साधन तत्व
”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी अतिरिक्तता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।”
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसकाा सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।
इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।
इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।
पहला कदम-
जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए - सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´द्या कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम:-
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण:
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।
सब काम करते हुए भी नाद सुनने का अभ्यास रखना है। बोलते पढ़ते, घर में भी, चाहे कितना शोर हो, बातें करते व सुनते हुए भी नाद सुनाई देता है। ध्यान वहीं रहता है। वैसे मन की यह क्षमता है कि एक समय में दो काम कर सकता है।
नाद सुनते समय काम पर एकाग्रता रह सकती है ?
काम करते समय भी नाद सुनते रहो। काम करते रहो। मन एक साथ दो काम कर सकता है। तीन नहीं। अभ्यास होने के बाद अपने आप चलता है। नाद कान नहीं सुनता। यह जो नाद सुनने का कार्य है, वह यह कान नहीं सुनता।
रात को स्वप्न हमको किस आंख से दिखता है। उस समय कौन सी आंख होती है। प्रकाश भी दिखता है। चित्र भी दिखते है। कौन देखता है।
वही नाद कौन सुनता है ।
सुनने वाला कौन है ? जब तक अपना बोल रहे, चल रहे, खा रहे, पी रहे, अपना ही सुनते है। परन्तु सुनते सुनते जब उस स्थिति में पहुंच जाते है, सबसे परे, तब अनुभूति होती है। जब तक अनुभूति नहीं होती है, तब तक जीवात्मा जिसे हमने मन, प्राण कहा है, जिसके अन्दर संसारमें वासनाएं पैदा होती है। वह सुनता है।यह अन्तर्मुखी बनने की यात्रा है। यही आत्म चिंतन है, यह इसी की यात्रा है।
प्राचीन काल में )षि मुनि यहां तक तो पहुंच गये थे। उन्होंने कई विधियां बतायी, बनायी। परन्तु यह प्रारम्भिक अवस्था ही थी। जहां तक जिसकी पहुंच थी, वह बताकर रह गए थे। पूर्ण अनुभव भी किसी को हुआ होगा, हुआ होगा तो शरीर नहीं रहा होगा। इसीलिए अच्छे आचार विचार बना गये। दुनिया ठीक ढंग से चले शास्त्र बनाये गए। उपनिषद भी आए, उनमें क्रम है, स्तर है।
अवतार भी बताये, उसमें अन्तर रखा। राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहा। कृष्ण को योगेश्वर बताया, पूर्ण अवतार उन्होंने भी कहा- आत्म चिंतन करो कहा, वही सार कही, आत्म चिंतन और नाद श्रवण , आत्म चिंतन ही है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।
सत्संग का तात्पर्य है, सत श्रेष्ठ श्रेष्ठ के साथ जोड़ना।
किसी भी रूप में अपने मन को श्रेष्ठ मन के साथ जोड़ दें। मन स्वतःऊँचा उठ जाता। जिस प्रकार से लोहे और चुम्बक का श्रेष्ठ संबंध है, जितना लोहा चुम्बक के पास रहेगा, उतनी अधिक शक्ति उसमें आयेगी और लगातार घिसने से सम्पर्क बनने से वह लोहाा भी चुम्बक हो जाता है। इसी प्रकार श्रेष्ठ के साथ जोड़ना ही सत्संग है। जोड़ने का तरीका है। यह तरीका विश्वास का है और यह तरीका मानसिकता का है।
स्वामीजी बोले कि एक बार अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में गया। जनक को बहुत जल्दी थी और वे घोड़े पर बैठते हुए अष्टावक्र से बोले कि मेरे पास समय नहीं, क्या तुम इतनी सी देर में कि मैं पैरदान पर पैर रखकर घोड़े पर बैठता हूं क्या तुम मुझे आत्मज्ञान की विधि समझा सकते हो ?
अष्टावक्र ने सहमते हुए कहा- हां, तुम मुझे अपना मन दे दो।
संकेत था, शारीरिक उपस्थिति नही है। यहां मानसिक समर्पण है। अपने आपको श्रेष्ठ के साथ जोड़ना संकल्प है और श्रेष्ठ से आप आध्यात्मिक कहें, परमात्मा कहें, चेतना कहें या नाम कुछ और दे दें, जो स्पष्ट है, जो हमारे भीतर है, जो हमारे पास है ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों मन, चित्त और अंहकार का नियामक उससे पहले अपने आपको जोड़ दे। फिर वही स्पष्ट है और उससे अहर्निश लगाव ही संकल्प होगा।
Monday, January 25, 2010
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