Friday, January 24, 2014

सेवा प्रतिष्ठान    वाहक सेवा प्रतिष्ठान
  गुरुकुल बकानी झालावाड़


वर्ष 10     जनवरी 2014             अंक1  ”


उर्ध्व कुंभक की स्थिति में पहुंचने के पश्चात जब मन प्राण युति धीरे- धीरे अंदर की ओर हृदय से नाभि तक पहंुचने में सफल होती है, उस समय साधक को इसका स्पष्ट आभास होने लगता है। साधक प्रयोग के रूप में छोटी -मोटी इच्छायें उत्पन्न करके उनकी पूर्ति होते देखकर संतुष्ट एवं अचम्भित भी होता है। धीरे धीरे इस प्रकार के अनेकों प्रयोगों में जब उसे पूर्ण सफलता प्राप्त होती है तब पूर्णतया आश्वस्त होकर वह दृढ़तापूर्वक मन की शक्ति के अनूठे प्रयोग भी करके देख सकता है जैसे अघटित घटनायें भी अपनी इच्छा मात्र से उत्पन्न करना। शरीर को अदृश्य करना, आकाश मार्ग से तथा जल के नीचे से तेज गति से प्रवास करना, क्षण भर में एक स्थान से लुप्त होकर वांछित स्थान पर प्रकट होना इस प्रकार अन्तर्मन की शक्ति से अनेक प्रयोग किए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में ही साधक किसी व्यक्ति के अंतर्मन को प्रभावित करके उसके लिए अपनी इच्छानुसार स्वप्न सृष्टि का निर्माण भी कर सकता है।

                                   पूज्य स्वामीजी विरचित






          जीवन जीने की कला

साधना का प्रारंभ ‘कर्म’ से ही होता है। कर्म और कर्मकांड में फर्क है। कर्म, स्वाभाविक क्रिया है, उसके साथ जब मन का सहयोग होता है, कर्म बनता है। प्रत्येक इन्द्रिय के अलग-अलग कर्म है। वाणी एक साथ दो काम कर सकती है। यहां से बोला भी जाता है, स्वाद भी लिया जाता है। इसका निग्रह करना सबसे कठिन होता है, हर इन्द्रिय का अलग-अलग कार्य प्रकृति ने निर्धारित कर रखा है।
इसीलिए पहला अभ्यास यही बताया है कि ‘जीवन के समस्त कार्यों में मन को पूर्णरूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।
कई बार होता है, जो कार्य प्रकृति के विरोध में होता है, वहां पर सतर्कता रहे, उसे वहीं रोकने का प्रयास होना चाहिए।
हां, जब मन उसी कार्य में बहुत देर तक रहने का अभ्यासी होने लगता है तो प्रकृति के विरूद्ध में कार्य करने का स्वभाव भी छूटता जाता है।
आदतें
उस दिन कोई कह रहा था, ... क्रोध तो मेरी आदत सी हो गई है। बाद में पश्चाताप होता है, ग्लानि होती है, क्या किया जाए, ...
... विचार करें, क्रोध आता ही क्यों है? हमारी दूसरे से अपेक्षा होती है, वह ऐसा करेगा, वह वैसा नहीं करता है। क्रोध आता है। हम हमेशा दूसरे की गलती ही देखने का प्रयास करते रहते हैं। इससे हमेशा तनाव बना रहता है।

आदत का बनाना, और इसे बनाए रखना हमारा ही बस का है। इसके लिए दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है।
बस आपको संकल्प करना है। संकल्प हमारी शक्ति है। मन की शक्ति है। ... जब भी मन बाहर की ओर बहे, इन्द्रिय उसे खींचे, वहीं सतर्कता रखनी है। आते ही उसे हटाने का प्रयास रहे, ... तो आदर न मिलने पर धीरे-धीरे वह आदत छूटनी शुरू हो जाती है।

... जब हम कुछ पकड़ते हैं, तो कुछ छूटना शुरू अपने आप होता है। आपने संकल्प का आदर किया, दृढ़ता रखी, तो मन की चंचलता जिसे आप आदत कह रहे थे, वह अपने आप छूटने लगती है।
.... अच्छी बातों के ग्रहण करते ही, बुरी आदतें अपने आप छूटने लगती है। छोड़ने का प्रयास मत करो। ग्रहण करने का करो।

जो ग्रहण किया जाता है, वह नियम है, जो छूटता जाता है, वह यम है। पतंजलि ने जो अष्टांग योग बनाया, वह सही है। परन्तु यहां क्रम को बदलना होता है। आप नियम पहले ले आवंे, यम अपने आप सधने शुरू हो जाते है।


मन जितना वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है। उतना ही स्वाभाविक रूप से गुण उसके भीतर आते जाते हैं।
करना क्या है?
यहां तो एक ही अभ्यास बताया जाता है। अधिक से अधिक अपने मन को वर्तमान में रखने का प्रयास करो। शरीर तो हमेशा वर्तमान में रहता ही है। मन ही इधर से उधर भटकता रहता है। उसी को शरीर के साथ, क्रिया के साथ लाकर रखना है। यही अभ्यास है। यहां छोड़ने और छूटने पर बल नहीं है।
मन जितना स्वाभाविक रूप से वर्तमान में रहने का अभ्यस्त होता जाता है उतना ही जो अनावश्यक है, वह छूटता जाता है। इसीलिए कहा गया है, यहां आकर अनावश्यक विचारों का बोझा मत लादो।
स्वाध्याय अच्छी बात है, इससे बुद्धि का परिष्कार होता है। चिन्तन करना शुरू होता है। चिन्तन करो। व्यवहार की कसौटी पर खूब कसो, जो सही नहीं लगे फिर उसे छोड़ते जाओ। सही का आदर ही विवेक का आदर है। सही की परिभाषा यही है कि वह तीनों कालों में सही रहता है।

सत्य का प्रयोग
वाक सिद्धि की बहुत चर्चा होती है, ... वाक पर नियंत्रण रखना पहला अभ्यास है। जैसे किसी बीमारी का इलाज होना है तो उसमें चिकित्सक पथ्य की बात भी करते हैं। यहां अभ्यास मार्ग पर ‘पथ्य’ वाणी पर संयम है। न तो किसी की निंदा हो, न किसी की प्रशंसा, ... हम प्रायः दूसरे की निंदा में रस लेते हैं, तथा आत्मप्रशंसा में डूबे रहते हैं, दोनों ही अहितकर है।

‘पर निंदा जहां हमेशा दूसरे को हमारे चित्त में बनाए रखती है तथा हमें अपने दोष नहीं देखने देती, ... हमारे भीतर परिवर्तन के सारे द्वार बंद कर देती है। आत्मप्रशंसा उससे भी बुरी आदत है।
‘मन जब वर्तमान’ में रहने लगता है, तो जहां वह क्रिया के साथ लगता है, वहां क्रिया के पूरे होने पर संतुष्टि का बोध होता है, वहीं शक्ति भी मिलती है।
... साथ ही जब परनिंदा तथा आत्मप्रशंसा की आदत कम होने लगती है तब स्वाभाविक रूप से मौन में भी हम प्रवेश करते हैं। यही सहज है।

‘अनंत यात्रा’ में कहा है, अहिंसक और परोपकारी होना ही हमारी स्वाभाविक अवस्था है, जो हमें प्रगति की ओर ले जाती है। अहिंसा कोई बाहर से धारण करने वाली वृति नहीं है। यह स्वाभाविक है। किसी दूसरे का अहित सोचना ही हिंसा है। हिंसा मात्र शारीरिक ही नहीं होती है। दूसरे के प्रति गलत भाषा का प्रयोग तथा मन में भी गलत भावना रखना हिंसा है। अहिंसा कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। जितना हम वर्तमान में रहने के अभ्यासी होते जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन अहिंसक होता जाता है।

शारीरिक स्वास्थ्य
क्या हम दूसरें की सहायता, ... जैसे बीमारी दूर होना, ... उनके शारीरिक कष्ट होना यह कम कर सकते हैं?
दूसरों के तो संकल्प से हो सकते हैं, पर अपने नहीं। जो मानसिक शक्ति हमें प्राप्त होती है। उसके साथ ही यह भी पता अपने आप लग जाता है कि अगर हमने अपने लिए करना शुरू कर दिया तो यह अहितकर होगा।
यह भोग योनी है। जो भी कष्ट हों, भोग हो, उन्हें भोगकर ही समाप्त होना है। आपने चाहा, आपके ठीक हो जाए, ... तो कुछ समय तो लगेगा, कि आप ठीक हो गए। फिर इसके बाद जैसे बैंक का ब्याज बढ़कर बाद में आता है, उसी प्रकार यह होता है।
सवाल था, ... कानूनगो साहब की पत्नी जब बहुत बीमार थीं, तब स्वामीजी पहली बार बकानी गए थे। उनका कोई विशेष परिचय भी नहीं था। स्वामीजी बस, वहां जाकर घंटेभर मौन उसके पास बैठते, ... वे धीरे-धीरे स्वस्थ होती गई। बाद में और बच्चे भी पैदा हुए, ... ऐसी अनेक घटनाएं घटीं, ... पर जब स्वयं स्वामीजी बीमार हुए तो उनसे भी कहा गया था, कि वे अपनी शक्ति से अपने आपको स्वस्थ करले। स्वामीजी ने कहा था-

‘इससे क्या होगा? भोग तो भोगकर ही कटेगा। आपको समर्थ रामदास का वृतांत बताया था। शिवाजी मिलने गए थे, ... तब उन्होंने देखा, पास में रखा कंबल हिल रहा है, कांप रहा है।
तब उन्होंने पूछा था- यह क्या है?
तब रामदास ने कहा था- ‘तुम्हारे आने के पहले मुझे बहुत तेज बुखार था, पर तुम आए हो, तुमसे बातें भी करनी है, तो मैंने यह बुखार कंबल को सौंप दिया है।
... ‘तुम जाओगे, फिर कंबल ओढ़ लंूगा। बुखार तो आना ही है। वह तो भोगकर ही जाएगा।’

यहां पर उस दिन सवाल पूछा गया था- ‘जब हमें जो प्रारब्ध में है वह भोगना ही है, तब फिर आप जो कहते हैं, वर्तमान में रहाा जाए, ...अभ्यास निरंतर किया जाए, इससे क्या लाभ?
स्वामी जी कह रहे थे- ‘मैंने तो आपसे कहा नहीं, आप यह करें या नहीं करंे। पर भोग से बचने के लिए प्रार्थना करना, चीखना, चिल्लाना यहां व्यर्थ है, ... वह तो भोगकर ही जाएगा, ... यह तो प्राकृतिक विधान है, ... हजारों कर्मों का भोग है, हर क्षण हम प्रकृति के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। परन्तु जो अभ्यासी हैं, वे यह जानते हैं कि मन शांत होना है, स्थिर होता है, तो यह अवधि कम हो जाती है। भोग, भोगकर चला जाता है, परन्तु उसकी तीव्रता का अहसास भी नहीं होता है। वास्तविक भजन यही है। शांत मन ही वास्तविक भक्ति है। किसी भी प्रकार की कठिनाई आती है, वह अपने आत्मविश्वास से उसका सामना करता है। जहां आत्मविश्वास घना होता है, वहां या तो विपत्तियां आती ही नहीं है, और अगर आती भी है तो उनका वेग सामना करने से कम होता जाता है।

क्या काम और क्रोध अभ्यास मार्ग पर सबसे बड़ी कठिनाइयां है? और हैं तो कैसे क्या किया जाए?
स्वामी जी कह रहे थे, हम जो अपनी संपत्ति साथ लाए है, वह हमारी इन्द्रियां और हमारा मन ही है। जन्म के साथ जो परिवार मिलता है, जो संपति मिलती है, वह तो नाशवान है।

बीज के साथ जो विकास होता है, उसमें गर्भ से ही इन्द्रियों का तथा बाद में मन का फिर बुद्धि का विकास होता जाता है। छः रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह मद और मत्सर, ये साथ ही आते हैं। सालभर  के शिशु से उसके हाथ की चीज छीन लो क्रोध से रोने लग जाता है। उसका चेहरा तन जाता है। काम का बीज, सबसे बाद में खिलता है। शास्त्र में कहा गया है-

‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुदभ्वः
महाशनो महापाप्मा विद्धयेेनमिह वैरिणम्।। (3-37)
रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम (ही) क्रोध है, यही महाअशन अर्थात् अग्नि के सदृश भोगों से न तृप्त होने वाला और बड़ा पापी है। इस विषय में इसको तू वेरी जान।
यह प्रसंग तब आया- जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से यह पूछा था कि मनुष्य क्यों न चाहते भी पाप कर्म में संलग्न हो जाता है, ... हम क्यों वह सब कर बैठते हैं, जो हम करना नहीं चाहते हैं। तब भगवान ने काम और क्रोध को नैसर्गिक शत्रु बताया है।

इसी प्रसंग में आगे कहा है- जैसे धुंवे से अग्नि, तथा मल से दर्पण ढंका रहता है, उसी प्रकार काम से यह ज्ञान ढंका रहता है। इस काम का निवास - इन्द्रियां, मन, बुद्धि है, इसीलिए कहा गया है इन्द्रियों को वश में किया जाए।’ विषय तो रहेंगे, ... पर इन्द्रियों का संबंध जब मन से जुड़ता है, तब इन्द्रियां भोगों को प्राप्त होती है। अगर मन अनुपस्थित है, अप्रभावी है, तो विषय भी रहेंगे, तथा इन्द्रियां भी होंगी, परन्तु संबंध टूटा हुआ होगा। यही अवस्था ‘स्थितिप्रज्ञता’ की होती है। इसके लिए कहीं समाज से कटकर अलग कहीं जाने की जरूरत नहीं है।
अभ्यास और वैराग्य की बात कही जाती है। अभ्यास तो निरंतरता है उसमें कोई कमी नहीं आए तथा वैराग्य, सीधी राह पर चलने में जो दाएं-बाएं का आकर्षण होता है, वह छूट जाए। यह आकर्षण स्मृति और कल्पना पैदा करती है।
जितना मन वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है, उतना ही स्मृतियों का आदर कम होता जाता है। मन का भटकाव कम होता जाता है।कल्पना का,भविष्य का मोह भी छूटता जाता है।

साधक के लिए सबसे बड़ी बात इस बात को समझने की है कि परमात्मा ने उसे जीवन यापन के लिए, उत्तम पेय और भोजन के पदार्थ दिए हैं, साथ ही प्रत्येक जीवधारी को चाहे चींटी हो या मनुष्य उसे काम शक्ति के साथ भेजा है। उसका सही व संतुलित आदर ही श्रेष्ठ है।

सभी धर्मों ने सभी आध्यात्मिक साधनाओं में, चरित्र का ऊँचा सम्मान है। परिवार के विकास के लिए, स्त्री और पुरुष दोनों का होना, अभ्यासी होना आवश्यक है। यहां जो काम संबंध है, वह प्राकृतिक है। सहज है। परन्तु अनावश्यक मन के भटकाव से जहां बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वहीं आत्मविश्वास भी चला जाता है। स्त्री के लिए पुरुष और पुरुष के लिए स्त्री दोनों ही अनिवार्य है। दोनों एक दूसरे का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करते हैं।

अभ्यास
अभ्यासियों का यह कर्तव्य है कि वे जिह्वा पर नियंत्रण पहले लावे। साधु-संन्यासी, बहुत स्वादिष्ट खाते हैं। इससे उनके देह में रस बनता है, फिर वे काम विकार से कैसे बचेंगे- स्वामी जी कहा करते थे- जब एक चपाती से मेरा शरीर चल जाता है, तब स्वादिष्ट माल खाने से क्या मतलब? रसना के स्वाद के गुलाम मत बनो, साथ ही वाणी पर निग्रह रहे, तो काम विकारों पर नियंत्रण होने में सरलता होती है।

मन जब एकाग्र होता है, ... तब स्वाभाविक रूप से काम उर्जा का विकास होता है। प्राणायाम जो लोग करते हैं, तब कपाल भाती ज्यादा करने पर नाभि पर जोर पड़ने से उनकी काम उर्जा तेजी से बढ़ने लगती है, तब परेशान हो उठते हैं। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। स्वामीजी कहा करते थे- न तो आप चिंतन करे, न ही किसी प्रकार का भेदभाव जो रहे। ”जो है“, ”क्यों ह“ै, चिंतन से ही मन इधर-उधर खिंच जाता है। जितना मन वर्तमान में रहने लगेगा, बाहर के विकारों की तीव्रता उतनी ही कम होती चली जाएगी। काम से लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। न हीं भागने की। दोनों कार्य चिंतन से होते हैं। जितना चिंतन घना होता जाता है, हम उतने ही इसके गुलाम होते जाते हैं।
मन जब किसी भी क्रिया के साथ बहुत देर तक संयुक्त रहता है तो इस स्थिति में चिंतन प्रक्रिया रूक जाती है, ... हम विकारों की लहरों के थपेड़ों से सुरक्षित होने लगते हैं।
तब क्या होता है? विषय भी होंगे, इन्द्रियां भी होंगी, पर दोनों के बीच संबंध स्थापित करने वाला जो मन है, वह वहां नही ंहोता है। संबंध टूटा सा रह जाता है। यही समाधि की अवस्था होती है। यहां सजगता तो होती है। पर मूर्च्छा नहीं होगी।

अपेक्षा
जब हम दूसरों से किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हमारी भोग की पूर्ति न होने पर हमें क्रोध भी आता है, ... उनसे मोह होता है, और शोक भी होता है।
यह तीन विकार तो अपेक्षा के कम होने से कम होते चले जाते हैं। परन्तु अहंकार जो है, यही मूल विकार है। यह ”म“ैं पन का बोध है। काम और अहंकार का सीधा संबंध है। ये दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं।

अहंकार अत्यंत ही सूक्ष्म है। यह स्वयं को दिखाई नहीं पड़ता। इसकी पहचान, परनिंदा की तथा आत्मप्रशंसा की पहचान होती है।
‘कहा गया है-
‘गर्व न कीजे बावरे, हरि है गर्व प्रहारि, ... इसका प्रभाव इतनी धीती गति से बढ़ता है कि पता ही नहीं चलता कब इसने आकर व्यक्तित्व को सोख डाला है।
संत लोगों ने कहा है- अभ्यासी को चाहिए हमेशा छोटा बना रहे। इसीलिए, अभ्यासी को आध्यात्मिक शक्तियां तभी प्राप्त होती है, जब वह हमेशा छोटा बना रहता है। अनंत यात्रा में रानी चूड़ाला नीलकंठ को छोटा बटुक बनाकर ही राजा शिनिध्वज के पास ले जाती है, जहां वह उसे आध्यात्मिक साधना करवा रही है। ‘बटुक होय तो सदगुरू पायो- सदगुरु की भी प्राप्ति तभी होती है।
सहजोबाई ने कहा है-
‘बड़ा न जाने पाय है, साहिब के दरबार।
द्वारे ही से लगी है सहजो मोही मार।।

आज जहां जाइए सभी जगह इसी अहंकार का बोलबाला है। स्वामी जी बता रहे थे, ... एक बार एक बड़े सम्मेलन में जाना हुआ, ... सन्यासी अगड़े बैठे थे-बहुत से छोटा कांच निकालकर बार-बार अपना चेहरा देख रहे थे।“ आजकल टी.वी. आ गया है, उस पर भाषण देते हैं। हजारों रूपया खर्च रोज का होता है। कहां से पैसा आता है। बड़ा अहंकार है। कहते हैं, फलाना मंत्री आता है, फलां सेठ आता है। यह सब पतन की ओर ले जाता है। इस अहंकार के अनेक रूप हैं, धन का, पद का, ज्ञान का, पांडित्य का, गुरुत्व का, यह अहंकार इतना तरल होता है कि अनेक रूप धारण कर लेता है।

इसकी पहचान यही है कि इसके आने के बाद विवेक शक्ति इसके प्रभाव से दब जाती है। बुद्धि का हनन हो जाता है। वह अपने को बड़ा समझने लगता है। दूसरे उसके सामने छोटे लगते हैं।
अभ्यासी की गति यहां पर आकर रूक जाती है। उसके भीतर अपने अभ्यास का अहंकार हो जाता है। मैं इतने वर्षों से अभ्यास कर रहा हूं। मुझे वाक सिद्धि है, ... मेरा कहा हो जाता है। मुझे भविष्य का आभास होने लग गया है, ... अनेक प्रकार के विकार धक्का मारते हैं।
यहां पर आकर गुरु की महता जगती है।-
पहले गुरु शिक्षक होते है। वे साधक को अभ्यास सौंपते हैं। दरवाजे पर ले आते हैं। पर आध्यात्म की दुनियां में प्रवेश ब्रह्मनिष्ठ गुरु के सानिध्य में ही प्राप्त होता है। ब्रह्मनिष्ठ वे ही है, जिनकी ब्रह्म में निष्ठा है, साथ ही श्रोत्रिय भी हैं। स्वामी जी ने समझाया है- वह सभी प्रश्नों का समाधान तो करता ही है, वह वहां तक पहुंचने में सहायक भी है। उसका अपना स्वार्थ भी नहीं है। यही प्रकृतिजन्य कर्म है। जिसके लिए वह है।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु साधक को उसके अहंकार से परिचित ही नहीं कराते हैं, वरन उसकी ग्रन्थि को ढीला भी कर देते हैं,अभ्यासी  काा पहला कदम संकल्प का होता हे।साधन का होता है। उसमें निरंतरता में रहे। स्वामी जी कहा करते थे- कॉन्सटेन्ट, ... अवेयरनेस, ... निरंतरता में रहे।

फिर यही अभ्यास, उसकी लगन बन जाता है। जो उसे, ... ब्रह्मनिष्ठ गुरु से मिला देता है।
जो गुरु स्वयं मिलने को उत्सुक है। जो स्वयं हजारों रूपया खर्च करके, शिष्य तलाश कर रहे हैं, वहां और कुछ तो होगा, परन्तु आध्यात्मिक विकास नहीं होगा।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु और अभ्यासी का मिलना, यही प्राकृतिक विधान है। जो प्रकृति स्वयं करती है।
महत्वपूर्ण यही है कि साधक की अपने अभ्यास के प्रति तीव्र लगन हो, उसमें निरंतरता रहे, ... तो ब्रह्मनिष्ठ गुरु की प्राप्ति उसे अवश्य ही होती है।

2
सेवा
स्वामी जी कह रहे थे- इस संस्था को बनाया। बहुत मेहनत की है। उद्देश्य यही था- निष्काम भाव से प्राणियों की सेवा की जाए, ... जो भी यहां आए किसी भी धर्म, का हो जाति का हो, दुखी हो, सुखी हो, अमीर हो, गरीब हो, उसकी सेवा हो, उसे शांति मिले, यही यहां का कार्य हो।“

यही कार्य उन्होंने सोंपा है। वे कहते थे- हां, अभ्यासी को शक्तियां प्राप्त होगी, ... पर उनका उद्देश्य स्वयं को लाभ पहुंचाने का नहीं हो, ... दूसरों को लाभ हो, उनका हित हो, यही लक्ष्य सामने रहना चाहिए।
स्वामी जी ने ‘सेवा’ का एक आदर्श सामने रखा। जहां स्वयं के लिए कुछ भी नहीं चाहिए था। जीवन की आखिरी सांस तक वे समाज के हित में ही लगे रहे। कहा करते थे- अब शरीर वृद्ध हो गया है, चला फिरा नहीं जाता, तो संकल्प से सेवा का कार्य होता है। यह तो चलता रहेगा।
गुरुकुल में कोई भी पहुंचा, वहां सबका घर था। सभी की नास्ते व भोजन की व्यवस्था होती थी। जब स्वस्थ थे, पैदल मीलों जाते थे। सामान्य से भी व्यक्ति के यहां ठहर जाते थे, ... स्वयं के लिए किसी प्रकार की कोई विशेष व्यवस्था नहीं चाहते थे।
... जीरापुर की घटना है। वहां एक मुसलमान था। उसे किसी मौलवी ने कह दिया था, तुम्हारी दो माह की उम्र ही शेष है। वह तो सुनकर सूखकर कांटा हो गया था। पुरोहित जी की निगाह पड़ी, उन्होंने पूछा- क्या बात है। उसने मौलवी जी का कथन बताया, कहा कि वे पहुंचे हुए हैं, उनकी बात गलत नहीं होती।
पुरोहित जी गुरुकुल आए, स्वामीजी को साथ ले गए। उन्हें कुछ नहीं बताया। फिर वह मुसलमान बुलाया, तब उसके सामने पूछा- ‘स्वामी जी कह रहे थे- एक बार उसके चेहरे पर देखा, ... फिर दो मिनट बाद बोले- तुम अभी नहीं मरोगे- जाओ’।
वह मुसलमान वर्षों जीया। बाद में गुरुकुल भी आता रहता था। स्वामीजी कह रहे थे- मैं किसी के चेहरे पर देखता ही नहीं, बहुतों को पहचानता भी नहीं, ... जब वो दो तीन बार बोलते रहे, तब संबंध जुड़ जाता है-
गीता में कहा गया है-
तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। 18।62।।
हे भारत, सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की ही कृपा से (ही) परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।

... जब तक शरीर है, संसार हैं। शरीर और संसार में एक्य है। शरीर हमेशा वर्तमान में रहता है, पर मन नहीं। मन का जहाँ शरीर हो, शारीरिक क्रिया में हो, उसी के साथ रहना, जहां क्रिया नहीं हो, वहां निर्विचारता में रहना ही वर्तमान की प्राप्ति है।
... हमें लगता है, हम सब कुछ कर सकते हैं। जीवनभर यहां से वहां, वहां से यहां भटकाव बना रहता है। इधर से उधर सुबह से शाम तक हाथ पांव मारते हैं।

स्वामी जी कहा करते थे- जब अन्तर्मुखी होते हैं, तभी अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य का पता लगता है। प्रकृति ने हमें कौन सा कार्य करने को भेजा है उसी कार्य को हम तब कर पाते हैं। नहीं तो भटकाव बना रहता है।
... फिर हम क्या करंे-
साधन के साथ, जो मात्र स्वाभाविक अवस्था में रहना है, ... उसमें रहे। बाहर जो घट रहा है, ... उसके साथ अधिक से अधिक मन को साथ रखने का अभ्यास रखे।
.... सुख-दुख होगा या नहीं, इन प्रश्नों के चिंतन में उलझना बेकार है। शक्ति सारी चिन्तन में चली जाती है। परमहंस जिस बिल्ली के बच्चे का उदाहरण देते थे, वह याद रहे, प्रकृति जो भी कर रही है, उसमें हमारा कोई उपकार है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर ले जाती है, पर बच्चा जानता है कि इसी में उसका हित है।

यही बात गीता के संदेश में कही गई है- जो है, वह स्वीकार है।‘‘  ईसा ने कहा है- .............. तेरी इच्छा पूरी हो। काश्तकार कहा करते हैं- हमने लगाई अर्जी जैसी दाता की मर्जी, हमारा तो काम करने का फर्ज है।पर यहां गुरुकुल में कोई आया है, उसने चाय पी है या नहीं, उसका इंतजाम हुआ है या नहीं, पहले पता करता हूं“स्वामीजी कहा करते थे।

  सेवा प्रतिष्ठान, छोटी सी संस्था थी, पर वह अपनी सीमा में निरन्तर सेवा में लगे रहे।
स्वामीजी कह रहे थे, हम जब अन्तर्मुखी होते हैं, वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाता है, तब शक्ति पाने का हकदार होते हैं। हमारी मानसिक शक्तियां प्रबल होती जाती है। परन्तु यहां ध्यान रहे, शक्तियों का सदुपयोग जनहित में ही होना है।
पर होता क्या है, हम स्वार्थ में अंधे हो जाते हैं। हम शिक्षा लेते भी नहीं है। जो कुछ भी चाहते हैं। अपने लिए ही चाहते हैं। अभ्यास का यही अर्थ है कि हमारे भीतर निष्कामता तथा निस्वार्थता आए। आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्व भूतेषु हितेरतः की भावना ही शेष रहे। सेवा कार्य, शरीर से भी होता है, मन से भी तथा धन से भी। धन से सेवा करना सरल है, उसमें रसीद कटती है। हमारा नाम दीवार पर लिखा जाता है। अहंकार की पूर्ति होती है। समाज में सम्मान मिलता है। शरीर से सेवा  करना उससे श्रेष्ठ है, इससे अहंकार गलता है। यह तप है। इससे अहंकार दूर होता है। मन से सेवा वे ही कर पाते हैं जिनका मनोबल बड़ा होता है। जो अभ्यासी हैं। जो सहजावस्था में रहते हैं।
ध्यान
जहां भी हों, जो भी क्रिया हो, ... मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए, दूसरे शब्दों में जहां शरीर हो वहीं मन भी हो, ... मन वहीं रहे। पर यह संभव नहीं हो पाता है।
हम जहां भी होते हैं, उस क्रिया को करते समय भी मन हर मिनट में दस पांच जगह चला जाता है। निरंतर निगरानी करते रहो, ... तो लगता है, ... जैसे बंदर उझलकूद करता रहा है, उसे पकड़ना हो, वैसा ही रहता है।
क्या अभ्यास हो-
स्वामी जी ने कहा था-” इसका प्रारंभ रात को किया जाए। सोते समय मन का भटकाव रोकना है। भटकाव से मानसिक शक्ति क्षीण होती है। संकल्प शक्ति कम होती है। बिस्तर पर लेटते समय, जब सारे कार्य समाप्त हो जाए, वहां हम जाए तब मन के द्वारा मन की निगरानी रखी जाए। निर्विचार स्थिति में लेटे रहे। तो क्या होगा? विचार तो आते रहेंगे, ... निगरानी होने से आते ही रूक जावेंगे। दो चार विचार आने के बाद, रूक जाने पर, हर गेप एक खालीपन आएगा। मन में कोई विचार नहीं होगा। इस गेप की मन के द्वारा मन पर वाच रखते हुए बड़ा करते जाना है। इस स्थिति में दो बातें होगी- या तो विचार आएंगे, ... या नींद आवेगी। नींद भी आना अच्छा है- तो यह प्रयास रात को, और यही प्रयास बिस्तर पर उठते समय सुबह किया जाना चाहिए। फिर दिन में जब भी समय मिले, ... तब मन पर वाच किया जाए। क्या विचार आता है? उसे हटाया जावे। इस स्थिति में थोड़ी प्रगति पर होने पर क्या होगा? कई बार सुगंध जैसे कमरे में कोई अगरबत्ती जल रहे हो या इत्र की सुगंध, ... या धीरे-धीरे एक महीन बारीक आवाज सुनाई देगी, ... थोड़ी देर रूकेगी, इसके बाद वह शाम को, छ या सात बजे, जब अंधेरा आने को होता है, जब प्रकाश, चौंधी हुयी रोशनी आपको नजर आएगी। इससे इतना ही पता लगता है कि हम सही रास्ते पर हैं- फिर जो कार्य होना है, इसका पता लग जाता है, अनावश्यक कार्य अपने आप छूटते जाते हैं-“
सवाल था, पर व्यवहार में तो कठिनाई रहती है, मन तो निरंतर भटकता रहता है- स्वामी जी ने बताया था, इसीलिए परंपरागत विधि में कई तरीके बताए गए हैं। विपश्चना भी एक है- यहां श्वास की गति पर एकाग्रता करते हैं। मन और प्राण का गहरा संबंध है। एक के संयम से दूसरा भी सध जाता है। पहले नासिका के अग्र भाग पर ध्यान को लाओ, फिर श्वास पर केन्द्रित करो, श्वास का कम घेरा होता है, बाहर से भीतर भीतर से बाहर, श्वास की गति के साथ रहो, जहां वह मुड़ती है, वहां सजगता में रहो, धीरे-धीरे विचारों की संख्या कम होती जाती है।
बौद्धों में यह विधि प्रचलित है।
परन्तु वर्तमान में रहने से क्या होता है? यहां बाह्य प्रयास कुछ भी नहीं करना पड़ता। मन के क्रिया के साथ निरंतरता में रहने से, प्राण की गति भी नियमित हो जाती है। संयम सधने लगता है। जब क्रिया नहीं होती है, तब मन जहां शांत होता है, अंतर्मुखी होने लगता है वहीं प्राण से भी उसकी युति होने लगती है। यही वास्तविक योग है। ... जहां हठयोग, राजयोग, आदि अंतर में अनेक बाह्य विधान बताए जाते हैं, वहां यह सहज ही उपलब्ध हो जाता है। स्वाभाविक अवस्था में रहना ही साध्य है। इस अवस्था को अधिक से अधिक सहजावस्था कह सकते हैं।


क्या करना है
”मानव जीवन का उद्देश्य, जीवन में सुख व शांति प्राप्त करना है। हम जब अंतर्मुखी होते हैं, तब हमें पता लगता है कि हम यहां किस उद्देश्य से आए हैं, ... अतः हमें निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यास करना है“- स्वामी जी कह रहे थे। प्रश्न था, हम कैसे रहंे, हम तो गृहस्थ हैं? वर्षों वे हमारे साथ रहे, ... पर हमारे भीतर तो कोई परिवर्तन नहीं आ पाया, ... सब कुछ पहले की तरह रहा। बर्हिमुखता बनी रही। इसके दबाव में कार्य करते रहे। स्वामी जी एक ही बात कहते थे, मुझे देखो- मेरे तो बचपन में पिता चले गये थे, युवावस्था में मां चली गई, अभाव रहे, जब मैं कर सकता हूं तो आप लोगों को तो बहुत सुविधाएं हैं, क्यों नहीं कर पाते? फिर कहते थे- कुनकुने पानी में चाय नहीं बनती है।’ अभ्यास व लगन दोनों ही महत्वपूर्ण है।
... स्वामी जी कहा करते थे- ‘मैं किसी का गुरु नहीं हूं, मैने किसी को अपना चेला नहीं बनाया, फिर कहा करते थे- आपने यदि मुझे गुरु माना है, आप यहां आए हैं, तो मेरे विचारों को चिन्तन का आधार बनाएँ, उन्हें व्यवहार में लाएं। वे कहा करते थे- मुझे पांव छुआना, पांव में रोली लगाना, पूजा कराना पसंद नहीं है तथा फिर वे हम सबके घर पर आते थे, सत्संग भी होता था तथा एक भरापूरा  गुरुकुल परिवार से वहां मिलना होता था-
उन्होंने गुरु और पिता का भेद समाप्त कर दिया था। वहां मात्र प्रेम था, एक सहजावस्था, जहां उन्हें शिशु से लेकर वृद्ध तक उनसे संपर्क बनाए रखते थे, परिवार की छोटी से छोटी समस्या को वे जानते थे, दूर भी करते थे- रास्ता सुझाते थे, ... प्रसन्नता सौंपते थे।

... जब हम शुरू-शुरू में गुरुकुल जाते थे, तब स्वामी जी खुद चाय बनाते थे, ... चाय के प्याले भी धोते थे, ... कहीं किसी प्रकार की विशिष्टता का आदर नहीं था। वहां गुरु और शिष्य का भाव नहीं था, ... पिता और पुत्र का भाव था, महिलाएं उनकी बेटियां थीं, कहा करते थे, जानकीबाई, पार्वती, क्षमा, सनोज की मां, केसरी लाल जी के यहां से, को चेहरे से पहचानते हैं, ... कभी किसी महिला की ओर उसके चेहरे को देखा तक नहीं, ... कोई राग वहां नहीं था। मात्र एक प्रेम। किसी से सेवा लेने का रत्तीभर भाव नहीं था।

कहा करते थे-‘अनंतयात्रा’ में जब चूडाला, नीलकंठ को राजा शिविध्वज के पास साधन सिखाने को ले जाती है, तब उसे नन्हा बटुक बनाकर ले जाती है। अगर करना है तो अपने अहंकार को कम करना है।
जैसी हरी दूब होती है। ... बड़ी घास को लोग उखाड़ लेते हैं। दूब बच जाती है। बड़े पेड़ तूफान में उखड़ जाते हैं। नए पौधे हिल-हिल से बच जाते हैं।
अहंकारी ही गिरता है, ... साधन पथ में इसीलिए विकास नहीं होता कि वहां तुम और तुम्हारा ‘में’’ दोनों एक साथ जाना चाहते हैं। वहां दो का प्रवेश नहीं हो सकता।
वहां तो नन्हें का ही प्रवेश है। छोटा होकर जाना होता है। ... अन्य मतों में, गुरु भाइयों व बहनों से प्रेम सिखाया जाता है। वहां लौकिक भार्ग व गुरु भाई का भेद समझाया जाता है। प्रेम भी बंट जाता है। ... स्वामी जी इसे पसंद नहीं करते थे, कहते थे प्रकृति ने जो रिश्ता बनाया है उसका निर्वाह पूरा करो। दूसरे नहीं करते हैं, दुर्भावना रखते हैं। वह उनका कर्म है, उनके कारण से हम अपना व्यवहार खराब नहीं करेंगे। जो गुरु परिवार के हैं, उनमें भी उतनी ही प्रीति हो। प्रेम, बंटता नहीं है। बांटता भी नहीं है। हां, आसक्ति अवश्य कम होती जानी चाहिए।

... अभ्यासी आप हैं, लगन रहे। आज किया कल छोड़ दिया, उचित नहीं, यहां न तो किसी विशेष व्यवस्था की जरूरत है, न ही किसी प्रदर्शन की बस, सुबह व रात को और जब समय मिले, अपने मन पर सतर्कता रखनी है। अनावश्यक विचारों का भटकाव कम हो, यह ध्यान रखना है। पथ्य एक ही है, कम बोलंे, अनावश्यक नहीं सोचंे, ... पर निंदा व आत्मप्रशंसा से बचंे, ... बस। यही अभ्यास है।
... जहां राग होता है, वहां मत्सर भी होता है। किसी से अपेक्षा होती है जब वह पूरी नहीं होती है, तो क्रोध आता है, वहां शोक होता है, वहीं मोह होता है, वहीं मस्कर है, ईर्ष्या है। ईर्ष्या का ही विकसित रूप घृणा है।
वैराग्य, किसी दूसरे के प्रति अपेक्षा का अभाव ही है। स्वामी जी कहा करते थे, दूसरा कोई है ही नहीं। तुम अपना काम करो, ... तुम्हें दूसरों से क्या प्रतिफल मिलेगा, यह सोचना ही नहीं है। दूसरों का चिंतन ही दुख है। वही पराधीनता है। दूसरे से सदा अपेक्षा होती है। जो भी दूसरा है, उसके प्रति प्रीति रहे। इसमें जाता क्या है?

अभ्यास और वैराग्य से ही शांति प्राप्त होती है। मन अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं शान्ति व शान्ति का निवास है।
फिर सवाल था; त्याग क्या हो?
स्वामी जी ने कहा था, जो आपका है नहीं, उसे आप क्या छोड़ सकते हैं? आपके पास तो आपकी स्मृतियां है, जो आपको वर्तमान में नहीं रहने देती है। उनका त्याग ही वास्तविक त्याग है। अधिकांश विकार स्मृति से ही पैदा होते हैं।
यही अभ्यास रहे। इसी अभ्यास से मन को जहां शांति मिलती है वहीं शक्ति भी मिलती है। स्वामी जी कहा करते थे- मैंने सभी प्रकार की साधनाएं की, ... साठ साल के निरंतर अभ्यास में इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि वर्तमान में रहना ही, सच्ची साधना है। यही वास्तव में गीता जी का सार है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो समझाया है- माम अनुस्सर युद्धच, यह वहीं है। यही वास्तविक समर्पण है।

मामेव ये प्रपद्यन्ते, माया मेेतां तरन्ति ते। 7/14
इस माया को वे ही पार कर जाते हैं, जो मेरी शरण में आते हैं।
इस माम की शरणागति ही सार है।

‘क्या गुरु की शरण में जाना आवश्यक नहीं ?
स्वामी जी ने अनंत यात्रा में, ब्रह्मनिष्ठ गुरु की अपरिहार्यता पर बल दिया है। उन्होंने अनेक जगह पर ब्रह्मनिष्ठ व क्षोत्रिय गुरु पर बल दिया है। कहा करते थे, ब्रह्मनिष्ठ गुरु का मार्गदर्शन अपेक्षित है। गुरु विवेकी है। वे शिष्य को विवेक प्रदान करने आते हैं। शिष्य विवेकी हो यही उनका कर्तव्य है। अनंतयात्रा में कुंभ नीलकंठ से कहता है- तुम्हारा मार्गदर्शन करूं, यही मुझे अभीष्ट था, हो सकता है कि इसके बाद मेरा शरीर रहे या नहीं? परन्तु ब्रह्मनिष्ठ गुरु कभी भी अपनी शरणागति के लिए नहीं करते। वे तो अपनी पूजा भी करवाना नहीं चाहते। उनसे पूछा था- किसी मत में व्यवस्था है, गुरु के द्वारा नामित शिक्षक अभ्यार्थियों के विकारों को दूर करते हैं, ... इन शिक्षकों को गुरु अपनी शक्ति प्रदान करते हैं।

स्वामी बस हंसे थे, ... बोले, यह संभव नहीं है। आध्यात्मिक विद्या, प्रबंधन व्यवस्था नहीं है। यहां शिक्षण नहीं होता। यहां मात्र प्रवेश होता है। लगन और अभ्यास होना ही पर्याप्त है।
हां, ब्रह्मनिष्ठ गुरु हो, उनके मन से आप अपना मन मिला दंे, ... तो आवश्यक नहीं है, वे सशरीर भी हों, उनकी शक्ति आपका मार्ग दर्शन करती रहेगी। संत मत में यही मार्ग है।
यहां गुरु की उपस्थिति उसकी मानसिक स्वीकृति है, उसके प्रति प्रेम है। उसके प्रति समर्पण है, ... वह मार्ग बताते हैं। साधना में गति देते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे, गुरुमत में साधक सब गुरु को छोड़कर अपने काम-धाम में लग जाते हैं। साल में एक दो बार आ गए। काम पूरा हुआ, भेंट दी, माला पहनाई, चल दिए, ... यह साधना नहीं है। गुरु भी कहते हैं- तुम्हें कुछ करना नहीं तुम्हें तो गुरु के आसरे हो जाना है, सब गुरु कर देंगे। इससे गुरुडम ही फैलता है। किसी का भी विकास होता देखा नहीं। आज करोड़ों की संख्या गुरु हैं, चैले हैं, ब्रह्मनिष्ठ गुरु होंगे तो वे इस प्रपंच से बहुत दूर होंगे।

आध्यात्मिक साधना कोई सरल साधना नहीं है। न ही इसका कोई सरल उपाय है। गीता में कहा गया है, ... करोड़ों में कोई एक इधर आता है, कबीर जी ने भी कहा है- यह तलवार की धार पर चलने के समान है।
‘एक बात साफ है-
स्वामी जी कहते थे- आपका चित्त विकारों से भरा हुआ है, संग्रह इकट्ठा हो रहा है, तरक्की कैसे होगी?
”किताबें कहती हैं कि यह काम तो गुरु का है, गुरु ही क्या, उनके द्धारा नामित शिक्षक ही यह काम कर देते हैं।“किसी ने कहा था।
स्वामी जी मन की भाषा पढ़ रहे थे। बोल,े ”करना आपको ही होगा मुझे नहीं, यहां सब यह सोचकर आते हैं, जैसे मेरा यह काम है क्या मैंने सन्यास इसलिए लिया, चालीस साल से अधिक समय इस जंगल में रहते हुए हो गया, क्या इसलिए? यह सेवा नहीं स्वार्थ है।“
विचार ही विकार हैं, आप खुद अपने विचारों पर सतर्कता रखो। कर्म के साथ जुड़ो मन को वहीं रखो। नया संग्रह नहीं बनेगाा पुराना अपने आप कम होने लगेगा। करना आपको ही है। आप इसीलिए यहां आए हैं। कोई किसी के विकारों को अपने ऊपर नहीं लेता। उन्हें क्या जरूरत है? क्या ब्रह्मनिष्ठ गुरु स्वार्थी है?, लोभी है? जो उनके पास गए उनकेे मल दूर कर दिए, जो नहीं गए उनके नहीं किए? उन्हें क्या इसकी जरूरत है।
वे तो मात्र, ‘जीवनमुक्त होकर भी प्रकृति के कार्य में सहयोग करते हैं। ... मार्गदर्शन करते हैं। उनका सत्संग, ... स्वाभाविक रूप से आनंददायी होना है। उसमें एक खिंचाव होना है। जो भीतर की गंदगी को कम कर देता है। उनके सानिध्य में मन शांत हो जाता है। प्रश्नों के उत्तर अनायास प्राप्त हो जाते हैं। वहां अमृतवर्षा होती है। वहां मात्र प्रेम है।
जहां स्वाभाविक प्रेम है, वहीं ब्रह्मनिष्ठ गुरु है। उनका सत्संग ही बहुमूल्य है।
स्वामी जी ने अपने प्रवचन में एक बार कहा था-
‘आप लोग कुछ नहीं कर सकते हों, तो कम से कम जो बातें कहीं गई है उन पर चिंतन करो, जो साहित्य प्रकाशित हुआ है, उसे पढं़े, इस प्रकार आपका और मेरा संबंध जुड़ा रहेगा। आपके मन से मेरी शक्ति जुड़ करके आपका मार्गदर्शन करती रहेगी।’
... वे कहा करते थे, हरेक का यहां आना कठिन है, तकलीफ भी होती है। ... पर हम इतना ता कर सकते हैैंं। मन से संबंध जोड़ सकते हैं। यही साधन है। मार्गदर्शन स्वतः प्राप्त होता रहता है।
... पर स्वामी जी जिनका भोजन इतना अल्प था कि कल्पना करना ही कठिन था। पहले  सुबह बस एक बार भोजन  था,वह भी एक चपाती, दाल, सब्जी, बाद में बंबई्र से आने के बाद शाम को भी भोजन लेना शुरू किया था, ... वह भी इतना ही अल्प था।
कहा करते थे- अभ्यासी को सबसे अधिक ध्यान अपने मन पर रखना होता है। मन का अन्न का गहरा संबंध है। अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से ही मन की निर्मिति होती है। आवश्यक है अन्न का संबंध ईमानदारी के पैसे से हो, जो बनाने वाला हो, उसका मन शुद्ध हो, तथा अन्न ग्रहण के समय हमारे विचार शांत हों। उत्तेजना में कभी भी अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
जब हम दूसरे का अन्न ग्रहण करते हैं तो उसका दासत्व तुरन्त आ जाता है। जहां तक हो सके, इससे बचा जावे। उसे चुकाने का संस्कार अपने आप बन जाता है। आधी से अधिक बीमारियों का यही कारण है। अन्न का दोष ही आज सर पर चढ़कर बोलता है। बीमारी शरीर में बाद में आती है। पहले मन में आती है। मन के विकार ही शरीर पर प्रकट होते हैं। पहला सूत्र यही है, जिस अन्न से हमारा पोषण होता है, उसके प्रति गहरी सावधानी रखी जाए।

ब्याज का पैसा और रिश्वत का, दोनों पैसे भी मय ब्याज के चुकाए जाते हैं, यह एक बुनियादी सिद्धान्त है। प्रायः सत्संगों से भी अब सेठों सेे भी मदद ली जाती है। वे दान क्यों करते हैं? उन्हें लाभ हो? स्वामी जी ने एक बालक की कहानी सुनाई थी, जो जन्म के बाद मिट्टी की मूर्ति बनाता था तथा उसका सिर चाकू से काट देता था, उसके माता-पिता जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, देखकर सकपका गए। उन्होंने विचार किया, फिर वह ब्राह्मण उस सेठ के पास गया जिसेे उसने श्रावण माह में घर पर अभिषेक करवाया था तथा दान दिया था।
उसने पूछा था, ... वह अभिषेक आपने क्यों करवाया था?

तब उसने बताया था कि मेरा एक कसाई के पास काफी रूपया उलझ गया था, ... मैंने मन्नत मांगी थी, रूपया मिल जाएगा तो अभिषेक करूंगा।’’
तब वह ब्राह्मण घर लौटा तथा दान में मिली राशि सारी सौंप आया। ... अन्न से संस्कार, हमारी पीढ़ी तक में पहुंच जाते हैं। गलत ढंग से पैसा कमाने वालों केे बच्चे जो निकम्मे हो जाते हैं, उसके पीछे यह भावना ही महत्वपूर्ण है। संस्कार बच्चों में, माता-पिता के संस्कारों से ही बनते हैं। इसमें उनके गुण-दोष तो होते ही हैं, वे स्वयं भी जिम्मेदार होते हैं। आज दुनिया में ये बातें अब बेवकूफी की मानी जाती है। सबके पास अपने-अपने तर्क हैं, पर वे दुखी है, व्यथित हैं, कारण भी उनके ही पास है। अभ्यार्थियों को चाहिए कि वे ब्याज, रिश्वत, तथा सूदखोरी से जहां तक हो सके, बचंे।

हम जब दूसरों से सेवा लेते हैं, तो बदले में हमें चुकाना चाहिए। यह पहला नियम है। स्वामी जी जब आते थे- तब वे किसी भी साधक की रत्तीभर भी सेवा नहीं चाहते थे। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था। वे कहा करते थे, जो सरकारी सेवक हैं, उसे सरकार धन देती है, आपको नहीं, उसके प्रति व्यवहार श्रेष्ठ हो, अगर खाना बनाना है, तो वह खाना वह भी खाएगा, याद रखो। प्रकृति में लेन-देन स्वाभाविक क्रिया है। हमें चुकाना पड़ेगा। जहां तक हो सके, सेवा करो, पर लेने की चेष्टा मत करना। दुनिया बचा करती है, हम  हमें इससे मतलब नहीं,है। यही तितिक्षा है, ... बर्दाश्त करो। लहरें आएंगी, थपेड़े देंगी, हमें बहना नहीं है। प्रकृति का खेल, एक मनोरंजन है। सब एक से नहीं हो सकते। जो आज राजा है, कल रंक बन सकता है, ... सब संभव है, हमें अपने आपको देखना है, दूसरों को नहीं।

अभ्यार्थियों के लिए

स्वामी जी से बहुत पूछा था, वे साधना शब्द का भी प्रयोग नहीं करते थे। ... सहज, स्वाभाविक अवस्था में रहना कहते थे। कहा करते थे- भाषा के चक्कर में मत फंसों, ... उनका अन्तर्मुखी वह था, जिसका इन्द्रियों और मन का संबंध टूट सा गया है, ... जिसका बाहर का भटकाव छूट गया है। वे कहा करते थे- ‘इन्दियां मन में सिमट जाती है, विषय रहेंगे, पर इन्द्रियां उसकी ओर उन्मुख नहीं हो पाती है। यह अवस्था निरन्तर वर्तमान में रहने से प्राप्त होती है।

तो जो इस मार्ग पर आना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक हैं, वे आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचंे। लगन और अभ्यास बनाए रखंे। अपने परिवार के साथ ही नहीं सबके प्रति प्रेम रखें। हम अभ्यास करते हैं। इसका प्रदर्शन भी नहीं होना चाहिए। एक बार एक परिचित आए हुए थे, वे सत्संगी थे, उनका सत्संग कहीं दूर होना था, वे वहां जाना चाह रहे थे, किसी को तलाश कर रहे थे कि वह वहां उन्हें छोड़ आए।
स्वामी जी ने उनका उतावलापन देखा। बोले कुछ नहीं।
उनके जाने के बाद, बोले वहां भी उनका मन नहीं लगेगा, वहां से यहां आने के लिए किसी को तलाश कर रहे होंगे।
इस सत्संगों का यही दोष है। यहां भी अवधारणा हावी हो जाती है। बार-बार सोचने से गुलामी आती है। हम चाहते हैं, मुक्ति, यह तो बंधन अधिक है। आपको शांत होना है, आपको वर्तमान में रहना है, आपको विचारों के प्रवाह को कम करना है, करना आपको ही है। आपकी लगन, आपकी भावना, आपका संकल्प महत्वपूर्ण है। गए तो ठीक, नहीं गए तो ठीक, यह वैचारिक दासता, शारीरिक दासता से भी अधिक गंभीर है।
स्वामी जी स्वयं खूब पढ़ते थे। पढ़ने को कहते भी थे। योग वशिष्ठ और गीता, पढ़ने को कहते थे, तथा ‘निसर्गदत्त महाराज, रामकृष्ण परमहंस, जे. कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि, ओशो, सभी चिन्तक मनीषियों के ग्रन्थ स्वयं पढ़ते थे, तथा दूसरों से चर्चा करवाकर सुनते थे। बाइबिल व कुरान व सूफी ग्रन्थों का भी अध्ययन था। कहते थे- बचपन में मैं दस से पंद्रह घंटे पढ़ता था। वे कभी भी किसी से ‘अपनी बात मानो’ यह आग्रह नहीं रखते थे। कहते थे- विचार एक निरंतर बदलने वाली प्रक्रिया है, जो आज विचार है, कल नहीं रहेंगे। हम स्वयं चिंतन करें, कठमुल्ला नहीं बने, जो उचित लगे, उस पर चलंे, लाभ मिलता हो आगे बढं़े, नहीं मिलता हो छोड़ दें। हमेशा खुद नहीं बोलते थे, दूसरे से पूछने के लिए प्रेरित करते थे। एक संवाद था। जहां दूसरा भी उनके पास बैठकर संवादी बनता था।
उनके पांवों में बाद में दर्द रहने लग गया था। वे जब भंडारी मिल में स्टोरकीपर का कार्य कर रहे थे। तब स्वामी राम के शिष्यों के साथ अमरनाथ की यात्रा पर गए थे। साधारण कपड़े पहने थे तथा जूते भी कपड़े के थे। लौटते समय, दोनों पांव सुन्न हो गए थे। कहा करते थे- संकल्प किया था, जब बीमार पडूंगा तब चैतन्य चरितावलि पढूंगा। तब स्वामीराम के कहने पर इन्दौर होईकोर्ट के चीफ जस्टिस जाम्मेकर अपने साथ उन्हें अपने घर ले गए थे। वे उन्हीं के घर पर रहते थे। तब यह घटना घटी थी। डॉक्टर मुखर्जी इन्दौर के चिकित्सक थे, उन्होंने लकवा बताया था। पर बाद में जिस दिन चैतन्य चरितावलि का अध्ययन पूरा हुआ उनके पांव ठीक हो चुके थे।
परन्तु वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर पांवों में दर्द आ गया था, चलने फिरने में तकलीफ थी। पर किसी को पांवतक नहीं दबाने देते थे। अपना काम खुद करते थे। न तो माला पहनाने देते थे। न पांव में रोली लगाने। उनके जाने के बाद तो देखा, गुरुकुल में ही जो साधु अतिथि होकर आए वे बिसलरी की बोतल मंगवाकर अपने पांव महिलाओं से धुलवा रहे थे। आश्रम के लोगों को बताया, यह कौन सी गुरु पूजा शुरू करवा रहे हो? स्वामी जी तो गुरुपूजा के सख्त खिलाफ थे।
वे एक ही बात कहते थे- मुझे बचपन में इंजीनीयर साहब मिले थे, वे ही उनके गुरु थे। जिन्होंने उनके बचपन में उनके भीतर इस ज्ञान निष्ठा का बीज बोया था। उन्होंने उनसे कहा था- संसार में भोजन और कपड़ा, रोटी मूल आवश्यकताएं हैं, इनको अपने ऊपर हावी मत होने देना। स्वामी जी की पूरी संपत्ति मात्र एक थैला रही। आधी धोती व कुरता तथा शैविंग का सामान। बस चार नंबर का छोटा सा कपड़े का जूता, दो चश्मे। भोजन में मात्र एक चपाती, थोड़ा चावल, दाल बस। नहीं मिला तो वह भी सही। महापुरुष संसार में अपने आचरण से ही धर्म, की स्थापना करते हैं। धर्म, माने कर्म जिस आधार पर हमें करने हैं जो कर्म हमें हमारे विकास की ओर ले जाएं। हमें शांति की प्राप्ति हो।
शास्त्र अपरिग्रह की चर्चा करता है। पर स्वामी जी तो स्वयं अपरिग्रह का उदाहरण रहे।
शास्त्र कहता है-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणां कुरूते लोकस्तवदनुवर्तते। 3 । 2। ।
श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, अन्य पुरुष (भी) उस उसके ही अनुसार वर्ततते हैं, वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसके अनुसार बर्तते हैं।

श्रेष्ठ अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी के लिए यहां कहा गया है। तिलक महाराज ने इस श्लोक की व्याख्या में कहा है- ‘जब तुम्हें संदेह हो कि यहां संसार मैं किसी प्रसंग पर कैसे बर्ताव करे, तब वैसे ही बर्ताव करो कि जैसा ज्ञानी, मुक्त और धार्मिक ब्राह्मण करते हो।’ आगे उन्होंने इसी प्रसंग में- रामदास स्वामी की उक्ति की कही है-
‘‘देख भलों की चाल को, बर्तेंसब संसार।’’
यहां भगवान अपना उदाहरण देकर स्पष्ट कर रहे हैं कि - आत्मज्ञानी पुरुष के लोककल्याण के कर्म उससे छूट नहीं जाते। इसी बात को स्वामी जी कहा करते थे। स्थितिप्रज्ञ होकर संसार से पलायन नहीं करना है। परन्तु प्रकृति ने जो कार्य सौंपा है, उसे करते हुए उसके कार्य में सहयोग करते रहना है।
उनके आचरण में यही ध्वनित था, ... जो उचित था, वह उनके द्वारा सदैव होता रहा, ... भले ही उसमें यह कितनी ही कठिनाई झेलनी पड़ी हो। करुणा उनका सहज स्वभाव रहा। परन्तु बाद में लगता था, ... उनकी करुणा, ... अहेतुकी होते हुए भी किसी अदृश्य विधान से संचालित थी। अट्ठाईस साल का गहरा संपर्क रहा। एक एक बात न जाने क्यों बताते थे। तब समझ में नहीं आता था पत्र लिखा करते थे। हर बात की सूचना देते थे। स्वप्न विजन तक बताते थे। पता नहीं क्यों तब इतनी न तो लगन थी, न हीं ज्ञान था, पर हां इन बातों को संग्रह करत रहें, यह ध्यान रहता था।
... कई बार पूछते थे- ”मुझमें कोई कमी नजर आती है तो बताओ।“ हम सुनकर चुप रह जाते थे। कमियां तो हममे हजारों है, ... हम कहां ढूंढे? पर उधर कोई मिलने आया, ... वे हमें बात करते देखते। उनके जाने के बाद, धीरे से पूछते- ”इतनी बात करने की क्या जरूरत थी। जो आश्वासन पूरे नहीं हो सकतेहैं, वे क्यों दिए,“ ... बारीक से बारीक दोष वे अनायास रेखांकित कर जाते थे। एक पिता की तरह उनका अनुशासन रहा। सब के प्रति, परन्तु क्रोध का अंश लेशमात्र भी नहीं। अकेले में जब होते, तो पास बुलाकर, समझाते। हां, उन्हीं  घरों में ठहरते थे, जहां प्रेम था। कहते थे, जहां परिवार में विग्रह है वहां क्या जाना? लेते शायद छटांग भी नहीं थे, पर जब वहां से जाते, उस घर में मन भर दे आते। उनकी सारी तकलीफों को दूर कर आते।
कहा करते थे- ”अगर परमात्मा भी धरती पर आए तो लोग उसमें भी कमी निकालेंगे, ... यह तो मनुष्य का स्वभाव है, ... परन्तु वे स्वयं आगे-बढ़कर  अपनी कमी पूछते थे। कभी यह नहीं कहते थे कि, ”मेरी बात मानो, यही सच है,“ मैंने यह जाना है, यह पाया है, इन शब्दों में कम से कम शब्दों में अपने आपको व्यक्त कर देते थे।


         गीता सार

मामका पाण्डवा श्चैव
मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, ... गीता का प्रारंभ धृतराष्ट्र के इस प्रश्न से होता है, ... मेरे और पाण्डु के, ... जबकि पाण्डवों के मन में यह विभाजन नहीं था, वे धृतराष्ट्र को ही अपना पूर्वज मानकर, आज्ञा मानते रहे थे। पर यह द्वेष- धृतराष्ट्र के मन में था; यही विभाजन ही संहार का मुख्य बना
... यही अप्रेम, कलह तथा स्वयं के व्यक्तित्व विभाजन का कारण बनता है।

लोभोपहत चेतसः
लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते-
... जो मिल गया वह कम है, ... और और मिल जाए इसका ही नाम लोभ है, ... इस लोभ से ही विवेक शक्ति लुप्त हो जाती है।
... मनुष्य संयोग का जितना सुख लेता है, वियोग का भी उतना ही दुख उसे भोगना पड़ता है।
पहले वस्तुओं का अभाव जो होता है, वह इतना दुखदायी नहीं होता जितना वस्तुओं का संयोग होकर, वियोग होता है, वह होता है, ... वस्तुओं का संयोग भी प्रारब्धानुसार होता है, स्थाई नहीं है, वियोग तो होना ही है, परन्तु लोभ उसे सातव्य प्रदान करता है। जो बीच में वस्तुओं से सुख प्रतीत होता है, वह लोभ के कारण से ही है। ‘मोह’ भी बन्धन जरूर है। मोह के कारण ही संबंधियों से सुख प्रतीत होता है।
... वैर, ... वैरभाव अत्यंत ही दुखदायी है। भोगकर तो दुख से पार हुआ जाता है पर वैर की अग्नि तो जन्म-जन्मान्तर तक साथ जाती है।
... मनुष्य की दृष्टि जब तक दूसरों के दोष दर्शन में रहती है, तब तक उसे अपना दोष दिखाई ही नहीं पड़ता है, ... दूसरों का दोष देखना भी, ... बड़ा दोष होता है, इससे अपने भीतर ‘अहंकार’ पैदा होता है।

पाप-पुण्य

दान-सेवा और बहुमूल्य शब्दों पर चर्चा हो रही थी।

स्वामी जी ने कहा- स्मृति पाप है, प्रश्न यहां पैदा हो गया था। वह पाप क्यों है?
- दो ही बातें होंगी, या तो तुम अपने में रहना चाहोगे, ... या बाहर भटकते रहोगे। तुमने दान किया, तुम्हारे भीतर अहंकार जगा, ... तुमने सेवा में समय दिया, ... अहंकार जगा, ... तुम फिर भीतर से बाहर चले गए। बाहर की अनंतयात्रा है, ... घूमते रहो, ... मात्र बौद्धिक जिज्ञासाएं हैं, ... समाधान नहीं है। यह जो बाहर भटकाता है, ... यही पाप है। स्मृति एक पल भी वर्तमान में नहीं रहने देती। हर क्षण बाहर ले जाती है। इस कल से उस कल में दौड़ाती रहती है। सारा दोष संग्रह यहीं रहता है। अभिमान भी यीं ठहरता है। जो तुम्हारे ‘स्व’ से, तुम्हारे अपने ‘होने से’, तुम्हारे ‘आत्म’ से तुम्हे दूर ले जाए वही ‘पाप’ है।
‘पुण्य है, जो तुम्हें तुम्हारी निजता के पास लाए, तुम्हें तुम्हारे ‘स्व’ के पास लाए, तुम्हें तुम्हारा ‘आत्म’ अहसास कराए। वहां वर्तमान है। वहा मात्र होता है। इसीलिए कहा था- स्मृति पाप है। राग-द्वेष का संग्रह वहीं रहता है। मन का मुकाम वहीं है। वहां वह ठहरना अधिक चाहता है। एक क्षण भी हम अपनी स्मृतियों से बाहर नहीं आना चाहते हैं। बुढ़ापा क्या है। ‘स्मृतियों के टापू’ में निवास करना है। ‘बटुक’ का मतलब होता है, जो मात्र वर्तमान है। नित नूतन, नया, ... वही साधक का मन होना चाहिए। बूढ़ा मन तो बस अतीत का  वजन ढोता रहता है।

दृश्य का चिन्तन ही पाप है
यह सच है, लहरें, सागर और हवा के संयोग से बनती है। जान था, शब्द ही ब्रह्म है। ‘बेखरी’ वाक की पहली अवस्था है, वहां मौन रहा जा सकता है, उसकी भी कीमत है, पर भीतर कंठ के पास आकर, विचारणा का स्रोत बहता रहता है, एक पल भी विराम नहीं आता है।
जाना, ध्यान किसी विषय या वस्तु या रूप पर एकाग्रता नहीं है, यह तो मात्र निर्विषय हो जाना होता है। पर क्या यह संभव है? अनुभव बताता है, ... एक संवेग बाहर से आता है, ... वह खींचकर ले जाता है, जब बाहर से नहीं आता है, तब भीतर का अनार सुलग उठता है, लहरें ही लहरें धक्का मारती है। बहाकर ले जाती है।
यही तो चित्त है, ... यह लहरों का आलय है, भीतर से मानो कोई धक्का दे रहा है।
कहा गया है, ... यहां का साधन, बर्फ हो जाना है, कोई तरंग ही नहीं उठे। जहां सरोवर है, जल है, वहां वायु आकर लहरें उठा देगी। परन्तु बर्फ में तरंगे नहीं आतीं।
और बाहर के वेग को सहन करने के लिए, भीतर चट्टान हो जाना है, लहरें आएँ, और टकरा-टकराकर लौट जावंे।
पर जाना, यह सिद्धान्त के रूप में, विधि के रूप में तो सही है, पर प्रयोग के स्तर पर, कठिन है।
हां, जहां भी हो,ं वहीं पर जो विचार उठ रहा है, मात्र देखंे, अवलोकन शुद्ध हो, हम बहंे नहीं, मात्र देखे,ं तो यह वेग कम होने लगता है। भीतर दोषदर्शन का संग्रह है।
यह वैर है, इसकी आग शांत नहीं होती है।
मात्र देखते रहो, देखते रहो, इसके साथ बहो मत, ... यह ठंडी होने लगती है।

क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...
गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,...

कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।
आज चाहे, ममता हो, परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ सब पलायन ही है।
यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,...
कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं।
गीता, यहां ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।
‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करे, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धि की स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।

कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः

मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।
... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करता है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो पर जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है।
आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,... परन्तु अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है।
... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है।
यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है।
... यह कहने से पूर्व की घटना है-
अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-
सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।
हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-
परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-
मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-
... गीता की यह भूमिका है...
यह संवाद चिंतन है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, यह निर्णय वह बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।
गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठा है।

अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता अपना कथन प्रारंभ करते हैं-
प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं; परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।
... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता...
पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।
संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।
- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती है, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है। गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा
आग मा पायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।
इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम्हें इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।
मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।
शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।
आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।
मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-
पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही साधन प्रणाली थी।
यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र  ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।
पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही  की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच  का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।
... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।
... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया ही पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।
... जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।
यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।
भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष; मूढ़ता हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में हैं यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।
पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।
इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।
... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन निर्विकारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर  आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है, अनित्य है आ गया पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो; विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस बनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।
भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।जीवन का उद्देश्य
क्योंकि जब मुझे सफलता मिल गई। तब ओरों को क्यों नहीं मिल सकती ? मेरे अपने जीवन का प्रारम्भ ही बड़ी कठिनाई से बीता था। मुझे परिवार से किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिली। किसी सुविधा के यहां तक आया तब जिन्हें सुविधाएं प्राप्त है, वे तो थोड़ी सी लगन से अवश्य ही पहुंच सकते हैं।
जीवन का उद्देश्य, बाहर तलाश करने पर मनुष्य को नहीं मिलेगा। जब तक हम अंतर्मुखी नहीं होंगे । हमें नहीं मिलेगा नदी बह रही है, बाहर बहती जा रही है, कहां किसे पकड़ोगे, अन्तर्मुखी होने के बाद ही जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।
चौबीस घंटे मनुष्य इतनी अनर्गल बातें करता है, इतना व्यवहार करता है। बस यही मानकर चलता है कि यही करना उन्नत्ति है, यदि मानसिक शांति प्राप्त नहीं हुई है तो उन्नति नहीं हुई। जब तक शांति मिली नहीं तब तक पता ही नहीं चलेगा।
शुरू से जप जाप, पाठ आडम्बर भर दिये हैं, ये बहिर्मुखी क्रियायें हैं, इनसे कोई सफलता नहीं मिलेगी। रूढ़ियां हैं, करते जाओ...करते जाओ ये ही उपलब्धि हो गई है।
परन्तु जीवन का मुख्य उद्देश्य शांति है और निरन्तर शान्ति में रहने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, इसी मे जाना है।
जीना तो वैसे ही है, परन्तु सुख दुःख भोगते हुए शांति से जीना ही साध्य होना चाहिए।
एक बहुत बड़े पेड़ की छाया में पशु-पक्षी छाया पाकर शांति पा सकते है। इसी प्रकार इस व्यक्ति के सम्पर्क में आकर अन्य को भी शांति मिलती है। प्रकृति स्वयं इन्तजाम करती है।
जब तक शांति नहीं हैं, तब तक अपना विश्वास ही नहीं होता। बाहर शांति है ही नहीं, वहां संसार निरन्तर परिवर्तनशील है। बाहर से तो यही संबंध रखना है कि वर्तमान में रहो, अन्दर से जो प्रेरणा आये, वही करों।
विवेक जागृत होने के बाद, सही कार्य स्वतः चलता रहेगा।
कर्त्तव्य पालन होता रहेगा।
इससे अधिक कुछ भी नहीं है।
प्रश्न क्या हम असामाजिक नहीं होंगे ?
उत्तर नहीं, समाज को अधिक लाभ होगा। हमारी शक्ति होगी तो समाज को लाभ ही होगा। असामाजिक वह है, जिससे दुनिया को हानि पहुंचेगी।
यहा दुनियां के प्रति हमारा संबंध तटस्थता का रहेगा, जो जितना निकट आता जावेगा, वह लाभ लेता जावेगा।
छाया के स्वतः जाने की जरूरत नहीं होगी। जो छाया में आता जायेगा, वह लाभ लेता जायेगा।
प्रश्न आप आत्मा, परमात्मा, इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं ?
उत्तर शब्दों को भी किसी ने दिया है, शब्दों की चर्चा छोड़ो ? इससे क्या होगा। क्या लाभ होंगे।
जो शक्ति है, जो गति है, नाद है, लहरे हैं, उसी से सब होता है, उसी से हम जुड़े हुए है।
जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है।
उन्होंने उसे समझाने के लिए भाषा में अलग अलग शब्दों का चयन किया जो शक्तियांे को समझ नहीं पाये उन्होंने देवी देवताओं तथा धर्म गुरूओं का सहारा लिया। देवी देवताओं के प्रचार से पूर्व प्रणव का जप होता था। ओम क्या है, यह जो नाद है, उसके प्रतीक का स्वरूप वही चिन्ह बन गया, उसका ही जप प्रारम्भ हो गया।फिर देवी देवता आये तो उनकी पूजा शुरू हो गई। उन्होंने माना कि इससे कुछ लाभ होता है....लोग भी यही चाहते है, यह सब चलता रहा। शक्ति का कुछ नाम नहीं है, वहां मात्र उर्जा हैं। उन्होंने इस ध्वनि के आधार पर उसका नाम ओम दे दिया यह भी तो कल्पना ही रही।
यही प्रणव साधना है।
प्रश्न फिर जीव क्या है ?
उत्तर विकार सहित मन ही है। यह सुख दुःख भोगने के लिये ही है। यह भी व्याख्या ग्रन्थों के लिये ही है।
प्रश्न फिर आप क्या नाम देंगे ?
उत्तर यहां नाम की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य शरीर ही पर्याप्त है। अन्दर रहने से बाहर भीतर की सभी क्रियाओं का निरन्तर ज्ञान होता है, सीमित शक्ति है। इसका अहसास होता है। यदि कुछ होना है तो अन्दर से प्रेरणा आती है। यदि किसी शरीर के द्वारा प्रकृति को कार्य करवाना है, तो वह करवा लेती है।
प्रश्न फिर विकारों से मुक्ति नहीं होगी ?
उत्तर मृत्यु के समय ही मुक्ति हो पायेगी। वह तो निरन्तर है जैसे सांस की क्रिया है। सांस रूक गई तब मनुष्य शरीर छूट जाएगा। लहरों से ही विकार उत्पन्न होते है।
लहरें भी आएगी और विकार भी उत्पन्न होगें। लेकिन वर्तमान में रहने से इन्हें सहन करने की शक्ति रहेगी। यह किसी अन्य साधन से प्राप्त नहीं होगा। ‘तान तितिशस्व भारतः’ यहीं गीता में कहा गया है। तितिक्षा याने सहन करने की शक्ति यह तुम्हारे अन्दर उत्पन्न होनी चाहिये। यह केवल वर्तमान में रहने से ही उत्पन्न होती है।
प्रश्न मन तो जो विचार आ रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य किसी जगह लगाने से भी रूक जाते हैं, क्या इसमें लाभ नहीं होगा ?
उत्तर यह तो बहिर्मुखी क्रिया है। बहते जाओगे प्रवाह में। जो क्षण है, उससे दूर हटते जाओगे। जहां करने का सवाल आया हम दूर हट गये। जो कुछ हम कर रहे है, माया में ही तो कर रहे है। बाहर का सहारा रहा तो हम अपने मूल स्थान से हट जाऐगे। वर्तमान में रहने में न तो कोई क्रिया है, न ही स्थान से हटने का कोई कारण है।
वह जो महान शक्ति है....वहां गति है....तेज गति....लहरे ही लहरें यहां लहरें आयेगी......अन्तर्मन से टकरायेगी।
वही संस्कार है।
विकार तो उत्पन्न होंगे।
लेकिन सहनशीलता होने के कारण विकारों की भी अनुभूति होती है। लहरों की भी होती है। मालूम होता है कि किसी ने आकर धक्का दिया, हम तो अपने स्थान से नहीं हटे।
प्रश्न हमें हमारा तो अनुभव होता है, विकार ही विकार है आपको देखकर लगता है कि आप वास्तव में मुक्त है ?
उत्तर मुझे क्या होता है, यह आप कैसे जान सकते हैं ? जो आप अनुभव कर रहे है, वो आपके शरीर में भी है, जब तक मेरा शरीर है, मेरे भी रहेगा।
जैसे शरीर है तो इसमें हड्डियां भी है, मांस भी है, खून भी है। यह नहीं रहेगा तो क्या शरीर जीवित रहेगा, इसी के साथ मन भी है, विकार भी है। सब कुछ है, लहरें जो टकरायी है, उन्हीं  को उत्तेजित करने के लिये ही है। यह मात्र कल्पना ही है कि उच्च कोटि के व्यक्ति के भीतर यह नहीं होगा। उसको भी लहरें टकरायेगी उसे अनुभूति होगी।
मात्र सहनशीलता ही वर्तमान में रहने से मात्र हो सकती है।
प्रश्न आपने एक बार कहा था, यह उसी प्रकार से है, बीज पड़े रहे, और अंकुरित नहीं हो पाए ?
उत्तर अंकुरित नहीं होना माने विचलित नहीं होना। विकार कोई वस्तु नहीं है। न ही कोई परिभाषा हो सकती है।
परन्तु लहरें टकराती है, एकदम क्रोध आता है। काम उठता है। यह कोई वस्तु है क्या बीज है क्या ?
बीज तो कोई वस्तु होती है, यहां तो ये मात्र लहरें है। इस प्रकार से विकार उत्पन्न होकर शरीर से काम करवाते है।
बीज का उदाहरण इसलिये दिया था, समझाने के लिए न तो बीज होता है न ही वह सड़ता है।
प्रकृति का कार्य है, लहरे उठाना शरीर का कार्य होता है विकारों में प्रभावित होकर क्रिया करना...जैसे कठपुतलियों को नचाते है, लहरें नचा रही है।
मनुष्य मात्र एक ही है, न तो वह साधारण है न वह असाधारण है। प्रयास करने पर वह अन्तर्मुखी हो सकता है।
प्रश्न विकार की देह मंे उपस्थिति कब तक रहेगी ?
उत्तर शरीर नष्ट होगा तब विकार समाप्त हो जावेंगे। सभी समाप्त होगा।
शरीर ही नहीं होगा तब विकार कहां होंगे ?
शरीर के साथ ही सब पैदा होता है उसी के साथ ही नष्ट होता है।
बचती तो मात्र शक्ति है।
वह शक्ति नए नए शरीर पैदा कर खेल खेला करती है।
प्रश्न जिसे आप संग्रह कहते है, वह इस शरीर में आता कहां से है ?
उत्तर संग्रह तो प्रकृति ने बना रखा है, पंच महाभूत उसने बना रखे है। वह तो अपनी गति के साथ नए-नए बनाती जाती है, मिटाती जाती है। यह जो पंचमहाभूत है, यही नाटक की सामग्री है। यह सब चीजें है जिससे मनुष्य बना है। यहां अच्छा बुरा कुछ नहीं होता.....। खाली जमीन पड़ी रहती है.....। वर्षा होते  ही  इतने पौधे-जीव जन्तु कहां से आ जाते हैं कहां चले जाते हैं.....। जब तक  मनुष्य सुख दुःख से जुड़ा हुआ है, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। कोई घटना होगी वह विचलित हो जाएगा। शान्ति वह है जो निरन्तर बनी रहे.....। मन मात्र गति है। जब तक बाहर की गति भीतर नहीं आती तब तक शांति का अनुभव नहीं होता। परन्तु अन्तर्मुखी होने के बाद ही उसका अहसास होगा।
बाहर के विषयों में रस आता है, इसलिये मन बाहर खिंचता रहता है।
वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास होना चाहिये। उसके लिए लगन आवश्यक है.....। 
प्रवचन सार
गुरुपूर्णिमा पर्व (1989)
आज गुरुपूर्णिमा का पर्व है। गुरु के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। वैसे मैं हमेशा से कहता आया हूं, न तो मैं किसी का गुरु हूं, न मैंने किसी को शिष्य बनाया है। परन्तु अनादिकाल से यह परम्परा चली आ रही है, यह कभी समाप्त नहीं होगी। यह चलती ही रहेगी।
- कहा है- गुरु, ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है। उसमें प्रकृति के ये तीनों गुण - उत्पत्ति, स्थिति व नाश ये तीनों गुण होते हैं। जिसमें यह क्षमता होती है। वह गुरु है। ऐसा गुरु, ब्रह्मनिष्ठ व श्रोत्रिय होता है।
ब्रह्मनिष्ठ का तात्पर्य है, जिसकी ब्रह्म में निष्ठा हो, सत्य में निष्ठा हो, जिसकी हर सांस सत्य की खोज में हो।
साथ ही वह श्रोत्रिय भी हो, श्रोत्रिय का अर्थ है, वह अपने विचार, जो साधना उसने की है, वह उसे दूसरों को भी बता सके, आत्मोन्नति के मार्ग पर दूसरों को भी ला सके।
आज वेश धारण करने वाले गुरु हैं। वेश धारण करने से, बहुत अधिक धन इकट्ठा करने से कोई गुरु नहीं हो जाता। गुरु में वास्तविक योग्यता होनी चाहिए। ‘महाभारत’ में गुरुओं के अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। आप लोगों ने टी.वी. पर महाभारत सीरियल देखा होगा, जहां गुरु दूर बैठे अपने शिष्यों के सारे हाल जानते हुए दिखाए गए हैं। प्राचीनकाल में हमारे गुरु इतने योग्य थे। आज उनकी बड़ी-बड़ी बातें हम सुनते हैं। प्रश्न उठता है- क्या वास्तव में आज ऐसे गुरु मौजूद हैं?
वास्तविक गुरु बनने के लिए क्या करना पड़ता है, मैंने अपने साठ से अधिक जीवन के वर्ष इसी बात को जानने में ईमानदारी से लगा दिए। सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए लगाए।
प्राचीनकाल से अनेक साधना पद्दतियां प्रचलित हैं। हमारे ग्रन्थों में लिखी है। भक्ति भी उनमें एक है। भक्ति नवधा प्रकार की बताई गई है। भक्ति से हम परमात्मा को प्रसन्न करते हैं। परन्तु जब भक्त भगवान की भक्ति में लगता है, तब भी द्वैत भाव रहता है। भक्त अलग है, भगवान अलग है। यह सब भी माया में घटता है। माया में जो कुछ भी नजर आता है। सब परिवर्तनशील है। यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। गुरु हो या हमारे माने हुए भगवान हो, वे भी अस्थायी है। परिवर्तनशील है। नाशवान चीज कभी सत्य को प्रकट नहीं कर सकती। सत्य ही सत्य को प्रकट करेगा। जितनी भी बाहरी चीजें हैं, जिनको हम इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं। सब नाशवान है। उनमें सत्यता नहीं होती।
सत्यता को आपको जानना है तो जितनी प्रकार की ये साधना पद्दतियां हैं, जिनमें ये नवधा भक्ति, योगाभ्यास वेदांत दर्शन उनसे भी परे जाकर देखना होगा। परन्तु इस प्रकार के गुरु आज नहीं है।
एक उदाहरण है-
राजा जनक को विदेही कहा जाता है। उनकी गीता में चर्चा है। एक दोपहर वे भोजन करके पलंग पर लेटे थे। उन्हें सपना आया कि सपने में वे कंगाल हैं। सात दिन से भूखे है। दाने-दाने को मोहताज हैं। एक जगह पंगत लगी हुई थीं, वहां गए, वहां से भी लोगों ने भगा दिया। फिर जहां झूठी पत्तलों का ढेर था, वहां गए कुछ मिल जाए, तभी एक सांड आया, उसने उठाकर दूर फेंक दिया, उसकी धमक से नींद खुल गयी। देखा, वह तो राजा जनक है, पलंग पर सो रहे हैं। स्वप्न में वे यह भी भूल गए थे कि वे ‘राजा’ हैं। दरबार में गए, सवाल पूछा- वह सत्य था या यह सत्य है? दरबारी चुप रह गए। तभी अष्टावक्र वहां पहुंचे। उन्होंने कहा- ‘राजा न तो वह सच था न यह सच है।’
आप जानते हैं, यहां आप बैठे हैं, भोजन के बाद आप निद्रा में चले जाएं तो यह दुनिया न जाने कहां चली जाएगी। वर्तमान की दुनिया का लोप वहां स्वप्न में हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यही है, गुरु वही होता है, जो वास्तविकता पर पहुंचा हुआ हो। जैसे ही सवाल पूछा गया हो, उत्तर तत्काल भीतर से आता है। जिसमें वास्तविक साधना की हो। सत्य को जाना हो। सांसारिक सुखों का त्याग किया हो। दूसरों के मार्गदर्शन की क्षमता हो, समर्पित किया हो। यहां तो कलियुग में गुरु ही गुरु हैं, कहीं सच्चे गुरु हों भी तो वे किसी कौने में पड़े होंगे, ...  परन्तु ऐसे आपको मिले तो वे ही आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं।
-मैं संक्षेप में दो बातें और कहना चाहूंगा।
आप दिन भर में जितनी भी बातें देखते हैं, इन्द्रियों के माध्यम से जो भी अनुभव करते हैं, उनका प्रभाव हमारे मन में संग्रहित होता जाता है। जो भी कार्य किया, कुछ देखा, इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी होता है, उसकी गूंज मन में बनी रहती है।
इन्द्रियों द्वारा भोगे गए विषय, संस्कार बनकर, नीचे उतरकर अंतर्मन में चले जाते हैं। जिस प्रकार बीज जो कोठे में साल दो साल पड़ा रहता है, पड़ा है तो पड़ा रहेगा, पर अनुकूल वातावरण मिलकर अनुकूल, मिट्टी, पानी, हवा पाकर अंकुरित हो जाता है।
इसी तरह हमारे द्वारा भोगे हुए जो विषय हैं, इनकी स्मृतियां है, संस्कार रूप में हमारे अंतर्मन में पहुंच जाती है। वहां वे सूखे बीच की तरह होती है। संसार घूम रहा है, तेज गति है। तेज गति से लहरे निरंतर उठती रहती है। जो नाभि स्थान पर आकर, जहां मन का मूल निवास होता है, वहां आकर टकराती है। वहीं हमारा अंतर्मन है, जहां हमारे द्वारा भोगे हुए विषयों के संसार हैं, वे लहरों से उफान खाकर ऊपर आते हैं। जागृत अवस्था में कई बार हम से ऐसा कुछ हो जाता है, जो संभव नहीं था, तब लोग कहते हैं, हम नहीं करते, पर प्रकृति करवा देती है। वास्तविकता यह है कि लहरें विकारों से टकराती है, जहां विषय भोग, बीज रूप में संग्रहित है, सूक्ष्म रूप में है। अंतर्मन अत्यधिक शक्तिशाली है, वह उन्हंे तीव्र गति से ऊपर फेंकता है।
-राजा जनक ने भी कभी ऐसा दृश्य देखा होगा।
उसका प्रभाव उनके भीतर अंकित रह गया। गहरी नींद में उनका नियंत्रण अपने ऊपर से उठ गया। वहां प्रकृति की लहरों ने उनके अंतर्मन पर ऐसी ठोकर मारी कि वही दृश्य सामने आ गया। वे स्वप्न में भिखारी बन गए।
हम दिन रात स्वप्न देखते हैं। हर रात न जाने किन परिस्थितियों में पहुंच गए थे।
इन्द्रियों के जो भोग निरंतर संस्कार बनकर अंतर्मन में जमा हो रहे हैं, इन्हें संस्कार न बनने दें, यही साधना है। बीच बनकर अंदर पहुंच जाएंगे, अंतर्मन में पहुंच जाएंगे, तो वे उगेंगे, तो वे अनुकूल वातावरण पाकर के उगेंगे। अब इस प्रकार, हमारे अनुभव के ही संस्कार बने, इन्हें कैसे रोका जाए, ...  इनसे कैसे छुटकारा पाया जाए, यही साधना है।
प्राचीनकाल से अनेक प्रकार की साधनाएं चली आ रही है। साधना के नाम पर देवी-देवताओं की पूजा, मंत्र पाठ, यज्ञ, जप बताया जाता रहा है। नाम जप का बहुत प्रचलन है। रास्ते पर लाने के लिए साधन बताया था कि बार-बाहर नाम रटने से मन एकाग्र हो जाता है। परन्तु जीभ से तो नाम रटते रहते हैं, पर मन कहीं ओर लगा रहता है। संसार में भटकता है, फिर लहरों के धक्के लगते हैं, सभी विकार सतह पर आते रहते हैं।
मैं गुरु न होते हुए भी, ... अगर आप मेरे प्रति गुरु का भाव रखते हैं। आप में श्रद्धा हैं तो मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि साधना के नाम पर कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
मैंने पहले भी कई बार कहा है, फिर दोहरा देता हूं।
मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू  जींज दव मििवतज पे तमुनपतमक
प्रयास किए जाते हैं, यह जानने के लिए कि किसी प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है। हम जो भी साधना करते हैं, किसी चीज को प्राप्त करने के लिए, एक समय बाद स्वयं पता लगता है कि वह तो किसी प्रकार की साधना नहीं थी, ... उससे कोई लाभ नहीं मिला।
सही बात मैं आपको बतलाऊं-
वर्तमान में रहने की जो पद्दति आपको समझाई है। पहले भी बहुत कहा है किताबों में भी आया है, ... आप इस पर प्रयोग करे। इससे जीवन के हर क्षण में आपको मार्गदर्शन मिलेगा। आपकी सहनशक्ति बढ़ेगी। आप मानसिक शक्ति बढ़ेगी। कठिन से कठिन समस्याएं भी आएंगी, जो अपने आप विलीन होती चली जाएंगी। वर्तमान में रहने का प्रयास करें।
जो भी कार्य कर रहे हैं, हमारा मन उसी के साथ रहे, क्षणभर भी न आगे, न पीछे रहे, ...
आप लोग यहां आए, इतना कष्ट उठाकर, इतनी दूर से आए हैं, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।


आपका मन

मन- हमेशा अतीत में या भविष्य में रहता है
वर्तमान में- मन विलीन हो जाता है
मन तो उर्जा है
उर्जा का विनाश नहीं होता
हां, कागज की दूसरी परत की तरह अंतर्मन होता है, जो विराट के नजदीक होने के कारण, अत्यधिक शक्तिशाली है
उसमें विलीन हो जाता है।वह महान उर्जा है।
वर्तमान में-मन नियंत्रित रहता है।वह अनावश्यक गति नहीं करता।परन्तु शक्तिशाली होता हैं


जीवन होता है,,जन्म और मृत्यु के बीच एक निरन्तर चलता हुआ खेल।
शरीर निरंतर बदलता है, कल में बच्चा था, युवा हुआआज वृद्धवस्था की पहली सीढ़ी पर पांव रखा हैबाल सफेद हो गए है,शरीर थका सा हैपर श्वास की गति वही है, ... एक क्षण भी विराम नहीं हुआ।
हां, जब क्रोध आया,श्वास तीव्र हो गई।
ध्यान में पाया श्वास मंद हो गया, ... धीमा,
पर श्वास-यथावत रहा
.. क्या प्राण श्वास ही है, ...
हॉ प्राण जीवनी शक्ति है, वह पोषण करती है, अंगों का संचालन प्राण उर्जा करती है।
स्वाजी ने- ‘उर्ध्वकुंभक प्राणायाम की चर्चा की है
मैं उसका अनुभव नहीं कर पाया, उनसे बहुत पूछा था पर वे चुप रह गए।
आनंद का और बुद्ध का उदाहरण देते रह,े आनंद तो उनका बड़ा भाई था, ... पर मैं तो नहीं, वे चुप रह जाते थे।
कहते थे, बुद्ध ने इसे अनापानसती कहा है। पर है, यह बहुत पुरानी विधि-
‘श्वास के साथ मन को ले आओ
मन एक साथ दो काम कर सकता है, अवधान मन को एक जगह लाना होता है, इसीलिए जो भी क्रिया हो वहां मन को अधिक से अधिक लाने का प्रयास करो, ध्यान रहे मन विपरीत अवस्था में न जा पाए, पर सजगता अवधान से अलग है, यहां हर क्रिया में सजगता रहती है। इसे ‘बोध कहो, होश कहो, तुम जहां भी हो, वहीं हो।
पर पहली सोच, ... श्वास के प्रति रखो.
‘आते हुए, जाते हुए, ... मन वहीं रहे, बोध रहे
हां, श्वास को बदलो मत, धीमी है, तेज है, हां तुम वहीं रहो,
क्रोध में हो, श्वास बदलंेगे, क्रोध हट जाएगा पर यह संघर्ष होगा।
हां,... श्वास पर सजगता रहेगी, ... विकार स्वतः बिखर जाएगा।
तनाव नहीं होगा।
‘श्वास एक ही है,
जितनी भीतर है, वही तो बाहर गई है,
हां सजगता रहे
वह आएगी, फैफड़ों से बाहर चली जाएगी
... पर धीरे-धीरे, सजगता उसके साथ, ... उसे नाभि तक ले जाएगी।
नाभि मन का मूल स्थान है।
वहीं पर उर्जा का अगाध भंडार है
श्वास धीरे-धीरे पेट तक आती है, वहां विचार नहीं है, स्मृति नहीं है, अतीत नहीं है, कल्पना नहीं है।
श्वास के साथ खोता हुआ मन, ...
स्वाभाविक युति को प्राप्त होता है
मन और प्राण की युति ही योग है।
यहां बलपूर्वक किया गया प्रयास नहीं है।
- हां श्वास को देखो
वह बाहर जाती है
पर तत्काल भीतर नहीं आती
क्षण तो क्षणिक होता है, जहां कुछ नहीं है, मात्र शून्य है
-भीतर आती है
भीतर से तत्काल बाहर नहीं जाती।
क्षण के क्षणांश में ठहरती है, वहां भी मुकाम है
वहां से लौटती है
-एक वर्तुल सा बन जाता है
उसमें रहना, मात्र वर्तमान को प्राप्त होता है
बंदर- बहुत चंचल होता है।उसका मन और मनुष्य का मन साम्य रखता है।वह स्थिर नहीं हो सकता
हां उससे आप आंख मिलाओ, पलक न झपकाओ तो वह ठहर जाता है, पर आपकी पलक झपकी, वह सामान उठाकर चल देता है,
इतनी सजगता रहे, ... यहां ध्यान आंख बंद करके नहीं होता है।
... सजगता है, ... चौकन्नापन, होश रहता है,
श्वास पूरी हो।अधूरी नहीं।
नाभि तक पहुंचे, ... वहां ठहरे वहां से फिर बाहर जाए।
वहीं पूर्णता है
मन, मस्तिष्क में रहता है
उसकी जाग्रति के लिए तेज श्वास, ... उथली श्वास आवश्यक है,
योगी कह रहा था, ... श्वास पेट पर नहीं ले जाना है
फैफड़ों को भरो-बाहर निकालो
धौकनी की तरह भरो
हां, जो ब्रह्मचर्य को मूल्य मानकर चल रहा है, वह अपनी कामवासना को दूर करने में सहायक होगा।
पर गृहस्थ उलझ जाएगा
न इधर का रहा न उधर का
मस्तिष्क मात्र सूचना का संग्राहक है, मन उतना ही जटिल गतिवान रहेगा
मन, श्वांस के साथ नीचे उतरता है, ... जब वह दोनों छोरों के बीच आकर ठहरता है, शक्ति का अनुभव होता है, नाभि उसका मूल स्थान है, ... वहां मात्र शक्ति है गति नहीं, ... प्राण उर्जा और मानसिक शक्ति दोनों ही युतवत हो जाती है,
श्वास गहरी हो, और गहरी व शिथिल, हां जब अब सजग होते जाते हैं, ... तब लगता है, श्वास थक सी गई है।
... श्वास भीतर गई, ... हम गवाह रहे, सजग हैं।
वह ठहरी, हम वहां रहे।
वह लौटी, ... हम सजग हैैं।
वह बाहर गई, ... ठहरी ... हम वहां रहे, अधिक से अधिक वहां सजग रहे, वह क्षणांश  का क्षणहै।

यह अंतराल बड़ा हो सकता है...
यहां श्वास उर्ध्वमुखी है।
सहज प्राणायाम है..।
... यहां मात्र श्वास है, उसका केन्द्र बिन्दु विराट से जुड़ गया है, ... मन यहां स्वतः विसर्जित हो जाता है।
श्वास भीतर गई
साथ रहो।
साथ रहो।
वह जहां तक गई, सजगता रहे..।.
वहां वह रूकी, ... यह भी केन्द्र है, यह नाभि के पास है...।. वहां भी रूको, ... सजग रहो,..।.
वहां वह ठहरेगी, ... वहां उसके साथ रहो।
वह लौटी, ... साथ आना है, यह एक पूरा चक्र होता है,।
... एक दूसरे मे विलीन भी हो जाती है, वहां रहना है, वहां जो है, वही वर्तमान होता है,
वहां न मन होता है, न विचार न विकार है।
शक्ति केन्द्र के साथ रहने का सानिघ्य जो प्राप्त होता है, वह बहुमूल्य है।
... हां, यहां चित्त की शुद्धि-स्वतः उपलब्ध होती है।
मूल सिद्धान्त है- विकार ही विचार है
विचार ही विकार है
विचारों के कम होने से विकार अपने आप कम होने लगते हैं।


 गुरुवाणी से साभार

















                             ‘अनंतयात्रासे’’

हम क्या चाहते हैं?


हम क्या चाहते हैं?

जब दुनिया के परिदृश्य में हम अपने आप को जानने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि ऐसा कुछ हमारे पास है, कि अपनी सारी बुराइयों के बावजूद हम अपनी एक अलग से पहचान रखते हैं।

यह हमारी पहचान  क्या है? यहीं से ही अगर अपनी यात्रा शुरू की जाए तो रास्ता मिल सकता है।

जब दर्शन का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि हमारी खोज दूसरों से अलग है। पश्चिमी दर्शन का जगत बर्हिजगत की खोज है, जहां दर्शन विज्ञान में ढल गया। वहां दर्शन का लक्ष्य ज्ञान से प्रेम है। हमारे यहां मनुष्य की आत्मा तक गया है। अस्तित्व को जानना, उस की खोज हमने माना। हम मनुष्य को ले कर आगे बढ़े। कैसे उसे श्रेय बनाया जाए? उस के भीतर सत्य, शिव और सुन्दर को कैसे पाया जा सके? यह हमारी खोज रही।

हमारे चिन्तन ने हमें यह  बताया कि हमारे भीतर सुप्त शक्तियां हैं, उन का हमें ध्यान नहीं है, पर थोड़े प्रयास यह जाना जाया सकता है। इम जिसे परमात्मा कहते हैं, उस का भी केन्द्र है, जो हमारे भीतर है। उसे नहीं जानने के कारण से ही हम दुखी और शक्तिहीन हैं। यह सही है, हमारे भीतर पशुत्व है, पर देवत्व भी हमारे ही भीतर है। उसे इसी जीवन में ही पाया जा सकता है।

मनुष्य के पास प्रकृति ने दो हाथ तथा मस्तिष्क की शक्ति दी है, वह महान है। वह विश्व का संचालन करने वाली महान शक्ति की देन है। उस के पास हृदय है, जहां प्रेम, विश्वास, मधुरता, आदि अनेक शक्तियां हैं। और उस के भी आगे, वह. उस परम तत्व को भी पा सकता है। हम जिसे परमात्मा कहते हैं।

मनुष्य भी उतना ही शक्तिशाली है, जितना उस का वह सृजनकर्ता है। उस ने वही शक्तियां उसे दे रखी हैं।

हम यहां सांख्य दर्शन की चर्चा नहीं कर रहे। पर यह सत्य है, मनुष्य क्या, यह संसार नीचे सेऊपर तक......... पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, अहंकार और बुद्धि इन आठ तत्वों से बना हुआ है। वह परम तत्व इन सब के आगे है।

पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ” सद्गुरु वही है, जो श्रोत्रिय भी हो, तथा ब्रह्मनिष्ठ भी हो। ब्रह्म वही है, जहां इन आठों तत्वों से आगे, उस की चेतना पहुंच गई हो। पांच तत्वों का ज्ञान हम सब को है, मन और अहंकार को हम जानते हैं, नाम व रूप उसी को प्राप्त होते हैं, पर बुद्धि से परे, वह है, तब उसे बुद्धि से कैसे जाना जा सकता है।
हमारे यहां गुरु ही , उन का प्रकाश ही वहां तक जाता है, वे सन्त होते हैं। पहले के गुरु कैसे होेते थे? पता करो, क्या था उन के पास? वे जंगल में कुटिया बना कर रहते थे। वे स्वयं पूर्ण थे। वे हर मनुष्य को पूर्णता का ज्ञान देते थे।“

भारतीय चिन्तक ने कहा कि, शरीर ही सब कुछ नहीं है। शरीर से परे मन है। मन ही बीज है। उन्हों ने मन की बीमारी को दूर करने को कहा। मन विचार रूप है। विचार ही विकार है। विकारों से मत लड़ो, विकारों को देखो, उन को कम करो, सुधार तुम्हारे पास आना शुरू हो जाएगा।

स्वामीजी यही कहते थे, ”तुम मन नहीं हो, मन तुम्हारा सेवक है, तुम उस के मालिक हो, सुधार मन में आता है। शास्त्र दूसरों को सुनाने के लिए नहीं हैं। छापेखाने की किताबें हैं, दूसरे पढ़ लेंगे, स्वयं के लिए लिखो, स्वयं के लिए पढ़ो, दूसरे में सुधार लाने का प्रयास मत करो। सुधान लाना चाहते हो तो खुद में लाओ।“

तुम पढ़े चले जा रहे हो, पर सुधार नहीं आता। शब्द बाहर ही बाहर रह जाते हैं। भीतर कोई हलचल नहीं होती। क्यों? जो पढ़ रहा है, जो सुन रहा है, जो मनन कर रहा है, सब अलग-अलग है।

हां जिन्हों ने जो जाना है, जो पालिया है, जो उन के भीतर उन के आचरण से सुगन्ध की तरह उठ रहा है, उन के पास जाओ, वहां उन के शब्द ही ‘सबद’ बन जाएंगे। उन्हें बाहर. कुछ कहने की जरूरत नहीं है। वे प्रवचन नहीं देंगे, उन्हें दूसरों में सुधार लाना नहीं है।

पर जिन्हों ने अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लिया है, तुम उन के पास जाओगे, तो उन का हृदय तुम्हारे भीतर शब्द की गूंज पैदा कर देगा। वे तो नहीं चाहेंगे, पर प्रकृति स्वयं यह कार्य करेगी।

वे ही गुरु हैं, गुरु बनाए नहीं जाते, न ही कोई वास्तविक गुरु कहता है कि मैं गुरु हूं, मुझे मानो, वह तो स्वयं सम्प्रेषित हो जाता है।

वे तुम्हें सांसारिक ज्ञान तो नहीं देंगे, न ही तुम्हारी सूचनाओं में वृद्धि करेंगे। इस की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। परन्तु वे तुम्हारे भीतर, तुम्हारी आस्था को जगा देंगे। तुम स्वयं अपने विकारों को जानने लगोगे, सदाचार कोई ओढ़ने वाली चादर नहीं है।

इसी लिए भारत, कर्मफल पर विश्वास करता है। पुनर्जन्म का आधार भी यही है। हम जैसा बोते हैं, वैसा ही काटना पड़ता है। इसी जिए हम अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहते हैं। जानते हैं, दूसरा कोई हमारे सुख-दुख का कारण नहीं है।

मैं ही कार्य हूं, तथा मैं ही उस का कारण हूं, यह हमारी अगली खोज है। इसी लिए हम मानते हैं, यह जीवन ही हमारा आखिरी जीवन नहीं है। एक सिलसिला है, हम मात्र बीच में हैं। कल थे, कल भी होंगे। इसी लिए हमारे भीतर निरन्तर सुधार की जरूरत बनी रहती है।

हमारे अन्दर बहुत कमजोरियां हैं, हम जानते हैं, परन्तु हमारे भीतर उन सेे उबरने की चाहत नहीं है। इसी लिए हमें ‘कमल’ का प्रतीक पसन्द है। कमल कीचड़ में ही खिलता है। हम जानते हैं, अशुभ और अमंगल के बीच ही शुभ का पुष्प खिलेगा। यही हमारी अपनी विशिष्ट पहचान है। जहां से हम अपनी यात्रा शुरू करते हैं।

हम अतीत का बोझा नहीं ढोते, वह तो होनी थी, हो गई, पर वर्तमान से ही भविष्य का रास्ता है, हम क्रि.यमान. कर्म पर भरोसा रखते हैं। हमारे भीतर अग्नि तत्व का आदर है, विवाह हम अगन को साक्षी कर के करते हैं। क्यों? हमारे यहां यज्ञ का विधान अग्नि तत्व का आदर है। हम दाह संस्कार करते हैं। अग्नि पवित्रता की प्रतीक है। हम मात्र वचन ही नहीं देते, अपना विश्वास देते हैं।

हमारे लिए तीन की संख्या महत्वपूर्ण है। हम चेतना की तीन अवस्थाएं मानते हैं, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। इन के पार तुरया है, हमारे प्रिय प्रतीक ऊंकार हैं, यह प्रणव. भी अ उ म ध्वनियों से बना है। वामन ने तीन पगों में धरती नाप ली थी। हम जनेऊ पहनते हैं, तीन धागे हैं, सत, रज, तम, दैवी की यही माया है। इस के पार जाना ही जीवन का लक्ष्य है।

इन तीनों पथों . की यात्रा को, गुरु ही पार कराते हैं। कर्म, उपासना, ज्ञान, तीन मार्ग हैं।

हम अन्न को प्राण का आधार मानते हैं। तीन बातें सामने रखते हैं। अन्न हमारी कमाई. का हो, अन्न शु( मन से बनाया गया हो, तथा अन्न ग्रहण करते समय हमारा मन शान्त हो। तब यह अन्न प्रसाद बन जाता है। इस से हमारे शरीर, मन व प्राण को पोषण मिलता है।

हम मानते हैं मृत्यु शरीर का ही नाश है। शरीर तो मात्र आवरण है, जिसे आत्मा ग्रहण करती रहती है, परन्तु आज ही हम ने यह भी जाना कि इसी जीवन में एक ऐसी अवस्था भी आती है, जिसे जीवनमुक्त अवस्था भी कहा जाता है। गीता उसे स्थितिप्रज्ञता. कहती है।

जहाँ शरीर सुखी है, मन शान्त है, आत्मा आनन्दित है, यही अमृत का घर है। पारस व अमृत हमारे ही शब्द हैं। पारस. सुख का जनक है, तो अमृत उस दिव्यता का जो हमारा लक्ष्य है।

आत्म ज्ञान, आत्म कृपा, आत्म विश्वास, इसी अवस्था के प्रतीक हैं। शरीर परिवर्तनशील है, क्षण भंगुर है। नाशवान है। पर आत्मा है, वहा नित्य है।

इस आत्म साक्षात्कार को मर कर के नहीं पाया जाता, यह तो इसी जीवन की उपसम्पदा है। इसे जानना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।

यह सही है कि आज लोग पूछते हैं, क्या यह जीवन संसार के लिए लाभकारी होगा? मनुष्य मन और मस्तिष्क की समग्रता में विशाल सम्पदा जमा कर रहा है, क्या यह आध्यात्म उस के लिए किसी काम का भी है? मृत्यु तो सभी की होती है, क्यों नहीं जब तक जीवन है, खूब सुख बटोर लिया जाए? यह भी एक रास्ता है।

पर हमने जाना, हमारी )षि परम्परा ने जाना, मनुष्य वही है, जो सुखी भी है और शान्त भी है।

आत्मवत सर्वभूतेषु  सर्व भूतेषु हितेरतः। यही अन्तिम लक्ष्य है।

सच्ची प्रगति यही है, मनुष्य शान्त भी हो और शक्तिशाली भी हो। आत्मा के जो नज्दीक है, वह अपने सोर्स के समीप है। सोर्स, शक्तिवान है, शान्त है, ज्ञानवान है। क्या ऐसा जीवन हम नहीं चाहते हैं?

पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, अन्तर्मुखी बनो, निरन्तर वर्तमान में रहो, फिर तुम कभी याचक नहीं रहोगे, दाता बनो, यही गुरुओं का सन्देश है।

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Thursday, November 28, 2013

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Wednesday, November 27, 2013

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय

श्री गुरु गीता अठारहवां अध्याय


‘‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु।। 45

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परन्तु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
‘‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्थ सि(ि विच्दति मानवः 46

 जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है।जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है।उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः पर धर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं  कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।47
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेय है। क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
स्वधर्म और स्वकर्म दोनों में अन्तर है। स्वधर्म- हमारे भीतर की अनुगूंज है। हमारा मौलिक स्वभाव है। मन का स्वभाव शांति है। अन्तर्मुखी व्यक्तित्व शांत है, वहीं ज्ञान है, वहीं  शक्ति है। यह मेरी निजता है। यह मेरा स्वभाव है, यहां जो गुणधर्म शेष बच जाता है, वह स्वधर्म है।
कर्म है, वह बाहर है, धर्म है वह भीतर है। कर्म, धर्म तक यात्रा करता है। जो कर्म का विभाजन है, उसे भगवान ृकृष्ण ने गीता में वर्ण के आधार पर विभाजित किया है। हर वर्ण की स्वाभाविक विशेषता है। उसकी यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है। लक्ष्य एक ही है, पर साधन सामग्री में भिन्नता है। रूचि में भिन्नता है, ... यह भिन्नता उसका स्वाभाविक गुण कर्म है। यह उसका स्वकर्म है, उस कर्म में पूरी तरह से अपने आपको लगा देना ही साधन तत्व है। जहां मन पूरा लगा, ... वहां वह अमन होने लगता है। अन्तर्यात्रा उपलब्ध हो जाती है। यहां भगवान कह रहे हैं अपने हीस्वकर्म में पूरी तरह उतरने से स्वधर्म की प्राप्ति हो जाती है।

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
यहां भगवान कह रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वहां हर क्रिया पूज्य है कहीं अलग हटकर पूजा की विधि नहीं है। हर क्रिया, हर कर्म परमात्मा के द्वार तक जाता है। कर्म ही यहां पूजा की सामग्री है, वही वंदना है।
कर्मों को बदलने की चेष्ठा व्यर्थ है, इस नाटक में जो भी रोल मिला है वह खूबसूरती से हो जाए, कोई कमी न रहे। मन पूरा उसी में डूब जाए। यही अहसास है, हर कर्म में उसी परमात्मा का संगीत है। इसीलिए अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। क्योंकि- स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता है।
हम जो भी कर्म कर रहे हैं, जो जीवन प्राप्त हुआ है, वे हमारे संस्कारों की छाया है। वे हमारा ही अर्जन है। हमने ही उन्हें मांगा है। वे हमारी ही मांग है। ... वे पूरा होने के लिए ही आए हैं। वहां मन को पूरा लगा देना है। आधा-अधूरा नहीं, दूसरे को देखकर कोई अतिरिक्त मांग नहीं, ... तब और भी कष्ट आएगा, ... वह स्वभाव के प्रतिकूल आएगा। अपने स्वाभाविक कर्म और आचरण को आधार मानते हुए उस कर्म को नियत मानते हुए पूरा मन वहां लगा देना चाहिए। छूटना होगा, ... स्वाभाविक क्रम में छूटता चला जाएगा। यही ‘दाता’ की मर्जी है।
दुख का बड़ा कारण प्राप्त सामर्थ्य का दुरुपयोग है। ”आकाश ही सीमा है, कहकर हम दूसरे को पूरा सोख लेते हैं। हम अपनी सीमा के बाहर कार्य करते हैं, धन व यश कमाने की लालसा में चले जाते हैं। जब लौटते हैं तो कई बार इतनी देर होजाती है कि अपने आपको ही खो देते हैं।

‘‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। 62

हे भारत सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की कृपा से ही परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार है। उसका ‘मैं’ भाव है। उसके सामने परम गुरु भी आ जाएं ,खुद परमात्मा भी सामने आजाए, पर उनके प्रति उसमें श्रद्धा-विश्वास नहीं होता। परन्तु जब वे चले जाते हैं। तब हर पल उनकी याद सताती है। पूज्य स्वामीजी जब तक रहे। वर्षों उनसे प्रश्न पूछते रहे, ... अपने आप में आश्वस्त रहे कि महान सिद्ध संत से हमारा जुड़ाव है, ... पर उनके बार-बार कहने पर भी प्रयोग में नहीं गए। मात्र शब्द ग्रहण करते रहे। क्यों? श्रद्धा-विश्वास दोनों ही नहीं रहा था। न अपने प्रति न दूसरे के प्रति। शास्त्र कहते हैं, जिनसे अधिक परिचय होता है, उनकी अवज्ञा होती है। यह मन की स्वाभाविक आदत है। कभी भी पुत्र के मन में पिता के प्रति, पत्नी में पति के प्रति, बुद्धिमान मंे गुरु के प्रति आदर नहीं होता। क्यों? अर्जुन जो कृष्ण के इतने समीप था, उसने भी गीता पूरी सुनने के बाद, और तो और विराट स्वरूप के दर्शन के बाद , दुबारा कृष्ण से ही महाभारत की समाप्ति के बाद गीता सुनाने का कहा था। वह  तो कृष्ण को ही सारथी बनाकर लाया है।
भगवान सामने है, अर्जुन का रथ हांक रहे हैं, ... परन्तु अर्जुन के भीतर कहीं शरणागति नहीं है। वह प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहा है, तब भगवान कह रहे हैं- तू परमेश्वर की अनन्य शरण में जा- ”वह सबके हृदय में स्थित हैं।“कृष्ण ने अपने आपको कहीं परमेश्वर नही कहा।
स्वामीजी कहते थे- क्रिया बाहर होती है, मन भीतर है। वह भीतर से प्रेरणा लेता है, वृत्तियां भीतर से उछाला करती हैं। उसे प्रेरणा भीतर से मिलती है। बाहर रहते हुए भी ,वह तो तूही है, तेरे पास है।  संत कबीर ने कहा है, जिस घट भीतर बाग बगीचे , वहीं है सिरजन हारा भजन सभी सुनते हैं, पर विश्वास किसको होता है? भीतर संबंध निरन्तर जुड़ा रहे, ... यही साधन है। वह बाहर ही बाहर न भटकता रहे। तब शांति व शक्ति दोनों मिलती है।

‘सर्व भावेन- निरन्तर वर्तमान में रहने से, यह स्थिति आती है। चिन्तन न होने से वृत्तियों तथा विषयों का संबंध टूट जाता है। तब स्वाभाविक अवस्था में मन शांत होने लगता है।

‘‘मन्मना भव मÚक्तोे मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसिमे। 65

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहंत्वासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामिमा शुचः।। 66

तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य निरन्तर अचल मन वाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा-भक्ति सहित निरन्तर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो, सबके आश्रय स्वरूप वासुदेव को नमस्कार, ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा प्रिय सखा है।

सर्व धर्मों को अर्थात् संपूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ एक सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, ... शोक मत कर।
यहां साधन का प्रारंभ है। संदेह का परित्याग। जहां अहंकार होता है, वहां संदेह रहता है। जहां हृदय है, वहां भाव है, वहां समर्पण है।
‘अनन्य श्रद्धा है। अहंकार , शक्ति को तोड़ता है। विभाजित करता रहता है। जहां भक्त है। वहां बंटवारा नहीं है। मन जब अंतर्मुखी होता है। वहां समर्पण जन्मता है। जब तक बहिर्मुखता होता है, वहां तक अहंकार है।  संदेह है। भटकाव है।
हम कौन से मार्ग से आ रहे हैं, यह सोचना व्यर्थ है। समर्पण का मार्ग अलग नहीं है। जहां बहिर्मुखता है, वहां मार्ग है। वहां अहंकार है। वहां संदेह है। जहां अतंर्मुखता है, वहां धारा-राधा बन जाती है। वहां बस समर्पण शेष रहता है।
 श्रद्धा बहिर्मुखता पर रोक लगाती  है। जहां विचारणा होती है। वहां विकल्प होते हैं। विचार तो तभी होता है, जहां विचारणा नहीं रहती। विचारणा का अंतिम छोर विचार है, जब विचार गिर जाता है, वहां निर्विकल्पता होती है। वहां निश्चयात्मकता होती है। वहां निर्णय होता है।
समर्पण वहीं होता है, जहां ‘मैं’ नहीं रहता। जहां कर्ता खो जाता है जहां समर्पण पूरा होता है, वहां पाप भी गिर जाता है। क्योंकि विचार ही तो पाप है।

और तब गीता का समाहार  , आज के युवक की इस स्वीकारोक्ति के साथ होता है।गीता वृद्धों का कोई अरण्य गान नहीं है, नहीं यह मृत्यु पर गाया जाने वाला शोकगीत है, यह आज के संघर्षशील युवक के लिए ,उस रास्ते को बताती है, जिस पर चलकर वह , शांति , शक्ति तथा वैभव पा सकता है, जो आज उसकी मॉंग हैं

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धात्वत्प्रसादान्मयाच्युज
स्थितोऽस्मि गत सन्देहः करिष्ये वचनं तब।ं 73।

अर्जुन का कथन है आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट होगया है, मुझे स्मृति की प्राप्ति हुई है। मेरा संशय दूर हुआ है। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूॅंगा।
गीता राम-रसायन है, यह आधुनिक मनुष्य की समस्याओं को एक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देख रही है। भारतीय समाज का पतन इसीलिए हुआ कि कि हमने  बुद्ध और शंकराचार्य के बीच के समय में हजार वर्ष के बीच गीता को विस्मृत ही कर दिया था। पूज्य स्वामीजी की साधना पद्धति गीता पर आधारित थी। वे मनुष्य के लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ दोनो को आवश्यक मानते थे। संसार में सफलता प्रयत्न से मिलती है, प्रकृति ने जो भी कार्य सौंपा है, उसे उत्कृष्टता से करना शरीर का उद्देश्य है। जीवन का उद्देश्य इसी जीवन में परमात्मा की महान शक्ति का ज्ञान प्राप्त करना है। पुरुषार्थ इसीलिए ही  है। उसके लिए  सुबह और शाम को वे निर्विचारता के अभ्यास के लिए कहते थे। निरन्तर वर्तमान में रहना उनकी साधना रही, अंर्तुमुखता प्राप्त करो, यही उनका आप्त वचन था। वे याचक वृत्ति के विरुद्ध रहे। एक नया मनुष्य जो सुखी है, शांत है, और शक्तिशाली है, वही साधक है , वे अर्जुन को इसी लक्ष्य की प्र्राप्ति में देखते थे।

गीता के आधार पर प्रयत्न और पुरुषार्थ की इस एकीकृत  साधन प्रणाली से उस नए मनुष्य का आगमन संभव है, जो विवेक को गुरु मानकर उसके आलोक में अपना पथ तय करेगा। इस मनुष्य के पास गहरा आत्मविश्वास होगा, संतोष होगा , प्रसन्नता होगी, जो पलायनवादी दृष्टि से दूर , इस आधुनिक समाज मंे अपने महत्वपूर्ण  योगदान से रेखांकित होगा। अर्जुन को मोह दूर होना, उसकीसंशयात्मा का दूर होना , निर्णय की ओर बढ़ना , आज की दुनिया में हर हारे हुए मनुष्य के लिए नई जिन्दगी की शुरुआत है।

क्या गीता को हम पलायनवादी दृष्टि से विवेचित कर सकते हैं?
संजय के ही शब्द  ही मत्वपूर्ण हैं, उसी ने ही गीता को ध्ृातराष्ट्र के वाक्य के साथ शुरु किया था। वही अंत में कह रहा है-
‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।। 67

जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण है वहां गांडीवधारी अर्जुन है  ,वहीं पर श्री, विजय, विभूति अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
‘यह संजय की सीख है। जो उसने धृतराष्ट्र को गीता सुनाकर पाई है। गीता का अभिप्राय, गीता का सार, ... इस एक श्लोक में आया है।
यहां गीता का समापन है।
पूर्व में भगवान कृष्ण ने कहा-
‘तस्मात सर्वेषुकालेषु माम अनुस्मर युद्ध च’
... मेरा स्मरण वह भी निरन्तर तथा युद्ध भी हो, ... कर्म भी हो? यहां संजय  यही कह रहा है-
जहां भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण है, ... तथा गांडीव धारी अर्जुन है। भगवान- योगेश्वर है, तथा अर्जुन धर्नुधारी हैं। वही पर ही श्री, विजय, विभूति, अचल नीति है।
भगवान बुद्ध ने, चार आर्य सत्य बताकर मनुष्य मात्र की दुःख से मुक्ति का उपाय निर्देशित किया था। मनुष्य की वास्तविक मांग यही है, वह शांति व सुख पाए। सुख की संपूर्ण व्याख्या, श्री, विजय, विभूति में है, ... यह किस प्रकार संभव हो?हमारा  भी यहॉं वही मत है, जो संजय का मत है, जहां भगवान योगेश्वर कृष्ण हैं तथा गांडीवधारी अर्जुन है। वही ंयह संभव है।

निरन्तर वर्तमान में रहना ही वह विधि है, जिससे यह संभव है। जो अतर्मुखी है, ... वह निरन्तर वर्तमान में है, वह बाहर से भी जुड़ा है, वहां कर्मठता है। शक्तियां भी हैं, परन्तु वह भीतर से जुड़ा रहकर, प्रेरणा लेकर, जहां शांत है, वही पर शक्ति संपन्न भी है। यहां मनुष्य के कर्म त्याग की बात नहीं है। यह वह अवस्था है कि वह अतिरिक्त संपदा जिसे सन्यास कहा जाता है, उससे सन्निहित है, वह गृहस्थ के कर्म कौशल से भी जुड़ा है।
वही वास्तविक स्थितिप्रज्ञ है। जो स्थितिप्रज्ञ है। उसके भीतर योगेश्वर की कृपा की उपस्थिति है। जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में है। वह शांत है। उसका मन उसके अधीन है। इन्द्रियां मन के अधीन है। वृत्तियां उठती है, पर तितिक्षा से उनके वेग को सहन करता हुआ, अविचलित है।

पर साथ ही वह कर्मठ है, प्रेरणा से प्राप्त स्वकर्म व स्वधर्म का पालन करता है, वह कुशलता से प्राप्त कर्म को निष्काम भाव से करता हुआ, प्रकृति के कार्य में सहयोग करता है।
मनुष्य प्रयत्न और पुरुषार्थ की शक्ति लेकर पैदा हुआ है। वह सांसारिक ज्ञान और संासारिक सम्पदाओं की खोज में पूरी आयु गंवा देता है। बाह्य की संपदाओं की सीमा है। यह जीवन यात्रा का एक पड़ाव है। उसे अपने को बेहतर बनाते हुए,अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी रखना है। सुख, शांति और शक्ति उस परम के समीप समर्पण से ही मिलती है। जहॉं वह ”मम“ की दासता को छोड़कर अपने ”माम“ से जुड़ जाता है।

यह वह अद्भुत कीमिया है, जहां वह भक्त है, वहीं वह योगी है, वहीं वह स्थितिप्रज्ञ है, ... गीता का यह सार तत्व श्री गुरु गीता है।
 जहां संसार से पलायन नहीं, वरन जगत की इस लीला में सक्रिय सहयोग देते हुए परम शांति पाने की प्रयोग धर्मिता है।पूज्य स्वामीजी के द्वारा दिए गए श्री गीता के संदेश को यहाँ पुनः यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।उनके साथ लगभग तीस वर्षोका सानिध्य रहा, उन्होंने स्वतंत्र कोई आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं लिखा, समय-समय पर प्रवचनों में, आपने  जिन श्लोकों पर  प्रकाश डाला था तथा जिन्हें पढ़ने ,मनन करने के लिए निर्देश दिए थे, वर्षोतक वे अंतःकरण में पुष्पित व पल्लवित होते रहे, अमरीका प्रवास में मेरे  छोटेपुत्र ने मुझसे गीता पर अपने मित्रों के साथ चर्चा की थी , तब अचानक ही यह  विचार स्वतः ही उपज गया था।  उसे ही मैंने इस कृति का पहला प्रारूप भेजा भी था। वह तो आज दुनिया में नहीं हे। पर उससे और उसके मित्रों केसाथ बीते हुए क्षण इस कृति के माध्यम से उसे ही समर्पित हैं वे ही यहाँ पर विवेचित किए गए हैं।