Monday, November 28, 2011

गु:कुल के कार्यक्रम मे ि‍दव्‍यानंद जी शंकराचार्य भानपुरा

 
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गुरूकुल में मोहन जोशी

 
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गंरूकुल में

 
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साधन क्रम

साधन क्रम साधन पथ रूपी त्रिभुज को अभ्यास, सत्संग और स्वाध्याय ये तीन भुजाएं है। जो साधन यात्रा की संपूर्णता देती है। स्वाध्याय सत्संग के लिए प्रेरित करता है और सत्संग अभ्यास के लिए तभी साधक संपूर्णता पाता है। यह शास्त्रानुसार प्रदर्शित मार्ग है। स्वाध्याय स्वाध्याय ही सामान्य व्यक्ति को साधन पथ सौंपता है। स्वाध्याय जीवन में नियमित रहना चाहिए। मन की स्थिरता के लिए और पथ की तलाश के लिए आवश्यक है कि सद्ग्रन्थों का नियमित अययन होता रहे। स्वाध्याय - स्व का अध्ययन है। यह हमें आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाताहै। इसलिए स्वाध्याय का अर्थ मात्र शास्त्र अध्ययन से नही है। अगर जीवन में सद्गुरू प्राप्त न हो तो, साधन यात्रा में सद्ग्रन्थों को ही सद्गुरू मान कर उनके आधार पर साधन की समस्याओं को हल करना चाहिए। वैसे सद्गुरू के द्वारा बताए गए सद्ग्रन्थ ही उपयोगी होते है। वे रोगी के रोग को देखकर ही दवा देते है। अन्यथा पुस्तकालय तो दवाई की दुकानों की तरह होता है। ग्रन्थों को समझ के लिए भी पर्याप्त समझ चाहिए। अंधों के लिए जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश व्यर्थ है उसी प्रकार सद्ग्रन्थों का अध्ययन विवेक के प्रकाश में ही होता है। अतः साधको को चाहिए कि गुरू आज्ञा से ही वह स्वाध्याय मे रत रहे। ये ग्रन्थ मनोरंजन के लिए नही है। साधन ग्रन्थ पहले सद्गुरू दिया करते थे। अब छापे खाने हो गये है। सभी तरह के ग्रन्थ उपलब्ध है। अतः अनर्थ अधिक हो गया है। साधन सूत्र यहां रूपक कथाओं में हैं।प्राप्त विवेक का आदर हमारे व्यवहार को बदलने में सहायक होता है। जो सही है, और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ,वही विवेक है। सत्संग - सत्संग और सद्चर्चा मे अंतर है। असत का त्याग होने पर सत्संग अपने आप हो जाता है। प्रायः सत्संग के नाम पर जब हम एकत्रित होते हैं, गपशप ही अधिक करते है। बातें करते हैं। कहा करते हैं हम सत्संग में गए थे। जब तक भीतर से परिवर्तन न हो, और आप खुद न करना चाहे, सत्संग आप नहीं कर सकते। अभ्यास और सत्संग विवेक के ही दो पहलू है। अभ्यास ही सत्संग है और सत्संग ही अभ्यास है। इसीलिए जहां तक हो सके सद्चर्चाओं के स्थान पर सत्संग ही किया जाना चाहिए। आत्मनिरीक्षण ही व्यक्तिगत सत्संग है। यहां साधक को ”जो है“ साक्षात्कार, अनुभवन का अभ्यास करना है। परन्तु साधक को आंतरिक गहरे मौन में स्मृतियां पास नही रहने देती। मूक सत्संग में सबसे बड़ी बाधा यही है।इन स्मृतियों के असहयोग से संबंध विच्छेद से इनसे बचा जा सकता है। संबंध समाप्त होते ही इनकी सत्ता समाप्त हो जाती है। फिर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु यह होना सहज और सरल नही है। जब साधक अपने एकांत सत्संग मे प्रवेश करने मे पने आपको असफल समझता है। तब उसे चाहिए कि उन कुछ लोगों को जिन्हें साधन में रूचि है। समान भाव है। उसे साथ बैठना चाहिए। यह सामूहिक अभ्यास भी लाभकारी है। परन्तु यहां पर दोष चिंतन के स्थान पर निज के दोषों की चर्चा करनी चाहिए। उन्हें दूर करने के उपाय तलाश करने चाहिए। सत्संग का अर्थ भजन कीर्तन नही है। न ही शास्त्र श्रवण है। परन्तु बहुत गहरे में अपने ”सत“ से युक्त होना है। इस तकनीक को जिसने समझा है वही साधन यात्रा का लाभ ले पाया है। क्यांेकि यात्रा में कई पड़ाव आते है। कोई साधक आगे, कोई साधक पीछे रहता है। कई समस्याएं सभी को एक जैसी पार करनी पड़ती है। जहां पर भी जिस साधक ने अपनी समस्याओं को जिस प्रकार दूर किया है, समाधान जानना लाभकारी रहता है। साधन यात्रा अनवरत प्रयोग है। जब तक परिणाम प्राप्त न हो तब तक प्रयोग नही छूटता है। अतः सत्संग को श्रेष्ठ साधन समझकर ग्रहण करना चाहिए। इस जीवन मे कभी कभी ऐसा होता है जो सत है, जो जीवन मुक्त है, उनकी कृपा दृष्टि भी हो जाती है। यदि साधक स्वयं अपनी जिज्ञासाओं के समाधान मे असफलता पा रहा है, उसे कुछ पूछना शेष रह गया हो, जानना शेष रह गया हो। वह पाता है कि उसके विक्षोभ को वह दूर नही कर पा रहा है बैचेनी है। तो फिर किसी सद्गुरू की शरण में जाना चाहिए। सद्गुरू की पहले खूब जांच पड़ताल रखनी चाहिए। बुद्वि लाभ, लोभ की दासी अवश्य है, पर वह बारीकी से जांच पड़ताल करने मे समर्थ है। जिसमेंअपने जानते हुए किसी प्रकार का दोष नहीं दिखता हो। जिसके सम्मुख अंहकार झुकना चाहता हो। क्योंकि मन का स्वभाव यही है कि वह अपने से बड़े के सम्मुख श्रेष्ठ के सम्मुख स्वतः ही झुक जाता है। यह समर्पण जो है, अस्वाभाविक नही है। यहां सम्मुख होते ही शांति की लहरों में साधक अपने आप को पाता है। शांत सरोवर जिस प्रकार अपने संसर्ग से चित्त की बैचेनी दूर कर देता है उसी प्रकार संतो के प्रेमिल चित्त साधक के मन में प्रेम की धाराएं उत्पन्ना कर देते है। यह उनके संसर्ग का ही परिणाम है कि अपने भीतर गहरी शांति अनुभव करता है। परन्तु यह ध्यान रहे, यहां तर्क नहीं, शंका नहीं। वरण का अधिकार एक बार का ही है। पर होता विपरीत है। साधक की सद्गुरू के प्रति श्रद्र्वा नहीं होती। वह वहां भी सांसारिक लाभ के लिए जाता है। व्यर्थ की चर्चाएं करता है। साथ ही वह जैसे कपड़े बदलता है, वैसे ही वह गुरू बदल लेता है। परिणाम यह रहता है कि वह लाभ नहींले पाता है। उसके भीतर परिवर्तन नही आता है। सद्गुरू मनोरंजन नहीं करते। वे अनुभव के स्त्रोत है। साधक के अनुभवन को जागृत करते हैं, पर आवश्यक है कि उनके परामर्श पर अमल किया जाए। अभ्यास:- संसार से अपने आप को हटा लेना अभ्यास नहीं है।अपने आप से संसार को हटा लेना ही अभ्यास है। यह सब एक ही दिन एक ही क्षण में तो नहीं होने वाला है, परन्तु निरन्तर अभ्यास से ही इसे पा अवश्य सकते है। संसार संकल्प रूप ही है। इच्छा कि उत्पत्ति ही दुख है। उसकी पूर्ति सुख है, और इच्छाएं अनन्त है,अतः हर इच्छा की पूर्ति असंभव ही है। परिणामतः दुख ही दुख है। अतः इच्छा की निवृत्ति ही आनन्द है। यही पूर्णता मिलती है। संसार की सहायता से पूर्णता नहीं मिलती है। यह संसार हर क्षण और अभाव बढ़ा सकता है। गरीबी दे सकता है। और जो अभाव में है उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता। मन अपने आप में ,अपने आप से हच्छा की पूर्ति नहीं कर सकता है,उसे इसके लिए इन्द्रियों की सहायता चाहिए।जब हम नाद सुनते हैं तो हमारी बाह्य श्रवणेन्द्रिय इसे नहीं सुनती है,पर हम सुनते हैं इसी तरह हम सोते हैं ,पर स्वप्न में तीव्र प्रकाश देखते हैं।यह हमारी अन्तेन्द्रिय करती है।पर मन अपने आप में इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह बिना इन्द्रियों के भोग कर सके। इन्द्रिय भोग से मन पर जो प्रभाव बनता है ,वह सुखात्मक और दुखात्मक दोनों ही प्रकार का होता है।इसीलिए वृत्ति के उठते ही अगर सतर्कता रहे तो हम दुख के प्रभाव को कम कर सकते हैं।निरंतर वत्र्तमान में रहने का जब अभ्यास बढ़ने लगता है तो वृत्ति के उठते ही हम यह जान जाते हैं कि यह संकल्प सहज और स्वाभाविक है, हमारे सामथ्र्य के अनुकूल है,हम इसे बिना किसी प्रलोभन या किसी अन्य के अनुकरण के अभाव में ,अपने बल के आधार पर कर सकते हैं,और हमने पूरा प्रयास किया है तब प्राकृतिक विधान से जो भी फल प्राप्त होगा,वह हमें सुख भी देगा और शांति भी देगा। साधक को चाहिए कि वह क्षण को जो उनके सामने उपस्थित है, सार्थकता प्रदान करे। यह सार्थकता उस क्षण को अनुभव में बदल कर हम पा सकते हैं अनुभव के लिए वर्तमान मे रहना होगा। आगे पीछे भटकना, मन का भूत और भविष्य में हो रहा संक्रमण हमें रोकना चाहिए। यह भटकाव हमारी शक्तियों को विघटित करता है। मन जितना अतीत और भविष्य के भटकाव से पृथक होगा, उतनी ही वह सार्थकता प्राप्त कर सकेगा। भगवत कर्म से युक्त होने का यही सार्थक प्रयत्न है।मन जितना वत्र्तमान में है उतना ही वह ईश्वर के नजदीक है।मात्र राम-राम रटने से ,छाप तिलक लगाने से,ईश्वर के नाम का प्रदर्शन ही होसकता है। इसीलिए जिन चीजों को अपने अंदर रख रखा है, उन्हें धीरे धीरे हटाते चले जाना ही यहां अभ्यास है। मन संकल्प रूप है, उसकी अशुद्वि दो प्रकार की है। एक तो वह चंचल है, दूसरा वह मलिन है। मलिनता और चंचलता, स्थिरतापाते ही दूर होती है। जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त हो जाएगी, विवेक के स्पर्श से मलिनता भी दूर हो जाएगी, और कर्म, भगवत कर्म में रूपांतरित होता चला जाएगा। इसीलिए साधक के लिए आवश्यक है, वह आत्मनिरीक्षण की ओर बढ़े। आत्म निरीक्षण यहां आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिकता में विचरण करे। मनोजगत मे पेठ करे।विचार ही राक्षस हैं।वाणी के आधार पर विचार मूत्र्तता पाते हैं। आप जो सोचते हैं,वही बोलते हैं।अपने आपको सोचते हुए कभी तटस्थता से अपने आपको देखें तो आप पाएंगे आपका असली स्वरूप यही है।आप जब स्वप्न में आप अपने आपको देखते हैं तो जो आप वत्र्तमान में नहीं कर पाए,नहीं सोच पाए ,यह सिलसिला वहां भी शुरू हो जाता है।स्वप्न भी उतने ही अधिक सच होते हैं जितनी यह व्यवहारिक दुनिया।हां जब आप वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते हैं तो इस विचारणा पर भी प्रभाव पड़ता है। विचारो की संख्या कम होने से विकार भी कम होने लग जाते हें,फिर स्वप्न भी कम आने लगते हैं।अवलोकन के माध्यम से धीरे-धीरे आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे है। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है परन्तु यहां पर किसी और अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे है। जीवन जो है, जिस रूप मे है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते। प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है..........यह मुझे दूर करना है तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विधमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना, बस इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नहीं करना है, बाह्य से लाकर कुद आरोपित नहीं करना है जो है उसका सतर्कता पूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई संकल्प नही है रूपांतरण की चाहत भी नही है तभी तो जो है उसी रूपमें अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान मे रूपान्तरण को क्रिया शुरू नहीं करनी है,जब यह शुरु हो जाती है तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द्व, यह ध्यान नही है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर.............मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नहीं। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति भावना नहीं, जो है उसे ही निःसंकल्पता से देखना है, बस नाव चलती रहे चलती रहे तभी यह अन्र्तयात्रा संभव है। यह निःसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन हो यह हमें प्रदान करता है। इसीलिए आवश्यक है काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है, कि विचारणा ही नहीं रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभवकर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक हो जाते हैं इसीलिए हम पाते हैं हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते है। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य मे मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है निःसंकल्पता, एक गहरा मौन यही तो हमारा ध्येय है। यह हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा भगवद् भाव की प्राप्ति होती है, वही जीवन भगवद् कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है। यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है यहां है सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं ? यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। अतः प्रयत्न यहंा निंदनीय नही है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है। इसीलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए उन विचारों को जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दे। बिना काम के विचार वे ही हैं जो कभी वर्तमान मे नहीं रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते है। यही तो चिन्ता है, जो कि चित्त भी है। इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्गजगत मे हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके मन एक क्षण में लाखांे मील की दूरी लांघ जाता है। ओर जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐंगे। सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग करना लक्ष्य नही है हम चाहते हैं, उसका बर्फ बनाना जिससे कि फिर कभी र्कोइ लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही और नहीं अबतक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां हमें, अनावश्यक विचारणा से मन को हटाते हुए उसे सार्थक संकल्प को सौंपता हैं , फिर धीरे -धीरे निर्विचारता तक उसे लाना है।जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत कर्म है। यही हमारा ध्येय है। साधक कहते हैं। दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर समय नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते है। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है तभी तक दुख है। पर न जाने कैसा भटकाव है। प्राणी दुख से भागता हुआ भी सुख की भूल भुलैया में इतना उलझा रहता है...............तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्वियों की तलाश में हठयोग में, या सुख की कामना मे ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है , गुरू डम के भटकाव में भटक जाता है। नहीं, हमें इसी जीवन मे शास्त्रानुसार बताए मार्ग पर चलकर अभ्यास सत्संग और स्वाध्याय द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यान योग ही सहज और सुगम वह मार्ग है जो संतो का साध्य पथ रहा है। इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो प्रयत्न आज से और अभी से ही किया जाए।

Sunday, November 27, 2011

साधन सूृ

साधन सूत्र
पर यह यात्रा सहज नही है। इसमें कई रूकावटें है। सुख लोलुपता भय सौंपती है। भय है, जिन चीजों में जिन वस्तुओं में, रूपों में, व्यक्तियों में मन उलझ गया है, रस लेता है, उनके छूट जाने का। सच तो यह है कि इस सुख लोलुपता के कारण व्यक्ति सारी उमर दुख झेलते हुए भी उसके कारण को समझ नहीं पाता है। समझ भी लेता है तो छोड़ने का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत वह भक्ति के नाम पर इस लोलुपता की मांग ही अधिक करता है।भक्ति प्रायः साधक को भटकाती ही रहती है,वह याचक बनता चला जाता है।
1. बुद्वि और विवेक में अंतर है। विवेक सत्यरूपी सूर्य की किरण है जो हमेशा सतपथ की ओर बढ़ने के लिए संकेत करती है। बुद्वि का आदर होने से सांसारिक लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्वार्थभावना भी बढ़ती है।
बुद्वि लाभ -हानि अधिक सोचती है। यहां सत-असत का भेद नहीं है।
अतः विवेक का आदर होना चाहिए। साधक को जो जाना गया है, उसका आदर करना चाहिए। बु(ि से जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं,हम गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।
2. विवेक का आदर होते ही, देहाभिमान टूटता है। शरीर भाव बहुत ही पुख्ता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी यह नहीं जाता। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का ही गुलाम हो जाता है। यह सूक्ष्म अंहकार है।यहां हम जो सही है उसके समीप आजाते हैं।हम अपने पुरूषार्थ से परिचित ही नहीं होते हें उसका सदुपयोग भी करने में समर्थ हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस अवस्था का बहुत ही सुंदर वर्णन है गोपियां जो सबकुछ छोड़ आयी, वे भी यह सोच कर कि उन जैसा प्रेम और कहीं नहीं कृष्ण जो प्राप्त थे उन्हे ही खो देती है। और तो और वह विशेष गोपिका जिसके साथ उन्होंने आराधना की थी। वह भी इसी अहमभाव में डूब जाती है और जब पाती है कि कृष्ण उसे भी छोड़ गये हैं.. वह व्याकुल हो उठती है।
कृष्ण के पदचिन्हों को ढूंएती हुयी अन्य गोपियां जब वहां पहुंचती है तो वे भी उसे उदास पाती है।यह सूक्ष्म अहमभाव साधना में विघ्न उपस्थित करता है। ऊंची से ऊंची अवस्था में भी व्यक्तित्व का मोह बना रहता है। यही द्वैत है। दूसरे से अपने को श्रेष्ठ समझने की भावना। दरअसल गुणों का संग्रह करने की भावना भी बाधा उपस्थित करती है। जब तक गुण की सत्ता है तभी तक दोष भी विधमान है। अतः साधक को चाहिए कि वह विवेक का आदर करे। मैं ओरों से श्रेष्ठ हूं यह अहमभाव साधक को वहां पहुंचा देता है जहां से यात्रा शुरू हुई है। अतः यह याद रहे, साधना का यह अर्थ नहीं है कि दोषों की अस्वीकृति के साथ ही गुणों को स्वीकारता चला जाये। यह गुणों की स्वीकृति एक मान्यता बना देती है उससे मोह हो जाता है। यह मोह अभिमान पैदा करता है, फिर साधक वहीं का वहीं रह जाता है।
3. साधक के लिये जैसा कहा, दो रास्ते हैं - पहला संसार की महत्ता उसे सौंपता है। दूसरा संसार को कत्र्तव्य भूमि बताते हुये उसे दासता से मुक्त करता है। सुखों की उपासना उसे गुलाम बनाती है। व्यक्ति अजाने सुख की लालसा में गुलाम रह जाता है। साथ ही कामना पूर्ति का अभाव उसे व्यथित कर देता है, तथा कामना पूर्ति का सुख उसे प्रसन्नता देता है। वह इसे ईश्वर कृपा कहता है और प्राप्त दुख को हटाने के लिए सद्गुरू तथा भगवान की शरण लेता है। वह दुखी होते हुए भी संसार की गुलामी नहीं छोड़ पाता है। अधिकांश इसी स्थिति में जीते हैं। कामना पूर्ति का लोभ उन्हें व्यथित बनाए रखता है।
इसीलिए साधक को चाहिए कि वह इस विघ्न को समझे। प्राप्त समझ का आदर करे। समझ ही उसे स्वाधीनता की ओर अग्रसित करेगी। वह कामना का स्वरूप समझ पाएगा तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को सहज भाव से जी सकेगा। समत्व बुद्वि यही है। साधक के लिए कामनाओं का पूरा होना या न होना समान ही है। परिस्थितियां प्रारब्धवश होती है। प्रयत्न उनका चिंतन नहीं उनकी सहज स्वीकृति है। उन्हें जिया जाए......उनका चिंतन व्यर्थ है। फल जो भी हो उसे प्रारब्ध मानकर स्वीकारा जाए। फल से पलायन तथा विचलित होना साधक के लिए उचित नही है। परिस्थितियां साधक में विवेक जागृत करने के लिए आती हंै।
जो भी कर्म सामने उपस्थित हुआ हे मन को अधिक से अधिक वहीं रखना चाहिए,किंचित मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए।कर्म की पूर्णता निश्चित ही पूर्णता का फल स्थाई शांति में सौंपने में समर्थ है।
4. कई बार ऐसा होता है कि हम प्राप्त परिस्थिति में सुधार की बात करते है। यह नहीं होता तो कितना अच्छा था, शायद इसके स्थान पर यह दूसरी नौकरी मिलती तो मैं बहुत खुश रहता, यह विकल्पों की यात्रा बड़ी लम्बी है। यही प्रमाद है, यही भ्रम है।
हर परिस्थिति प्रभु का प्रसाद है। प्रारब्धवश प्राप्त है। वह साधन के लिए ही है। परिस्थितियों में जान बूझकर किया गया परिवर्तन सिलसिले को बढ़ाता ही है। हां, यह जरूर है कि हर परिस्थिति का सदुपयोग किया जाए। सदुपयोग से परिस्थिति का भोग समाप्त हो जाता है। सुख के सदुपयोग से, विनय प्राप्त होता है। यह मनुष्यत्व है। दुख का सदुपयोग वैराग्य सौंपता है।वस्तु के प्रति आसक्ति कम होने लगती है,साथ ही हमें अपनी सहनशीलता, कठिनाइयों में प्रसन्नता का अनुभव भी होता है।परिस्थितियों की निंदा,दूसरों पर दोषारोपण,उचित नहीं है।
परिस्थितियां जो भी प्राप्त है, वही हमारा वरण है। उनकी स्वीकृति ही जीवन का आदर है। प्राप्त का सदुपयोग और अप्राप्त का चिंतन छोड़ देना ही उचित है। इससे अभ्यास मे बहुत ही सहायता मिलती है। यह साधक को वह मंगलमल विधान सौंपता है जिससे कि उसका पारिवारिक जीवन ही मंगलमय हो जाता है। जहां भी हम रहें, होश में रहें। तो हर कार्य कुशलता के साथ तो होता ही है, साथ ही करने का भाव भी छूटने लगता है। प्रायः यह जो हम भविष्य पर टालते हैं कि आज नहीं कल करूंगा पहले यह हो जाए तब वह करूं, यह चिंतन साधक के लिए उचित नही है।
जो करना है, आज ही करना है।
साधन के लिए हिमालय की किसी कंदरा में नहीं जाना है। जहां भी रहंे, जिस समय रहे, वहीं से शुरू किया जा सकता है। साधन का अस्तित्व ही वर्तमान मे है। न वह स्मृति में है, न जीवेषण में। इस तरह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग ही साधन का लक्ष्य होना चाहिए।
बाह्य यह जो जगत है, इसमे जो मान अपमान है, आदर भाव है, अवहेलना है, साधन क्षेत्र में इसकी कोई उपयोगिता नहीं।इसे एक सीरियल की तरह लेना चाहिए,ज्यादा विचलित होने की जरूरत नहीं है।यह संसार गतिशील है, जो परिस्थिति आज है कल नहीं रहेगी।इसलिए बात-बात पर उत्तेजित होना ,अशांत होना उचित नहीं है।
हर प्राणी जो किसी भी स्थिति मे है वह अपनी योग्यतानुसार अपने विवेक का आदर कर साधन निश्चित कर साध्य को पाने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि लक्ष्य मात्र अध्ीिक से अधिक वत्र्तमान में रहना है।
5. हर साधक, साधन का यह अर्थ समझता है कि यह उसके भौतिक लाभ में सहायक होगा। यह सोचना ही गलत नहीं हैै। परन्तु भौतिक सुख के लिए आवश्यक है कि प्रयत्न किया जाए। प्रयत्न की सफलता भौतिक सुख देती है। जो भी प्रयत्न हो पूरी ताकत से किया जाए।मन की शक्तियां अधिक से अधिक वहीं रहें।
यह कहना है कि जो साधक है, वे इस जीवन मे धनी होंगे, स्वस्थ होंगे, वस्तुएं प्राप्त करेंगे, यह सोचना ही गलत नहीं है। क्योंकि साधक जब अपने विवेक का आदर कर अपने पुरूषार्थ का सदुपयोग करता है तब उसे भौतिक सुख जो उसके प्रारब्ध से उसे प्राप्त होने हैं ,वे तो प्राप्त होंगे ही कर्मो की श्रेष्ठता से यह अवधि बढ़ती भी चली जाती है।

6. सीखना एक अनवरत क्रिया है। साधक के लिए आवश्यक है कि वह सदैव प्रयोगशील रहे। प्रयोग का अंत कहीं नहीं है और न ही प्रयोग दूसरे के अनुभवों पर आधारित है। हर साधक का पथ उसको खुद की यात्रा ही नही है वरन् वही उसका प्रयोग है। अतः यह उसे कभी नहीं भूलना कि वह साधक है और प्रयोेगरत है। प्रयोग वही कर सकता है जो जगा हुआ है। सोया हुआ कभी कुछ जान नहीं सकता। अनुभव के लिए जागरूकता आवश्यक है। अतः साधक को अपनी मान्यता की कभी विस्मृति नहीं होनी चाहिए।
7. इस विस्मृति से ही साधक प्रायः अपनी साधन प्रणाली से मोहकर बैठते है। जैसे जप करने वाले जप को ही साधन मान लेते है। आसन लगाने वाले आसन को कभी छोड़ नहीं पाते। यह याद रखना चाहिये कि साधन सामग्री जो है वह प्रयोग की सामग्री है। हर सामग्री प्रयोग में सदा काम नहीं आती। जो कभी प्रारम्भ में काम आती है। वह कुछ ही समय बाद छूट जाती है। प्रयोग में मोह नहीं रहता। हां, साध्य के प्रति, कुतूहल रह जाता है। साधक प्रायः अपनी साधना की प्रणाली से इतना एकाकार हो जाता है कि वह अपने साध्य को ही भूल जाता है। उसे ही सबकुछ मान बैठता है। यह सबसे बड़ा विघ्न है। साथ ही प्रणाली के प्रति यह जो आसक्ति है वहअहं भाव पैदा करती है। साधक अपने साध्य को छोड़ कर साधन को ही सबकुछ मान लेता है। इससे वह साध्य से विचलित हो जाता है।
8. साधन यात्रा मे सबसे बड़ी कठिनाई, छोड़ने और छूटने की होती है। साधन उबाऊ और नीरस नही है। जो अपने साध्य के प्रति समर्पित है, वह कभी नीरस नहीं हो सकता। उसमें तो नित्य प्रियता रहती है।
इसीलिए छोड़ने और छूटने पर अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये। अगर वर्तमान का आदर रहे, व्यर्थ के चिंतन में मन को नहीं जाने दिया जाये तो जो कुछ छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। हां, आवश्यक है कि विवेक का पूरी तरह आदर किया जाए, विवेक जन्य आचरण रखा जाए, जिसे छूटना है वह सहज ही छूट जाता है। जो जाना गया है उसका पूर्ण आदर किया जाये तभी आचरण में शुद्वता रहती है।
पर होता विपरीत ही है। साधक और सिद्व भी जो जाना गया है अपने आचरण में उससे विपरीत रहते है। अहं सबसे बड़ा विघ्न है। साधक के लिए गुणी का आरोपण नहीं होना चाहिए। ऊपर से ओढ़ने के स्थान पर , विवेक का आदर और उसके अनुरूप आचरण ही पर्याप्त है।
9. साधक के लिए जो प्राप्त हो चुका है। प्रारब्धवश मिला है, वह उसके ही कृत संकल्पों का परिणाम है। यह जान लेना ही आवश्यक है। जो संबंध प्रारब्धवश बन गए हैं, माने गए हैं उनके प्रति कर्तव्य परायणता आवश्यक है। जो संबंधों को तोड़कर भगने को साधन मान बैठे हैं। वह कहीं भी लाभ नहीं ले सकते।
हां, जो संबंध हैं ? वहां अधिकार भावना के स्थान पर सेवा का भाव रखने से साधन में सफलता मिलती है। सेवक के लिए कत्र्तवय परायण होना आवश्यक है। जो हमारा है उसका ही हम त्याग कर सकते हैं, त्याग हम अपनी स्मृयिों का ही कर सकते हैं, वे ही हमारी संपत्ति हैं। वस्त्र बदलना ,घर छोड़ना, कोई त्याग नहीं है, घन की वस्त्रों की ,भोजन की आवश्यकता सभी को होती है,सन्यासियों की आवश्यकताएं गृहस्थों से अध्ीिक होती हैं।इसलिए त्यागी होना आवश्यक है। जोे निरंतर वत्र्तमान में रहना चाहता है वही त्यागी है। वैराग्य वस्त्रों का परिवत्र्तन नहीं है, अनावश्यक कल्पनाओं के बोझ को छोड़ते जाना ही वैराग्य है।साधक को चाहिए कि वह परमात्म भाव से कत्र्तव्य कर्म करे, यही वास्तविक सेवा है। जो संबंध है, उनकी कर्तव्य भावना से पूर्ति करे।
10. साधक मे अपने साधन के प्रति अनन्य प्रेम, विश्वास जब तक नहीं होगा उसे सफलता नहीं मिलेगी। प्रायः साधक सारी उम्र साधन तलाश करते रहते हैं, जबकि साधन उनके ही पास उपलब्ध है। जो असाधन है उसका त्याग हो तो साधन है। पर वे भटकते रहते है। शास्त्रों का अध्ययन करते है तो वहां भी शंका करते है। सद्गुरू से मिलते है तो तार्किक बुद्वि ले आते है। गुरूवाणी मे तलाशते हैं कि यह शास्त्रों से कितना मेल खाता है। हर जगह वे संदेह से भरे रहते है। यह पहले ही कहा गया है कि रास्ते अलग अलग है मंजिल एक ही है।
हां, रास्ता चुनने से पहले खूब सोच लो, तर्क कर लो, पर जब समझ आ गई हो तो तब चलना ही श्रेयस्कर है। वहां वादविवाद होना, संदेह होना लाभप्रद नही है।एक ही सफलता का सूत्रा है जो भी हम कहें ,जोभी हम करें उसके प्रति हमारे भीतर पूर्ण विश्वास हो।
11. साधन यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई, साधन के चयन की है। साधन का यचन अपनी योग्यता तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हर साधक अपनी मांग को अवश्य जानता है। फिर भी अगर निर्णय लेने में परेशानी हो, असुविधा हो तो सदगुरू की शरण में जाना चाहिए।
शिक्षक और सद्गुरू में भेद है।
शिक्षक जानकारी देगा। शास्त्र वचनों के आधार पर साधक को समझाएगा पर सद्गुरू निजी अनुभव के आलोक में साधक के विवेक को जागृत करेगा।
विवेक अलौकिक है। वह एकाग्रता का फल है।
सद्गुरू पर पूर्ण विश्वास करके उसके आदेशों को स्वीकार करना चाहिए। साथ ही अन्य साधकों से न तो अपनी तुलना करनी चाहिए और न ही उनका अनुकरण करना चाहिए। सब अपनी योग्यतानुसार बढ़ते है।
जिस प्रकार एक ही रोग की एक ही दवा तथा एक ही पथ्य होते हुए भी रोग की अवस्थानुसार रोगियों को अलग अलग मात्राऐं दी जाती है, वही स्थिति साधन प्रणाली की है। हर साधन हरेक के लिए आवश्यक नही है।
12. साधन यात्रा मे कई पड़ाव आते है। साधक प्रायः एक दूसरे को देखकर मन में कई बार हीनता का भाव ले आत है। इसलिए प्रायः साधन को प्रायः गुप्त रखनेके लिए कहा जाता है प्रायः जो अतिरिक्त अनुभूतियां हैं वे एक दूसरे की समान नहीं हो।
उदाहरण के लिए एकाग्रता कर अंतिम अवस्था में कई बार साधको को प्रकाशपुंजों का जो कि बैंगनी रंग के होेेेेेेेेते है दर्शन होते हैं, किसी किसी की यह न हो कर अनवरत ध्वनियां सुनाई देती है, प्रारम्भ में ये बहुत तीव्र होती है साधक डर जाता है, वह कान मे दवाई डालने लग जाता है किसी की सूक्ष्म नाद, झींगुर की तरह या घुंघरू की तरह सुनाई देता है। नाद की कई अवस्थाएं है। परन्तु सच तो यह है कि हर साधक के अनुभव दूसरे से पृथक है।
यही स्थिति स्वप्न और ”विजन“ की है। स्वप्न और ”विजन“ में अंतर है। विजन स्थाई सा रहता है। आंख खोले रखने पर भी उसकी प्रतीती होती है। पर ये विजन तथा स्वप्न हर साधक की स्थितियों के आधार पर अलग अलग होते है।
प्रायः साधक यहां अनुकरण शुरू कर देते है। इस बारे मंे कई बार जो धारणाएं बन जाती है। उन्हें ही वे पाने का प्रयास करते है।
साधक अपनी साधन यात्रा से विचलित हो जाता है।
13. साथ ही साधको की भी अवस्थाएं है। उनकी मानसिक अवस्था के आधार पर उनके भेद हैं । कुछ हैं जो अपने दोषों से, अपने दुख से इतने व्याकुल हैं कि वे निर्दोषिता प्राप्त करने के लिए चल दिए है। उनका हर पल साधन को समर्पित है।
कुछ साधक है, समझते भी हैं। समझ का आदर भी करते हैं, पर सुख लोलुपता छोड़ नहीं पाते है। से साधन मे स्थिर नहीं रह पाते और तो और वे अपने दुख का कारण अपने से बाहर तलाशते हुए उसके रूपांतरण का प्रयास भी करते है। वे जानते हुए भी आचरण में अपनी समझ को नहीं ला पाते। कहते हैं, समझ तो गया परन्तु अभी इसके लिए समय नही है। उन्हें दोष पता तो है परन्तु अभी व्याकुलता बढ़ी नही है कि वे बदलने के लिए प्रयास करें।
इसलिए सद्गुरू सत्संग और सद्गुरू की शरण एक मात्र आधार है।
सत्संग से आत्म प्रशंसा रूकती है और निज का दोष दर्शन शुरू होता है। वह समझ का आदर करने लगता है।
सदगुरू की आज्ञा मानते ही विनय प्राप्त होता है। विनय ही विवेका की तरफ ले जाता है। विनय ही अंहकार को तोड़ता है। अंहकार ही अविद्याा का जनक है। इसलिए विनय महत्वपूर्ण है। विनय अलौकिक है। विनय ही विाद्या प्रदान करता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है।
सर्वाधिक संख्या उनकी है जो विवेक का महत्व समझते तो है परन्तु अपने आपको इस दुख से इस दोष से, बाहर आने में असमर्थ मान लेते है। वे संसार की भागदौड़ में उलझ कर ही रह जाते है। यहां, बुढ़ापा ही भगवान के भजन के लिए छोड़ दिया गया है। इनके लिए वर्तमान में तो समय है ही नहीं। ये सब उधार की जिंदगी जी रहे है। उनके लिए खुद के लिए एक मिनट भी नही है। वे जीवेषणा में जीवित है। वे भविष्योन्मुखी है। कल में ही वे सबकुछ करना चाहते है। ये लोग सद्गुरू के पास भी जाते हैं तो भौतिक सुख को कामना ही शेष रहती है।
इनसे भी नीची अवस्था उनकी होती है जो प्राप्त समझ का दुरूपयोग करते है। ये आध्यात्मिक जानकारी को पेट भरने का धंधा बना लेते है। ये आध्यात्मिक सूचनाएं बेचते हैं। धन ही इनका लक्ष्य रहता है। ये स्वयं साधन यात्रा पर न होते हुए भी साधन की चर्चा सर्वाधिक करते हैं इन ज्ञान बंधुओं को साधन का लाभ कभी प्राप्त नहीं होता है।यह आवश्यक नहीं है घर वापिस पहुंचने के बाद वापसी इसी रूप में हो,इन परिस्थिितियों से भी बदतर स्थ्तिि में लौटना हो सकता है।यह जीवन अत्यध्ीिक महत्वपूर्ण है।साम्थ्र्य का सदुपयोग ही सार तत्व है।
14. हर साधक को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधन यात्रा में आत्म प्रशंसा ही शत्रु है मन जो हीन भावना से ग्रस्त रहता है वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा में लिप्त हो जाता है।
क्यों ?
यहां भी तो संतोष मिलता है। पर आत्म प्रशंसा व्यक्ति के विकास में बाधक है। वह कभी आपको अपने आपसे संलग्न नहीं कर पाती। दूर ही रखती है।
आत्म प्रशंसा-आत्मनिरीक्षण में बाधक है। जब हम अपने दोषों से जी चुराना चाहते है। तभी आत्म प्रशंसा में डूबते है। खोलखलापन जो है, वहां गूंज जोरों से होती है। ओर जो दोष है, वे उसी रूप में विधमान रहते है। अगर देखनी है तो अपनी बुराई देखिए।
15. दूसरों के दोष देखने से निज का अंहभाव दृढ़ ही होता है। आत्मनिरीक्षण रूक जाता है। साधन पथ में यह सर्वथा अहितकर है। पर दोष चिंतन में मन असाधारण गतिशील होता है उसे रस मिलता है। निंदा स्तुति ही प्रायः मनुष्य की पहचान हो गई है।
साधक को चाहिए कि वह इससे बेचे।
परदोष चिंतन और आत्मप्रशंसा का मुख्य कारण है,
वाचालता।
हमें कुछ ना कुछ बोलने की आदत ही हो गई है। साधन यात्रा में अगर संयम करना ही है तो वाकसंयम आवश्यक है।
जब साधक निरन्तर बोलता है, तब दो ही रास्ते बने हैं -
1. आत्म प्रशंसा 2. परदोष दर्शन।
इससे मन और अधिक विक्षोभ में डूबता है। तनाव रहता है।
साधन में यह बाधक है।
16. वाचालता का प्रमुख कारण स्मृति है।
स्मृतियां ही व्यर्थ का चिंतन करती है।
मन जब व्यर्थ का चिंतन करता है तब आवश्यक संकल्पों की पूर्ति नहीं हो पाती। कर्म तभी सफल हो पाता है जब अनावश्यक विचारणा का दबाब नहीं होता है। यहीं कर्म कर्तव्य बुद्वि से जन्य होकर सार्थकता देने में सफल होता है।
यह व्यर्थ का चिंतन होता है, स्मृतियों में रस लेने से । स्मृतियां ही तो अचेतन मन में संग्रहित है। उनके साथ असहयोग होते ही उनकी अर्थवत्ता समाप्त हो जाती है वर्तमान में रहने की यही कला है कि स्मृतियों के साथ सहयोग न किया जाये। तभी आगे पीछे का व्यर्थ चिंतन रोका जा सकता है।
स्मृतियों का दबाब कम से कम होता जाए इसके लिए आवश्यक है:-
1 आप शांत होकर बैठें संकल्प लें आप किसी से भी नाराज नहीं हैं,जिनके प्रतिनाराजगी है ,उन्हें याद करें ,उन्हें अपने अंतः करण से क्षमा करदंे।जिस को भी आप अपना इष्अ मानते हैं कल्पना करें वे आपके साक्षी हैं।
2 जो आप से नाराज हैं,उनको याद कर उनसे भी क्षमा मांगें।
दस दिन बाद आप पाएंगे आपके विचार भी कम होने लग गए हैं
विचारों के कम होते ही विकारों का कम होजाना स्वाभाविक है।इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता है।

gurukul

 
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