक्ति है पर वह निर्णय नहीं कर सकता। निर्णय बुद्धिकरती है। विचार वह करती है। विचारणा का प्रवाह मन पैदा करता है। वहां कल्पनाएं होती है। बुद्धि के पास आते ही, जब मन की निगरानी शुरू हो जाती है। यह काम घंटे दो घंटे का नहीं है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस। यह तो चौबीस घंटे का है। मन का ऊर्ध्वगमन तभी संभव है, जब निगरानी लगातार हो, सतत हो, तब मन की गति कम होने लगती है। पर मन की शक्ति बढ़ती है। तब इन्द्रियां स्वाभाविक रूप से मन के नियंत्रण में आ जाती है। विवेक का आदर करने से, बुद्धि विवेक में परिणित हो जाती है। विवेक अलौकिक है।

बुद्धि भी सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है। निरंतर ध्यान से सजगता से स्वाभाविक रूप से बुद्धि भी शुद्ध होने लगती है। पहले बूंद का मटमैलापन कम होता है, फिर वह ज्योतित पारदर्शी हो जाती है, तब जाकर सागर में लय होता है। यह विवेक की प्राप्ति है। पूज्य स्वामीजी कहा करते थे- यहां बाह्यमन जब इन्द्रियों से अपने आपको सिकोड़ लेता है, तब वह अन्तर्मुखी होकर भीतर की ओर मुड़ जाता है। मन तो गति है, वह रुक गई तो शरीर का नाश हो जाएगा,  मन का नाश नहीं होता, उसकी गति परिवर्त्रित हो जाती है। तब वह अपने मूल स्थान नाभि की ओर आता है, जहँां अंतर्मन है, बाह्यमन अंतर्मन में लय हो जाता है। बाहर तो कुछ नहीं बदलता, वैसा ही रहता है, पर भीतर चेतना का ऊर्ध्वगमन हो जाता है। मौलिक रूपान्तरण जो हम चाहते हैं।