दर्शन
कहा है न, अन्दर जो वासना रूपी संग्रह है, पहले का, उसे ”संस्कार” कहा जाता है। उसे प्रकृति स्वयं लहरों के द्वारा धक्के देती है। धक्के देती है, वहां वासनाएं उत्पन्न होती हैं, वह लगातार उठ रही हैं। कभी काम की, कभी क्रोध की, कभी अंहकार की, लगातार उठते हुए इस तरह से आकर धक्का देती हैं। जिनका संग्रह ज्यादा होगा, उफान उठता जायेगा, इच्छाएं जगेंगी, वृत्तियां उठेंगी फिर उसी के साथ प्रयत्न प्रारम्भ हो जाता है।
उससे परे जाकर, मैं मौजूद तो हूं। इस शरीर के भीतर हूं और अनुभव भी कर रहा हूं कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूं। वह उस महान शक्ति का पुर्जा है। अपने आपको इस छोटे से शरीर में रहकर भी यह अहसास कि वह उस महान शक्ति का पुर्जा है तथा यह स्मृति निरन्तर जब बनी रहती है, वह जागरूकता या सजगता कहलाती है। अंग्रेजी में इसे ही ”अवेयरनेस” कहते हैं।
यह जो चेतना है। मैं सजग हूं। यह जो परिस्थितियां घर कर रही हैं, उनकी मुझे जानकारी है। तथा साथ ही यह भी महसूस होता है कि हम इस महान शक्ति से अलग हैं। छोटे से शरीर में अलग मौजूद हैं। संसार से संबंध रखे हुए हैं। हम आधार से अलग है। तथा आधार हमसे अलग है। यही भावना चेतना है। कांशियसनेस है।हमें स्वाभाविक स्थिति में रहना है। स्वाभाविक का अर्थ है, शरीर का सक्रिय होना, मन का निष्क्रिय होना।
यह संसार निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील है।
समाधि के लिए आसन लगाओ, ध्यान लगाओ, समाधी में प्रविष्ट हो जाओ और पत्थर हो जाओ। समाधि के लिए जो भी क्रिया होगी, माया के ही अन्तर्गत होगी।
लेकिन यहां तो व्यवहार को स्वाभाविक रखना है। साधना में क्रिया आती है। यहां क्रिया का कोई महत्व नहीं है। वह जो स्वाभाविक क्रिया चल रही है, वही क्रिया है। मनुष्य जो अपने आपको अलग मानकर क्रिया करता है, उसके लिए कोई स्थान नहीं है।
वहां करना यही हैं कि बाहर से सब वृत्तियों को, जो विषयों से जुड़ी हुई हैं, उनसे अलग होना है। वह अलग होता है, चिन्तन न करने से। चिन्तन होता है- मन के द्वारा। इन्द्रियां विषयों को भोगती हैं, लेकिन इन्द्रियां मन से जुड़ी हुई है। मन जब धीरे धीरे विचार रहित स्थिति तक आता है, स्थिर होता है, तो उसका संबंध वृत्तियों से, इन्द्रियों से टूट जाता है। विषयों से इन्द्रियां जब संबंध तोड़ लेंगी, मन से भी अपने आप टूट जाता है। मन से संबंध जुड़ता है, वृत्तियों के उठने से। मन में जो वृत्तियां उठती हैं, वह विषयों के लिए प्रेरित करती है। वृत्तियों को नहीं उठने देना है।
यहां वृत्तियों को बलपूर्वक रोकना नहीं है। विरोध न दमन है, न दबाव और न बाहृा अनुशासन है। उसके लिए जो प्रारम्भिक प्रयास है, वह है सजगता पूर्वक वृत्तियां जो उठ रही हैं, उन्हें देखा जावे। मन में वृत्तियां उठना अपने आप समाप्त हो जायेगा। उसके बाद जो स्थिति आती है। उसे आप कुछ भी कहें, सहज समाधि कहें, जीवनमुक्त अवस्था कहें, नाम कुछ भी दे दीजिए। वहां की पहचान है, देह का कृकृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना साधना का रहस्य है।
स्थिति प्रज्ञ:-
जिसकी बु(ि स्थिर है। जीवनमुक्त अवस्था तक ही मनुष्य पहुंच सकता है। मुक्ति अगर होगी तो भी मरने के बाद होगी। अन्तिम अवस्था तक मन रहेगा। मन जब अपने काबू में हो जावे तब वह विचलित नहीं होगा। गीता में कहा भी है-
”ऐषां ब्राहृी स्थिति....” मन विचलित नहीं होगा। उस स्थिति में पहुंच सकते है।
सहज समाधि:-
समाधि का मतलब वृत्तियों का शांत हो जाना है। वृत्तियां बार बार न उठें। एकरस अवस्था रहे, यही समाधि है। यही तो संभव है। जीवनमुक्त अवस्था इसी का नाम है। सारे कार्य करते रहो। मन की यही अवस्था बनी रहे। यही समाधि है।
वन में जाना, एकान्त वास करना, कोई लाभ नहीं है। विश्वामित्र वन में गए, मेनका के पहुंचते ही वापिस नीचे आ गए। यह कोई समाधि नहीं हुई। इससे तो रामकृष्ण परमहंस की समाधि श्रेष्ठ है।
यही परीक्षा की घड़ी है। जंगल में रहकर किया तो क्या किया, समस्याओं कठिनाइयों की, जो यहां संसार में हैं, यही परीक्षा होती है।
मन पर प्रभाव न पड़े, इसकी जांच संसार में ही हो सकती है। संसार में रहना आवश्यक है। घी आग के पास रहे, न पिघले तभी कहेंगे कि आग का प्रभाव नहीं पड़ा। यही तो समाधि है। अलग कोने मंे रख दिया तो क्या हुआ ?
Monday, January 25, 2010
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