Monday, September 30, 2013

अवलोकन


अवलोकन



प्रश्नः- स्वामीजी यह अवलोकन की जो विधि बताई जाती है ,वह क्या है?


स्वामीजी विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कह रहे थे :-
”इतने सारे मत है, पंथ है, रोज़ नए-नए बनते हैं, पुराने हटते चले जाते हैं क्यों? प्रकृति का यही रहस्य है, उसे हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए।
वरन! इतने देवी-देवता कहाँ से आते, उनकी पूजा, उनकी आराधना,... इतने ग्रन्थ कहां से आते,... सिलसिला चल रहा है।
रूचि, योग्यता, सामर्थ्य इस संार में प्रत्येक प्राणी का अलग-अलग है। सब एक जैसे हों, यह हो नहीं सकता। साधन और साधना भेद का यही कारण है। नहीं तो सबका एक ही रंग होता, एक ही भाषा होती।
सब अपने-अपने रास्ते पर चलंे, अपने ही अनुसार चलंे, यही सही बात है। मैंने कभी किसी को मार्ग बदलने का नहीं कहा, हॉं, वह अपने रास्ते पर सही कैसे चल सकता है, उसे कोई दुविधा आ रही हो, आकर पूछे तो बताओ, पर किसी का रास्ता खराब है, उसमें कमी है, यह कहना गलत है।
जिसे कंन्वर्जन कहते हैं, धर्म परिवर्तन, यह हमारे यहां का शब्द नहीं है। यह बाहर से आया है। उन्होंने कहा तुम्हारा रास्ता गलत है, हमारा ठीक है, सारा झगड़ा यहीं से शुरू हुआ है। हमने तो उनको भी गलत नहीं कहा। सब बात तो एक ही करते है एक महान सत्ता है, वही नियंत्रक है, उसे पाना है, उसे जानना है, उसकी कृपा चाहो, फिर भेद कहां है? बस अहंकार ही बाधा देता है। उसके कारण से हम अपने आपको श्रेष्ठ तथा दूसरे को खराब कहते हैं।
साधन भेद तो समय व स्थान भेद से ही बदल जाता है। मनुष्य कोई जड़ तो है नहीं, जब पृथ्वी घूम रही है, गृह-नक्षत्र घूम रहे हैं, वहां निरंतर गति ही सार है। वहां एक मुकाम पर पड़े होकर बैठ जाना क्या सही है? यहां सब कुछ परिवर्तनशील है, जब सब-कुछ बदल रहा है तब एक निश्चित रूप व आधार या तरीके पर कैसे टिका रहा जा सकता है।
हाँ, प्राणिमात्र को ध्यान से देखो।
कुछ बातें उनकी एक ही है, उनकी मूलभूल आवश्यकताएं एक ही हैं। मनुष्यों को, उनकी विचारधारा को, उनकी साधना पद्दति को देखो सबका ध्यान एक ही जगह पर रहता है, हमारे जीवन से व्यर्थ का चिंतन हट जावे। वही हटाए नहीं हटता।
मजेदार बात यह है कि न तो हम बलपर्वूक सार्थक चिन्तन कर सकते हैं। नहीं व्यर्थ का चिन्तन हटा सकते हैं।
लगता है, हम तो मात्र तिनके हैं, हवा आई और हम उड़ गए। आप पता करो, यह बात कितनी सही है।
यहां लोग आते हैं, क्यांें आए उन्हें ही पता नहीं रहता। बातें चलती रहती हैं, उसमें बह जाते हैं।
मैं पूछता हूं, कैसे आए?
कहता है, वह बात तो रह ही गयी, अब में आऊंगा तो बात करूंगा। यही तो होता आया है।
जो करना होता है, वह तो होता नहीं है।
जो नहीं करना होता है, वही होता जाता है।
मैंने पहले कहा था-
जो करना होता है, उसे एक बार सोचो, अच्छी तरह सोचो फिर जो तय किया है, करो, सोचो मत। बार-बार सोचने से कार्य करने की शक्ति चली जाती है। अंत में वह कार्य भी छूट जाता है।
इस आदत को कम करना है।
इतने सारे पूजा-विधान इसलिए बनाए गए कि मन एकाग्र हो जाए। जितनी रुचि होती है, उतने ही विधान बनते गए पर मुख्य बात सब भूलते गए।
हम जहां भी हों, जो भी कार्य हो, मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए। परमात्मा की इस सृष्टि का आदर यही है कि हर स्थान श्रेष्ट है। हर कार्य श्रेष्ट है। कोई छोटा नहीं। कोई बड़ा नहीं। हमारा अस्तित्व ही महत्वपूर्ण है।
हम जो भी हैं, जिस जाति कुल में पैदा हुए हैं, प्राकृतिक विधान से जो भी योग्यता हमें मिली है, वही हमारी साधन सामग्री है। वही हमारे विकास में सहायक है।
हमें अपने ही स्वधर्म का पालन करना चाहिए।
रास्ते अनेक हैं, पर पहुंचते एक ही जगह हैं।
व्यर्थ का चिंतन हमारे जीवन से हट जाए।
इसके लिए करना यही है-
जो भी प्राप्त परिस्थिति है, उसका स्वागत करो, उसे प्रिय मानो, उससे प्रेम करो, उससे भागो मत। हमारे यहां उपनिषद काल में यह भागना नहीं था। बाद में आया। समाज से भागकर कहां जाओगे? संसार कहॉं नहीं है?
आपने पूछा था- मैंने सन्यास क्यों लिया।
बचपन से ही मेरी रूचि, इस सत्य को जानने की। बाहर मेरी कोई रूचि नहीं थी। परिवार की परिस्थितियां भी ऐसी ही बनती गईं। हां, मां की मृत्यु के बाद फिर मेरे पास कोई पारिवारिक कार्य नहीं बचा था, मैं स्वेच्छा से सन्यास लेने गया पर वहां भी कहा था- याचक नहीं बनूंगा। सन्यास के बाद निरंतर कार्य करता रहा। सन्यासी की परंपरा तथा उसका निर्वाह छूटता चला गया। गरीब से गरीब के घर भी गया। सादा रोटी खाकर भी जीवन जिया। गृहस्थों के यहां ठहरता  रहा। उनके परिवार का हिस्सा बनकर, मार्गदर्शन किया ।
परंपरा में जाकर इसकी व्यर्थता को देखा। इसीलिए आपसे कहता हूं कि आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। जो भी जैसा आया है, सामना करो। वर्तमान में रहो। कल जो होना है, प्रकृति का कार्य निर्धारित है, वह होना है। आज में आपको रहना है। यही सार है।
यह न होता तो क्या होता, हमें बचपन में सुविधाऐं नहीं मिली, यह कमी रही, वह कमी रही, यह सोच ही व्यर्थ है। जो जैसा प्राप्त हुआ है विधान के अंतर्गत ही है। हमें उसका आदर करना चाहिए। जब हम प्राप्त परिस्थिति को आदरपूर्वक सवीकार कर लेते हैं, तो व्यर्थ के चिंतन से बच जाते हैं।
आप भगना क्यों चाहते हैं, पलायन क्यों चाहते हैं, क्यों नहीं प्राप्त परिस्थिति का आदर कर पाते हैं, सोचें।
हमेशा नयी परिस्थिति से भय रहता है, पुरानी जगह पर प्राप्त सुख-सुविधाऐं पकड़ लेती हैं। यही सुख का प्रलोभन है। नई जगह जाने में संकोच का यही कारण है। सुविधा कम हो जाएगी। मान-सम्मान कम हो जाएगा। पैसा कम आएगा, बहुत सारी बातें है।
अगर एक बार यह सोचो, जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह ऐसा ही होना था इसलिए हुआ है, इससे बेहतर हमारे हित में नहीं था। हमने जो चाहा था। जिन परिस्थितियों में हमारा विकास हो सकता है, जो हमारा प्राप्तव्य था, वही हमें प्राप्त हुआ है, तो आपकी दुनिया बदल जाएगी। अभाव पाकर, व्यथित होना रुक जावेगा। जो भी परिस्थिति मिली है, उसमें प्रसन्नता आ जावेगी। कहते सभी हैं, ईश्वर हैं, पर उस पर विश्वास किसी को नहीं है।
उसे भी अपनी इच्छानुसार चलाना चाहते है।
साधन में सफलता मिले, इसके लिए आवश्यक है कि जो भी प्राप्त हुआ है वह पूरी तरह स्वीकार हो। साथ ही उसके प्रति प्रियता भी रहे। वह कार्य बोझा नहीं लगे। उसमें उदासीनता नहीं आवे।
क्योंकि जो परिस्थिति आपको प्राप्त है, उसमें प्रियता नहीं होगी तो अनावश्यक चिंतन शुरू हो जावेगा। आपसे कहा था- प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल मानते हुए प्रेम से भोगो, जल्दी ही समाप्त हो जावेगी। जो है, सामना करो, आप जितना उसे बोझा मानते रहेंगे, वह समय उतना ही बढ़ता जाऐगा। यह प्रकृति का नियम है। अगर परमात्मा पर विश्वास हो तो सो टका हो, अपने ऊपर विश्वास हो तो सौ टका हो। बात एक ही है। हर परिस्थिति, एक विधान के अंतर्गत आती है, उसका स्वागत करो। मीरा के लिये गया जाता है, विष का प्याला भी उसके लिए अमृत हो गया।
तब व्यर्थ का चिंतन अपने आप कम होने लगता है।
पहले भी कहा है-
जो कर सकते हो, उसे तुरंत कर देना चाहिए। पर होता उसके विपरीत है-
जो कर सकते हो, वह तो होता नहीं है, जो नहीं कर सकते हो, उसके बारे में निरंतर सोचते रहते हो। प्रयास से न तो कोई व्यक्ति व्यर्थ के चिंतन को हटा सकता है, नहीं कोई सार्थक चिंतन कर सकता है, मात्र गहरी समझ ही सहायक है। प्राप्त समझ का आदर ही साधना है।
उस दिन आपने पूछा था-
मन में अशुभ व मलिन विचार आ रहे हैं तो क्या किया जाए?
उन्हें हटाओ मत, प्रवाह को आने दो, देखते रहो। परन्तु उन विचारों में रमण मत करो। न तो उनका समर्थन करो, न बुराई करो। इससे क्या होगा, जैसे जहॉं काले रंग का धब्बा हो, वहॉं पानी डाला जावे, तो काला पानी बाहर आता है। धब्बा धीरे-धीरे अपना रंग खोता है। उसी प्रकार बुराई भी अपने आप समर्थन  के न मिलने से, कम होती चली जाती है। जो विचार बुरे हैं, वे अपने भीतर संग्रहित बुराई के कारण से पैदा हो रहे हैं। उनका समर्थन न करने से बुराई जो जमा है वह कम होने लगती है। उन बुरे विचारों को पूरा करने का मत सोचो। बुराई अपने आप कम होती चली जावेगी। बुरे व अशुभ संकल्प अपने आप कम होने चले जाऐंगे।“

Sunday, September 29, 2013

अन्तर्यात्रा’

अन्तर्यात्रा’



उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते हुए कह रहे थेः-

आप जब फिल्म देखते हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं, क्यों?
अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य, आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य है। वह अपनी काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
हां, ‘ध्यान’ की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’ का संधान पाने के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’ से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है। ‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
यह दृश्यीकरण एक तकनीक  है। मानसिक पूजा में इसी का सहारा लिया जाता है।
पर हम गहराई से विचार करें, तो पाते हैं कि वहां से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती है।
इस पर गहराई से विचार किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर है।
आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं। उसे ही ”आत्म“ कहा जाता है। यह यात्रा इतनी अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा में उसे व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

संक्षेप में चित्त, इन बाहर व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें आती हैं, टकराती है, और बहाकर ले जाती हैं।
होना यही चाहिए, लंहरें आऐं, वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां, हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव, अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने में सहायक होती हैं।
मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
पहले अशांत थे।
सुख था......संपति थी, धन था, पद था...... दोनों ही नावों पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
पर पाया,... भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
तब इन शत्रुओं से पहचान हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप दिया।
वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां आत्मकृपा हों। जहां आत्मकृपा होगी, वहां स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा, सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
शास्त्र कहते हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
क्रूा आपनेे इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता है।
हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन  पाना ही साध्य है।
यह प्राप्त होता है- विवेक के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
शारीरिक दुख, कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा, औषध, धन की व्यवस्था से संभव है।
मानसिक दुख- इसका मुख्य कारण आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,... जो आपका निंदक है, जो आलोचक है, जो नकारात्मक सोच है।
हाँ, जीवन में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति में ढल जाता है। शास्त्र कहते हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता है-
”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
और जिसे इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन  की  उपलब्धि है।





Saturday, September 21, 2013

. अन्तर्यात्रा’अमृत पथ लेख माला की पंचम किश्त

अमृत पथ  लेख माला की पंचम किश्त

. अन्तर्यात्रा’



उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते हुए कह रहे थेः-

आप जब फिल्म देखते हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
    आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं, क्यों?
    अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य, आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य है। वह अपनी काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
    हां, ‘ध्यान’ की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’ का संधान पाने के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’ से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है। ‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
    यह दृश्यीकरण एक तकनीक  है। मानसिक पूजा में इसी का सहारा लिया जाता है।
    पर हम गहराई से विचार करें, तो पाते हैं कि वहां से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती है।
    इस पर गहराई से विचार किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
     हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर है।
    आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
    हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं। उसे ही ”आत्म“ कहा जाता है। यह यात्रा इतनी अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा में उसे व्यक्त नहीं कर पाते हैं।

    संक्षेप में चित्त, इन बाहर व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें आती हैं, टकराती है, और बहाकर ले जाती हैं।
    होना यही चाहिए, लंहरें आऐं, वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां, हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
    ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव, अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने में सहायक होती हैं।
    मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
     पहले अशांत थे।
    सुख था......संपति थी, धन था, पद था...... दोनों ही नावों पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
    पर पाया,... भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
    तब इन शत्रुओं से पहचान हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
    आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
    पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
    दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
    दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप दिया।
ु    वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां आत्मकृपा हों। जहां आत्मकृपा होगी, वहां स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा, सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
    दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
    शास्त्र कहते हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
    क्रूा आपनेे इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता है।
    हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन  पाना ही साध्य है।
    यह प्राप्त होता है- विवेक के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
    इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
    शारीरिक दुख, कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा, औषध, धन की व्यवस्था से संभव है।
    मानसिक दुख- इसका मुख्य कारण आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,... जो आपका निंदक है, जो आलोचक है, जो नकारात्मक सोच है।
    हाँ, जीवन में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति में ढल जाता है। शास्त्र कहते हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता है-
    ”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
    और जिसे इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन  की  उपलब्धि है।



Friday, September 20, 2013

अमृतपथ लेखमाला की यहॉं चौथी किश्त ”प्रेम“ दी जारही हें।


प्रेम

प्रश्नः- स्वामीजी क्या यही प्रेम है? आपको देखकर लगता है आपके पास कुछ विशिष्ठता है जो हमारे पास नहीं है।
स्वामीजीः-
यहां क्या है,... आप पता करें, मुझे तो कुछ भी पता नहीं रहता, एक जैसी स्थिति रहती है। कोई आया उसका पता भी नहीं रहता जब तक वह बोलता नहीं है,... या आंखों के सामने नहीं आता,... आपने देखा है जब मैं घूमता था, निगाह नीचे तीन फीट तक ही रहती थी। क्या निकल गया है, मुझे पता नहीं रहता, जब तक वह स्वयं सामने आकर रोकता नहीं था।
यहां विचार तो है ही नहीं, जब विचार नहीं होता, मन भी नहीं होता। मन ही तो विचार है, वह रहता है जब कोईक्रियाहुयी
तब वह जाता है, फिर मुकाम पर आकर ठहर जाता है। स्मृति भी है, वहां तो भंडार है, आवश्यकता होने पर वह वहाँ से सूचना ले आता है।
जब मन शांत होने लगता है, तब संग्रह साथ नहीं रखना पड़ता। ग्रन्थों की तभी तक आवश्यकता रहती है। जब तक आपके भीतर जो उत्तर देता है, वह उपेक्षित है जब उत्तर भीतर से अपने आप आने लगते हैं। तब ग्रन्थों की जरूरत नहीं होती। उस खालीपन से भय नहीं होता है। यह स्मृति लोप नहीं है। आप जो चौबीस घंटे सोचते रहते हैं वह विचारणा हैं, आप विचारक नहीं है। विचार जो आएगा, वह मौलिक होगा। वर्तमान में होगा।
जब यह विचारणा ही रुक जाती है तब उस शांति का पता लगता है, आप एक ही विचार या एक ही क्रिया में अधिक से अधिक रहने का प्रयास करें। मन वहीं रहे... तब मन स्वतः अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं शांति है। इस शांति की अवस्था में अधिक से अधिक रहने पर स्वाभाविक प्रेम का उदय होता है।
जहां प्रेम है वहां राग-द्वेष नहीं होगा। यही चित्त की शुद्धि है। क्योंकि विचार ही विकार है, जब विचार आने रुक  जाते हैं तो हम विकारों से भी मुक्त होने लग जाते हैं। सभी के प्रति एक रस एक भाव रह जाता है। आचरण में धर्म स्वाभाविक रूप से आ जाता है।
‘आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेषु हितेरतः’, यह भावना जितनी दृढ़ होती जाती है, उतना ही हम प्रेम भी पाते जाते हैं। यहां आने पर आप भी होंगे, परिवार भी होगा, जो भी कार्य कर रहे हैं, वह भी होगा। पर अब क्रम विपरीत हो जाता है। बहाव अपने मूल स्थान पर लौटने लगता है। अभी तक बहाव बाहर की ओर था। बाहर की छोटी से छोटी  घटना भी आपको बाहर भटकाती चली जाती थी। आप तिनके की तरह भटक रहे थे। पर अब, विषय भी रहेगा, इंद्रियाँ भी रहंेगी, मन भी रहेगा पर सबंध नहीं जुड़ेगा। संबंध मन जोड़ता है। मन के न रहने पर स्वाभाविक क्रम में कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्दिय में तथा ज्ञानेन्द्रिय, अंतःकरण में डूब जाती है। वहां तीनों का एकीकरण हो जाता है। यह बलपूर्वक नहीं होता, स्वाभाविक क्रम में होता है।
इस स्थिति में बुद्धि जो है वह ‘सम’ हो जाती है। समता यहीं आती है। बुद्धि का कार्य है, निरंतर परीक्षण करते रहना, जितना बुद्धिमान होगा उतना ही वह विचारणा का दास होगा। उसकी मान्यता होगी, हम नहीं सोचेंगे, नहीं बोलंेगे तो मूर्ख माने जायेंगे। विवेकी चुप रहेगा।बुद्धि जब स्थिर होती है, तब वह विवेक में ढल पाती है। अतः कर्मेेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय तथा अंतःकरण जब एकीकृत हो पाते हैं। तब ये बुद्धि में, तथा बुद्धि विवेक में लीन हो जाती है। इसके पहले बताया गया था कि अब अंतर्मन आकर हमारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। वह विराट के समीप होने के कारण से अत्यंत शक्तिशाली है, और सच तो यही है कि जहां शांति है, वहीं प्रेम है, और शक्ति भी।
यह प्रेम जो है, इसकी स्वाभाविक पहचान ‘आकर्षण’ है, जैसे पूर्णमासी का चांद, ज्वार आने पर लहरों को अपनी तरफ खींच लेता है उसी प्रकार प्रेम का उदय होने पर, स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर आकर्षण शक्ति पढ़ने लगती है। प्राणिमात्र के प्रति, कल्याणकारी भावना रहती है, कर्म तब सेवा में ढल जाता है। तुम्हारा सोच  है, तुम्हें कुछ ना कुछ हमेशा करना चाहिए और जब तक  सफलता नहीं मिल, निरंतर प्रयास करना चाहिए।

मैंने प्रयत्न के लिए कभी मना नहीं किया। सामर्थ्य जो तुम्हें मिला है, उसका सदुपयोग पूरा करना चाहिए, साथ ही विवेक विरोधी कार्य नहीं करना चाहिए। कोई भी कर्म, भय तथा प्रलोभन से नहीं करना चाहिए। कर्म के बिना कोई नहीं रह सकता है,अतःप्राकृतिक विधान से जो भी कार्य उपस्थित हो वहां मन को पूरी तरह लगाए रखना चाहिए। पर कर्म का फल क्या होगा? इस पर अधिक नहीं सोचना चाहिए। कर्त्ता ही निष्काम होता है, कर्म नहीं, हम जब स्वधर्म का पालन करते हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हैं तब किया हुआ कर्म स्वाभाविक यप से निष्काम होता है। क्योंकि वहां मन वर्तमान में रहता है।
वर्तमान में किया गया कर्म निष्काम होता है। वर्तमान का क्षण वह है, जहाँ मन, भूत और भविष्य की विचारणा में नहीं है। सरल भाषा में जो भी क्रिया है, मन वहीं है, किंचित मात्र भी विपरीत दिशा में नहीं है।
बस यही स्वतंत्रता है, इसलिए निरंतर बिना उत्तेजना केे शांत मन से कर्मरत रहना चाहिए।
रहा सवाल, प्राप्ति का, अप्राप्ति का,- वस्तु तो प्राकृतिक विधान के अनुसार ही मिलेगी। जिसको जो मिलना है वह उसके पूर्व संकल्पों के अनुसार मिलेगा ही, जिसके द्वारा जो अच्छा या बुरा किया जाता है वह उसके ही काम आता है, कई गुणा होकर लौटता है, उसे ही मिलता है।
प्राकृतिक नियम की अवहेलना कभी नहीं होती है। इसीलिए किसी वस्तु को देना देने वाले के हाथ में नहीं हैं। हम जिसे देना चाहते हैं उसे नहीं मिलता, जिसे नहीं देना चाहते हैं, उसे मिल जाता है। प्रकृ्रति में कर्तुम, अकर्तुम अन्थथाकर्तुम, सदा से रहा है। होगा, नहीं होगा या तीसरा कुछ होगा।यह एक विधान है।
इसलिए पहले बताया था, जो कार्य कर सकते हें उसे तत्काल पूरा करने का प्र्रयास होना चाहिए, जो विवेक विरोधी है, उसे छोड़ देना चाहिए जो आपके सामर्थ्य की सीमा से बाहर है, उसे प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।








Thursday, September 19, 2013

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Lokehth&       tc lq[k feyrk gS] rc mldh ykylk mRiUu gks tkrh gSA nsgkfHkeku gks tkrk gSA ge fof'k"V gSa] ;g gekjh ;ksX;rk ls vk;k gSA blls vgadkj mRiUu gks tkrk gSA vgadkj vkrs gh] bZ";kZ] }s"k] ?k`.kk vkfn fodkj vk tkrs gSaA ge nwljksa ls Js"B gSa]] ;g Hkkouk cM+h gks tkrh gSA

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        lk/kd vkReXykfu esa pyk tkrk gSA og vius vkidks nhu&ghu ekuus yxrk gSA mldk vkRefo'okl pyk tkrk gSA og vius vkidks thou esa vlQy ekuus yxrk gSA
        tks ncs gq, nks"k gaS] tSls /kjrh ij vuqdwy okrkoj.k gksus ls vadqj QwV iM+rs gSa] mlh izdkj fodkj izdV gks tkrs gSa] mudk izdV gksuk LokHkkfod gh gSA
        okLrfod xyrh gekjh gksrh gSA geus xq.kksa dks vks<+ j[kk gSA xq.k rks izkd`frd /keZ gS] U;k; gS] tks gesa izkIr gksuk gSA vks<+k gqvk vkn'kZ dHkh dke ugha vkrk gSA
        gka] tc lpeqp gekjs Hkhrj xq.kksasa dk fodkl gksrk gS] rks lk/kd dks mldk Hkku ugha gksrk gS] tSls Qwy f[kyus ij ij mldh tks lqxa/k gSA mls mldk vuqHko ugha gksrk gS] lqxa/k dk vuqHko nwljks dks gksrk gSA
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        mldh izlUurk nwljs ij fuHkZj gks tkrh gSA
        mlus mlds ladYi dh iwfrZ djnh rks jkx vkSj ugha djh rks Øks/k dk iSnk gksuk LokHkkfod gSA
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        Øks/k ls rHkh NqVdkjk laHko gS] tc ;g osx lgu djus dh {kerk c<+ tk,A nq[k esa rks bl osx dks lgu djuk etcwjh gksrh gSA djuk gh iM+rk gSA ij lq[k esa ugha gksrk] ,d izdkj dk izn'kZu 'kq: gks tkrk gSA ;gh va'kkfr dk tud gSA
        blhfy, vko';d gS fd lk/kd dks pkfg, fd og vius Hkhrj >kads] fparu djs] vius Hkhrj tks xq.kksa dk vfHkeku fn[kkbZ iM+rk gS] mls le>s] mldh vokLrfodrk dks le>sA
        ;g rHkh laHko gS tc og nks"k n'kZu ls eqDr gksus dk iz;kl djsA vHkh rks gkyr ;g gS fd ge vius vykok nwljs ds nks"k n'kZu esa jkr&fnu yxs jgrs gSaA
        viuk jkst nks"k Hkh ns[krs gSa rks vgadkj dh vk¡[k ls ns[krs gSaA HkbZ! ;g nks"k rks lcesa gSa] ge esa Hkh gS] rqjar U;k;ksfpr Bgjkus dk iz;kl djrs gSaA
        vr% t:jh ;gh gS fd ge nks"k n'kZu dh vknr dks gh NksM+ nsaA pyks] eku ysa] muesa nks"k gSA
        rks D;k gekjs nks"k&n'kZu ls] vkykspuk ls os vius nks"k NksM+ nsaxsA
        ge ;g Hkwy tkrs gSa fd ge tks ns[krs gSa] fparu djrs gSa] ogh rks LokHkkfod :i ls gekjs fpr esa tgka laxzg laxzfgr gS] ogka vafdr gksrk tkrk gSA og xyrh tks ge nwljksa esa ns[krs gS] og geesa vkus yx tkrh gSA
        blhfy, ,slk gS rks viuh xyrh ns[kksA
        voyksdu ls D;k gksrk gSA
        T;ksa gh izokg [kqyrk gS Hkhrj dk nck gqvk laxzg ckgj vkus dks epy mBrk gSA
        mls ns[kdj ;gh eSa gw¡] esjk okLrfod :i ;gh gS] lk/kd ?kcM+k tkrk gSA ;g nks"k izdV gksdj ftlds fy, ckgj vkrk gS] mls vkus ns] ojuk nck fn;k] rks O;ogkj esa vlaxrrk ykdj] v'kkafr iSnk djsxkA
        pkgs foi';uk gks] ;k /;ku ;k vU; iífr gks] mldh mi;ksfxrk ;gh gS] ;g fpÙk dh efyurk dks de djus dk iz;kl gSA
        tc gekjh vka[k ckgj ls Hkhrj dh vksj eqM+rh gSA ge ckgj ns[kuk can djrs gSaA rc Hkhrj ns[kuk 'kq: gks tkrk gSA ;gha vUreqZ[krk dk izkjaHk gksrk gSA viuh xyfr;ka fn[kkbZ nsus yx tkrh gSaA ge ftls viuh iwath ekurs Fks] ghjs&tokgjkr] os dk¡p ds VqdM+s fn[kkbZ iM+rs gSaA rc os fQad ikrs gSaA
        fut dk nks"k fn[krs gh vkSj le> ds }kjk mls ;Fkkor Lohdkj djrs gh nwljksa ds nks"k ns[kus dh izo`fr pyh tkrh gSA
tc Hkhrj viuk ?kj  vO;ofLFkr feyrk gS rks mls lgh djus dh bPNk gks tkrh gSA
        ckgj ds izfr vkd"kZ.k dk de gksrk tkuk] mnklhurk gh oSjkX; gSA ;gk¡ ij NksM+dj dgha tkuk ugha gksrk gSA
        fut ds nks"kksas dh Lohd`fr gksrs gh] feF;k xq.kk tks vius Hkhrj LFkkfir dj j[ks Fks] os gVus yx tkrs gSA muds gVrs gh vius nks"k Hkh de gksus yx tkrs gSA
        geus vius nks"kksasa dks  fNikus ds fy, gh rks feF;k xq.kksa dh vius Hkhrj dYiuk dj j[kh FkhA
        blhfy, vko';d gS fd &

1-      lk/kd viuh gh n`f"V esa vknj ;ksX; cusA tks gS] mldk gh izdVh dj.k gksA Hks"k cnyus ls] Nkikfryd yxkus ls] eqMk,a /kkj.k djus ls] 'kkafr esa izos'k ugh gksrkA 'kakfr rks vkpj.k dh igpku gSA ;g lqxa/k gS] vius vki izdV gksrh gSaA
        ;gh dkj.k gS fd ge nksgjh ftanxh thrs gSA Hkhrj ds [kks[kysiu ls ifjfpr jgrs gSA geesa vkRe fo'okl ugha jgrkA blhfy, tc frfr{kk lk/ku cu tkrh gS] ge nks"k n'kZu ls eqDr gksrs tkrs gaSA tks viuh gh n`f"V esa vknj ;ksX; ugha gksrk gS] mldk dgha lEeku ugh gksrk gSA ugha vkRefo'okl vkrk gSA ugha mls 'kakfr izkIr gksrh gSA ;g rHkh laHko gS] tc og viuh tkuh gq;h xyfr;kas dks Lohdkj djsA nks"kksas dh Lohd`fr] 'kkafr dh vkSj c<+us okyk igyk dne gksrk gSA
        yksx ckj& ckj mfpr& vuqfpr deZ ds ckjs esa iwNrs gSA lcds ikl bldk mÙkj gSA var%dj.k dk;Z djus ls igys crk nsrk gS] fd ;g dk;Z mfpr gS ;k vuqfprA foosd lcds ikl gS] ij mldk vknj ugha gksrkA ge cqf) pkrq;Z ls vuqfpr dks mfpr Bgjkus dk iz;kl djrs gSaA ftu dk;ksZ ls fdlh dk vfgr gksrk gS]os nks"k gSaA
                                                                                                             
        ge ;g lksprs gaS]fd ge ftu dk;ksZ dks djrs gaS] ftuds ds }kjk nwljks dk vfgr gksrk gS] muls gekjs vgadkj dh rq`f"V gksrh gSA ij ;g  mruk gh lp gS fd ftruk ge nwljksa ds vfgr dk iz;kl djrs gaS] mruk gh gekjk Hkh veaxy gksrk gSA
        tc rd gekjs var%dj.k esa v'kkafr nch jgsxh] rc rd gekjs dk;Z iznwf"kr gh gksrs jgsaxsA v'kkafr dks ckgj vkuk gh gksxk] gka] xgjh le> ls] gka] fujarj cuh jgus okyh lk/kuk ls ;g v'kkafr izdV gksxh] rc mlls fdlh dk uqdlku ugh gksxkA fodkj voyksdu ls izdV gks tkrs gSa] var%dj.k 'kq) gksus yxrk gSA
        fQj /khj& /khjs okLrfod 'kkafr izdV gksus yxrh gSA 'kkafr dk Hksl /kkj.k djuk] fcuk LoHkko ds yk, gq, mldh ppkZ djuk] Hkhrj rwQku dk mBrs jguk] mlds izdV gksus ds mik; ugha djrs gq,] Hkhrj nckuk] vijk/k gksrk gSaA
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Monday, September 16, 2013

Amrit Path

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       laLdkj fufeZfr vkSj muds {k; dk vUu ls xgjk laca/k gSA oks igys ml cPps dk n`"VkUr fn;k FkkA
       czkã.k naifÙk dk ckyd Fkk] tks [ksy jgk Fkk] [ksy esa feêh dh ewfrZ cukrk Fkk rFkk fQj Nqjh ls mldk 'kjhj dkV nsrk FkkA og ;g [ksy] [ksy jgk FkkA firk mls ns[k dj pkSad x;kA mlus ifRu dks cqyk;k] og Hkh ;g ns[kdj pkSadhA
       nksuks gh ifr& ifRu] usd fu"V naifÙk FksA mls dqN ;kn vk;kA og rRdky lsB ds ikl x;k] ftlus mlls ,d ekg dh  iwtk djkbZ Fkh] rFkk ;K djok;k FkkA
       mlus iwNk& vkius eq>ls og iwtk djokbZ Fkh] nf{k.kk Hkh nh FkhA rc esjh iRuh xHkZorh FkhA ?kVuk dks rhu o"kZ gks x, gaS] D;k vki eq>s mldk dkj.k crk ldrs gSa\Þ
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       ßog czkáE.k ?kj ykSVk--- fQj nf{k.kk ls izkIr leLr jk'kh ysdj lsB dks lkSai vk;kA
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vUUk dk laxzg] vUu dks idkus okys dh Hkkouk] vkSj Hkkstu ysrs le; vkidh Hkko n'kk rhuksa egRoiw.kZ gSaA
ml lar dk Hkh n`"Vkar fn;k FkkA
       ßmUgsas ,d lsB ds ;gkWa Hkkstu dk fuea=.k FkkA---vPNk Hkyk ifjokj FkkA os ogk¡ x,] Hkkstu ckn ogha foJke dh O;oLFkk gks xbZA os ogha foJke djus yxsA vpkud fuxkg lkeus est ij j[ks gkj ij xbZA mBrs le; mUgksaus gkj mBk;k vkSj Hkhrj /kksrh esa mls [kksal fy;kA pknj vks<+ j[kh FkhA lc fNi x;kA lcus cgqr vknj ls fonk fd;kA
       FkksM+h nwj tc vkxs c<+s---rks pkasds] ;g eSus D;k fd;k---
       mYVs ikao okfil ykSVs*
       mUgsa okfil vkrk ns[kdj] lc pkSad x,A
       os vanj mlh dejs esa x,] lcdks cSBus dks dgkA
       fQj iwNk-- Hkkstu fdlus cuk;k Fkk\
       Mjr& Mjrs lsfodk lkeus vk;hA
       cksys Mj er]lp crkuk] tc rw Hkkstu cuk jgh Fkh] rc D;k lksp jgh Fkh\
       og cksyh egkjkt tSlk gkj lsBkuh th ds ikl gS] esjs ikl gksrk rks fdruk vPNk gksrk] eSus mls est ij j[kk ns[kk Fkk--
       og gals]tk] fQj gkj fudkyk vkSj est ij j[k fn;kA
       cksys] ml vUUk us esjk eu Hkh [kjkc dj fn;k---
       gekjs laLdkj gh gekjh fopkj /kkjk dks cukrs gSA ckgj ,d gh ?kVuk ?kVrh gS] ij mldk izHkko lc ij vyx vyx gksrk gSA fopkjksa esa tks er fofHkUurk gksrh gSa] mldk dkj.k ;gh gSA jax]xq.k eu esa ugh gSA og rks 'kfä ]laLdkj ls tqM+dj ftl #i esa bafUnz;ksaa dks /kDdk nsrh gS] mls ge ml #i esa tku ikrs gSaA ,d gh fopkj dks ckj ckj nksgjkus ls og ladYi cu tkrk gSA fQj ladYi ls deZ] deZ ls Hkksx]Hkksx ls Hkkouk] vkSj Hkkouk laLdkj ij u;h Nki NksM+ nsrh gSA
       eu vkSj bl laLdkj dh ,djlrk ls gh eu dks lrksxq.kh] jtksxq.kh] reks xq.kh ekuk tkrk gSA
       eu rks ÅtkZ gS] ogka xfr gS] gkWa mldh igyh igpku fopkj ds #i esa gksrh gSA /kDdk yxrs gh tks ygj mBrh gS] og fopkj esa
       gka vxj fujarj orZeku esa jgus dk y{; cuk jgrk gS] rks ge cgqr lkjh leL;kvksa ls cp ldrs gSaA
       orZeku esa jgus dk vH;kl c<+rs gh ges irk yxrk gS] fd gesa D;k djuk gS] D;k djuk ugha gSA
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अमृत पथ 1




अमृत पथ
यह लेखमाला पूज्य स्वामीजी द्वारा दिए गए  प्रवचनो के अंश है।
उनके महानिर्वाण के बाद पुस्तकों का प्रकाशन कुछ रुक गया था। समाधि स्थल पर उनके अनुयायियेा द्वारा भी तथाकथित कर्मकांड का सहारा लेना भी प्रारम्भ कर दिया गया था। जिन मूल्यों का स्वामीजी ने जीवन भर निर्वहन किया ं , वे मूल्य नई पीढ़ी के हाथों सुरक्षित रहें, इसी अभिप्राय से ये लेखमाला प्रकाशित की जारही हैअमृथ पथः-
प्रश्न था- पूज्य स्वामी जी हमारा तो मन ठहरता ही नहीं है।भटकता ही रहता है ,क्या किया जाए?
स्वामीजी ने कहा थाः-
”आपने सवाल किया है, मन ठहरता ही नही है,  एकाग्र ही नही हो पाता है।
 आपको पहले भी बताया था कि किसी बाहरी क्रिया से  या किसी अन्य उपाय की सहायता लेने की कोई आवश्यकता ही नही है। मन का स्वभाव है कि जिसका भी आप चिन्तन करंेगें, उसी के अनरूप यह ढल जाएगा। यह जो बाह्य क्रियाओ का सहारा लिया जाता है। उनसे शुरु-शुरु में तो सहायता मिलती है। फिर मन उन्हीं का दासत्व ले लेता है। जब तक पूजा रही ध्यान रहा, मन एकाग्र हुआ, उठते ही फिर वही विचार आ गए। मन भटकने लगा। लोगों को देखा है, चेहरा खिंचा- खिंचा रहता है। कहते है, ध्यान लगाकर आये है, उसमें भी इतनी कठिनाई, इतना कष्ट, यह तो विश्राम के लिए था? पूछो उनसे।
शांत होना कोई कष्टकारी साधना नहीं है। नहीं शरीर को कष्ट देना आवश्यक है। एक परिपाटी चल गई है। आप करते रहो इससे मन जो शक्तिशाली है। वह शक्तिहीन हो जाता है। जड़ बना देता है। इसका कोई मूल्य नहीं है।
अब आप विचार करें, मन किन-किन विचारों में रहता है। आपने ही बताया है, भय है, लोभ है।
रात- दिन आप किसी भी प्रकार से धन आ जाए, इस चिन्तन में डूबे रहते हैं। हर व्यक्ति , हर परिवार, समाज लोभ की दिशा में ही दौड़ रहा है, कहने को त्याग की बातें होती हैं, पर जो त्यागी है, उनसे बड़ा लोभी कोई नही है। नाम वे परमात्मा का लेते है, ईश्वर चर्चा की बातें करते हैं। पर गृहस्थ से भी अधिक उन्हें धन व यश की चिन्ता रहती है। साधन सुविधा की उन्हें अधिक तलाश है। उनके रहने के तरीके देखो। आज आश्रम भी होटलों की तरह हो गए हैं।
साधु, महात्मा, मैनेजर बन गए हैं ज्ञान वार्ता करेगें, ग्रन्थ सुना देगें, मीठी- मीठी लोभ लुभावनी बाते करंेगे, पर उनकी दृष्टि साधारण जनता की जेब पर रहती है।
 
आज सारा समाज इसी प्रदूषण से युक्त हो गया है। चित्त ही प्रदूषित है। चेहरा देखो, वहाँ से लोभ ही झांकता है। धन का लोभ हटता हैतो  प्रशंसा का लोभ पैदा हो जाता हैं लोभ और प्रशंसा में दो ही नावें हैं, जिन पर सवार होकर संसार सागर में लोग यात्रा करते हैं।
और यही कारण है कि लोभी को जो भी प्राप्त है, उसके छिन जाने का भय हमेशा रहता है।
धन संग्रह किया है, उसे चोर- डाकू नही ले जाएं, यही भय है। समाज में प्रतिष्ठा बनाई है, वह छिन न जाए, पद से जो सम्मान- सुविधा प्राप्त है, वह छिन न पाए उसी का भय है।
जब हमारी प्रसन्नता दूसरे पर निर्भर हो जाती है, तब हमारे भीतर भय और लोभ उत्पन्न होता है।
गीता में कहा गया है, जो व्यक्ति दुःख मंे अनुद्विग्न  है, सुख में जिसकी लालसा नहीं है, वही रागसे, भय से, क्रोध से परे जा सकता है।
दूसरा ही दुःख का कारण है, वही सुख का कारण है,  प्रीति जब कम होने लगती है, तब दूसरे पर आश्रित होने का भाव हटने लगता है।
यहीं पर वर्त्तमान में रहना प्राप्त होता है।
ऐसा क्यो होता है, उस पर विचार करो।
हमारी संसार पर उसके क्रिया कलापों पर ममता है। मैने कभी भी छोड़ने को नहीं कहा।  छूट जाना ही सार है, यह ममता हमारी बढ़ती जाती है। संतान के प्रति हममें कर्तव्य परायणता का भाव नहीं होकर ममता का भाव रहता है। ममता में आसक्ति होती है। वह पूरी नही होने पर, दूसरे के द्वारा आपके राग की पूर्ति नहीं होने पर आपको क्रोध आता है। निरंतर दूसरों का चिन्तन, और उसका या उसके द्वारा अहित न हो जाए यही कल्पना आपको भयभीत करती रहती है।
जब आप ईश्वर को मानते हैं, कर्मफल को मानते है, गुरु को मानते हैं, तो कहीं पर तो आपको विश्वास होना चाहिए। आपको न अपने ऊपर विश्वास है, न किसी और पर। यही  परंपरा  आप बच्चों को सौंप जाते हैं।
आपको एक कहानी उस फकीर की सुनाई थी।
वह दिन भर मेहनत मजदूरी करता था। सुबह उठता किसी भी दरवाजे पर खड़ा होकर काम मांगता। काम मिलने पर काम मिला है, पूरे मन से उसे करता, बदले में बस भोजन लेता रात को मस्जिद में जाकर सो जाता ।
े। एक रात वहॉं फरिश्ता आया, वह लालटेन की रोशनी में कुछ लिख रहा था
फकीर ने पूछा, ”क्या कर रहे हो?“
उसने कहा, ”जो परमात्मा को प्यार करते है, उनका नाम लिख रहा हूँ।“
”उसने अपना नाम बताया पूछा, मेरा नाम तो नही है?“
फरिश्ते ने सूची पढ़ी, बोला, ”तुम्हारा नाम तो नही है।“
वह कुछ देर उदास रहा, फिर जाकर अपनी जगह सो गया।
कुछ दिनों बाद उसने देखा फिर फरिश्ता आया और सूची बना रहा है। वह उधर गया, बोला, ”अब क्या कर रहे हो?“
उसने कहा, ”सूची बना रहूँ।“
‘किसकी’
”जिन्हें अल्लाह प्यार करता है।“
वह मुड़ गया, बोला, ”इसमें मेरा नाम तो नही होगा!“
‘उसने कहा - ”अपना नाम तो बताओ।“
उसने नाम बताया।
उसने सूची पढ़ी, बोला, ”तुम्हारा नाम तो सबसे ऊपर है।“
कहानी, कहानी होती है। पर उसका अभिप्राय होता है। हम जहाँ भी विश्वास करें, वहीं विश्वास पूरा होना चाहिए।
हमारे पास दो ही बातंे हैं।
पहली बुद्धि चातुर्य है, हम उसके ही सहारे चलते हैं। जहाँ से दो पैसे का लाभ मिले, वही काम करना अपना उद्देश्य हो गया है। हम गलत को सही, सही को गलत अपनी अक्ल से ठहराते आए हैं।जो सही है, उसकी पहचान सभी को हैं। सही की आवाज हमारे भीतर से आती है, पर हम उसे नही सुनते हैं वही आवाज विवेक की है। परमात्मा ने हर प्राणी को विवेक सोंपा हैं पर वह उसका आदर नही करता है, हर गलत कार्य को सही ठहराने का प्रयास करता है।
अपना आचरण  कोई नही देखता। अपना खुद का आचरण देखो। कितना आपने सही किया है, गलत किया है। यह व्यक्ति को खुद पता है।यह जो चित्त है, दर्पण की तरह है।यहॉं भुक्त,अभुक्त वासनाओं का प्रभाव अंकित रहता है। पर हम उसे दबा कर रखते हैं। बाहर आते ही उपद्रव खड़े होने की आशंका बनी रहती है।
ध्यान इस संग्रह के दबाव का कम होते जाना है।
 आप चाहते हैं, शंाति, आप चाहते हैं अभय और आपने अब तक विवेक विरोधी कार्य ही तो किया है।
जो आपके पास किसी आशा से आया था, आपने उसका कार्य किया अथवा नहीं यह महत्च पूर्ण नहीं है, पर आपने उसके साथ गलत भाषा का प्रयोग किया झूठा आश्वासन दिया, क्या यह विवेक का अनादर नहीं है?
सच बोलने में आपका क्या जाता , पर आपको लगता है, आपका मान सम्मान घट जाएगा, प्रलोभन से भी काम करना विवेक विरोधी ही है, पर उसे कौन मानता है?
आज समाचार पत्र, ज्योतिषियों, वास्तुविदों  के लेखों से भरे होते है। तंात्रिक उपचार भी बताते हैं कोई उनसे पूछे हजार-पांच सौसालपहले   इन्ही ग्रन्थों की , और इन्ही लोगों की ,राजाओं के राज में भरमार थी.... क्या वे बच पाए, इतनी गुलामी और इतना अत्याचार समाज ने भोगा, इनसे कोई लाभ होने वाला नही है। इनकी फालतू बाते मनोरंजन के लिए हैं। इनसे अधिक इनका कोई मूल्य नही है।
जब तक मनुष्य अपने विवेक का अनादर करता रहेगा, वह भय और प्रलोभन से युक्त होकर कार्य करेगा, उसके जीवन में अभय और शांति नही रहेगी।
यहॉं संसार में सभी वस्तुएं सदुपयोग के लिए प्राप्त हैं ये जीवन के लिए अनिवार्य है। परन्तु उसमें लालसा नही रखनी है। मैं, धोती में छेद होते ही उसे हटा देता हूॅं। एक धोती के दो टुकड़े हैं, दो कुर्ते बस। यह एक झोला है,जब इतने कम सामान में मेरा काम चल जाता है, तब आपने मुझे देखकर क्या समझा? हम अपनी आवश्यकताओं को  अनावश्यक रूप से बढ़ाते चले जा रहे है। हमारी जरुरतों को प्रकृति हमेशा पूरा करती है। परन्तु हम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाते ही  चले जा रहे हैं। क्या चाहते हैं, हमें भी नही पता है? वस्तुओं के संग्रह में सुख नही है। सुख तो वस्तु के उपभोग व उपयोग में है। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
परन्तु यही नही होता है।
हम जिसे मानते हैं, उस पर हमारा विश्वास नही है और जो जानते हैं, वह हमारा व्यवहार नहीं है। जब हम अपने जीवन में विवेक का आदर करते हैं। तब हमारा विश्वास भी, वस्तुओं से, इनके प्रभाव से, हटनेलग जाता है। विश्वास एक बार आने के बाद जाता नहीं है, विकल्प रहित विश्वास जब अपने भीतर घना होने लगता है,  तब वहाँ भय नही रहता।
जो होना है, वह तो होगा ही, प्राकृतिक विधान से होना निर्धारित है, व्यक्ति तो मात्र दृष्टा है, देख रहा है, उसके शरीर के द्वारा मन के द्वारा जो भोगा जाना है, वह उसके लिए तैयार रहता है।
आपको कंवर लाल की लड़की की शादी के बारे में बताया था। वह आया था, उसने कार्ड दिया ।
पूछा तो बताया, कुछ हजार रुपयों की जरुरत होगी।
मैने संकल्प लिया आज से जो भी भेंट आएगी, उसमें जो रुपये आएंगें, सब उसे दे दंूगा। तब सो पचास रोज आ पाते थे। उसी रात सपना आया मैं जा रहा हूँ, रास्ते में कुतिया आई, उसने मेरा पांव काट लिया, मैं लहूलुहान हो गया हूँ।
सुबह उठा, मैं समझ गया, संकेत मिला है। पर मेरा संकल्प था, सहायता करनी है, जो होगा देखा जाएगा।
अगले ही दिन से भेंट पूजा ही कम हो गई। जो सौ-पचास 3पये भेंट देते थ,े उन्होंने आना बन्द कर दिया।
बड़ी मुश्किल से कुछ हजार हो पाए। तभी पास से कथा का बुलावा आया। वो जो कभी इधर नहीं आता था, वह आया। मैने सोचा वहां से कुछ मिलेगा, उससे कमी पूरी हो जाएगी।
उस रात फिर वही सपना आया।
सुबह मै उठा, तैयार हुआ,उससे कहा था, कथा समाप्त होते- होते मैं पहुँच जाऊंगाा। पैदल- पैदल गांव गया। दूर, उधर खेतों से लाउड स्पीकर की आवाज आ रही थी। मैं पगडंडी पर जा रहा था। वहाँ कथा हो रही थी, वहाँ पहुँचने वाला था कि अचानक कहीं से काली कुतिया निकली। उसने मेरे टखने पर दांत गड़ा दिए। मै खून से नहा गया। मैने वहीं धोती फाड़ी पट्टी बांधी। खून आना बंद हो गया। मैं चारपाई पर आकर लेट गया। वहीं खाना खाया। जितना लेता हूँ, उतना लिया। फिर थाली नीचे रख दी। वही कुतिया वहीं आकर नीचे चारपाई के नीचे बैठ गई। ये लैैटते समय लोग मोटर साइकिल लाए। मैने मना किया पैदल ही आ गया। बाद मै बकानी वाले डॉक्टर को लेकर आए। ड्रेसिंग तो मैने करवाली, पर इंजेक्शन नही लगाए।
.. यह घटना क्यों बताई,सोचो।
हर घटना का अभिप्राय होता है।
बाद में कंवर लाल से पूछा रुपयों का क्या हुआ?
उसने बताया, शादी तो अच्छी होगयी, पर रुपये उसका कोई परिजन ले गया।
विश्वास स्वयं के प्रति होना चाहिए। हमारा कार्य विवेक जन्य हो। कठिनाई तो आयगी, तो हम उसे भोगेंगे, भागंेगें नहीं। वहीं आत्म विश्वास पैदा होता है। कोई भी परिस्थिति है, वह स्थायी नहीं है।
आज है कल नहीं रहेगी।
..यहाँ तो सब परिवर्तनशील है।
हमारी प्रसन्नता दूसरे पर आश्रित नहीं है। हम पर ही है। तब सारा झुकाव बदल जाता है। जागृति में जब आनावश्यक विचारणा का प्रवाह रुक जाता है। हम अधिक से अधिक क्रिया के साथ रहने लग जाते है, तब हम स्वतः ही हम शांत अवस्था में रहने लग जाते हैं।
इस अवस्था में रहने के बाद, अनावश्यक संकल्प विकल्पों के उठने की जो प्रक्रिया है, वह रुक जाती है। आवश्यक संकल्प स्वतः ही पूरे होने लग जाते है। अंतः प्रेरणा सजग हो जाती है।