Saturday, November 26, 2011
Friday, November 25, 2011
साधन का उपाय
”जो है“ उसी पर ही ध्यान केन्द्रित रहे यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहता है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर, मन और संसार सब बदल रहे है। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर में क्या अंतर है ? जो निरन्तर बदल रहा है वह सत्य नहीं। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है, उसी का ही चिंतन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह जो है उस पर जब ध्यान पहुंचता है तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान ”जो है“ उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है, वह मन है। तभी तो सारा ब्राह्यंड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान मनोनिग्रह का साधन कहा गया है।
प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यंत्र, रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान मात्र एकाग्रता नही है। एकाग्रता मन का बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मंत्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। एकाग्रता के बाद ही अन्तर्यात्रा प्रारम्भ होती है। परन्तु एकाग्रता को ही साधन यात्रा स्वीकारने से साधक साधक पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा यह मंत्र यह नाम फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनः और अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान“ एकाग्रता नही है।
”ध्यान“ सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन का पथ है,यहयह भी आंशिक सही है। हम जो भीतर है, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही सही विश्वसनीय पहचान हो,यहां ”ध्यान“ प्रक्रिया है। हम जो हैं एक स्थिर इकाई नही है। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आन्तरिकता नही है।
मन के संकल्प विकल्प की अनवरत श्रंृखला है। इसी श्रृंखला, इसी विचारणा का सतर्कता पूर्वक किया गया अवलोकन होना ,ध्यान की प्रक्रिया हैै।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नहीं रखना है। बनी बनाई पूर्व निर्धारित कल्पना को क्या देखना । जो बात तय कर ली जाए, जैसे कोई नाम, कोई रूप उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही है, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर संपूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः एक खालीपन एक गैप ,विचार और विचार के बीच में प्रदान करता है। यह अंतराल ही, यह खलीपन ही साधना का एक पड़ाव है।
मन का आगे पीछे का चिंतन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह बेहोशी है, यह नींद है।
सच है हम जागते हुए भी सोए रहते है। कोई पूछे तो हमे लगता है, हम कहीं ओर थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधक स्वयं को प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलाएगा।
मन की गति असाधारण है। क्षण भर में ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती है। चित्र ही चित्र। न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे है। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम अपनी पूंजी मान बैठे है। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती है। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियां के साथ असहयोग करे तो संभव है कि मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है, न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पाऐंगे। जो कुछ है भीतर अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ उसे बाहर तो आने दे। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंद लाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं, और अस्वीकार करने लग जाते है। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते है। यह क्या है, यह तो पलायन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नही है। यह अज्ञान ही है। यहां हमारी जागरूकता यही है। कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम है हाजरी रहे।
छात्र कक्षा में आते हैं, बैठते हैं। पर जरा पूछो तो लगता है यहा थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान“ गायब होने का नाम नहीं, साक्षात अनुभवन है। जो कुछ है उसका विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्त्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नही है, हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन टूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञान रूपी कूड़ा कचरा जल कर राख हो जाता है। बंधन, वे पाश जिनसे हमने अपने आपको बांध रखा है, टूट जाते है। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते ही शेष रह जाता है, खुला आकाश निरभ्र और शांत जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रख कर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती है। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवद् इच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख दुख के झंझावत से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। यही भगवत्इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाए रखती है।
शास्त्रों में इसे ही योगमाया कहा जाता है। यही सोच मोक्ष अभिलाषा है यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा...... संसार से पलायन नही है।
यह संसार के प्रति सही संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आम्यंतरिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशांत रखता है, उसे दूर करने का है। इसलिए यहां व्यक्तित्व का संपूर्ण रूपान्तरण है। यहां आभ्यांतर तथा बाहय जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म को साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्मभाव से ऊपर उठ कर आत्मानुभव ही नही हैं, परन्तु साथ ही उस परमात्मभाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहंी ओर भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल भी तो स्थिर नहीं रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितनागंदलाया, जल है। हमेशा निज को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्यों वहीं तो इसका रस है। जब तक उसे संसार से निराशा नहीं होती तब तक मन का अपना जो स्वरूप है वहां लौटना असंभव ही है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं है। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती है। ज्यों ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यो त्यों भगवत्कृपा के हम हकदार बनते चले जाते है। साथ ही जितनी भगवत कृपा हम पर होती रहेगी उतनी ही निम्न प्रकृति भी शुद्व होती रहेगी। यह साधारण नियम है। इसीलिए बर्हिजगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जाएगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन को छोड़ा ही छूटा है, और मन का ग्रहण किया चिपटा है।
चित्त शुद्वि और भगवत कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते है। यही साधन यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति उस विराट शांति की जिसके लिए हम इस अन्र्तयात्रा पर गतिशील है।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिस में जिस संसार की उपस्थिति है उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
कभी आचार्य ने कहा था। ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। और साथ ही जगत ही ब्रह्म है।
यह तीसरा कथन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यही तो आध्यात्मिक यात्रा की उपलब्धि है। यह पूर्व कथनों की अवहेलना न कर उन्हें ही अधिक स्पष्ट कर रहा है। यही वह स्थिति है जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान अनासक्ति भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक ही नहीं रह जाते हैं, वरन् आचरण मे स्वतः ही आ जाते है। यही तो भगवतकर्म है। जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करती है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन् जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठकला है। अभिलाषाओं सेसन्यास ही तो विक्षोभ का अंत है। यही तो मोक्ष है।
इसीलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है और साथ ही इस शरीर को भगवतकर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती है वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती है। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए मनोनिग्रह के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से विक्षोभ का अंत संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है तभी सकल त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां है। जन्म जन्म का संस्कार है।
स्थिरता के लिए वांछनीय है, इन स्मृतियों से असहयोग। साधक स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। अतीत के जो निष्कर्ष हैं, वे साधन पथ के चयन मे सहायक तो हैं पर मन का बार बार स्मृतियांे जाना तनाव ही लाता है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है। वह अशुभ ही अधिक है। दुखद है। वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी। जब तक यह ताला बंद है। मन का शांत भाव में आना असंभव ही है।
हर साधक प्रयोगशील है । उसे चाहिये अनंत धैर्य अनंत प्रतीक्षा। साधन के प्रति गहरा विश्वास। जब तक विश्वास नहीं होगा, सफलता नही मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगता पूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। यह एकाग्रता से प्रारम्भ होकर स्थिरता प्रदान करता है। निरन्तर सजगता पूर्वक की गई मन की निगरानी स्थिरता प्रदान अवश्य करेगी। यहां कोई दबाव नही है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाह्य आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन् जो जरूरी नही है उसको छोड़ना है इसी से ”जो“ है उस स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है, आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक हो, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो संपूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः, ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। और उसमें जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ”जो“ जरूरी नही है, उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी हे।
जहां भी रहे जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहे। हम वहीं रहे उसी क्षण में रहे।
स्मृतियां तथा आकांक्षाओं मे जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिंदगी से पलायन नही है। वरन् जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है। यहां संसार को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं कोई विचित्र वेशभूषा धार ण करनी है,संसार में रहते हुए ही अपनी सर्वोत्तम भूमिका प्राप्त करनी है।हम जहां भी हैं ,जो भी कार्य कर रहे हैं,उस कार्य को बेहतर करते हुए,वहीं जीवन में सुख एवं शांति पासकते हैं।
साधन मात्र है ,निरंतर वत्र्तमान में रहने का अधिक से अधिक से अधिक अभ्यास रखना।यहां किसी भी प्रकार के पलायन की कोई आवश्यकता नहीं है,जितना हम वत्र्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ाते जाएंगे उतना ही जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाता है।सुख इन्द्रियों के माध्यम से मन ही प्राप्त करता है,स्थायी सुख ही शांति की ओर लेजाता है।
Thursday, November 24, 2011
साधन क्यों ?
यह प्रश्न और कहीं नहीं हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधन क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। पर अगर उत्तर नहीं में आए......तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है, यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है, जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास, सब उसी के रूप है। पेट की भूख और शरीर की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं है। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं भी बढ़ती है। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बर्हिमुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरंतर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है, वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता, उसे विश्राम की स्थति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अंत प्रशांति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके संपूर्ण जीवन की यात्रा है।वह गहरी नींद से जन्म लेता है फिर उसी में लौट जाता है।
विश्राम, मन की स्थिरता है, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्र्तमुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।मनुष्य संभावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की संभावना। जैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्विक आवश्यकताएं यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है। और इन सब आवश्यकताओं का एक लंबा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यां चाहता हूं ? मैं, आखिर जीवित ही क्यों हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नही है, चलता ही रहता है। पढ़ना, रोज पढ़ना...........नौकरी तक......नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा तब तुष्टि किसे ?
अक्सर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे, इन सबके पीछे जो भीड़ है............वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार। उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए ।
यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और सकल्प पूर्ति का अभाव दुःख देता है।
यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख।
सुख अल्प है, दुख अनंत है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है...............एक बड़े आधार को खोज जो दुख दूर करेगा...........अनवरत सुख देगा।
अनंत सुख।
और यही नहीं मिलता है.................
शेष रह जाता है, विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यही से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज........
जहां अमृत है।
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो इसके पूर्व ही हजार कामनाएं पैदा हो जाती है। क्या वे सब पूरी हो पाती है ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती है।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा,.............प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में , समाज में, धन में, मकान में, धर्म में, यश में, हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नहीं है।यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है, हमेशा आज मंे ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है उनसे कुछ मांगता है, और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है वही वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है उसका कभी नही हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है,परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कमी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका है। हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है, अपने को छोड़कर, परे सुख को खोज करना।
जो स्वभाव है, जो है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण की तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख, दुखी के उद्वार के लिए आता है। उसकी समझ को जागृत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ”जो है“ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकीआवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है, खोजी होता है।
”जो“ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था अभी भी जीवन में था, पर बुद्वि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही अविवेक छूटता है। विवेक ”जो“ है उसके प्रति आदर भाव तथा ”जो“ नहीं है उसके प्रति अनादर का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते है। विवेक के जागृत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है वह आचरण में आने लगता है।
साधन प्रारम्भ हो जाता है।
साधन कहीं बाहर नहीं, अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिंतन ही बाधक है। जो स्मृतियांे तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है।
यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नहीं होगी तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख है वह जगत के कारण से है। जगत ही सुख देने वाला है। जगत ही दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती, अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती है। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़तीहै। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही, वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह में डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति मंे प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत है। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा बिम्ब रहा। जाते ही जल फिर वही दर्पण का दर्पण।
यही तो प्रशांत मन है।
उस दिन पाया, शरद के शांत सरोवर में भी हवा के स्पर्श से लहरें उठ गयी। तब जाना मात्र सरोवर का उद्वेलन हीन होना ही साध्य नहीं है। कामना निवृत्ति से प्राप्त शांति भी स्थायी नहीं है। उसमे रहने का भाव, साधक के मन में सूक्ष्म अंहकार जगा देता है। यहां से पार जाना ही कठिन है।
उसके जगते ही यह जो दूसरा है, संसार है, वह उपस्थित हो जाता है। हो सकता है, साधक उपदेशक बन जाए, ऋषि महर्षि हो जाए, भगवान बन बैठे। संसार पर प्रभाव डालने की आकांक्षा बलवती हो जाती है। साधक अपनी विशिष्टता स्थापित करने के प्रयास में डूब जाता है। वह पुनः संसार के आकर्षण में लौट आता है।
तो फिर ?
जल का बर्फ हो जाना ही यहां साध्य है। सुख दुख, शांति से परे ”जो“ है वही साध्य है। यह सच है शांति बहुमूल्य है। पर अंत मे उससे भी परे जाना है। तभी ”जो“ है उसकी प्राप्ति संभव है। साध्य वही है। जो नित्य है, तथा जिसकी प्राप्ति से नित्य अभय और नित्य शांति प्राप्त होती है। यही धर्म का रहस्य है। जो धार्मिक है वह इसे पाने में समर्थ है। जिसकी प्राप्ति सहज हो, जो दूर नहीं जो विनाश युक्त न हो, तथा जिसमें आत्मीयता हो। जो इसी जीवन में, आज में अभी ही प्राप्त किया जा सकता है, वही साध्य है। साधन की सही समझ और विवेक के प्रति आदर भाव साध्य से अवश्य ही मिला देता है। जीवन आज में, अभी में, वर्तमान में ही जिया जाता है। वही साध्य उपस्थित है। विवेक का आदर होते हीमन की रूग्णता चली जाती है, जो दुख का कारण है।
हाॅं, यह जो कल है,हमेशा स्मृति की कोटर से निकल कर आता है, वहीं वापिस लौट जाता है।स्मृति जननी है ,वह निरंतर विचारणा को सृजित करती रहती है।अवधारणा
ीभी वहीं जगह पाती है।यह वह ऐसा है, वह तो ऐसा ही है,विचारणा ,अवधारणा का आधार पाकर और पुख्ता होती जाती है।तब विचार बन जाता है। यही विचार मन का
ही स्वरूप है। विचार जैसा होता है,मन वैसा ही होजाता है। विचारों का परिवर्तन ही मौलिक परिवत्र्तन है।
विचार ही भय है, विचार ही घृणा है,विचार ही लोभ है,वही राक्षस भी बना सकता है,और निर्विचारता ही परमात्मा है,वहीं शक्ति है,वहीं शांति है।वह और कहीं दूर नहीं स्वयं के समीप है,जब यह जाना जाता है,तब जानने की जिज्ञासा में जो प्रयास अब तक किए थे तब उनकी अर्थहीनता का पता लगता है।
पूज्य स्वामी जी कहाकरते थे,‘ प्रयासों की आवश्यकता है ,यह जानने के लिए कि उनकी आवश्यकता नहीं रही है।’
शांत रहने के लिए ,शक्ति पाने के लिए आवश्यक है,हम मन के नियंत्रण के लिए,विचारों के नियंत्रण के लिए प्रयास करें।
यही आध्यात्म का मार्ग है,जिसका प्रवेश हमारे अंतः करण से ही होता है।
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