वर्तमान में रहना:
वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, यह हमें समझना होगा
जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिब(ता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाह्य में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रुक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।श में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही है। ये नाभि में उठती है। नाभि में विकारों के बीज है। वे बीज सूक्ष्म है। वहां मात्र स्पंदन है। वो धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे है, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में है, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।
लहरें अनवरत उठ रही है धीरे धीरे यह अनुभव हो जाता है कि पकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है उसके सबसे समीप अन्र्तमन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहा जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नही है।यहा तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, जानने का माध्यम नही है। अभ्यास यही करना है। नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, वहीं वासनाएं जन्म लेती है। उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते है, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते है। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते है। यहां आकर भाव दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती है, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती है, उन्हें पोषण मिल जाता है, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती है, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती। व्यवहार अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरूकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग है। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बु( जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। जससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां किसी प्रकार का दमन नहीं है। अभ्यास का लक्ष्य है, मात्र साक्षी रहना। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
रास्ता यही है
स्मृति अनवरत चिन्तन से बनती है कोई व्यक्ति आया, बातचीत हुई। भूल गए उसको तो कोई बात नहीं। परन्तु यदि उसकी बार बार याद आती रहे, वह धीरे धीरे गहरी हो जाती है। वह संस्कार बन जाती है।
कांच के ऊपर तो जो वस्तु आई उसका प्रभाव नहीं रहता, परन्तु मन तो कांच नहीं है, वहां चित्र बनता है अंकित हो जाता है ?वह भी कब। उसका बार बार स्मरण रहे। किसी ने कोई बात कहंी और ध्यान नहीं दिया तो बात बाहर ही रह गई। वह जब याद दिलावे तो भी हल्की ही याद आती है। और कोई बात कही, ध्यान नहीं दिया तो वह भीतर चली गई।गिलास में पानी है, रंग डाल दो। कुछ हवा में उड़ जायेगा, कुछ सतह पर फैल जायेगा, कुछ नीचे जाकर बैठ जायेगा। इसी प्रकार हमारे ऊपर घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, वह मन रूपी कांच पर इसी प्रकार असर डालती है।
कोई तो आई और ऊपर से निकल गई। और कोई वहीं फैल गई। कोई नीचे जाकर फैल गइ्र्र। वही संस्कार बन जाती है। जो ऊपर उड़ गई, उसका पता ही नहीं। जो ऊपर सतह पर फैल गई, वह कुछ दिन ठहरी और चली गई। जो नीचे जाकर बैठ गई, वह संस्कार बन गई। वहीं से वासनाएं उत्पन्न होती है।
इसालिए
प्रारम्भिक अवस्था में वर्तमान में रहने के लिए मन पर उठने वाली वृत्यिों का अवलोकन आवश्यक है,
यह तो शुरू में कुछ दिन लगातार अवलोकन करने की जरूरत है। इससे आदत पड़ जाती है, विचार न उठने की। अवलोकन तो विचार उठने की स्थिति है। इससे क्या होता है, विचार धीरे धीरे उठना कम हो जाता है। उसके बाद की स्थिति जो है, वह हमेशा रहने की है। हमेशा अवलोकन नहीं होता। दिन में काम करते समय अवलोकन करते रहोगे तो काम करने में बाधा पड़ेगी।
शुरू की अवस्था और बाद की अवस्था में अन्तर है। बच्चों की पढ़ाई शुरू करते समय पहले स्लेट पेन्सिल लेकर बैठाया जाता है।
यही प्रारम्भिक स्थिति है।
बाद में वह किताब देखते ही पढ़ने लग जाता है। यह बाद की स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए अवलोकन शुरू की स्थिति है।
अवलोकन रहते रहते बाद में यह स्थिति आ जाती है कि विचार उठना बन्द हो जाता है।
इस स्थिति में रहना है। यह स्थिति हमेशा रहेगी। अवलोकन हमेशा नहीं रहेगा।
वैसे क्रिया के लिए श्रेष्ठ समय रात का है।
साईकिल चलाते समय जब सीखा जाता है, तब ध्यान हैण्डिल पर रहता है, ध्यान वहीं टिका रहता है। बाद में, सीखने के बाद इतनी सावधानी की जरूरत नहीं रहती।
बाद में यह आदत में आ जाता है। फिर कुछ करना नहीं पड़ता, रहना पड़ता है।यदि बात ढंग से समझ में आ गयी और अमल में आने लग गयी तो जल्दी ही सब हो जाता है। चाहिए यही, अभ्यास बना रहे।
हम चाहते भी हैं, करते भी हैं, पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। और बातों में रस आता है। जो काम दस मिनट में होता है, यहां घंटो लगा देते हैं। व्यर्थ का कार्य और फालतू बातें करते है। फालतू कामों में अपने आपको लगाये रखते हैं, दिमाग में जितना फालतू बातों का जमघट होगा, स्थिरता उतनी ही दूर रहेगी। दिमाग पर फालतू चीजों का जो बोझा डाला है, वह बाधा डालेगा ही....।
जो चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा। इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक संसार भी है। काम भी होगा, बदस्तूर होगा। नहीं कैसे रहेगा संसार। जो कहते हैं- संसार असार है, उनका कहना है, प्रतिक्षण यह भूत में जा रहा है, इसीलिए आप आज कितना भी करो, कल उसका क्या महत्व हो, कुछ पता नहीं। हजारो सालों की बात आज कितनी सही है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता, वह तो बदलती ही जायेगी।
यहां जो कर्म होगा, इसमें किसी तरह के संस्कार नहीं बनेंगे ?
क्योंकि हर चीज आयेगी और कांच के सामने से निकल जायेगी। प्रवेश द्वार अन्दर होगा ही नहीं। स्मृति तक बन जाती है, जब वह अनदर पहुंच जाती है। इधर से आये, उधर से गये। हमने देखा ही नहीं। अन्दर पहुंचेगा ही नहीं, बोलते समय देखा है, घड़ी से घंटे बज उठते है। घंटे बज रहे है। कानों ने भी सुना था, पर बातें करते समय कोई पूछे कब बजे, पता ही नहीं रहता। वह वहीं के वहीं रह गया।
वर्तमान में रहने का मतलब है जो देखें, सुनें, वह वहीं के वहीं से वापिस लौअ जाये। अन्दर नहीं पहुंचे।
अन्दर पहुंचते ही वे संस्कार बन जावेंगे। जो बातें सुनी, वहीं छोड़ जाओं।इसके बाद जब यह स्थिति निरन्तर बनी हुई हो, तब शरीर वही काम करता है, जो शरीर के द्वारा प्रकृति को कराना होता है। उसमें वह सुन भी लेता है। कर भी लेता है। तो उसको आगे का संस्कार नहीं बनता। अपने आप ही सब कार्य होते रहते है। प्रकृति आगे सब कार्य करवाती है।इससे शांति मिलती है ?पहले का कितना भी हो। नया नहीं बनना चाहिए। कितनी भी बड़ी पूंजी हो, अगर नया नहीं बनता है तो खतम होना चाहिए। स्वाभाविक बात है। सबसे जो मोटी बात है, इतने चक्कर में पड़ने के बजाय वर्तमान में रहो। अपना सब काम करते जाओं, जरा भी आगे पीछे मत घूमो।
शुरू में जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए। अवलोकन करना उसके बाद का अभ्यास है। इस स्थिति में लाने के लिए यहां शुरू की क्रिया है, इससे जो स्थिति बनेगी, वह वर्तमान में रहने की अवस्था होती है। और अगर यह समझ गए हो तो यह सब शुरू से करने की जरूरत नहीं हैं। इसीलिए प्रारम्भ में कह गई परम्परागत साधनों का अपना महत्व है।बगर आगे का समझे जो कर रहे हो उसे छोड़ना उचित नही है। उसके साथ ही अवलोन का अभ्यास शुरु कर देना चाहिए।अवलाकन का अभ्यास बढ़ने के सयासथ नाद श्रवण शुरु हो जाता है। तब परम्परागत साधन अपने आप छूटने लग जाता है।
यह बात सही है कि विचार तो अवलोकन करते ही ढेर से चले आते है। इतनी बातें, इतना कचरा, साधक घबड़ा जाता है।निरन्तर ध्यान रहने से वह क्रिया शिथिल होती जाती है। इस स्थिति में ढेर जो आता है, वह आना बन्द हो जायेगा। निरन्तर ध्यान रहेगा। शिथिल होते होते नाद सुनाई पड़ता है। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। वह जिन्हें यह समझने में नहीं आता है, उन्हें पहले यह कहा जाता है। नाद सुनते सुनते अपना कर्म चलता रहता है, यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। तब चिन्तन इसका होता ही नहीं है।
जहां करने का ध्यान आया। वहीं हट गए, फिर संसार आया। फिर मन का सहारा लो। फिर मन से दूसरी वस्तु का सहारा लो।सि(ान्त तो बहुत छोटा है ?
उलझा रखा है लोगों ने। जांच कर देखते हैं, शास्त्र में यह लिखा है या नहीं। इसमें न तो वर मांगना है, न सहारा लेना है, न आशीर्वाद है, न गुरू है, न कोई अलौकिक खेल है, यहां बस शांति है। यह भी नहीं है, यह छोड़ो, यह करो, जो है जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, ठीक है।
हमारा व्यवहार
आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
हमारी चाय पीने की आदत है।
चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
प्रकृति का भी यही नियम है।
प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते रहते है।
और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
पहला कत्र्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
साधना का सार ,यही है, अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
और उसी के साथ बताया है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
यह बात जरा कठिन है।
काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चैबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।
जीवन जीने की कला
सांसारिक जीवन और धन की उपादेयता रहेगी।
व्यवहार के लिए धन की जरूरत है। संग्रह भी करो। सब काम करते रहो। बस चिंतन समाप्त करो।
प्रारम्भिक अवस्था में वाणी पर निगाह आवश्यक है। इससे दूसरों की आलोचना रुक जाती है। वाणी का संयम रखने में जिहृा का संयम भी है। कम बोलना और स्वाद पर मन का नहीं जाना- यही अभ्यास है। सब से अधिक फिसलने वाली चीज जिहृा है। बोलते ही मन अधिकांश आलोचना मंे चला जाता है। और मन वर्तमान को हर जाता है। यहां गड़बड़ होने से मन हर जाता है।
ब्रहृाचर्य का आत्म साक्षात्कार से कोई सम्बन्ध नहीं है।
वह जो समझ रहे थे, इसमें ऐसा होगा, वह लिखते रहे। बाद में जो भी लिखते रहे। लेकिन भूखे मरो, यह भी कोई लाभ है। शरीर इन्द्रियों पर आधारित है। सब इन्द्रियां सही काम करेगी, तभी शरीर चलेगा। ब्रहृाचर्य का पालन करो, खूब माल खाओ। रस तो बनेगा। फिर क्या होगा। नियम यही है। दुराचारी मत बनो। व्यभिचारी मत बनो। उचित है कि भोजन की मात्रा पर निगाह रहे। रसना पर स्वतः ही निगाह हो जावेगी।
शास्त्र कहता है ,उचित आहार।
गृहस्थ की ऊपर ही इन सन्यासियों का जीवन चलता है।वास्तविक साधक गृहस्थ ही है।
छोड़ना और छूटना:-
मैने तो कभी नहीं कहा- यह छोड़ों, यह मत छोड़ो। क्योंकि मैं मानता नहीं हूं कि इससे व्यवधान पड़ेगा। हां, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता गया तो इसकी स्मृति ही नहीं होगी। वह स्वयं तुम्हारा छूट जावेगा। यही अच्छा है।
वर्तमान में रहने का अभ्यास नहीं करना पड़ता?
जहां क्रिया शुरू करो, वह चक्कर में पड़ जायेगा। प्रकृति को जो चाहिए, वह कराती रहेगी। वह मालिक है। वह नाटक करा रही है। पात्र वही देती रहेगी। वर्तमान मे रहने के लिए बाह्य साधन की जरूरत नहीं है। किसी भी चीज की आसक्ति नहीं रहे।
परम्परागत साधनों की भी प्रारम्भ में जरूरत रहती है।
यदि हम आज कहें कि कोई जरूरत नहीं है तो जो लोग पीछे रह गये हैं यही मान बैठे हैं, कितने लोग छोड़ बैठेंगे। उससे लाभ नहीं, अहित ही होगा। वे कुण्ठा में ही रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि वह स्वयं आकर अनुभव करे कि जो हमने किया, उसकी जरूत नहीं थी। परन्तु यह सब नाटक इसी तरह चलेगा। ना, करते हुए भी लोेग करते रहेंगे, करके ही हट सकते हैं। कोई बहुत बड़ा मकान बनाना होता है तो , उसके लिए पेड़ा भी बनाना पड़ता है, मकान बनाने के बाद पेड़ा हटाना पड़ जाता है। मूर्ति पूजा, भक्ति का स्थान इसी तरह ही है।
विचार, उसकी क्रिया मस्तिष्क में प्रतीत होती है- इस विचार को नाभि में ले जाना संभव है !इसीलिए तो यह क्रिया है कि विचार धीरे धीरे जैसा कि मन का स्वभाव है, जो कि विचित्र है, जैसे कि अपन किसी चीज को पकड़ने लगते हैं तो वह भाग जाता है। तो इसी तरह से वर्तमान में हरेक व्यक्ति का मस्तिष्क ही काम कर रहा है। वहीं से विचार उठते है। हम सोचते हैं कि दिमाग से सोच रहें है, परन्तु वहीं उसे विचारों को अवलोकन करना प्रारम्भ करते हैं, क्या हो जाता है कि जो विचार करने की जो वहां क्रिया चलती है, वो क्रिया को वो नीचे सरकता जाता है।
वहां उसे पकड़ने की कितनी कोशिश करो, पकड़ में नहीं आता है, वह धीरे धीरे नीचे सरकता जाता है। जितना विचार रहित मन होता जायेगा उतना ही वह धीरे धीरे नीचे सरकते सरकते अन्त में जाकर नाभि में विलीन हो जायेगा। जब जाकर उस मन की ऊपरी सतह पर जो हमारा वर्तमान मन है, उसका प्रयास समाप्त हो जाता है।
जो यह लहरें टकराने का सवाल है, वह अन्तर्मन से टकराती है। और यही से फिर वो ऊपर उठत उठते वापिस दिमाग में आ जाती है, और यहां आकर फिर क्रियाएं प्रारम्भ हो जाती है। तो फिर वह किस प्रकार नीचे खिसकता जाता है, इसका भी अनुभव हो जाता है।
करने सइसकी पहचाने होती है, जैसा मेरा अनुभव है, वह मैं कह सकता हूं, पर आपको अभ्यास करना होगा। साधन वही है। कोई अलग साधन नहीं है। रास्ता एक ही है। मेन रोड़ एक ही है। दूसरा रास्ता नही है। मेन रोड को पहुंचने वाले बाई पास से होंगे।
हां, बाह्य मन नीचे आते आते समाप्त हो जाता है, अन्तर्मन जो हमेशा जागृत रहता है, उसकी अनुभूति हो जाती है कि वहां प्रकृति किस प्रकार कार्य करती है। उसका ज्ञान हो जायेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म दर्शन जो यन्त्र होता है, उसको बारीक से बारीक चीज नजर आती है। वहां जाकर सूक्ष्म से सूक्ष्म लहरें किस प्रकार कार्य करती है। इसकी अनुभूति होती है। इसी से भविष्य का आभास हो जाता है।
जब यह अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है तो वहीं से यह आभास होता है कि यह घटना होने वाली है तो अपने को देखना चाहिए कि प्रयोग करके सचमुच यह घटना होती है या नहीं। यदि होती है तो फिर अपना विश्वास दृढ हो जाता है, फिर और प्रयास करो, इस प्रकार प्रयास करो तो और भविष्य की धटनाएं पता हो जाएगी। इस प्रकार बढ़ते जाओ तो कई बातें आगे की पता हो सकती है।
फिर यह स्थिति आती है कि आज से आगे साल, दो साल, पांच साल बाद की घटनाओं का आभास होने लग जाता है ? परन्तु फिर उनका प्रचारहुआ, कहने की आदत हो गई तो प्रकृति को मौका मिलेगा, टाँग पकड़कर नीचे फैंकने का। अतः कहना भी हो तो संकेत में, ताकि और कोई नहंी समझे।
हम इस मार्ग पर चलकर आत्म विश्वास पा सकते हैं।
प्रयास नाम से शून्य हो, खाली पुस्तके पढ़ने तथा चर्चा करने से कुछ भी नहीं होगा। कुछ किया नहीं तो क्या होगा !कई बार कहा है- जबान पर जो नियमन चाहिए वह तो होता नही। दवाई भी खाते जाओ, परहेज भी नहीं करो। दैनिक जीवन में कितनी गड़बड़ करते हैं, पता नही। कभी सोचा है, पहले परहेज करो, तब दवा फायदा करेगी।
जो बातें गलत हाती है, जबान से होती है, जबान का मन का- गहरा संबंध है। जब तक जीभ पर काबू नहीं है, तब तक मन पर काबू पाना कठिन है।
हम दिनभर जो बातें करते है, उसके बारे में सोचना चाहिए। हम जो वादे करते हैं, वो कितने पूरे करते हैं, सोचा है ?
इससे संकल्प शक्ति कम होती है। ज्यादा बोलने से शक्ति क्षीण हो जाती है। अनावश्यक बोलना, ज्यादा बोलना, इसमें तारीफ भी दूसरे की करनी होती है, बुराई भी होती है, बुराई ज्यादा होती है, सच्ची कम, झूंठी ज्यादा होती है। इस प्रकार की जो बातें हैं, वे बाधक है। बाधाएं पहले हटानी चाहिए।
प्रयास यही है, प्रयास करो।
मैने जो बाते कही हैं, वे पहले जानने का प्रयास करो। जो बातें कही है, उन्हें गहराई से सोचो, तभी आगे जाकर कुछ हो सकेगा।
Monday, January 25, 2010
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