हम क्या चाहते हैं?
जब दुनिया के परिदृश्य में हम अपने आप को जानने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि ऐसा कुछ हमारे पास है, कि अपनी सारी बुराइयों के बावजूद हम अपनी एक अलग से पहचान रखते हैं।
यह हमारी पहचान क्या है? यहीं से ही अगर अपनी यात्रा शुरू की जाए तो रास्ता मिल सकता है।
जब दर्शन का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि हमारी खोज दूसरों से अलग है। पश्चिमी दर्शन का जगत बर्हिजगत की खोज है, जहां दर्शन विज्ञान में ढल गया। वहां दर्शन का लक्ष्य ज्ञान से प्रेम है। हमारे यहां मनुष्य की आत्मा तक गया है। अस्तित्व को जानना, उस की खोज हमने माना। हम मनुष्य को ले कर आगे बढ़े। कैसे उसे श्रेय बनाया जाए? उस के भीतर सत्य, शिव और सुन्दर को कैसे पाया जा सके? यह हमारी खोज रही।
हमारे चिन्तन ने हमें यह बताया कि हमारे भीतर सुप्त शक्तियां हैं, उन का हमें ध्यान नहीं है, पर थोड़े प्रयास यह जाना जाया सकता है। इम जिसे परमात्मा कहते हैं, उस का भी केन्द्र है, जो हमारे भीतर है। उसे नहीं जानने के कारण से ही हम दुखी और शक्तिहीन हैं। यह सही है, हमारे भीतर पशुत्व है, पर देवत्व भी हमारे ही भीतर है। उसे इसी जीवन में ही पाया जा सकता है।
मनुष्य के पास प्रकृति ने दो हाथ तथा मस्तिष्क की शक्ति दी है, वह महान है। वह विश्व का संचालन करने वाली महान शक्ति की देन है। उस के पास हृदय है, जहां प्रेम, विश्वास, मधुरता, आदि अनेक शक्तियां हैं। और उस के भी आगे, वह. उस परम तत्व को भी पा सकता है। हम जिसे परमात्मा कहते हैं।
मनुष्य भी उतना ही शक्तिशाली है, जितना उस का वह सृजनकर्ता है। उस ने वही शक्तियां उसे दे रखी हैं।
हम यहां सांख्य दर्शन की चर्चा नहीं कर रहे। पर यह सत्य है, मनुष्य क्या, यह संसार नीचे सेऊपर तक......... पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, अहंकार और बुद्धि इन आठ तत्वों से बना हुआ है। वह परम तत्व इन सब के आगे है।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ” सद्गुरु वही है, जो श्रोत्रिय भी हो, तथा ब्रह्मनिष्ठ भी हो। ब्रह्म वही है, जहां इन आठों तत्वों से आगे, उस की चेतना पहुंच गई हो। पांच तत्वों का ज्ञान हम सब को है, मन और अहंकार को हम जानते हैं, नाम व रूप उसी को प्राप्त होते हैं, पर बुद्धि से परे, वह है, तब उसे बुद्धि से कैसे जाना जा सकता है।
हमारे यहां गुरु ही , उन का प्रकाश ही वहां तक जाता है, वे सन्त होते हैं। पहले के गुरु कैसे होेते थे? पता करो, क्या था उन के पास? वे जंगल में कुटिया बना कर रहते थे। वे स्वयं पूर्ण थे। वे हर मनुष्य को पूर्णता का ज्ञान देते थे।“
भारतीय चिन्तक ने कहा कि, शरीर ही सब कुछ नहीं है। शरीर से परे मन है। मन ही बीज है। उन्हों ने मन की बीमारी को दूर करने को कहा। मन विचार रूप है। विचार ही विकार है। विकारों से मत लड़ो, विकारों को देखो, उन को कम करो, सुधार तुम्हारे पास आना शुरू हो जाएगा।
स्वामीजी यही कहते थे, ”तुम मन नहीं हो, मन तुम्हारा सेवक है, तुम उस के मालिक हो, सुधार मन में आता है। शास्त्र दूसरों को सुनाने के लिए नहीं हैं। छापेखाने की किताबें हैं, दूसरे पढ़ लेंगे, स्वयं के लिए लिखो, स्वयं के लिए पढ़ो, दूसरे में सुधार लाने का प्रयास मत करो। सुधान लाना चाहते हो तो खुद में लाओ।“
तुम पढ़े चले जा रहे हो, पर सुधार नहीं आता। शब्द बाहर ही बाहर रह जाते हैं। भीतर कोई हलचल नहीं होती। क्यों? जो पढ़ रहा है, जो सुन रहा है, जो मनन कर रहा है, सब अलग-अलग है।
हां जिन्हों ने जो जाना है, जो पालिया है, जो उन के भीतर उन के आचरण से सुगन्ध की तरह उठ रहा है, उन के पास जाओ, वहां उन के शब्द ही ‘सबद’ बन जाएंगे। उन्हें बाहर. कुछ कहने की जरूरत नहीं है। वे प्रवचन नहीं देंगे, उन्हें दूसरों में सुधार लाना नहीं है।
पर जिन्हों ने अपने अन्तःकरण को शुद्ध कर लिया है, तुम उन के पास जाओगे, तो उन का हृदय तुम्हारे भीतर शब्द की गूंज पैदा कर देगा। वे तो नहीं चाहेंगे, पर प्रकृति स्वयं यह कार्य करेगी।
वे ही गुरु हैं, गुरु बनाए नहीं जाते, न ही कोई वास्तविक गुरु कहता है कि मैं गुरु हूं, मुझे मानो, वह तो स्वयं सम्प्रेषित हो जाता है।
वे तुम्हें सांसारिक ज्ञान तो नहीं देंगे, न ही तुम्हारी सूचनाओं में वृद्धि करेंगे। इस की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। परन्तु वे तुम्हारे भीतर, तुम्हारी आस्था को जगा देंगे। तुम स्वयं अपने विकारों को जानने लगोगे, सदाचार कोई ओढ़ने वाली चादर नहीं है।
इसी लिए भारत, कर्मफल पर विश्वास करता है। पुनर्जन्म का आधार भी यही है। हम जैसा बोते हैं, वैसा ही काटना पड़ता है। इसी जिए हम अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहते हैं। जानते हैं, दूसरा कोई हमारे सुख-दुख का कारण नहीं है।
मैं ही कार्य हूं, तथा मैं ही उस का कारण हूं, यह हमारी अगली खोज है। इसी लिए हम मानते हैं, यह जीवन ही हमारा आखिरी जीवन नहीं है। एक सिलसिला है, हम मात्र बीच में हैं। कल थे, कल भी होंगे। इसी लिए हमारे भीतर निरन्तर सुधार की जरूरत बनी रहती है।
हमारे अन्दर बहुत कमजोरियां हैं, हम जानते हैं, परन्तु हमारे भीतर उन सेे उबरने की चाहत नहीं है। इसी लिए हमें ‘कमल’ का प्रतीक पसन्द है। कमल कीचड़ में ही खिलता है। हम जानते हैं, अशुभ और अमंगल के बीच ही शुभ का पुष्प खिलेगा। यही हमारी अपनी विशिष्ट पहचान है। जहां से हम अपनी यात्रा शुरू करते हैं।
हम अतीत का बोझा नहीं ढोते, वह तो होनी थी, हो गई, पर वर्तमान से ही भविष्य का रास्ता है, हम क्रि.यमान. कर्म पर भरोसा रखते हैं। हमारे भीतर अग्नि तत्व का आदर है, विवाह हम अगन को साक्षी कर के करते हैं। क्यों? हमारे यहां यज्ञ का विधान अग्नि तत्व का आदर है। हम दाह संस्कार करते हैं। अग्नि पवित्रता की प्रतीक है। हम मात्र वचन ही नहीं देते, अपना विश्वास देते हैं।
हमारे लिए तीन की संख्या महत्वपूर्ण है। हम चेतना की तीन अवस्थाएं मानते हैं, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। इन के पार तुरया है, हमारे प्रिय प्रतीक ऊंकार हैं, यह प्रणव. भी अ उ म ध्वनियों से बना है। वामन ने तीन पगों में धरती नाप ली थी। हम जनेऊ पहनते हैं, तीन धागे हैं, सत, रज, तम, दैवी की यही माया है। इस के पार जाना ही जीवन का लक्ष्य है।
इन तीनों पथों . की यात्रा को, गुरु ही पार कराते हैं। कर्म, उपासना, ज्ञान, तीन मार्ग हैं।
हम अन्न को प्राण का आधार मानते हैं। तीन बातें सामने रखते हैं। अन्न हमारी कमाई. का हो, अन्न शु( मन से बनाया गया हो, तथा अन्न ग्रहण करते समय हमारा मन शान्त हो। तब यह अन्न प्रसाद बन जाता है। इस से हमारे शरीर, मन व प्राण को पोषण मिलता है।
हम मानते हैं मृत्यु शरीर का ही नाश है। शरीर तो मात्र आवरण है, जिसे आत्मा ग्रहण करती रहती है, परन्तु आज ही हम ने यह भी जाना कि इसी जीवन में एक ऐसी अवस्था भी आती है, जिसे जीवनमुक्त अवस्था भी कहा जाता है। गीता उसे स्थितिप्रज्ञता. कहती है।
जहाँ शरीर सुखी है, मन शान्त है, आत्मा आनन्दित है, यही अमृत का घर है। पारस व अमृत हमारे ही शब्द हैं। पारस. सुख का जनक है, तो अमृत उस दिव्यता का जो हमारा लक्ष्य है।
आत्म ज्ञान, आत्म कृपा, आत्म विश्वास, इसी अवस्था के प्रतीक हैं। शरीर परिवर्तनशील है, क्षण भंगुर है। नाशवान है। पर आत्मा है, वहा नित्य है।
इस आत्म साक्षात्कार को मर कर के नहीं पाया जाता, यह तो इसी जीवन की उपसम्पदा है। इसे जानना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
यह सही है कि आज लोग पूछते हैं, क्या यह जीवन संसार के लिए लाभकारी होगा? मनुष्य मन और मस्तिष्क की समग्रता में विशाल सम्पदा जमा कर रहा है, क्या यह आध्यात्म उस के लिए किसी काम का भी है? मृत्यु तो सभी की होती है, क्यों नहीं जब तक जीवन है, खूब सुख बटोर लिया जाए? यह भी एक रास्ता है।
पर हमने जाना, हमारी )षि परम्परा ने जाना, मनुष्य वही है, जो सुखी भी है और शान्त भी है।
आत्मवत सर्वभूतेषु सर्व भूतेषु हितेरतः। यही अन्तिम लक्ष्य है।
सच्ची प्रगति यही है, मनुष्य शान्त भी हो और शक्तिशाली भी हो। आत्मा के जो नज्दीक है, वह अपने सोर्स के समीप है। सोर्स, शक्तिवान है, शान्त है, ज्ञानवान है। क्या ऐसा जीवन हम नहीं चाहते हैं?
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, अन्तर्मुखी बनो, निरन्तर वर्तमान में रहो, फिर तुम कभी याचक नहीं रहोगे, दाता बनो, यही गुरुओं का सन्देश है।
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