सेवा प्रतिष्ठान वाहक
गुरुकुल बकानी झालावाड़
वर्ष”उर्ध्व कुंभक की स्थिति में पहुंचने के पश्चात जब मन प्राण युति धीरे- धीरे अंदर की ओर हृदय से नाभि तक पहंुचने में सफल होती है, उस समय साधक को इसका स्पष्ट आभास होने लगता है। साधक प्रयोग के रूप में छोटी -मोटी इच्छायें उत्पन्न करके उनकी पूर्ति होते देखकर संतुष्ट एवं अचम्भित भी होता है। धीरे धीरे इस प्रकार के अनेकों प्रयोगों में जब उसे पूर्ण सफलता प्राप्त होती है तब पूर्णतया आश्वस्त होकर वह दृढ़तापूर्वक मन की शक्ति के अनूठे प्रयोग भी करके देख सकता है जैसे अघटित घटनायें भी अपनी इच्छा मात्र से उत्पन्न करना। शरीर को अदृश्य करना, आकाश मार्ग से तथा जल के नीचे से तेज गति से प्रवास करना, क्षण भर में एक स्थान से लुप्त होकर वांछित स्थान पर प्रकट होना इस प्रकार अन्तर्मन की शक्ति से अनेक प्रयोग किए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में ही साधक किसी व्यक्ति के अंतर्मन को प्रभावित करके उसके लिए अपनी इच्छानुसार स्वप्न सृष्टि का निर्माण भी कर सकता है।
पूज्य स्वामीजी विरचित
‘अनंतयात्रासे’’ 1 मई 2012जीवन जीने की कला
साधना का प्रारंभ ‘कर्म’ से ही होता है। कर्म और कर्मकांड में फर्क है। कर्म, स्वाभाविक क्रिया है, उसके साथ जब मन का सहयोग होता है, कर्म बनता है। प्रत्येक इन्द्रिय के अलग-अलग कर्म है। वाणी एक साथ दो काम कर सकती है। यहां से बोला भी जाता है, स्वाद भी लिया जाता है। इसका निग्रह करना सबसे कठिन होता है, हर इन्द्रिय का अलग-अलग कार्य प्रकृति ने निर्धारित कर रखा है।
इसीलिए पहला अभ्यास यही बताया है कि ‘जीवन के समस्त कार्यों में मन को पूर्णरूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।
कई बार होता है, जो कार्य प्रकृति के विरोध में होता है, वहां पर सतर्कता रहे, उसे वहीं रोकने का प्रयास होना चाहिए।
हां, जब मन उसी कार्य में बहुत देर तक रहने का अभ्यासी होने लगता है तो प्रकृति के विरूद्ध में कार्य करने का स्वभाव भी छूटता जाता है।
आदतें
उस दिन कोई कह रहा था, ... क्रोध तो मेरी आदत सी हो गई है। बाद में पश्चाताप होता है, ग्लानि होती है, क्या किया जाए, ...
... विचार करें, क्रोध आता ही क्यों है? हमारी दूसरे से अपेक्षा होती है, वह ऐसा करेगा, वह वैसा नहीं करता है। क्रोध आता है। हम हमेशा दूसरे की गलती ही देखने का प्रयास करते रहते हैं। इससे हमेशा तनाव बना रहता है।
आदत का बनाना, और इसे बनाए रखना हमारा ही बस का है। इसके लिए दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है।
बस आपको संकल्प करना है। संकल्प हमारी शक्ति है। मन की शक्ति है। ... जब भी मन बाहर की ओर बहे, इन्द्रिय उसे खींचे, वहीं सतर्कता रखनी है। आते ही उसे हटाने का प्रयास रहे, ... तो आदर न मिलने पर धीरे-धीरे वह आदत छूटनी शुरू हो जाती है।
... जब हम कुछ पकड़ते हैं, तो कुछ छूटना शुरू अपने आप होता है। आपने संकल्प का आदर किया, दृढ़ता रखी, तो मन की चंचलता जिसे आप आदत कह रहे थे, वह अपने आप छूटने लगती है।
.... अच्छी बातों के ग्रहण करते ही, बुरी आदतें अपने आप छूटने लगती है। छोड़ने का प्रयास मत करो। ग्रहण करने का करो।
जो ग्रहण किया जाता है, वह नियम है, जो छूटता जाता है, वह यम है। पतंजलि ने जो अष्टांग योग बनाया, वह सही है। परन्तु यहां क्रम को बदलना होता है। आप नियम पहले ले आवंे, यम अपने आप सधने शुरू हो जाते है।
मन जितना वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है। उतना ही स्वाभाविक रूप से गुण उसके भीतर आते जाते हैं।
करना क्या है?
यहां तो एक ही अभ्यास बताया जाता है। अधिक से अधिक अपने मन को वर्तमान में रखने का प्रयास करो। शरीर तो हमेशा वर्तमान में रहता ही है। मन ही इधर से उधर भटकता रहता है। उसी को शरीर के साथ, क्रिया के साथ लाकर रखना है। यही अभ्यास है। यहां छोड़ने और छूटने पर बल नहीं है।
मन जितना स्वाभाविक रूप से वर्तमान में रहने का अभ्यस्त होता जाता है उतना ही जो अनावश्यक है, वह छूटता जाता है। इसीलिए कहा गया है, यहां आकर अनावश्यक विचारों का बोझा मत लादो।
स्वाध्याय अच्छी बात है, इससे बुद्धि का परिष्कार होता है। चिन्तन करना शुरू होता है। चिन्तन करो। व्यवहार की कसौटी पर खूब कसो, जो सही नहीं लगे फिर उसे छोड़ते जाओ। सही का आदर ही विवेक का आदर है। सही की परिभाषा यही है कि वह तीनों कालों में सही रहता है।
सत्य का प्रयोग
वाक सिद्धि की बहुत चर्चा होती है, ... वाक पर नियंत्रण रखना पहला अभ्यास है। जैसे किसी बीमारी का इलाज होना है तो उसमें चिकित्सक पथ्य की बात भी करते हैं। यहां अभ्यास मार्ग पर ‘पथ्य’ वाणी पर संयम है। न तो किसी की निंदा हो, न किसी की प्रशंसा, ... हम प्रायः दूसरे की निंदा में रस लेते हैं, तथा आत्मप्रशंसा में डूबे रहते हैं, दोनों ही अहितकर है।
‘पर निंदा जहां हमेशा दूसरे को हमारे चित्त में बनाए रखती है तथा हमें अपने दोष नहीं देखने देती, ... हमारे भीतर परिवर्तन के सारे द्वार बंद कर देती है। आत्मप्रशंसा उससे भी बुरी आदत है।
‘मन जब वर्तमान’ में रहने लगता है, तो जहां वह क्रिया के साथ लगता है, वहां क्रिया के पूरे होने पर संतुष्टि का बोध होता है, वहीं शक्ति भी मिलती है।
... साथ ही जब परनिंदा तथा आत्मप्रशंसा की आदत कम होने लगती है तब स्वाभाविक रूप से मौन में भी हम प्रवेश करते हैं। यही सहज है।
‘अनंत यात्रा’ में कहा है, अहिंसक और परोपकारी होना ही हमारी स्वाभाविक अवस्था है, जो हमें प्रगति की ओर ले जाती है। अहिंसा कोई बाहर से धारण करने वाली वृति नहीं है। यह स्वाभाविक है। किसी दूसरे का अहित सोचना ही हिंसा है। हिंसा मात्र शारीरिक ही नहीं होती है। दूसरे के प्रति गलत भाषा का प्रयोग तथा मन में भी गलत भावना रखना हिंसा है। अहिंसा कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। जितना हम वर्तमान में रहने के अभ्यासी होते जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन अहिंसक होता जाता है।
शारीरिक स्वास्थ्य
क्या हम दूसरें की सहायता, ... जैसे बीमारी दूर होना, ... उनके शारीरिक कष्ट होना यह कम कर सकते हैं?
दूसरों के तो संकल्प से हो सकते हैं, पर अपने नहीं। जो मानसिक शक्ति हमें प्राप्त होती है। उसके साथ ही यह भी पता अपने आप लग जाता है कि अगर हमने अपने लिए करना शुरू कर दिया तो यह अहितकर होगा।
यह भोग योनी है। जो भी कष्ट हों, भोग हो, उन्हें भोगकर ही समाप्त होना है। आपने चाहा, आपके ठीक हो जाए, ... तो कुछ समय तो लगेगा, कि आप ठीक हो गए। फिर इसके बाद जैसे बैंक का ब्याज बढ़कर बाद में आता है, उसी प्रकार यह होता है।
सवाल था, ... कानूनगो साहब की पत्नी जब बहुत बीमार थीं, तब स्वामीजी पहली बार बकानी गए थे। उनका कोई विशेष परिचय भी नहीं था। स्वामीजी बस, वहां जाकर घंटेभर मौन उसके पास बैठते, ... वे धीरे-धीरे स्वस्थ होती गई। बाद में और बच्चे भी पैदा हुए, ... ऐसी अनेक घटनाएं घटीं, ... पर जब स्वयं स्वामीजी बीमार हुए तो उनसे भी कहा गया था, कि वे अपनी शक्ति से अपने आपको स्वस्थ करले। स्वामीजी ने कहा था-
‘इससे क्या होगा? भोग तो भोगकर ही कटेगा। आपको समर्थ रामदास का वृतांत बताया था। शिवाजी मिलने गए थे, ... तब उन्होंने देखा, पास में रखा कंबल हिल रहा है, कांप रहा है।
तब उन्होंने पूछा था- यह क्या है?
तब रामदास ने कहा था- ‘तुम्हारे आने के पहले मुझे बहुत तेज बुखार था, पर तुम आए हो, तुमसे बातें भी करनी है, तो मैंने यह बुखार कंबल को सौंप दिया है।
... ‘तुम जाओगे, फिर कंबल ओढ़ लंूगा। बुखार तो आना ही है। वह तो भोगकर ही जाएगा।’
यहां पर उस दिन सवाल पूछा गया था- ‘जब हमें जो प्रारब्ध में है वह भोगना ही है, तब फिर आप जो कहते हैं, वर्तमान में रहाा जाए, ...अभ्यास निरंतर किया जाए, इससे क्या लाभ?
स्वामी जी कह रहे थे- ‘मैंने तो आपसे कहा नहीं, आप यह करें या नहीं करंे। पर भोग से बचने के लिए प्रार्थना करना, चीखना, चिल्लाना यहां व्यर्थ है, ... वह तो भोगकर ही जाएगा, ... यह तो प्राकृतिक विधान है, ... हजारों कर्मों का भोग है, हर क्षण हम प्रकृति के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। परन्तु जो अभ्यासी हैं, वे यह जानते हैं कि मन शांत होना है, स्थिर होता है, तो यह अवधि कम हो जाती है। भोग, भोगकर चला जाता है, परन्तु उसकी तीव्रता का अहसास भी नहीं होता है। वास्तविक भजन यही है। शांत मन ही वास्तविक भक्ति है। किसी भी प्रकार की कठिनाई आती है, वह अपने आत्मविश्वास से उसका सामना करता है। जहां आत्मविश्वास घना होता है, वहां या तो विपत्तियां आती ही नहीं है, और अगर आती भी है तो उनका वेग सामना करने से कम होता जाता है।
क्या काम और क्रोध अभ्यास मार्ग पर सबसे बड़ी कठिनाइयां है? और हैं तो कैसे क्या किया जाए?
स्वामी जी कह रहे थे, हम जो अपनी संपत्ति साथ लाए है, वह हमारी इन्द्रियां और हमारा मन ही है। जन्म के साथ जो परिवार मिलता है, जो संपति मिलती है, वह तो नाशवान है।
बीज के साथ जो विकास होता है, उसमें गर्भ से ही इन्द्रियों का तथा बाद में मन का फिर बुद्धि का विकास होता जाता है। छः रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह मद और मत्सर, ये साथ ही आते हैं। सालभर के शिशु से उसके हाथ की चीज छीन लो क्रोध से रोने लग जाता है। उसका चेहरा तन जाता है। काम का बीज, सबसे बाद में खिलता है। शास्त्र में कहा गया है-
‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुदभ्वः
महाशनो महापाप्मा विद्धयेेनमिह वैरिणम्।। (3-37)
रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम (ही) क्रोध है, यही महाअशन अर्थात् अग्नि के सदृश भोगों से न तृप्त होने वाला और बड़ा पापी है। इस विषय में इसको तू वेरी जान।
यह प्रसंग तब आया- जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से यह पूछा था कि मनुष्य क्यों न चाहते भी पाप कर्म में संलग्न हो जाता है, ... हम क्यों वह सब कर बैठते हैं, जो हम करना नहीं चाहते हैं। तब भगवान ने काम और क्रोध को नैसर्गिक शत्रु बताया है।
इसी प्रसंग में आगे कहा है- जैसे धुंवे से अग्नि, तथा मल से दर्पण ढंका रहता है, उसी प्रकार काम से यह ज्ञान ढंका रहता है। इस काम का निवास - इन्द्रियां, मन, बुद्धि है, इसीलिए कहा गया है इन्द्रियों को वश में किया जाए।’ विषय तो रहेंगे, ... पर इन्द्रियों का संबंध जब मन से जुड़ता है, तब इन्द्रियां भोगों को प्राप्त होती है। अगर मन अनुपस्थित है, अप्रभावी है, तो विषय भी रहेंगे, तथा इन्द्रियां भी होंगी, परन्तु संबंध टूटा हुआ होगा। यही अवस्था ‘स्थितिप्रज्ञता’ की होती है। इसके लिए कहीं समाज से कटकर अलग कहीं जाने की जरूरत नहीं है।
अभ्यास और वैराग्य की बात कही जाती है। अभ्यास तो निरंतरता है उसमें कोई कमी नहीं आए तथा वैराग्य, सीधी राह पर चलने में जो दाएं-बाएं का आकर्षण होता है, वह छूट जाए। यह आकर्षण स्मृति और कल्पना पैदा करती है।
जितना मन वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है, उतना ही स्मृतियों का आदर कम होता जाता है। मन का भटकाव कम होता जाता है।कल्पना का,भविष्य का मोह भी छूटता जाता है।
साधक के लिए सबसे बड़ी बात इस बात को समझने की है कि परमात्मा ने उसे जीवन यापन के लिए, उत्तम पेय और भोजन के पदार्थ दिए हैं, साथ ही प्रत्येक जीवधारी को चाहे चींटी हो या मनुष्य उसे काम शक्ति के साथ भेजा है। उसका सही व संतुलित आदर ही श्रेष्ठ है।
सभी धर्मों ने सभी आध्यात्मिक साधनाओं में, चरित्र का ऊँचा सम्मान है। परिवार के विकास के लिए, स्त्री और पुरुष दोनों का होना, अभ्यासी होना आवश्यक है। यहां जो काम संबंध है, वह प्राकृतिक है। सहज है। परन्तु अनावश्यक मन के भटकाव से जहां बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वहीं आत्मविश्वास भी चला जाता है। स्त्री के लिए पुरुष और पुरुष के लिए स्त्री दोनों ही अनिवार्य है। दोनों एक दूसरे का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करते हैं।
अभ्यास
अभ्यासियों का यह कर्तव्य है कि वे जिह्वा पर नियंत्रण पहले लावे। साधु-संन्यासी, बहुत स्वादिष्ट खाते हैं। इससे उनके देह में रस बनता है, फिर वे काम विकार से कैसे बचेंगे- स्वामी जी कहा करते थे- जब एक चपाती से मेरा शरीर चल जाता है, तब स्वादिष्ट माल खाने से क्या मतलब? रसना के स्वाद के गुलाम मत बनो, साथ ही वाणी पर निग्रह रहे, तो काम विकारों पर नियंत्रण होने में सरलता होती है।
मन जब एकाग्र होता है, ... तब स्वाभाविक रूप से काम उर्जा का विकास होता है। प्राणायाम जो लोग करते हैं, तब कपाल भाती ज्यादा करने पर नाभि पर जोर पड़ने से उनकी काम उर्जा तेजी से बढ़ने लगती है, तब परेशान हो उठते हैं। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। स्वामीजी कहा करते थे- न तो आप चिंतन करे, न ही किसी प्रकार का भेदभाव जो रहे। ”जो है“, ”क्यों ह“ै, चिंतन से ही मन इधर-उधर खिंच जाता है। जितना मन वर्तमान में रहने लगेगा, बाहर के विकारों की तीव्रता उतनी ही कम होती चली जाएगी। काम से लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। न हीं भागने की। दोनों कार्य चिंतन से होते हैं। जितना चिंतन घना होता जाता है, हम उतने ही इसके गुलाम होते जाते हैं।
मन जब किसी भी क्रिया के साथ बहुत देर तक संयुक्त रहता है तो इस स्थिति में चिंतन प्रक्रिया रूक जाती है, ... हम विकारों की लहरों के थपेड़ों से सुरक्षित होने लगते हैं।
तब क्या होता है? विषय भी होंगे, इन्द्रियां भी होंगी, पर दोनों के बीच संबंध स्थापित करने वाला जो मन है, वह वहां नही ंहोता है। संबंध टूटा सा रह जाता है। यही समाधि की अवस्था होती है। यहां सजगता तो होती है। पर मूर्च्छा नहीं होगी।
अपेक्षा
जब हम दूसरों से किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हमारी भोग की पूर्ति न होने पर हमें क्रोध भी आता है, ... उनसे मोह होता है, और शोक भी होता है।
यह तीन विकार तो अपेक्षा के कम होने से कम होते चले जाते हैं। परन्तु अहंकार जो है, यही मूल विकार है। यह ”म“ैं पन का बोध है। काम और अहंकार का सीधा संबंध है। ये दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं।
अहंकार अत्यंत ही सूक्ष्म है। यह स्वयं को दिखाई नहीं पड़ता। इसकी पहचान, परनिंदा की तथा आत्मप्रशंसा की पहचान होती है।
‘कहा गया है-
‘गर्व न कीजे बावरे, हरि है गर्व प्रहारि, ... इसका प्रभाव इतनी धीती गति से बढ़ता है कि पता ही नहीं चलता कब इसने आकर व्यक्तित्व को सोख डाला है।
संत लोगों ने कहा है- अभ्यासी को चाहिए हमेशा छोटा बना रहे। इसीलिए, अभ्यासी को आध्यात्मिक शक्तियां तभी प्राप्त होती है, जब वह हमेशा छोटा बना रहता है। अनंत यात्रा में रानी चूड़ाला नीलकंठ को छोटा बटुक बनाकर ही राजा शिनिध्वज के पास ले जाती है, जहां वह उसे आध्यात्मिक साधना करवा रही है। ‘बटुक होय तो सदगुरू पायो- सदगुरु की भी प्राप्ति तभी होती है।
सहजोबाई ने कहा है-
‘बड़ा न जाने पाय है, साहिब के दरबार।
द्वारे ही से लगी है सहजो मोही मार।।
आज जहां जाइए सभी जगह इसी अहंकार का बोलबाला है। स्वामी जी बता रहे थे, ... एक बार एक बड़े सम्मेलन में जाना हुआ, ... सन्यासी अगड़े बैठे थे-बहुत से छोटा कांच निकालकर बार-बार अपना चेहरा देख रहे थे।“ आजकल टी.वी. आ गया है, उस पर भाषण देते हैं। हजारों रूपया खर्च रोज का होता है। कहां से पैसा आता है। बड़ा अहंकार है। कहते हैं, फलाना मंत्री आता है, फलां सेठ आता है। यह सब पतन की ओर ले जाता है। इस अहंकार के अनेक रूप हैं, धन का, पद का, ज्ञान का, पांडित्य का, गुरुत्व का, यह अहंकार इतना तरल होता है कि अनेक रूप धारण कर लेता है।
इसकी पहचान यही है कि इसके आने के बाद विवेक शक्ति इसके प्रभाव से दब जाती है। बुद्धि का हनन हो जाता है। वह अपने को बड़ा समझने लगता है। दूसरे उसके सामने छोटे लगते हैं।
अभ्यासी की गति यहां पर आकर रूक जाती है। उसके भीतर अपने अभ्यास का अहंकार हो जाता है। मैं इतने वर्षों से अभ्यास कर रहा हूं। मुझे वाक सिद्धि है, ... मेरा कहा हो जाता है। मुझे भविष्य का आभास होने लग गया है, ... अनेक प्रकार के विकार धक्का मारते हैं।
यहां पर आकर गुरु की महता जगती है।-
पहले गुरु शिक्षक होते है। वे साधक को अभ्यास सौंपते हैं। दरवाजे पर ले आते हैं। पर आध्यात्म की दुनियां में प्रवेश ब्रह्मनिष्ठ गुरु के सानिध्य में ही प्राप्त होता है। ब्रह्मनिष्ठ वे ही है, जिनकी ब्रह्म में निष्ठा है, साथ ही श्रोत्रिय भी हैं। स्वामी जी ने समझाया है- वह सभी प्रश्नों का समाधान तो करता ही है, वह वहां तक पहुंचने में सहायक भी है। उसका अपना स्वार्थ भी नहीं है। यही प्रकृतिजन्य कर्म है। जिसके लिए वह है।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु साधक को उसके अहंकार से परिचित ही नहीं कराते हैं, वरन उसकी ग्रन्थि को ढीला भी कर देते हैं,अभ्यासी काा पहला कदम संकल्प का होता हे।साधन का होता है। उसमें निरंतरता में रहे। स्वामी जी कहा करते थे- कॉन्सटेन्ट, ... अवेयरनेस, ... निरंतरता में रहे।
फिर यही अभ्यास, उसकी लगन बन जाता है। जो उसे, ... ब्रह्मनिष्ठ गुरु से मिला देता है।
जो गुरु स्वयं मिलने को उत्सुक है। जो स्वयं हजारों रूपया खर्च करके, शिष्य तलाश कर रहे हैं, वहां और कुछ तो होगा, परन्तु आध्यात्मिक विकास नहीं होगा।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु और अभ्यासी का मिलना, यही प्राकृतिक विधान है। जो प्रकृति स्वयं करती है।
महत्वपूर्ण यही है कि साधक की अपने अभ्यास के प्रति तीव्र लगन हो, उसमें निरंतरता रहे, ... तो ब्रह्मनिष्ठ गुरु की प्राप्ति उसे अवश्य ही होती है।
2
सेवा
स्वामी जी कह रहे थे- इस संस्था को बनाया। बहुत मेहनत की है। उद्देश्य यही था- निष्काम भाव से प्राणियों की सेवा की जाए, ... जो भी यहां आए किसी भी धर्म, का हो जाति का हो, दुखी हो, सुखी हो, अमीर हो, गरीब हो, उसकी सेवा हो, उसे शांति मिले, यही यहां का कार्य हो।“
यही कार्य उन्होंने सोंपा है। वे कहते थे- हां, अभ्यासी को शक्तियां प्राप्त होगी, ... पर उनका उद्देश्य स्वयं को लाभ पहुंचाने का नहीं हो, ... दूसरों को लाभ हो, उनका हित हो, यही लक्ष्य सामने रहना चाहिए।
स्वामी जी ने ‘सेवा’ का एक आदर्श सामने रखा। जहां स्वयं के लिए कुछ भी नहीं चाहिए था। जीवन की आखिरी सांस तक वे समाज के हित में ही लगे रहे। कहा करते थे- अब शरीर वृद्ध हो गया है, चला फिरा नहीं जाता, तो संकल्प से सेवा का कार्य होता है। यह तो चलता रहेगा।
गुरुकुल में कोई भी पहुंचा, वहां सबका घर था। सभी की नास्ते व भोजन की व्यवस्था होती थी। जब स्वस्थ थे, पैदल मीलों जाते थे। सामान्य से भी व्यक्ति के यहां ठहर जाते थे, ... स्वयं के लिए किसी प्रकार की कोई विशेष व्यवस्था नहीं चाहते थे।
... जीरापुर की घटना है। वहां एक मुसलमान था। उसे किसी मौलवी ने कह दिया था, तुम्हारी दो माह की उम्र ही शेष है। वह तो सुनकर सूखकर कांटा हो गया था। पुरोहित जी की निगाह पड़ी, उन्होंने पूछा- क्या बात है। उसने मौलवी जी का कथन बताया, कहा कि वे पहुंचे हुए हैं, उनकी बात गलत नहीं होती।
पुरोहित जी गुरुकुल आए, स्वामीजी को साथ ले गए। उन्हें कुछ नहीं बताया। फिर वह मुसलमान बुलाया, तब उसके सामने पूछा- ‘स्वामी जी कह रहे थे- एक बार उसके चेहरे पर देखा, ... फिर दो मिनट बाद बोले- तुम अभी नहीं मरोगे- जाओ’।
वह मुसलमान वर्षों जीया। बाद में गुरुकुल भी आता रहता था। स्वामीजी कह रहे थे- मैं किसी के चेहरे पर देखता ही नहीं, बहुतों को पहचानता भी नहीं, ... जब वो दो तीन बार बोलते रहे, तब संबंध जुड़ जाता है-
गीता में कहा गया है-
तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। 18।62।।
हे भारत, सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की ही कृपा से (ही) परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
... जब तक शरीर है, संसार हैं। शरीर और संसार में एक्य है। शरीर हमेशा वर्तमान में रहता है, पर मन नहीं। मन का जहाँ शरीर हो, शारीरिक क्रिया में हो, उसी के साथ रहना, जहां क्रिया नहीं हो, वहां निर्विचारता में रहना ही वर्तमान की प्राप्ति है।
... हमें लगता है, हम सब कुछ कर सकते हैं। जीवनभर यहां से वहां, वहां से यहां भटकाव बना रहता है। इधर से उधर सुबह से शाम तक हाथ पांव मारते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे- जब अन्तर्मुखी होते हैं, तभी अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य का पता लगता है। प्रकृति ने हमें कौन सा कार्य करने को भेजा है उसी कार्य को हम तब कर पाते हैं। नहीं तो भटकाव बना रहता है।
... फिर हम क्या करंे-
साधन के साथ, जो मात्र स्वाभाविक अवस्था में रहना है, ... उसमें रहे। बाहर जो घट रहा है, ... उसके साथ अधिक से अधिक मन को साथ रखने का अभ्यास रखे।
.... सुख-दुख होगा या नहीं, इन प्रश्नों के चिंतन में उलझना बेकार है। शक्ति सारी चिन्तन में चली जाती है। परमहंस जिस बिल्ली के बच्चे का उदाहरण देते थे, वह याद रहे, प्रकृति जो भी कर रही है, उसमें हमारा कोई उपकार है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर ले जाती है, पर बच्चा जानता है कि इसी में उसका हित है।
यही बात गीता के संदेश में कही गई है- जो है, वह स्वीकार है।‘‘ ईसा ने कहा है- .............. तेरी इच्छा पूरी हो। काश्तकार कहा करते हैं- हमने लगाई अर्जी जैसी दाता की मर्जी, हमारा तो काम करने का फर्ज है।पर यहां गुरुकुल में कोई आया है, उसने चाय पी है या नहीं, उसका इंतजाम हुआ है या नहीं, पहले पता करता हूं“स्वामीजी कहा करते थे।
सेवा प्रतिष्ठान, छोटी सी संस्था थी, पर वह अपनी सीमा में निरन्तर सेवा में लगे रहे।
स्वामीजी कह रहे थे, हम जब अन्तर्मुखी होते हैं, वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाता है, तब शक्ति पाने का हकदार होते हैं। हमारी मानसिक शक्तियां प्रबल होती जाती है। परन्तु यहां ध्यान रहे, शक्तियों का सदुपयोग जनहित में ही होना है।
पर होता क्या है, हम स्वार्थ में अंधे हो जाते हैं। हम शिक्षा लेते भी नहीं है। जो कुछ भी चाहते हैं। अपने लिए ही चाहते हैं। अभ्यास का यही अर्थ है कि हमारे भीतर निष्कामता तथा निस्वार्थता आए। आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्व भूतेषु हितेरतः की भावना ही शेष रहे। सेवा कार्य, शरीर से भी होता है, मन से भी तथा धन से भी। धन से सेवा करना सरल है, उसमें रसीद कटती है। हमारा नाम दीवार पर लिखा जाता है। अहंकार की पूर्ति होती है। समाज में सम्मान मिलता है। शरीर से सेवा करना उससे श्रेष्ठ है, इससे अहंकार गलता है। यह तप है। इससे अहंकार दूर होता है। मन से सेवा वे ही कर पाते हैं जिनका मनोबल बड़ा होता है। जो अभ्यासी हैं। जो सहजावस्था में रहते हैं।
ध्यान
जहां भी हों, जो भी क्रिया हो, ... मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए, दूसरे शब्दों में जहां शरीर हो वहीं मन भी हो, ... मन वहीं रहे। पर यह संभव नहीं हो पाता है।
हम जहां भी होते हैं, उस क्रिया को करते समय भी मन हर मिनट में दस पांच जगह चला जाता है। निरंतर निगरानी करते रहो, ... तो लगता है, ... जैसे बंदर उझलकूद करता रहा है, उसे पकड़ना हो, वैसा ही रहता है।
क्या अभ्यास हो-
स्वामी जी ने कहा था-” इसका प्रारंभ रात को किया जाए। सोते समय मन का भटकाव रोकना है। भटकाव से मानसिक शक्ति क्षीण होती है। संकल्प शक्ति कम होती है। बिस्तर पर लेटते समय, जब सारे कार्य समाप्त हो जाए, वहां हम जाए तब मन के द्वारा मन की निगरानी रखी जाए। निर्विचार स्थिति में लेटे रहे। तो क्या होगा? विचार तो आते रहेंगे, ... निगरानी होने से आते ही रूक जावेंगे। दो चार विचार आने के बाद, रूक जाने पर, हर गेप एक खालीपन आएगा। मन में कोई विचार नहीं होगा। इस गेप की मन के द्वारा मन पर वाच रखते हुए बड़ा करते जाना है। इस स्थिति में दो बातें होगी- या तो विचार आएंगे, ... या नींद आवेगी। नींद भी आना अच्छा है- तो यह प्रयास रात को, और यही प्रयास बिस्तर पर उठते समय सुबह किया जाना चाहिए। फिर दिन में जब भी समय मिले, ... तब मन पर वाच किया जाए। क्या विचार आता है? उसे हटाया जावे। इस स्थिति में थोड़ी प्रगति पर होने पर क्या होगा? कई बार सुगंध जैसे कमरे में कोई अगरबत्ती जल रहे हो या इत्र की सुगंध, ... या धीरे-धीरे एक महीन बारीक आवाज सुनाई देगी, ... थोड़ी देर रूकेगी, इसके बाद वह शाम को, छ या सात बजे, जब अंधेरा आने को होता है, जब प्रकाश, चौंधी हुयी रोशनी आपको नजर आएगी। इससे इतना ही पता लगता है कि हम सही रास्ते पर हैं- फिर जो कार्य होना है, इसका पता लग जाता है, अनावश्यक कार्य अपने आप छूटते जाते हैं-“
सवाल था, पर व्यवहार में तो कठिनाई रहती है, मन तो निरंतर भटकता रहता है- स्वामी जी ने बताया था, इसीलिए परंपरागत विधि में कई तरीके बताए गए हैं। विपश्चना भी एक है- यहां श्वास की गति पर एकाग्रता करते हैं। मन और प्राण का गहरा संबंध है। एक के संयम से दूसरा भी सध जाता है। पहले नासिका के अग्र भाग पर ध्यान को लाओ, फिर श्वास पर केन्द्रित करो, श्वास का कम घेरा होता है, बाहर से भीतर भीतर से बाहर, श्वास की गति के साथ रहो, जहां वह मुड़ती है, वहां सजगता में रहो, धीरे-धीरे विचारों की संख्या कम होती जाती है।
बौद्धों में यह विधि प्रचलित है।
परन्तु वर्तमान में रहने से क्या होता है? यहां बाह्य प्रयास कुछ भी नहीं करना पड़ता। मन के क्रिया के साथ निरंतरता में रहने से, प्राण की गति भी नियमित हो जाती है। संयम सधने लगता है। जब क्रिया नहीं होती है, तब मन जहां शांत होता है, अंतर्मुखी होने लगता है वहीं प्राण से भी उसकी युति होने लगती है। यही वास्तविक योग है। ... जहां हठयोग, राजयोग, आदि अंतर में अनेक बाह्य विधान बताए जाते हैं, वहां यह सहज ही उपलब्ध हो जाता है। स्वाभाविक अवस्था में रहना ही साध्य है। इस अवस्था को अधिक से अधिक सहजावस्था कह सकते हैं।
क्या करना है
”मानव जीवन का उद्देश्य, जीवन में सुख व शांति प्राप्त करना है। हम जब अंतर्मुखी होते हैं, तब हमें पता लगता है कि हम यहां किस उद्देश्य से आए हैं, ... अतः हमें निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यास करना है“- स्वामी जी कह रहे थे। प्रश्न था, हम कैसे रहंे, हम तो गृहस्थ हैं? वर्षों वे हमारे साथ रहे, ... पर हमारे भीतर तो कोई परिवर्तन नहीं आ पाया, ... सब कुछ पहले की तरह रहा। बर्हिमुखता बनी रही। इसके दबाव में कार्य करते रहे। स्वामी जी एक ही बात कहते थे, मुझे देखो- मेरे तो बचपन में पिता चले गये थे, युवावस्था में मां चली गई, अभाव रहे, जब मैं कर सकता हूं तो आप लोगों को तो बहुत सुविधाएं हैं, क्यों नहीं कर पाते? फिर कहते थे- कुनकुने पानी में चाय नहीं बनती है।’ अभ्यास व लगन दोनों ही महत्वपूर्ण है।
... स्वामी जी कहा करते थे- ‘मैं किसी का गुरु नहीं हूं, मैने किसी को अपना चेला नहीं बनाया, फिर कहा करते थे- आपने यदि मुझे गुरु माना है, आप यहां आए हैं, तो मेरे विचारों को चिन्तन का आधार बनाएँ, उन्हें व्यवहार में लाएं। वे कहा करते थे- मुझे पांव छुआना, पांव में रोली लगाना, पूजा कराना पसंद नहीं है तथा फिर वे हम सबके घर पर आते थे, सत्संग भी होता था तथा एक भरापूरा गुरुकुल परिवार से वहां मिलना होता था-
उन्होंने गुरु और पिता का भेद समाप्त कर दिया था। वहां मात्र प्रेम था, एक सहजावस्था, जहां उन्हें शिशु से लेकर वृद्ध तक उनसे संपर्क बनाए रखते थे, परिवार की छोटी से छोटी समस्या को वे जानते थे, दूर भी करते थे- रास्ता सुझाते थे, ... प्रसन्नता सौंपते थे।
... जब हम शुरू-शुरू में गुरुकुल जाते थे, तब स्वामी जी खुद चाय बनाते थे, ... चाय के प्याले भी धोते थे, ... कहीं किसी प्रकार की विशिष्टता का आदर नहीं था। वहां गुरु और शिष्य का भाव नहीं था, ... पिता और पुत्र का भाव था, महिलाएं उनकी बेटियां थीं, कहा करते थे, जानकीबाई, पार्वती, क्षमा, सनोज की मां, केसरी लाल जी के यहां से, को चेहरे से पहचानते हैं, ... कभी किसी महिला की ओर उसके चेहरे को देखा तक नहीं, ... कोई राग वहां नहीं था। मात्र एक प्रेम। किसी से सेवा लेने का रत्तीभर भाव नहीं था।
कहा करते थे-‘अनंतयात्रा’ में जब चूडाला, नीलकंठ को राजा शिविध्वज के पास साधन सिखाने को ले जाती है, तब उसे नन्हा बटुक बनाकर ले जाती है। अगर करना है तो अपने अहंकार को कम करना है।
जैसी हरी दूब होती है। ... बड़ी घास को लोग उखाड़ लेते हैं। दूब बच जाती है। बड़े पेड़ तूफान में उखड़ जाते हैं। नए पौधे हिल-हिल से बच जाते हैं।
अहंकारी ही गिरता है, ... साधन पथ में इसीलिए विकास नहीं होता कि वहां तुम और तुम्हारा ‘में’’ दोनों एक साथ जाना चाहते हैं। वहां दो का प्रवेश नहीं हो सकता।
वहां तो नन्हें का ही प्रवेश है। छोटा होकर जाना होता है। ... अन्य मतों में, गुरु भाइयों व बहनों से प्रेम सिखाया जाता है। वहां लौकिक भार्ग व गुरु भाई का भेद समझाया जाता है। प्रेम भी बंट जाता है। ... स्वामी जी इसे पसंद नहीं करते थे, कहते थे प्रकृति ने जो रिश्ता बनाया है उसका निर्वाह पूरा करो। दूसरे नहीं करते हैं, दुर्भावना रखते हैं। वह उनका कर्म है, उनके कारण से हम अपना व्यवहार खराब नहीं करेंगे। जो गुरु परिवार के हैं, उनमें भी उतनी ही प्रीति हो। प्रेम, बंटता नहीं है। बांटता भी नहीं है। हां, आसक्ति अवश्य कम होती जानी चाहिए।
... अभ्यासी आप हैं, लगन रहे। आज किया कल छोड़ दिया, उचित नहीं, यहां न तो किसी विशेष व्यवस्था की जरूरत है, न ही किसी प्रदर्शन की बस, सुबह व रात को और जब समय मिले, अपने मन पर सतर्कता रखनी है। अनावश्यक विचारों का भटकाव कम हो, यह ध्यान रखना है। पथ्य एक ही है, कम बोलंे, अनावश्यक नहीं सोचंे, ... पर निंदा व आत्मप्रशंसा से बचंे, ... बस। यही अभ्यास है।
... जहां राग होता है, वहां मत्सर भी होता है। किसी से अपेक्षा होती है जब वह पूरी नहीं होती है, तो क्रोध आता है, वहां शोक होता है, वहीं मोह होता है, वहीं मस्कर है, ईर्ष्या है। ईर्ष्या का ही विकसित रूप घृणा है।
वैराग्य, किसी दूसरे के प्रति अपेक्षा का अभाव ही है। स्वामी जी कहा करते थे, दूसरा कोई है ही नहीं। तुम अपना काम करो, ... तुम्हें दूसरों से क्या प्रतिफल मिलेगा, यह सोचना ही नहीं है। दूसरों का चिंतन ही दुख है। वही पराधीनता है। दूसरे से सदा अपेक्षा होती है। जो भी दूसरा है, उसके प्रति प्रीति रहे। इसमें जाता क्या है?
अभ्यास और वैराग्य से ही शांति प्राप्त होती है। मन अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं शान्ति व शान्ति का निवास है।
फिर सवाल था; त्याग क्या हो?
स्वामी जी ने कहा था, जो आपका है नहीं, उसे आप क्या छोड़ सकते हैं? आपके पास तो आपकी स्मृतियां है, जो आपको वर्तमान में नहीं रहने देती है। उनका त्याग ही वास्तविक त्याग है। अधिकांश विकार स्मृति से ही पैदा होते हैं।
यही अभ्यास रहे। इसी अभ्यास से मन को जहां शांति मिलती है वहीं शक्ति भी मिलती है। स्वामी जी कहा करते थे- मैंने सभी प्रकार की साधनाएं की, ... साठ साल के निरंतर अभ्यास में इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि वर्तमान में रहना ही, सच्ची साधना है। यही वास्तव में गीता जी का सार है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो समझाया है- माम अनुस्सर युद्धच, यह वहीं है। यही वास्तविक समर्पण है।
मामेव ये प्रपद्यन्ते, माया मेेतां तरन्ति ते। 7/14
इस माया को वे ही पार कर जाते हैं, जो मेरी शरण में आते हैं।
इस माम की शरणागति ही सार है।
‘क्या गुरु की शरण में जाना आवश्यक नहीं ?
स्वामी जी ने अनंत यात्रा में, ब्रह्मनिष्ठ गुरु की अपरिहार्यता पर बल दिया है। उन्होंने अनेक जगह पर ब्रह्मनिष्ठ व क्षोत्रिय गुरु पर बल दिया है। कहा करते थे, ब्रह्मनिष्ठ गुरु का मार्गदर्शन अपेक्षित है। गुरु विवेकी है। वे शिष्य को विवेक प्रदान करने आते हैं। शिष्य विवेकी हो यही उनका कर्तव्य है। अनंतयात्रा में कुंभ नीलकंठ से कहता है- तुम्हारा मार्गदर्शन करूं, यही मुझे अभीष्ट था, हो सकता है कि इसके बाद मेरा शरीर रहे या नहीं? परन्तु ब्रह्मनिष्ठ गुरु कभी भी अपनी शरणागति के लिए नहीं करते। वे तो अपनी पूजा भी करवाना नहीं चाहते। उनसे पूछा था- किसी मत में व्यवस्था है, गुरु के द्वारा नामित शिक्षक अभ्यार्थियों के विकारों को दूर करते हैं, ... इन शिक्षकों को गुरु अपनी शक्ति प्रदान करते हैं।
स्वामी बस हंसे थे, ... बोले, यह संभव नहीं है। आध्यात्मिक विद्या, प्रबंधन व्यवस्था नहीं है। यहां शिक्षण नहीं होता। यहां मात्र प्रवेश होता है। लगन और अभ्यास होना ही पर्याप्त है।
हां, ब्रह्मनिष्ठ गुरु हो, उनके मन से आप अपना मन मिला दंे, ... तो आवश्यक नहीं है, वे सशरीर भी हों, उनकी शक्ति आपका मार्ग दर्शन करती रहेगी। संत मत में यही मार्ग है।
यहां गुरु की उपस्थिति उसकी मानसिक स्वीकृति है, उसके प्रति प्रेम है। उसके प्रति समर्पण है, ... वह मार्ग बताते हैं। साधना में गति देते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे, गुरुमत में साधक सब गुरु को छोड़कर अपने काम-धाम में लग जाते हैं। साल में एक दो बार आ गए। काम पूरा हुआ, भेंट दी, माला पहनाई, चल दिए, ... यह साधना नहीं है। गुरु भी कहते हैं- तुम्हें कुछ करना नहीं तुम्हें तो गुरु के आसरे हो जाना है, सब गुरु कर देंगे। इससे गुरुडम ही फैलता है। किसी का भी विकास होता देखा नहीं। आज करोड़ों की संख्या गुरु हैं, चैले हैं, ब्रह्मनिष्ठ गुरु होंगे तो वे इस प्रपंच से बहुत दूर होंगे।
आध्यात्मिक साधना कोई सरल साधना नहीं है। न ही इसका कोई सरल उपाय है। गीता में कहा गया है, ... करोड़ों में कोई एक इधर आता है, कबीर जी ने भी कहा है- यह तलवार की धार पर चलने के समान है।
‘एक बात साफ है-
स्वामी जी कहते थे- आपका चित्त विकारों से भरा हुआ है, संग्रह इकट्ठा हो रहा है, तरक्की कैसे होगी?
”किताबें कहती हैं कि यह काम तो गुरु का है, गुरु ही क्या, उनके द्धारा नामित शिक्षक ही यह काम कर देते हैं।“किसी ने कहा था।
स्वामी जी मन की भाषा पढ़ रहे थे। बोल,े ”करना आपको ही होगा मुझे नहीं, यहां सब यह सोचकर आते हैं, जैसे मेरा यह काम है क्या मैंने सन्यास इसलिए लिया, चालीस साल से अधिक समय इस जंगल में रहते हुए हो गया, क्या इसलिए? यह सेवा नहीं स्वार्थ है।“
विचार ही विकार हैं, आप खुद अपने विचारों पर सतर्कता रखो। कर्म के साथ जुड़ो मन को वहीं रखो। नया संग्रह नहीं बनेगाा पुराना अपने आप कम होने लगेगा। करना आपको ही है। आप इसीलिए यहां आए हैं। कोई किसी के विकारों को अपने ऊपर नहीं लेता। उन्हें क्या जरूरत है? क्या ब्रह्मनिष्ठ गुरु स्वार्थी है?, लोभी है? जो उनके पास गए उनकेे मल दूर कर दिए, जो नहीं गए उनके नहीं किए? उन्हें क्या इसकी जरूरत है।
वे तो मात्र, ‘जीवनमुक्त होकर भी प्रकृति के कार्य में सहयोग करते हैं। ... मार्गदर्शन करते हैं। उनका सत्संग, ... स्वाभाविक रूप से आनंददायी होना है। उसमें एक खिंचाव होना है। जो भीतर की गंदगी को कम कर देता है। उनके सानिध्य में मन शांत हो जाता है। प्रश्नों के उत्तर अनायास प्राप्त हो जाते हैं। वहां अमृतवर्षा होती है। वहां मात्र प्रेम है।
जहां स्वाभाविक प्रेम है, वहीं ब्रह्मनिष्ठ गुरु है। उनका सत्संग ही बहुमूल्य है।
स्वामी जी ने अपने प्रवचन में एक बार कहा था-
‘आप लोग कुछ नहीं कर सकते हों, तो कम से कम जो बातें कहीं गई है उन पर चिंतन करो, जो साहित्य प्रकाशित हुआ है, उसे पढं़े, इस प्रकार आपका और मेरा संबंध जुड़ा रहेगा। आपके मन से मेरी शक्ति जुड़ करके आपका मार्गदर्शन करती रहेगी।’
... वे कहा करते थे, हरेक का यहां आना कठिन है, तकलीफ भी होती है। ... पर हम इतना ता कर सकते हैैंं। मन से संबंध जोड़ सकते हैं। यही साधन है। मार्गदर्शन स्वतः प्राप्त होता रहता है।
... पर स्वामी जी जिनका भोजन इतना अल्प था कि कल्पना करना ही कठिन था। पहले सुबह बस एक बार भोजन था,वह भी एक चपाती, दाल, सब्जी, बाद में बंबई्र से आने के बाद शाम को भी भोजन लेना शुरू किया था, ... वह भी इतना ही अल्प था।
कहा करते थे- अभ्यासी को सबसे अधिक ध्यान अपने मन पर रखना होता है। मन का अन्न का गहरा संबंध है। अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से ही मन की निर्मिति होती है। आवश्यक है अन्न का संबंध ईमानदारी के पैसे से हो, जो बनाने वाला हो, उसका मन शुद्ध हो, तथा अन्न ग्रहण के समय हमारे विचार शांत हों। उत्तेजना में कभी भी अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
जब हम दूसरे का अन्न ग्रहण करते हैं तो उसका दासत्व तुरन्त आ जाता है। जहां तक हो सके, इससे बचा जावे। उसे चुकाने का संस्कार अपने आप बन जाता है। आधी से अधिक बीमारियों का यही कारण है। अन्न का दोष ही आज सर पर चढ़कर बोलता है। बीमारी शरीर में बाद में आती है। पहले मन में आती है। मन के विकार ही शरीर पर प्रकट होते हैं। पहला सूत्र यही है, जिस अन्न से हमारा पोषण होता है, उसके प्रति गहरी सावधानी रखी जाए।
ब्याज का पैसा और रिश्वत का, दोनों पैसे भी मय ब्याज के चुकाए जाते हैं, यह एक बुनियादी सिद्धान्त है। प्रायः सत्संगों से भी अब सेठों सेे भी मदद ली जाती है। वे दान क्यों करते हैं? उन्हें लाभ हो? स्वामी जी ने एक बालक की कहानी सुनाई थी, जो जन्म के बाद मिट्टी की मूर्ति बनाता था तथा उसका सिर चाकू से काट देता था, उसके माता-पिता जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, देखकर सकपका गए। उन्होंने विचार किया, फिर वह ब्राह्मण उस सेठ के पास गया जिसेे उसने श्रावण माह में घर पर अभिषेक करवाया था तथा दान दिया था।
उसने पूछा था, ... वह अभिषेक आपने क्यों करवाया था?
तब उसने बताया था कि मेरा एक कसाई के पास काफी रूपया उलझ गया था, ... मैंने मन्नत मांगी थी, रूपया मिल जाएगा तो अभिषेक करूंगा।’’
तब वह ब्राह्मण घर लौटा तथा दान में मिली राशि सारी सौंप आया। ... अन्न से संस्कार, हमारी पीढ़ी तक में पहुंच जाते हैं। गलत ढंग से पैसा कमाने वालों केे बच्चे जो निकम्मे हो जाते हैं, उसके पीछे यह भावना ही महत्वपूर्ण है। संस्कार बच्चों में, माता-पिता के संस्कारों से ही बनते हैं। इसमें उनके गुण-दोष तो होते ही हैं, वे स्वयं भी जिम्मेदार होते हैं। आज दुनिया में ये बातें अब बेवकूफी की मानी जाती है। सबके पास अपने-अपने तर्क हैं, पर वे दुखी है, व्यथित हैं, कारण भी उनके ही पास है। अभ्यार्थियों को चाहिए कि वे ब्याज, रिश्वत, तथा सूदखोरी से जहां तक हो सके, बचंे।
हम जब दूसरों से सेवा लेते हैं, तो बदले में हमें चुकाना चाहिए। यह पहला नियम है। स्वामी जी जब आते थे- तब वे किसी भी साधक की रत्तीभर भी सेवा नहीं चाहते थे। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था। वे कहा करते थे, जो सरकारी सेवक हैं, उसे सरकार धन देती है, आपको नहीं, उसके प्रति व्यवहार श्रेष्ठ हो, अगर खाना बनाना है, तो वह खाना वह भी खाएगा, याद रखो। प्रकृति में लेन-देन स्वाभाविक क्रिया है। हमें चुकाना पड़ेगा। जहां तक हो सके, सेवा करो, पर लेने की चेष्टा मत करना। दुनिया बचा करती है, हम हमें इससे मतलब नहीं,है। यही तितिक्षा है, ... बर्दाश्त करो। लहरें आएंगी, थपेड़े देंगी, हमें बहना नहीं है। प्रकृति का खेल, एक मनोरंजन है। सब एक से नहीं हो सकते। जो आज राजा है, कल रंक बन सकता है, ... सब संभव है, हमें अपने आपको देखना है, दूसरों को नहीं।
अभ्यार्थियों के लिए
स्वामी जी से बहुत पूछा था, वे साधना शब्द का भी प्रयोग नहीं करते थे। ... सहज, स्वाभाविक अवस्था में रहना कहते थे। कहा करते थे- भाषा के चक्कर में मत फंसों, ... उनका अन्तर्मुखी वह था, जिसका इन्द्रियों और मन का संबंध टूट सा गया है, ... जिसका बाहर का भटकाव छूट गया है। वे कहा करते थे- ‘इन्दियां मन में सिमट जाती है, विषय रहेंगे, पर इन्द्रियां उसकी ओर उन्मुख नहीं हो पाती है। यह अवस्था निरन्तर वर्तमान में रहने से प्राप्त होती है।
तो जो इस मार्ग पर आना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक हैं, वे आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचंे। लगन और अभ्यास बनाए रखंे। अपने परिवार के साथ ही नहीं सबके प्रति प्रेम रखें। हम अभ्यास करते हैं। इसका प्रदर्शन भी नहीं होना चाहिए। एक बार एक परिचित आए हुए थे, वे सत्संगी थे, उनका सत्संग कहीं दूर होना था, वे वहां जाना चाह रहे थे, किसी को तलाश कर रहे थे कि वह वहां उन्हें छोड़ आए।
स्वामी जी ने उनका उतावलापन देखा। बोले कुछ नहीं।
उनके जाने के बाद, बोले वहां भी उनका मन नहीं लगेगा, वहां से यहां आने के लिए किसी को तलाश कर रहे होंगे।
इस सत्संगों का यही दोष है। यहां भी अवधारणा हावी हो जाती है। बार-बार सोचने से गुलामी आती है। हम चाहते हैं, मुक्ति, यह तो बंधन अधिक है। आपको शांत होना है, आपको वर्तमान में रहना है, आपको विचारों के प्रवाह को कम करना है, करना आपको ही है। आपकी लगन, आपकी भावना, आपका संकल्प महत्वपूर्ण है। गए तो ठीक, नहीं गए तो ठीक, यह वैचारिक दासता, शारीरिक दासता से भी अधिक गंभीर है।
स्वामी जी स्वयं खूब पढ़ते थे। पढ़ने को कहते भी थे। योग वशिष्ठ और गीता, पढ़ने को कहते थे, तथा ‘निसर्गदत्त महाराज, रामकृष्ण परमहंस, जे. कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि, ओशो, सभी चिन्तक मनीषियों के ग्रन्थ स्वयं पढ़ते थे, तथा दूसरों से चर्चा करवाकर सुनते थे। बाइबिल व कुरान व सूफी ग्रन्थों का भी अध्ययन था। कहते थे- बचपन में मैं दस से पंद्रह घंटे पढ़ता था। वे कभी भी किसी से ‘अपनी बात मानो’ यह आग्रह नहीं रखते थे। कहते थे- विचार एक निरंतर बदलने वाली प्रक्रिया है, जो आज विचार है, कल नहीं रहेंगे। हम स्वयं चिंतन करें, कठमुल्ला नहीं बने, जो उचित लगे, उस पर चलंे, लाभ मिलता हो आगे बढं़े, नहीं मिलता हो छोड़ दें। हमेशा खुद नहीं बोलते थे, दूसरे से पूछने के लिए प्रेरित करते थे। एक संवाद था। जहां दूसरा भी उनके पास बैठकर संवादी बनता था।
उनके पांवों में बाद में दर्द रहने लग गया था। वे जब भंडारी मिल में स्टोरकीपर का कार्य कर रहे थे। तब स्वामी राम के शिष्यों के साथ अमरनाथ की यात्रा पर गए थे। साधारण कपड़े पहने थे तथा जूते भी कपड़े के थे। लौटते समय, दोनों पांव सुन्न हो गए थे। कहा करते थे- संकल्प किया था, जब बीमार पडूंगा तब चैतन्य चरितावलि पढूंगा। तब स्वामीराम के कहने पर इन्दौर होईकोर्ट के चीफ जस्टिस जाम्मेकर अपने साथ उन्हें अपने घर ले गए थे। वे उन्हीं के घर पर रहते थे। तब यह घटना घटी थी। डॉक्टर मुखर्जी इन्दौर के चिकित्सक थे, उन्होंने लकवा बताया था। पर बाद में जिस दिन चैतन्य चरितावलि का अध्ययन पूरा हुआ उनके पांव ठीक हो चुके थे।
परन्तु वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर पांवों में दर्द आ गया था, चलने फिरने में तकलीफ थी। पर किसी को पांवतक नहीं दबाने देते थे। अपना काम खुद करते थे। न तो माला पहनाने देते थे। न पांव में रोली लगाने। उनके जाने के बाद तो देखा, गुरुकुल में ही जो साधु अतिथि होकर आए वे बिसलरी की बोतल मंगवाकर अपने पांव महिलाओं से धुलवा रहे थे। आश्रम के लोगों को बताया, यह कौन सी गुरु पूजा शुरू करवा रहे हो? स्वामी जी तो गुरुपूजा के सख्त खिलाफ थे।
वे एक ही बात कहते थे- मुझे बचपन में इंजीनीयर साहब मिले थे, वे ही उनके गुरु थे। जिन्होंने उनके बचपन में उनके भीतर इस ज्ञान निष्ठा का बीज बोया था। उन्होंने उनसे कहा था- संसार में भोजन और कपड़ा, रोटी मूल आवश्यकताएं हैं, इनको अपने ऊपर हावी मत होने देना। स्वामी जी की पूरी संपत्ति मात्र एक थैला रही। आधी धोती व कुरता तथा शैविंग का सामान। बस चार नंबर का छोटा सा कपड़े का जूता, दो चश्मे। भोजन में मात्र एक चपाती, थोड़ा चावल, दाल बस। नहीं मिला तो वह भी सही। महापुरुष संसार में अपने आचरण से ही धर्म, की स्थापना करते हैं। धर्म, माने कर्म जिस आधार पर हमें करने हैं जो कर्म हमें हमारे विकास की ओर ले जाएं। हमें शांति की प्राप्ति हो।
शास्त्र अपरिग्रह की चर्चा करता है। पर स्वामी जी तो स्वयं अपरिग्रह का उदाहरण रहे।
शास्त्र कहता है-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणां कुरूते लोकस्तवदनुवर्तते। 3 । 2। ।
श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, अन्य पुरुष (भी) उस उसके ही अनुसार वर्ततते हैं, वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसके अनुसार बर्तते हैं।
श्रेष्ठ अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी के लिए यहां कहा गया है। तिलक महाराज ने इस श्लोक की व्याख्या में कहा है- ‘जब तुम्हें संदेह हो कि यहां संसार मैं किसी प्रसंग पर कैसे बर्ताव करे, तब वैसे ही बर्ताव करो कि जैसा ज्ञानी, मुक्त और धार्मिक ब्राह्मण करते हो।’ आगे उन्होंने इसी प्रसंग में- रामदास स्वामी की उक्ति की कही है-
‘‘देख भलों की चाल को, बर्तेंसब संसार।’’
यहां भगवान अपना उदाहरण देकर स्पष्ट कर रहे हैं कि - आत्मज्ञानी पुरुष के लोककल्याण के कर्म उससे छूट नहीं जाते। इसी बात को स्वामी जी कहा करते थे। स्थितिप्रज्ञ होकर संसार से पलायन नहीं करना है। परन्तु प्रकृति ने जो कार्य सौंपा है, उसे करते हुए उसके कार्य में सहयोग करते रहना है।
उनके आचरण में यही ध्वनित था, ... जो उचित था, वह उनके द्वारा सदैव होता रहा, ... भले ही उसमें यह कितनी ही कठिनाई झेलनी पड़ी हो। करुणा उनका सहज स्वभाव रहा। परन्तु बाद में लगता था, ... उनकी करुणा, ... अहेतुकी होते हुए भी किसी अदृश्य विधान से संचालित थी। अट्ठाईस साल का गहरा संपर्क रहा। एक एक बात न जाने क्यों बताते थे। तब समझ में नहीं आता था पत्र लिखा करते थे। हर बात की सूचना देते थे। स्वप्न विजन तक बताते थे। पता नहीं क्यों तब इतनी न तो लगन थी, न हीं ज्ञान था, पर हां इन बातों को संग्रह करत रहें, यह ध्यान रहता था।
... कई बार पूछते थे- ”मुझमें कोई कमी नजर आती है तो बताओ।“ हम सुनकर चुप रह जाते थे। कमियां तो हममे हजारों है, ... हम कहां ढूंढे? पर उधर कोई मिलने आया, ... वे हमें बात करते देखते। उनके जाने के बाद, धीरे से पूछते- ”इतनी बात करने की क्या जरूरत थी। जो आश्वासन पूरे नहीं हो सकतेहैं, वे क्यों दिए,“ ... बारीक से बारीक दोष वे अनायास रेखांकित कर जाते थे। एक पिता की तरह उनका अनुशासन रहा। सब के प्रति, परन्तु क्रोध का अंश लेशमात्र भी नहीं। अकेले में जब होते, तो पास बुलाकर, समझाते। हां, उन्हीं घरों में ठहरते थे, जहां प्रेम था। कहते थे, जहां परिवार में विग्रह है वहां क्या जाना? लेते शायद छटांग भी नहीं थे, पर जब वहां से जाते, उस घर में मन भर दे आते। उनकी सारी तकलीफों को दूर कर आते।
कहा करते थे- ”अगर परमात्मा भी धरती पर आए तो लोग उसमें भी कमी निकालेंगे, ... यह तो मनुष्य का स्वभाव है, ... परन्तु वे स्वयं आगे-बढ़कर अपनी कमी पूछते थे। कभी यह नहीं कहते थे कि, ”मेरी बात मानो, यही सच है,“ मैंने यह जाना है, यह पाया है, इन शब्दों में कम से कम शब्दों में अपने आपको व्यक्त कर देते थे।
गीता सार
मामका पाण्डवा श्चैव
मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, ... गीता का प्रारंभ धृतराष्ट्र के इस प्रश्न से होता है, ... मेरे और पाण्डु के, ... जबकि पाण्डवों के मन में यह विभाजन नहीं था, वे धृतराष्ट्र को ही अपना पूर्वज मानकर, आज्ञा मानते रहे थे। पर यह द्वेष- धृतराष्ट्र के मन में था; यही विभाजन ही संहार का मुख्य बना
... यही अप्रेम, कलह तथा स्वयं के व्यक्तित्व विभाजन का कारण बनता है।
लोभोपहत चेतसः
लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते-
... जो मिल गया वह कम है, ... और और मिल जाए इसका ही नाम लोभ है, ... इस लोभ से ही विवेक शक्ति लुप्त हो जाती है।
... मनुष्य संयोग का जितना सुख लेता है, वियोग का भी उतना ही दुख उसे भोगना पड़ता है।
पहले वस्तुओं का अभाव जो होता है, वह इतना दुखदायी नहीं होता जितना वस्तुओं का संयोग होकर, वियोग होता है, वह होता है, ... वस्तुओं का संयोग भी प्रारब्धानुसार होता है, स्थाई नहीं है, वियोग तो होना ही है, परन्तु लोभ उसे सातव्य प्रदान करता है। जो बीच में वस्तुओं से सुख प्रतीत होता है, वह लोभ के कारण से ही है। ‘मोह’ भी बन्धन जरूर है। मोह के कारण ही संबंधियों से सुख प्रतीत होता है।
... वैर, ... वैरभाव अत्यंत ही दुखदायी है। भोगकर तो दुख से पार हुआ जाता है पर वैर की अग्नि तो जन्म-जन्मान्तर तक साथ जाती है।
... मनुष्य की दृष्टि जब तक दूसरों के दोष दर्शन में रहती है, तब तक उसे अपना दोष दिखाई ही नहीं पड़ता है, ... दूसरों का दोष देखना भी, ... बड़ा दोष होता है, इससे अपने भीतर ‘अहंकार’ पैदा होता है।
पाप-पुण्य अंक1
गुरुकुल बकानी झालावाड़
वर्ष”उर्ध्व कुंभक की स्थिति में पहुंचने के पश्चात जब मन प्राण युति धीरे- धीरे अंदर की ओर हृदय से नाभि तक पहंुचने में सफल होती है, उस समय साधक को इसका स्पष्ट आभास होने लगता है। साधक प्रयोग के रूप में छोटी -मोटी इच्छायें उत्पन्न करके उनकी पूर्ति होते देखकर संतुष्ट एवं अचम्भित भी होता है। धीरे धीरे इस प्रकार के अनेकों प्रयोगों में जब उसे पूर्ण सफलता प्राप्त होती है तब पूर्णतया आश्वस्त होकर वह दृढ़तापूर्वक मन की शक्ति के अनूठे प्रयोग भी करके देख सकता है जैसे अघटित घटनायें भी अपनी इच्छा मात्र से उत्पन्न करना। शरीर को अदृश्य करना, आकाश मार्ग से तथा जल के नीचे से तेज गति से प्रवास करना, क्षण भर में एक स्थान से लुप्त होकर वांछित स्थान पर प्रकट होना इस प्रकार अन्तर्मन की शक्ति से अनेक प्रयोग किए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में ही साधक किसी व्यक्ति के अंतर्मन को प्रभावित करके उसके लिए अपनी इच्छानुसार स्वप्न सृष्टि का निर्माण भी कर सकता है।
पूज्य स्वामीजी विरचित
‘अनंतयात्रासे’’ 1 मई 2012जीवन जीने की कला
साधना का प्रारंभ ‘कर्म’ से ही होता है। कर्म और कर्मकांड में फर्क है। कर्म, स्वाभाविक क्रिया है, उसके साथ जब मन का सहयोग होता है, कर्म बनता है। प्रत्येक इन्द्रिय के अलग-अलग कर्म है। वाणी एक साथ दो काम कर सकती है। यहां से बोला भी जाता है, स्वाद भी लिया जाता है। इसका निग्रह करना सबसे कठिन होता है, हर इन्द्रिय का अलग-अलग कार्य प्रकृति ने निर्धारित कर रखा है।
इसीलिए पहला अभ्यास यही बताया है कि ‘जीवन के समस्त कार्यों में मन को पूर्णरूपेण एकाग्र रखते हुए किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।
कई बार होता है, जो कार्य प्रकृति के विरोध में होता है, वहां पर सतर्कता रहे, उसे वहीं रोकने का प्रयास होना चाहिए।
हां, जब मन उसी कार्य में बहुत देर तक रहने का अभ्यासी होने लगता है तो प्रकृति के विरूद्ध में कार्य करने का स्वभाव भी छूटता जाता है।
आदतें
उस दिन कोई कह रहा था, ... क्रोध तो मेरी आदत सी हो गई है। बाद में पश्चाताप होता है, ग्लानि होती है, क्या किया जाए, ...
... विचार करें, क्रोध आता ही क्यों है? हमारी दूसरे से अपेक्षा होती है, वह ऐसा करेगा, वह वैसा नहीं करता है। क्रोध आता है। हम हमेशा दूसरे की गलती ही देखने का प्रयास करते रहते हैं। इससे हमेशा तनाव बना रहता है।
आदत का बनाना, और इसे बनाए रखना हमारा ही बस का है। इसके लिए दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है।
बस आपको संकल्प करना है। संकल्प हमारी शक्ति है। मन की शक्ति है। ... जब भी मन बाहर की ओर बहे, इन्द्रिय उसे खींचे, वहीं सतर्कता रखनी है। आते ही उसे हटाने का प्रयास रहे, ... तो आदर न मिलने पर धीरे-धीरे वह आदत छूटनी शुरू हो जाती है।
... जब हम कुछ पकड़ते हैं, तो कुछ छूटना शुरू अपने आप होता है। आपने संकल्प का आदर किया, दृढ़ता रखी, तो मन की चंचलता जिसे आप आदत कह रहे थे, वह अपने आप छूटने लगती है।
.... अच्छी बातों के ग्रहण करते ही, बुरी आदतें अपने आप छूटने लगती है। छोड़ने का प्रयास मत करो। ग्रहण करने का करो।
जो ग्रहण किया जाता है, वह नियम है, जो छूटता जाता है, वह यम है। पतंजलि ने जो अष्टांग योग बनाया, वह सही है। परन्तु यहां क्रम को बदलना होता है। आप नियम पहले ले आवंे, यम अपने आप सधने शुरू हो जाते है।
मन जितना वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है। उतना ही स्वाभाविक रूप से गुण उसके भीतर आते जाते हैं।
करना क्या है?
यहां तो एक ही अभ्यास बताया जाता है। अधिक से अधिक अपने मन को वर्तमान में रखने का प्रयास करो। शरीर तो हमेशा वर्तमान में रहता ही है। मन ही इधर से उधर भटकता रहता है। उसी को शरीर के साथ, क्रिया के साथ लाकर रखना है। यही अभ्यास है। यहां छोड़ने और छूटने पर बल नहीं है।
मन जितना स्वाभाविक रूप से वर्तमान में रहने का अभ्यस्त होता जाता है उतना ही जो अनावश्यक है, वह छूटता जाता है। इसीलिए कहा गया है, यहां आकर अनावश्यक विचारों का बोझा मत लादो।
स्वाध्याय अच्छी बात है, इससे बुद्धि का परिष्कार होता है। चिन्तन करना शुरू होता है। चिन्तन करो। व्यवहार की कसौटी पर खूब कसो, जो सही नहीं लगे फिर उसे छोड़ते जाओ। सही का आदर ही विवेक का आदर है। सही की परिभाषा यही है कि वह तीनों कालों में सही रहता है।
सत्य का प्रयोग
वाक सिद्धि की बहुत चर्चा होती है, ... वाक पर नियंत्रण रखना पहला अभ्यास है। जैसे किसी बीमारी का इलाज होना है तो उसमें चिकित्सक पथ्य की बात भी करते हैं। यहां अभ्यास मार्ग पर ‘पथ्य’ वाणी पर संयम है। न तो किसी की निंदा हो, न किसी की प्रशंसा, ... हम प्रायः दूसरे की निंदा में रस लेते हैं, तथा आत्मप्रशंसा में डूबे रहते हैं, दोनों ही अहितकर है।
‘पर निंदा जहां हमेशा दूसरे को हमारे चित्त में बनाए रखती है तथा हमें अपने दोष नहीं देखने देती, ... हमारे भीतर परिवर्तन के सारे द्वार बंद कर देती है। आत्मप्रशंसा उससे भी बुरी आदत है।
‘मन जब वर्तमान’ में रहने लगता है, तो जहां वह क्रिया के साथ लगता है, वहां क्रिया के पूरे होने पर संतुष्टि का बोध होता है, वहीं शक्ति भी मिलती है।
... साथ ही जब परनिंदा तथा आत्मप्रशंसा की आदत कम होने लगती है तब स्वाभाविक रूप से मौन में भी हम प्रवेश करते हैं। यही सहज है।
‘अनंत यात्रा’ में कहा है, अहिंसक और परोपकारी होना ही हमारी स्वाभाविक अवस्था है, जो हमें प्रगति की ओर ले जाती है। अहिंसा कोई बाहर से धारण करने वाली वृति नहीं है। यह स्वाभाविक है। किसी दूसरे का अहित सोचना ही हिंसा है। हिंसा मात्र शारीरिक ही नहीं होती है। दूसरे के प्रति गलत भाषा का प्रयोग तथा मन में भी गलत भावना रखना हिंसा है। अहिंसा कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। जितना हम वर्तमान में रहने के अभ्यासी होते जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन अहिंसक होता जाता है।
शारीरिक स्वास्थ्य
क्या हम दूसरें की सहायता, ... जैसे बीमारी दूर होना, ... उनके शारीरिक कष्ट होना यह कम कर सकते हैं?
दूसरों के तो संकल्प से हो सकते हैं, पर अपने नहीं। जो मानसिक शक्ति हमें प्राप्त होती है। उसके साथ ही यह भी पता अपने आप लग जाता है कि अगर हमने अपने लिए करना शुरू कर दिया तो यह अहितकर होगा।
यह भोग योनी है। जो भी कष्ट हों, भोग हो, उन्हें भोगकर ही समाप्त होना है। आपने चाहा, आपके ठीक हो जाए, ... तो कुछ समय तो लगेगा, कि आप ठीक हो गए। फिर इसके बाद जैसे बैंक का ब्याज बढ़कर बाद में आता है, उसी प्रकार यह होता है।
सवाल था, ... कानूनगो साहब की पत्नी जब बहुत बीमार थीं, तब स्वामीजी पहली बार बकानी गए थे। उनका कोई विशेष परिचय भी नहीं था। स्वामीजी बस, वहां जाकर घंटेभर मौन उसके पास बैठते, ... वे धीरे-धीरे स्वस्थ होती गई। बाद में और बच्चे भी पैदा हुए, ... ऐसी अनेक घटनाएं घटीं, ... पर जब स्वयं स्वामीजी बीमार हुए तो उनसे भी कहा गया था, कि वे अपनी शक्ति से अपने आपको स्वस्थ करले। स्वामीजी ने कहा था-
‘इससे क्या होगा? भोग तो भोगकर ही कटेगा। आपको समर्थ रामदास का वृतांत बताया था। शिवाजी मिलने गए थे, ... तब उन्होंने देखा, पास में रखा कंबल हिल रहा है, कांप रहा है।
तब उन्होंने पूछा था- यह क्या है?
तब रामदास ने कहा था- ‘तुम्हारे आने के पहले मुझे बहुत तेज बुखार था, पर तुम आए हो, तुमसे बातें भी करनी है, तो मैंने यह बुखार कंबल को सौंप दिया है।
... ‘तुम जाओगे, फिर कंबल ओढ़ लंूगा। बुखार तो आना ही है। वह तो भोगकर ही जाएगा।’
यहां पर उस दिन सवाल पूछा गया था- ‘जब हमें जो प्रारब्ध में है वह भोगना ही है, तब फिर आप जो कहते हैं, वर्तमान में रहाा जाए, ...अभ्यास निरंतर किया जाए, इससे क्या लाभ?
स्वामी जी कह रहे थे- ‘मैंने तो आपसे कहा नहीं, आप यह करें या नहीं करंे। पर भोग से बचने के लिए प्रार्थना करना, चीखना, चिल्लाना यहां व्यर्थ है, ... वह तो भोगकर ही जाएगा, ... यह तो प्राकृतिक विधान है, ... हजारों कर्मों का भोग है, हर क्षण हम प्रकृति के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। परन्तु जो अभ्यासी हैं, वे यह जानते हैं कि मन शांत होना है, स्थिर होता है, तो यह अवधि कम हो जाती है। भोग, भोगकर चला जाता है, परन्तु उसकी तीव्रता का अहसास भी नहीं होता है। वास्तविक भजन यही है। शांत मन ही वास्तविक भक्ति है। किसी भी प्रकार की कठिनाई आती है, वह अपने आत्मविश्वास से उसका सामना करता है। जहां आत्मविश्वास घना होता है, वहां या तो विपत्तियां आती ही नहीं है, और अगर आती भी है तो उनका वेग सामना करने से कम होता जाता है।
क्या काम और क्रोध अभ्यास मार्ग पर सबसे बड़ी कठिनाइयां है? और हैं तो कैसे क्या किया जाए?
स्वामी जी कह रहे थे, हम जो अपनी संपत्ति साथ लाए है, वह हमारी इन्द्रियां और हमारा मन ही है। जन्म के साथ जो परिवार मिलता है, जो संपति मिलती है, वह तो नाशवान है।
बीज के साथ जो विकास होता है, उसमें गर्भ से ही इन्द्रियों का तथा बाद में मन का फिर बुद्धि का विकास होता जाता है। छः रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह मद और मत्सर, ये साथ ही आते हैं। सालभर के शिशु से उसके हाथ की चीज छीन लो क्रोध से रोने लग जाता है। उसका चेहरा तन जाता है। काम का बीज, सबसे बाद में खिलता है। शास्त्र में कहा गया है-
‘काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुदभ्वः
महाशनो महापाप्मा विद्धयेेनमिह वैरिणम्।। (3-37)
रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम (ही) क्रोध है, यही महाअशन अर्थात् अग्नि के सदृश भोगों से न तृप्त होने वाला और बड़ा पापी है। इस विषय में इसको तू वेरी जान।
यह प्रसंग तब आया- जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण से यह पूछा था कि मनुष्य क्यों न चाहते भी पाप कर्म में संलग्न हो जाता है, ... हम क्यों वह सब कर बैठते हैं, जो हम करना नहीं चाहते हैं। तब भगवान ने काम और क्रोध को नैसर्गिक शत्रु बताया है।
इसी प्रसंग में आगे कहा है- जैसे धुंवे से अग्नि, तथा मल से दर्पण ढंका रहता है, उसी प्रकार काम से यह ज्ञान ढंका रहता है। इस काम का निवास - इन्द्रियां, मन, बुद्धि है, इसीलिए कहा गया है इन्द्रियों को वश में किया जाए।’ विषय तो रहेंगे, ... पर इन्द्रियों का संबंध जब मन से जुड़ता है, तब इन्द्रियां भोगों को प्राप्त होती है। अगर मन अनुपस्थित है, अप्रभावी है, तो विषय भी रहेंगे, तथा इन्द्रियां भी होंगी, परन्तु संबंध टूटा हुआ होगा। यही अवस्था ‘स्थितिप्रज्ञता’ की होती है। इसके लिए कहीं समाज से कटकर अलग कहीं जाने की जरूरत नहीं है।
अभ्यास और वैराग्य की बात कही जाती है। अभ्यास तो निरंतरता है उसमें कोई कमी नहीं आए तथा वैराग्य, सीधी राह पर चलने में जो दाएं-बाएं का आकर्षण होता है, वह छूट जाए। यह आकर्षण स्मृति और कल्पना पैदा करती है।
जितना मन वर्तमान में रहने का अभ्यासी होता जाता है, उतना ही स्मृतियों का आदर कम होता जाता है। मन का भटकाव कम होता जाता है।कल्पना का,भविष्य का मोह भी छूटता जाता है।
साधक के लिए सबसे बड़ी बात इस बात को समझने की है कि परमात्मा ने उसे जीवन यापन के लिए, उत्तम पेय और भोजन के पदार्थ दिए हैं, साथ ही प्रत्येक जीवधारी को चाहे चींटी हो या मनुष्य उसे काम शक्ति के साथ भेजा है। उसका सही व संतुलित आदर ही श्रेष्ठ है।
सभी धर्मों ने सभी आध्यात्मिक साधनाओं में, चरित्र का ऊँचा सम्मान है। परिवार के विकास के लिए, स्त्री और पुरुष दोनों का होना, अभ्यासी होना आवश्यक है। यहां जो काम संबंध है, वह प्राकृतिक है। सहज है। परन्तु अनावश्यक मन के भटकाव से जहां बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वहीं आत्मविश्वास भी चला जाता है। स्त्री के लिए पुरुष और पुरुष के लिए स्त्री दोनों ही अनिवार्य है। दोनों एक दूसरे का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करते हैं।
अभ्यास
अभ्यासियों का यह कर्तव्य है कि वे जिह्वा पर नियंत्रण पहले लावे। साधु-संन्यासी, बहुत स्वादिष्ट खाते हैं। इससे उनके देह में रस बनता है, फिर वे काम विकार से कैसे बचेंगे- स्वामी जी कहा करते थे- जब एक चपाती से मेरा शरीर चल जाता है, तब स्वादिष्ट माल खाने से क्या मतलब? रसना के स्वाद के गुलाम मत बनो, साथ ही वाणी पर निग्रह रहे, तो काम विकारों पर नियंत्रण होने में सरलता होती है।
मन जब एकाग्र होता है, ... तब स्वाभाविक रूप से काम उर्जा का विकास होता है। प्राणायाम जो लोग करते हैं, तब कपाल भाती ज्यादा करने पर नाभि पर जोर पड़ने से उनकी काम उर्जा तेजी से बढ़ने लगती है, तब परेशान हो उठते हैं। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। स्वामीजी कहा करते थे- न तो आप चिंतन करे, न ही किसी प्रकार का भेदभाव जो रहे। ”जो है“, ”क्यों ह“ै, चिंतन से ही मन इधर-उधर खिंच जाता है। जितना मन वर्तमान में रहने लगेगा, बाहर के विकारों की तीव्रता उतनी ही कम होती चली जाएगी। काम से लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। न हीं भागने की। दोनों कार्य चिंतन से होते हैं। जितना चिंतन घना होता जाता है, हम उतने ही इसके गुलाम होते जाते हैं।
मन जब किसी भी क्रिया के साथ बहुत देर तक संयुक्त रहता है तो इस स्थिति में चिंतन प्रक्रिया रूक जाती है, ... हम विकारों की लहरों के थपेड़ों से सुरक्षित होने लगते हैं।
तब क्या होता है? विषय भी होंगे, इन्द्रियां भी होंगी, पर दोनों के बीच संबंध स्थापित करने वाला जो मन है, वह वहां नही ंहोता है। संबंध टूटा सा रह जाता है। यही समाधि की अवस्था होती है। यहां सजगता तो होती है। पर मूर्च्छा नहीं होगी।
अपेक्षा
जब हम दूसरों से किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हमारी भोग की पूर्ति न होने पर हमें क्रोध भी आता है, ... उनसे मोह होता है, और शोक भी होता है।
यह तीन विकार तो अपेक्षा के कम होने से कम होते चले जाते हैं। परन्तु अहंकार जो है, यही मूल विकार है। यह ”म“ैं पन का बोध है। काम और अहंकार का सीधा संबंध है। ये दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं।
अहंकार अत्यंत ही सूक्ष्म है। यह स्वयं को दिखाई नहीं पड़ता। इसकी पहचान, परनिंदा की तथा आत्मप्रशंसा की पहचान होती है।
‘कहा गया है-
‘गर्व न कीजे बावरे, हरि है गर्व प्रहारि, ... इसका प्रभाव इतनी धीती गति से बढ़ता है कि पता ही नहीं चलता कब इसने आकर व्यक्तित्व को सोख डाला है।
संत लोगों ने कहा है- अभ्यासी को चाहिए हमेशा छोटा बना रहे। इसीलिए, अभ्यासी को आध्यात्मिक शक्तियां तभी प्राप्त होती है, जब वह हमेशा छोटा बना रहता है। अनंत यात्रा में रानी चूड़ाला नीलकंठ को छोटा बटुक बनाकर ही राजा शिनिध्वज के पास ले जाती है, जहां वह उसे आध्यात्मिक साधना करवा रही है। ‘बटुक होय तो सदगुरू पायो- सदगुरु की भी प्राप्ति तभी होती है।
सहजोबाई ने कहा है-
‘बड़ा न जाने पाय है, साहिब के दरबार।
द्वारे ही से लगी है सहजो मोही मार।।
आज जहां जाइए सभी जगह इसी अहंकार का बोलबाला है। स्वामी जी बता रहे थे, ... एक बार एक बड़े सम्मेलन में जाना हुआ, ... सन्यासी अगड़े बैठे थे-बहुत से छोटा कांच निकालकर बार-बार अपना चेहरा देख रहे थे।“ आजकल टी.वी. आ गया है, उस पर भाषण देते हैं। हजारों रूपया खर्च रोज का होता है। कहां से पैसा आता है। बड़ा अहंकार है। कहते हैं, फलाना मंत्री आता है, फलां सेठ आता है। यह सब पतन की ओर ले जाता है। इस अहंकार के अनेक रूप हैं, धन का, पद का, ज्ञान का, पांडित्य का, गुरुत्व का, यह अहंकार इतना तरल होता है कि अनेक रूप धारण कर लेता है।
इसकी पहचान यही है कि इसके आने के बाद विवेक शक्ति इसके प्रभाव से दब जाती है। बुद्धि का हनन हो जाता है। वह अपने को बड़ा समझने लगता है। दूसरे उसके सामने छोटे लगते हैं।
अभ्यासी की गति यहां पर आकर रूक जाती है। उसके भीतर अपने अभ्यास का अहंकार हो जाता है। मैं इतने वर्षों से अभ्यास कर रहा हूं। मुझे वाक सिद्धि है, ... मेरा कहा हो जाता है। मुझे भविष्य का आभास होने लग गया है, ... अनेक प्रकार के विकार धक्का मारते हैं।
यहां पर आकर गुरु की महता जगती है।-
पहले गुरु शिक्षक होते है। वे साधक को अभ्यास सौंपते हैं। दरवाजे पर ले आते हैं। पर आध्यात्म की दुनियां में प्रवेश ब्रह्मनिष्ठ गुरु के सानिध्य में ही प्राप्त होता है। ब्रह्मनिष्ठ वे ही है, जिनकी ब्रह्म में निष्ठा है, साथ ही श्रोत्रिय भी हैं। स्वामी जी ने समझाया है- वह सभी प्रश्नों का समाधान तो करता ही है, वह वहां तक पहुंचने में सहायक भी है। उसका अपना स्वार्थ भी नहीं है। यही प्रकृतिजन्य कर्म है। जिसके लिए वह है।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु साधक को उसके अहंकार से परिचित ही नहीं कराते हैं, वरन उसकी ग्रन्थि को ढीला भी कर देते हैं,अभ्यासी काा पहला कदम संकल्प का होता हे।साधन का होता है। उसमें निरंतरता में रहे। स्वामी जी कहा करते थे- कॉन्सटेन्ट, ... अवेयरनेस, ... निरंतरता में रहे।
फिर यही अभ्यास, उसकी लगन बन जाता है। जो उसे, ... ब्रह्मनिष्ठ गुरु से मिला देता है।
जो गुरु स्वयं मिलने को उत्सुक है। जो स्वयं हजारों रूपया खर्च करके, शिष्य तलाश कर रहे हैं, वहां और कुछ तो होगा, परन्तु आध्यात्मिक विकास नहीं होगा।
ब्रह्मनिष्ठ गुरु और अभ्यासी का मिलना, यही प्राकृतिक विधान है। जो प्रकृति स्वयं करती है।
महत्वपूर्ण यही है कि साधक की अपने अभ्यास के प्रति तीव्र लगन हो, उसमें निरंतरता रहे, ... तो ब्रह्मनिष्ठ गुरु की प्राप्ति उसे अवश्य ही होती है।
2
सेवा
स्वामी जी कह रहे थे- इस संस्था को बनाया। बहुत मेहनत की है। उद्देश्य यही था- निष्काम भाव से प्राणियों की सेवा की जाए, ... जो भी यहां आए किसी भी धर्म, का हो जाति का हो, दुखी हो, सुखी हो, अमीर हो, गरीब हो, उसकी सेवा हो, उसे शांति मिले, यही यहां का कार्य हो।“
यही कार्य उन्होंने सोंपा है। वे कहते थे- हां, अभ्यासी को शक्तियां प्राप्त होगी, ... पर उनका उद्देश्य स्वयं को लाभ पहुंचाने का नहीं हो, ... दूसरों को लाभ हो, उनका हित हो, यही लक्ष्य सामने रहना चाहिए।
स्वामी जी ने ‘सेवा’ का एक आदर्श सामने रखा। जहां स्वयं के लिए कुछ भी नहीं चाहिए था। जीवन की आखिरी सांस तक वे समाज के हित में ही लगे रहे। कहा करते थे- अब शरीर वृद्ध हो गया है, चला फिरा नहीं जाता, तो संकल्प से सेवा का कार्य होता है। यह तो चलता रहेगा।
गुरुकुल में कोई भी पहुंचा, वहां सबका घर था। सभी की नास्ते व भोजन की व्यवस्था होती थी। जब स्वस्थ थे, पैदल मीलों जाते थे। सामान्य से भी व्यक्ति के यहां ठहर जाते थे, ... स्वयं के लिए किसी प्रकार की कोई विशेष व्यवस्था नहीं चाहते थे।
... जीरापुर की घटना है। वहां एक मुसलमान था। उसे किसी मौलवी ने कह दिया था, तुम्हारी दो माह की उम्र ही शेष है। वह तो सुनकर सूखकर कांटा हो गया था। पुरोहित जी की निगाह पड़ी, उन्होंने पूछा- क्या बात है। उसने मौलवी जी का कथन बताया, कहा कि वे पहुंचे हुए हैं, उनकी बात गलत नहीं होती।
पुरोहित जी गुरुकुल आए, स्वामीजी को साथ ले गए। उन्हें कुछ नहीं बताया। फिर वह मुसलमान बुलाया, तब उसके सामने पूछा- ‘स्वामी जी कह रहे थे- एक बार उसके चेहरे पर देखा, ... फिर दो मिनट बाद बोले- तुम अभी नहीं मरोगे- जाओ’।
वह मुसलमान वर्षों जीया। बाद में गुरुकुल भी आता रहता था। स्वामीजी कह रहे थे- मैं किसी के चेहरे पर देखता ही नहीं, बहुतों को पहचानता भी नहीं, ... जब वो दो तीन बार बोलते रहे, तब संबंध जुड़ जाता है-
गीता में कहा गया है-
तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। 18।62।।
हे भारत, सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की ही कृपा से (ही) परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
... जब तक शरीर है, संसार हैं। शरीर और संसार में एक्य है। शरीर हमेशा वर्तमान में रहता है, पर मन नहीं। मन का जहाँ शरीर हो, शारीरिक क्रिया में हो, उसी के साथ रहना, जहां क्रिया नहीं हो, वहां निर्विचारता में रहना ही वर्तमान की प्राप्ति है।
... हमें लगता है, हम सब कुछ कर सकते हैं। जीवनभर यहां से वहां, वहां से यहां भटकाव बना रहता है। इधर से उधर सुबह से शाम तक हाथ पांव मारते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे- जब अन्तर्मुखी होते हैं, तभी अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य का पता लगता है। प्रकृति ने हमें कौन सा कार्य करने को भेजा है उसी कार्य को हम तब कर पाते हैं। नहीं तो भटकाव बना रहता है।
... फिर हम क्या करंे-
साधन के साथ, जो मात्र स्वाभाविक अवस्था में रहना है, ... उसमें रहे। बाहर जो घट रहा है, ... उसके साथ अधिक से अधिक मन को साथ रखने का अभ्यास रखे।
.... सुख-दुख होगा या नहीं, इन प्रश्नों के चिंतन में उलझना बेकार है। शक्ति सारी चिन्तन में चली जाती है। परमहंस जिस बिल्ली के बच्चे का उदाहरण देते थे, वह याद रहे, प्रकृति जो भी कर रही है, उसमें हमारा कोई उपकार है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर ले जाती है, पर बच्चा जानता है कि इसी में उसका हित है।
यही बात गीता के संदेश में कही गई है- जो है, वह स्वीकार है।‘‘ ईसा ने कहा है- .............. तेरी इच्छा पूरी हो। काश्तकार कहा करते हैं- हमने लगाई अर्जी जैसी दाता की मर्जी, हमारा तो काम करने का फर्ज है।पर यहां गुरुकुल में कोई आया है, उसने चाय पी है या नहीं, उसका इंतजाम हुआ है या नहीं, पहले पता करता हूं“स्वामीजी कहा करते थे।
सेवा प्रतिष्ठान, छोटी सी संस्था थी, पर वह अपनी सीमा में निरन्तर सेवा में लगे रहे।
स्वामीजी कह रहे थे, हम जब अन्तर्मुखी होते हैं, वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाता है, तब शक्ति पाने का हकदार होते हैं। हमारी मानसिक शक्तियां प्रबल होती जाती है। परन्तु यहां ध्यान रहे, शक्तियों का सदुपयोग जनहित में ही होना है।
पर होता क्या है, हम स्वार्थ में अंधे हो जाते हैं। हम शिक्षा लेते भी नहीं है। जो कुछ भी चाहते हैं। अपने लिए ही चाहते हैं। अभ्यास का यही अर्थ है कि हमारे भीतर निष्कामता तथा निस्वार्थता आए। आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्व भूतेषु हितेरतः की भावना ही शेष रहे। सेवा कार्य, शरीर से भी होता है, मन से भी तथा धन से भी। धन से सेवा करना सरल है, उसमें रसीद कटती है। हमारा नाम दीवार पर लिखा जाता है। अहंकार की पूर्ति होती है। समाज में सम्मान मिलता है। शरीर से सेवा करना उससे श्रेष्ठ है, इससे अहंकार गलता है। यह तप है। इससे अहंकार दूर होता है। मन से सेवा वे ही कर पाते हैं जिनका मनोबल बड़ा होता है। जो अभ्यासी हैं। जो सहजावस्था में रहते हैं।
ध्यान
जहां भी हों, जो भी क्रिया हो, ... मन को अधिक से अधिक वहीं रखा जाए, दूसरे शब्दों में जहां शरीर हो वहीं मन भी हो, ... मन वहीं रहे। पर यह संभव नहीं हो पाता है।
हम जहां भी होते हैं, उस क्रिया को करते समय भी मन हर मिनट में दस पांच जगह चला जाता है। निरंतर निगरानी करते रहो, ... तो लगता है, ... जैसे बंदर उझलकूद करता रहा है, उसे पकड़ना हो, वैसा ही रहता है।
क्या अभ्यास हो-
स्वामी जी ने कहा था-” इसका प्रारंभ रात को किया जाए। सोते समय मन का भटकाव रोकना है। भटकाव से मानसिक शक्ति क्षीण होती है। संकल्प शक्ति कम होती है। बिस्तर पर लेटते समय, जब सारे कार्य समाप्त हो जाए, वहां हम जाए तब मन के द्वारा मन की निगरानी रखी जाए। निर्विचार स्थिति में लेटे रहे। तो क्या होगा? विचार तो आते रहेंगे, ... निगरानी होने से आते ही रूक जावेंगे। दो चार विचार आने के बाद, रूक जाने पर, हर गेप एक खालीपन आएगा। मन में कोई विचार नहीं होगा। इस गेप की मन के द्वारा मन पर वाच रखते हुए बड़ा करते जाना है। इस स्थिति में दो बातें होगी- या तो विचार आएंगे, ... या नींद आवेगी। नींद भी आना अच्छा है- तो यह प्रयास रात को, और यही प्रयास बिस्तर पर उठते समय सुबह किया जाना चाहिए। फिर दिन में जब भी समय मिले, ... तब मन पर वाच किया जाए। क्या विचार आता है? उसे हटाया जावे। इस स्थिति में थोड़ी प्रगति पर होने पर क्या होगा? कई बार सुगंध जैसे कमरे में कोई अगरबत्ती जल रहे हो या इत्र की सुगंध, ... या धीरे-धीरे एक महीन बारीक आवाज सुनाई देगी, ... थोड़ी देर रूकेगी, इसके बाद वह शाम को, छ या सात बजे, जब अंधेरा आने को होता है, जब प्रकाश, चौंधी हुयी रोशनी आपको नजर आएगी। इससे इतना ही पता लगता है कि हम सही रास्ते पर हैं- फिर जो कार्य होना है, इसका पता लग जाता है, अनावश्यक कार्य अपने आप छूटते जाते हैं-“
सवाल था, पर व्यवहार में तो कठिनाई रहती है, मन तो निरंतर भटकता रहता है- स्वामी जी ने बताया था, इसीलिए परंपरागत विधि में कई तरीके बताए गए हैं। विपश्चना भी एक है- यहां श्वास की गति पर एकाग्रता करते हैं। मन और प्राण का गहरा संबंध है। एक के संयम से दूसरा भी सध जाता है। पहले नासिका के अग्र भाग पर ध्यान को लाओ, फिर श्वास पर केन्द्रित करो, श्वास का कम घेरा होता है, बाहर से भीतर भीतर से बाहर, श्वास की गति के साथ रहो, जहां वह मुड़ती है, वहां सजगता में रहो, धीरे-धीरे विचारों की संख्या कम होती जाती है।
बौद्धों में यह विधि प्रचलित है।
परन्तु वर्तमान में रहने से क्या होता है? यहां बाह्य प्रयास कुछ भी नहीं करना पड़ता। मन के क्रिया के साथ निरंतरता में रहने से, प्राण की गति भी नियमित हो जाती है। संयम सधने लगता है। जब क्रिया नहीं होती है, तब मन जहां शांत होता है, अंतर्मुखी होने लगता है वहीं प्राण से भी उसकी युति होने लगती है। यही वास्तविक योग है। ... जहां हठयोग, राजयोग, आदि अंतर में अनेक बाह्य विधान बताए जाते हैं, वहां यह सहज ही उपलब्ध हो जाता है। स्वाभाविक अवस्था में रहना ही साध्य है। इस अवस्था को अधिक से अधिक सहजावस्था कह सकते हैं।
क्या करना है
”मानव जीवन का उद्देश्य, जीवन में सुख व शांति प्राप्त करना है। हम जब अंतर्मुखी होते हैं, तब हमें पता लगता है कि हम यहां किस उद्देश्य से आए हैं, ... अतः हमें निरन्तर वर्तमान में रहने का अभ्यास करना है“- स्वामी जी कह रहे थे। प्रश्न था, हम कैसे रहंे, हम तो गृहस्थ हैं? वर्षों वे हमारे साथ रहे, ... पर हमारे भीतर तो कोई परिवर्तन नहीं आ पाया, ... सब कुछ पहले की तरह रहा। बर्हिमुखता बनी रही। इसके दबाव में कार्य करते रहे। स्वामी जी एक ही बात कहते थे, मुझे देखो- मेरे तो बचपन में पिता चले गये थे, युवावस्था में मां चली गई, अभाव रहे, जब मैं कर सकता हूं तो आप लोगों को तो बहुत सुविधाएं हैं, क्यों नहीं कर पाते? फिर कहते थे- कुनकुने पानी में चाय नहीं बनती है।’ अभ्यास व लगन दोनों ही महत्वपूर्ण है।
... स्वामी जी कहा करते थे- ‘मैं किसी का गुरु नहीं हूं, मैने किसी को अपना चेला नहीं बनाया, फिर कहा करते थे- आपने यदि मुझे गुरु माना है, आप यहां आए हैं, तो मेरे विचारों को चिन्तन का आधार बनाएँ, उन्हें व्यवहार में लाएं। वे कहा करते थे- मुझे पांव छुआना, पांव में रोली लगाना, पूजा कराना पसंद नहीं है तथा फिर वे हम सबके घर पर आते थे, सत्संग भी होता था तथा एक भरापूरा गुरुकुल परिवार से वहां मिलना होता था-
उन्होंने गुरु और पिता का भेद समाप्त कर दिया था। वहां मात्र प्रेम था, एक सहजावस्था, जहां उन्हें शिशु से लेकर वृद्ध तक उनसे संपर्क बनाए रखते थे, परिवार की छोटी से छोटी समस्या को वे जानते थे, दूर भी करते थे- रास्ता सुझाते थे, ... प्रसन्नता सौंपते थे।
... जब हम शुरू-शुरू में गुरुकुल जाते थे, तब स्वामी जी खुद चाय बनाते थे, ... चाय के प्याले भी धोते थे, ... कहीं किसी प्रकार की विशिष्टता का आदर नहीं था। वहां गुरु और शिष्य का भाव नहीं था, ... पिता और पुत्र का भाव था, महिलाएं उनकी बेटियां थीं, कहा करते थे, जानकीबाई, पार्वती, क्षमा, सनोज की मां, केसरी लाल जी के यहां से, को चेहरे से पहचानते हैं, ... कभी किसी महिला की ओर उसके चेहरे को देखा तक नहीं, ... कोई राग वहां नहीं था। मात्र एक प्रेम। किसी से सेवा लेने का रत्तीभर भाव नहीं था।
कहा करते थे-‘अनंतयात्रा’ में जब चूडाला, नीलकंठ को राजा शिविध्वज के पास साधन सिखाने को ले जाती है, तब उसे नन्हा बटुक बनाकर ले जाती है। अगर करना है तो अपने अहंकार को कम करना है।
जैसी हरी दूब होती है। ... बड़ी घास को लोग उखाड़ लेते हैं। दूब बच जाती है। बड़े पेड़ तूफान में उखड़ जाते हैं। नए पौधे हिल-हिल से बच जाते हैं।
अहंकारी ही गिरता है, ... साधन पथ में इसीलिए विकास नहीं होता कि वहां तुम और तुम्हारा ‘में’’ दोनों एक साथ जाना चाहते हैं। वहां दो का प्रवेश नहीं हो सकता।
वहां तो नन्हें का ही प्रवेश है। छोटा होकर जाना होता है। ... अन्य मतों में, गुरु भाइयों व बहनों से प्रेम सिखाया जाता है। वहां लौकिक भार्ग व गुरु भाई का भेद समझाया जाता है। प्रेम भी बंट जाता है। ... स्वामी जी इसे पसंद नहीं करते थे, कहते थे प्रकृति ने जो रिश्ता बनाया है उसका निर्वाह पूरा करो। दूसरे नहीं करते हैं, दुर्भावना रखते हैं। वह उनका कर्म है, उनके कारण से हम अपना व्यवहार खराब नहीं करेंगे। जो गुरु परिवार के हैं, उनमें भी उतनी ही प्रीति हो। प्रेम, बंटता नहीं है। बांटता भी नहीं है। हां, आसक्ति अवश्य कम होती जानी चाहिए।
... अभ्यासी आप हैं, लगन रहे। आज किया कल छोड़ दिया, उचित नहीं, यहां न तो किसी विशेष व्यवस्था की जरूरत है, न ही किसी प्रदर्शन की बस, सुबह व रात को और जब समय मिले, अपने मन पर सतर्कता रखनी है। अनावश्यक विचारों का भटकाव कम हो, यह ध्यान रखना है। पथ्य एक ही है, कम बोलंे, अनावश्यक नहीं सोचंे, ... पर निंदा व आत्मप्रशंसा से बचंे, ... बस। यही अभ्यास है।
... जहां राग होता है, वहां मत्सर भी होता है। किसी से अपेक्षा होती है जब वह पूरी नहीं होती है, तो क्रोध आता है, वहां शोक होता है, वहीं मोह होता है, वहीं मस्कर है, ईर्ष्या है। ईर्ष्या का ही विकसित रूप घृणा है।
वैराग्य, किसी दूसरे के प्रति अपेक्षा का अभाव ही है। स्वामी जी कहा करते थे, दूसरा कोई है ही नहीं। तुम अपना काम करो, ... तुम्हें दूसरों से क्या प्रतिफल मिलेगा, यह सोचना ही नहीं है। दूसरों का चिंतन ही दुख है। वही पराधीनता है। दूसरे से सदा अपेक्षा होती है। जो भी दूसरा है, उसके प्रति प्रीति रहे। इसमें जाता क्या है?
अभ्यास और वैराग्य से ही शांति प्राप्त होती है। मन अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं शान्ति व शान्ति का निवास है।
फिर सवाल था; त्याग क्या हो?
स्वामी जी ने कहा था, जो आपका है नहीं, उसे आप क्या छोड़ सकते हैं? आपके पास तो आपकी स्मृतियां है, जो आपको वर्तमान में नहीं रहने देती है। उनका त्याग ही वास्तविक त्याग है। अधिकांश विकार स्मृति से ही पैदा होते हैं।
यही अभ्यास रहे। इसी अभ्यास से मन को जहां शांति मिलती है वहीं शक्ति भी मिलती है। स्वामी जी कहा करते थे- मैंने सभी प्रकार की साधनाएं की, ... साठ साल के निरंतर अभ्यास में इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि वर्तमान में रहना ही, सच्ची साधना है। यही वास्तव में गीता जी का सार है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो समझाया है- माम अनुस्सर युद्धच, यह वहीं है। यही वास्तविक समर्पण है।
मामेव ये प्रपद्यन्ते, माया मेेतां तरन्ति ते। 7/14
इस माया को वे ही पार कर जाते हैं, जो मेरी शरण में आते हैं।
इस माम की शरणागति ही सार है।
‘क्या गुरु की शरण में जाना आवश्यक नहीं ?
स्वामी जी ने अनंत यात्रा में, ब्रह्मनिष्ठ गुरु की अपरिहार्यता पर बल दिया है। उन्होंने अनेक जगह पर ब्रह्मनिष्ठ व क्षोत्रिय गुरु पर बल दिया है। कहा करते थे, ब्रह्मनिष्ठ गुरु का मार्गदर्शन अपेक्षित है। गुरु विवेकी है। वे शिष्य को विवेक प्रदान करने आते हैं। शिष्य विवेकी हो यही उनका कर्तव्य है। अनंतयात्रा में कुंभ नीलकंठ से कहता है- तुम्हारा मार्गदर्शन करूं, यही मुझे अभीष्ट था, हो सकता है कि इसके बाद मेरा शरीर रहे या नहीं? परन्तु ब्रह्मनिष्ठ गुरु कभी भी अपनी शरणागति के लिए नहीं करते। वे तो अपनी पूजा भी करवाना नहीं चाहते। उनसे पूछा था- किसी मत में व्यवस्था है, गुरु के द्वारा नामित शिक्षक अभ्यार्थियों के विकारों को दूर करते हैं, ... इन शिक्षकों को गुरु अपनी शक्ति प्रदान करते हैं।
स्वामी बस हंसे थे, ... बोले, यह संभव नहीं है। आध्यात्मिक विद्या, प्रबंधन व्यवस्था नहीं है। यहां शिक्षण नहीं होता। यहां मात्र प्रवेश होता है। लगन और अभ्यास होना ही पर्याप्त है।
हां, ब्रह्मनिष्ठ गुरु हो, उनके मन से आप अपना मन मिला दंे, ... तो आवश्यक नहीं है, वे सशरीर भी हों, उनकी शक्ति आपका मार्ग दर्शन करती रहेगी। संत मत में यही मार्ग है।
यहां गुरु की उपस्थिति उसकी मानसिक स्वीकृति है, उसके प्रति प्रेम है। उसके प्रति समर्पण है, ... वह मार्ग बताते हैं। साधना में गति देते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे, गुरुमत में साधक सब गुरु को छोड़कर अपने काम-धाम में लग जाते हैं। साल में एक दो बार आ गए। काम पूरा हुआ, भेंट दी, माला पहनाई, चल दिए, ... यह साधना नहीं है। गुरु भी कहते हैं- तुम्हें कुछ करना नहीं तुम्हें तो गुरु के आसरे हो जाना है, सब गुरु कर देंगे। इससे गुरुडम ही फैलता है। किसी का भी विकास होता देखा नहीं। आज करोड़ों की संख्या गुरु हैं, चैले हैं, ब्रह्मनिष्ठ गुरु होंगे तो वे इस प्रपंच से बहुत दूर होंगे।
आध्यात्मिक साधना कोई सरल साधना नहीं है। न ही इसका कोई सरल उपाय है। गीता में कहा गया है, ... करोड़ों में कोई एक इधर आता है, कबीर जी ने भी कहा है- यह तलवार की धार पर चलने के समान है।
‘एक बात साफ है-
स्वामी जी कहते थे- आपका चित्त विकारों से भरा हुआ है, संग्रह इकट्ठा हो रहा है, तरक्की कैसे होगी?
”किताबें कहती हैं कि यह काम तो गुरु का है, गुरु ही क्या, उनके द्धारा नामित शिक्षक ही यह काम कर देते हैं।“किसी ने कहा था।
स्वामी जी मन की भाषा पढ़ रहे थे। बोल,े ”करना आपको ही होगा मुझे नहीं, यहां सब यह सोचकर आते हैं, जैसे मेरा यह काम है क्या मैंने सन्यास इसलिए लिया, चालीस साल से अधिक समय इस जंगल में रहते हुए हो गया, क्या इसलिए? यह सेवा नहीं स्वार्थ है।“
विचार ही विकार हैं, आप खुद अपने विचारों पर सतर्कता रखो। कर्म के साथ जुड़ो मन को वहीं रखो। नया संग्रह नहीं बनेगाा पुराना अपने आप कम होने लगेगा। करना आपको ही है। आप इसीलिए यहां आए हैं। कोई किसी के विकारों को अपने ऊपर नहीं लेता। उन्हें क्या जरूरत है? क्या ब्रह्मनिष्ठ गुरु स्वार्थी है?, लोभी है? जो उनके पास गए उनकेे मल दूर कर दिए, जो नहीं गए उनके नहीं किए? उन्हें क्या इसकी जरूरत है।
वे तो मात्र, ‘जीवनमुक्त होकर भी प्रकृति के कार्य में सहयोग करते हैं। ... मार्गदर्शन करते हैं। उनका सत्संग, ... स्वाभाविक रूप से आनंददायी होना है। उसमें एक खिंचाव होना है। जो भीतर की गंदगी को कम कर देता है। उनके सानिध्य में मन शांत हो जाता है। प्रश्नों के उत्तर अनायास प्राप्त हो जाते हैं। वहां अमृतवर्षा होती है। वहां मात्र प्रेम है।
जहां स्वाभाविक प्रेम है, वहीं ब्रह्मनिष्ठ गुरु है। उनका सत्संग ही बहुमूल्य है।
स्वामी जी ने अपने प्रवचन में एक बार कहा था-
‘आप लोग कुछ नहीं कर सकते हों, तो कम से कम जो बातें कहीं गई है उन पर चिंतन करो, जो साहित्य प्रकाशित हुआ है, उसे पढं़े, इस प्रकार आपका और मेरा संबंध जुड़ा रहेगा। आपके मन से मेरी शक्ति जुड़ करके आपका मार्गदर्शन करती रहेगी।’
... वे कहा करते थे, हरेक का यहां आना कठिन है, तकलीफ भी होती है। ... पर हम इतना ता कर सकते हैैंं। मन से संबंध जोड़ सकते हैं। यही साधन है। मार्गदर्शन स्वतः प्राप्त होता रहता है।
... पर स्वामी जी जिनका भोजन इतना अल्प था कि कल्पना करना ही कठिन था। पहले सुबह बस एक बार भोजन था,वह भी एक चपाती, दाल, सब्जी, बाद में बंबई्र से आने के बाद शाम को भी भोजन लेना शुरू किया था, ... वह भी इतना ही अल्प था।
कहा करते थे- अभ्यासी को सबसे अधिक ध्यान अपने मन पर रखना होता है। मन का अन्न का गहरा संबंध है। अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से ही मन की निर्मिति होती है। आवश्यक है अन्न का संबंध ईमानदारी के पैसे से हो, जो बनाने वाला हो, उसका मन शुद्ध हो, तथा अन्न ग्रहण के समय हमारे विचार शांत हों। उत्तेजना में कभी भी अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
जब हम दूसरे का अन्न ग्रहण करते हैं तो उसका दासत्व तुरन्त आ जाता है। जहां तक हो सके, इससे बचा जावे। उसे चुकाने का संस्कार अपने आप बन जाता है। आधी से अधिक बीमारियों का यही कारण है। अन्न का दोष ही आज सर पर चढ़कर बोलता है। बीमारी शरीर में बाद में आती है। पहले मन में आती है। मन के विकार ही शरीर पर प्रकट होते हैं। पहला सूत्र यही है, जिस अन्न से हमारा पोषण होता है, उसके प्रति गहरी सावधानी रखी जाए।
ब्याज का पैसा और रिश्वत का, दोनों पैसे भी मय ब्याज के चुकाए जाते हैं, यह एक बुनियादी सिद्धान्त है। प्रायः सत्संगों से भी अब सेठों सेे भी मदद ली जाती है। वे दान क्यों करते हैं? उन्हें लाभ हो? स्वामी जी ने एक बालक की कहानी सुनाई थी, जो जन्म के बाद मिट्टी की मूर्ति बनाता था तथा उसका सिर चाकू से काट देता था, उसके माता-पिता जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, देखकर सकपका गए। उन्होंने विचार किया, फिर वह ब्राह्मण उस सेठ के पास गया जिसेे उसने श्रावण माह में घर पर अभिषेक करवाया था तथा दान दिया था।
उसने पूछा था, ... वह अभिषेक आपने क्यों करवाया था?
तब उसने बताया था कि मेरा एक कसाई के पास काफी रूपया उलझ गया था, ... मैंने मन्नत मांगी थी, रूपया मिल जाएगा तो अभिषेक करूंगा।’’
तब वह ब्राह्मण घर लौटा तथा दान में मिली राशि सारी सौंप आया। ... अन्न से संस्कार, हमारी पीढ़ी तक में पहुंच जाते हैं। गलत ढंग से पैसा कमाने वालों केे बच्चे जो निकम्मे हो जाते हैं, उसके पीछे यह भावना ही महत्वपूर्ण है। संस्कार बच्चों में, माता-पिता के संस्कारों से ही बनते हैं। इसमें उनके गुण-दोष तो होते ही हैं, वे स्वयं भी जिम्मेदार होते हैं। आज दुनिया में ये बातें अब बेवकूफी की मानी जाती है। सबके पास अपने-अपने तर्क हैं, पर वे दुखी है, व्यथित हैं, कारण भी उनके ही पास है। अभ्यार्थियों को चाहिए कि वे ब्याज, रिश्वत, तथा सूदखोरी से जहां तक हो सके, बचंे।
हम जब दूसरों से सेवा लेते हैं, तो बदले में हमें चुकाना चाहिए। यह पहला नियम है। स्वामी जी जब आते थे- तब वे किसी भी साधक की रत्तीभर भी सेवा नहीं चाहते थे। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था। वे कहा करते थे, जो सरकारी सेवक हैं, उसे सरकार धन देती है, आपको नहीं, उसके प्रति व्यवहार श्रेष्ठ हो, अगर खाना बनाना है, तो वह खाना वह भी खाएगा, याद रखो। प्रकृति में लेन-देन स्वाभाविक क्रिया है। हमें चुकाना पड़ेगा। जहां तक हो सके, सेवा करो, पर लेने की चेष्टा मत करना। दुनिया बचा करती है, हम हमें इससे मतलब नहीं,है। यही तितिक्षा है, ... बर्दाश्त करो। लहरें आएंगी, थपेड़े देंगी, हमें बहना नहीं है। प्रकृति का खेल, एक मनोरंजन है। सब एक से नहीं हो सकते। जो आज राजा है, कल रंक बन सकता है, ... सब संभव है, हमें अपने आपको देखना है, दूसरों को नहीं।
अभ्यार्थियों के लिए
स्वामी जी से बहुत पूछा था, वे साधना शब्द का भी प्रयोग नहीं करते थे। ... सहज, स्वाभाविक अवस्था में रहना कहते थे। कहा करते थे- भाषा के चक्कर में मत फंसों, ... उनका अन्तर्मुखी वह था, जिसका इन्द्रियों और मन का संबंध टूट सा गया है, ... जिसका बाहर का भटकाव छूट गया है। वे कहा करते थे- ‘इन्दियां मन में सिमट जाती है, विषय रहेंगे, पर इन्द्रियां उसकी ओर उन्मुख नहीं हो पाती है। यह अवस्था निरन्तर वर्तमान में रहने से प्राप्त होती है।
तो जो इस मार्ग पर आना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक हैं, वे आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचंे। लगन और अभ्यास बनाए रखंे। अपने परिवार के साथ ही नहीं सबके प्रति प्रेम रखें। हम अभ्यास करते हैं। इसका प्रदर्शन भी नहीं होना चाहिए। एक बार एक परिचित आए हुए थे, वे सत्संगी थे, उनका सत्संग कहीं दूर होना था, वे वहां जाना चाह रहे थे, किसी को तलाश कर रहे थे कि वह वहां उन्हें छोड़ आए।
स्वामी जी ने उनका उतावलापन देखा। बोले कुछ नहीं।
उनके जाने के बाद, बोले वहां भी उनका मन नहीं लगेगा, वहां से यहां आने के लिए किसी को तलाश कर रहे होंगे।
इस सत्संगों का यही दोष है। यहां भी अवधारणा हावी हो जाती है। बार-बार सोचने से गुलामी आती है। हम चाहते हैं, मुक्ति, यह तो बंधन अधिक है। आपको शांत होना है, आपको वर्तमान में रहना है, आपको विचारों के प्रवाह को कम करना है, करना आपको ही है। आपकी लगन, आपकी भावना, आपका संकल्प महत्वपूर्ण है। गए तो ठीक, नहीं गए तो ठीक, यह वैचारिक दासता, शारीरिक दासता से भी अधिक गंभीर है।
स्वामी जी स्वयं खूब पढ़ते थे। पढ़ने को कहते भी थे। योग वशिष्ठ और गीता, पढ़ने को कहते थे, तथा ‘निसर्गदत्त महाराज, रामकृष्ण परमहंस, जे. कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि, ओशो, सभी चिन्तक मनीषियों के ग्रन्थ स्वयं पढ़ते थे, तथा दूसरों से चर्चा करवाकर सुनते थे। बाइबिल व कुरान व सूफी ग्रन्थों का भी अध्ययन था। कहते थे- बचपन में मैं दस से पंद्रह घंटे पढ़ता था। वे कभी भी किसी से ‘अपनी बात मानो’ यह आग्रह नहीं रखते थे। कहते थे- विचार एक निरंतर बदलने वाली प्रक्रिया है, जो आज विचार है, कल नहीं रहेंगे। हम स्वयं चिंतन करें, कठमुल्ला नहीं बने, जो उचित लगे, उस पर चलंे, लाभ मिलता हो आगे बढं़े, नहीं मिलता हो छोड़ दें। हमेशा खुद नहीं बोलते थे, दूसरे से पूछने के लिए प्रेरित करते थे। एक संवाद था। जहां दूसरा भी उनके पास बैठकर संवादी बनता था।
उनके पांवों में बाद में दर्द रहने लग गया था। वे जब भंडारी मिल में स्टोरकीपर का कार्य कर रहे थे। तब स्वामी राम के शिष्यों के साथ अमरनाथ की यात्रा पर गए थे। साधारण कपड़े पहने थे तथा जूते भी कपड़े के थे। लौटते समय, दोनों पांव सुन्न हो गए थे। कहा करते थे- संकल्प किया था, जब बीमार पडूंगा तब चैतन्य चरितावलि पढूंगा। तब स्वामीराम के कहने पर इन्दौर होईकोर्ट के चीफ जस्टिस जाम्मेकर अपने साथ उन्हें अपने घर ले गए थे। वे उन्हीं के घर पर रहते थे। तब यह घटना घटी थी। डॉक्टर मुखर्जी इन्दौर के चिकित्सक थे, उन्होंने लकवा बताया था। पर बाद में जिस दिन चैतन्य चरितावलि का अध्ययन पूरा हुआ उनके पांव ठीक हो चुके थे।
परन्तु वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर पांवों में दर्द आ गया था, चलने फिरने में तकलीफ थी। पर किसी को पांवतक नहीं दबाने देते थे। अपना काम खुद करते थे। न तो माला पहनाने देते थे। न पांव में रोली लगाने। उनके जाने के बाद तो देखा, गुरुकुल में ही जो साधु अतिथि होकर आए वे बिसलरी की बोतल मंगवाकर अपने पांव महिलाओं से धुलवा रहे थे। आश्रम के लोगों को बताया, यह कौन सी गुरु पूजा शुरू करवा रहे हो? स्वामी जी तो गुरुपूजा के सख्त खिलाफ थे।
वे एक ही बात कहते थे- मुझे बचपन में इंजीनीयर साहब मिले थे, वे ही उनके गुरु थे। जिन्होंने उनके बचपन में उनके भीतर इस ज्ञान निष्ठा का बीज बोया था। उन्होंने उनसे कहा था- संसार में भोजन और कपड़ा, रोटी मूल आवश्यकताएं हैं, इनको अपने ऊपर हावी मत होने देना। स्वामी जी की पूरी संपत्ति मात्र एक थैला रही। आधी धोती व कुरता तथा शैविंग का सामान। बस चार नंबर का छोटा सा कपड़े का जूता, दो चश्मे। भोजन में मात्र एक चपाती, थोड़ा चावल, दाल बस। नहीं मिला तो वह भी सही। महापुरुष संसार में अपने आचरण से ही धर्म, की स्थापना करते हैं। धर्म, माने कर्म जिस आधार पर हमें करने हैं जो कर्म हमें हमारे विकास की ओर ले जाएं। हमें शांति की प्राप्ति हो।
शास्त्र अपरिग्रह की चर्चा करता है। पर स्वामी जी तो स्वयं अपरिग्रह का उदाहरण रहे।
शास्त्र कहता है-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणां कुरूते लोकस्तवदनुवर्तते। 3 । 2। ।
श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, अन्य पुरुष (भी) उस उसके ही अनुसार वर्ततते हैं, वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसके अनुसार बर्तते हैं।
श्रेष्ठ अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी के लिए यहां कहा गया है। तिलक महाराज ने इस श्लोक की व्याख्या में कहा है- ‘जब तुम्हें संदेह हो कि यहां संसार मैं किसी प्रसंग पर कैसे बर्ताव करे, तब वैसे ही बर्ताव करो कि जैसा ज्ञानी, मुक्त और धार्मिक ब्राह्मण करते हो।’ आगे उन्होंने इसी प्रसंग में- रामदास स्वामी की उक्ति की कही है-
‘‘देख भलों की चाल को, बर्तेंसब संसार।’’
यहां भगवान अपना उदाहरण देकर स्पष्ट कर रहे हैं कि - आत्मज्ञानी पुरुष के लोककल्याण के कर्म उससे छूट नहीं जाते। इसी बात को स्वामी जी कहा करते थे। स्थितिप्रज्ञ होकर संसार से पलायन नहीं करना है। परन्तु प्रकृति ने जो कार्य सौंपा है, उसे करते हुए उसके कार्य में सहयोग करते रहना है।
उनके आचरण में यही ध्वनित था, ... जो उचित था, वह उनके द्वारा सदैव होता रहा, ... भले ही उसमें यह कितनी ही कठिनाई झेलनी पड़ी हो। करुणा उनका सहज स्वभाव रहा। परन्तु बाद में लगता था, ... उनकी करुणा, ... अहेतुकी होते हुए भी किसी अदृश्य विधान से संचालित थी। अट्ठाईस साल का गहरा संपर्क रहा। एक एक बात न जाने क्यों बताते थे। तब समझ में नहीं आता था पत्र लिखा करते थे। हर बात की सूचना देते थे। स्वप्न विजन तक बताते थे। पता नहीं क्यों तब इतनी न तो लगन थी, न हीं ज्ञान था, पर हां इन बातों को संग्रह करत रहें, यह ध्यान रहता था।
... कई बार पूछते थे- ”मुझमें कोई कमी नजर आती है तो बताओ।“ हम सुनकर चुप रह जाते थे। कमियां तो हममे हजारों है, ... हम कहां ढूंढे? पर उधर कोई मिलने आया, ... वे हमें बात करते देखते। उनके जाने के बाद, धीरे से पूछते- ”इतनी बात करने की क्या जरूरत थी। जो आश्वासन पूरे नहीं हो सकतेहैं, वे क्यों दिए,“ ... बारीक से बारीक दोष वे अनायास रेखांकित कर जाते थे। एक पिता की तरह उनका अनुशासन रहा। सब के प्रति, परन्तु क्रोध का अंश लेशमात्र भी नहीं। अकेले में जब होते, तो पास बुलाकर, समझाते। हां, उन्हीं घरों में ठहरते थे, जहां प्रेम था। कहते थे, जहां परिवार में विग्रह है वहां क्या जाना? लेते शायद छटांग भी नहीं थे, पर जब वहां से जाते, उस घर में मन भर दे आते। उनकी सारी तकलीफों को दूर कर आते।
कहा करते थे- ”अगर परमात्मा भी धरती पर आए तो लोग उसमें भी कमी निकालेंगे, ... यह तो मनुष्य का स्वभाव है, ... परन्तु वे स्वयं आगे-बढ़कर अपनी कमी पूछते थे। कभी यह नहीं कहते थे कि, ”मेरी बात मानो, यही सच है,“ मैंने यह जाना है, यह पाया है, इन शब्दों में कम से कम शब्दों में अपने आपको व्यक्त कर देते थे।
गीता सार
मामका पाण्डवा श्चैव
मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, ... गीता का प्रारंभ धृतराष्ट्र के इस प्रश्न से होता है, ... मेरे और पाण्डु के, ... जबकि पाण्डवों के मन में यह विभाजन नहीं था, वे धृतराष्ट्र को ही अपना पूर्वज मानकर, आज्ञा मानते रहे थे। पर यह द्वेष- धृतराष्ट्र के मन में था; यही विभाजन ही संहार का मुख्य बना
... यही अप्रेम, कलह तथा स्वयं के व्यक्तित्व विभाजन का कारण बनता है।
लोभोपहत चेतसः
लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते-
... जो मिल गया वह कम है, ... और और मिल जाए इसका ही नाम लोभ है, ... इस लोभ से ही विवेक शक्ति लुप्त हो जाती है।
... मनुष्य संयोग का जितना सुख लेता है, वियोग का भी उतना ही दुख उसे भोगना पड़ता है।
पहले वस्तुओं का अभाव जो होता है, वह इतना दुखदायी नहीं होता जितना वस्तुओं का संयोग होकर, वियोग होता है, वह होता है, ... वस्तुओं का संयोग भी प्रारब्धानुसार होता है, स्थाई नहीं है, वियोग तो होना ही है, परन्तु लोभ उसे सातव्य प्रदान करता है। जो बीच में वस्तुओं से सुख प्रतीत होता है, वह लोभ के कारण से ही है। ‘मोह’ भी बन्धन जरूर है। मोह के कारण ही संबंधियों से सुख प्रतीत होता है।
... वैर, ... वैरभाव अत्यंत ही दुखदायी है। भोगकर तो दुख से पार हुआ जाता है पर वैर की अग्नि तो जन्म-जन्मान्तर तक साथ जाती है।
... मनुष्य की दृष्टि जब तक दूसरों के दोष दर्शन में रहती है, तब तक उसे अपना दोष दिखाई ही नहीं पड़ता है, ... दूसरों का दोष देखना भी, ... बड़ा दोष होता है, इससे अपने भीतर ‘अहंकार’ पैदा होता है।
पाप-पुण्य अंक1
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