Thursday, May 10, 2012

वाहक 2

वाहक 2


इस अंक में हम गीता के अध्ययन में प्रवेश कर रहे हैं। वाहक के हर अंक में हम गुरुगीता के कुछ श्लोकों की चर्चा करेंगे। पूज्य स्वामीजी ने अपने प्रवचनो में गीता के आधार पर समझाने का प्रयास किया था।

पाप और पुण्य





दान-सेवा और बहुमूल्य शब्दों पर चर्चा हो रही थी।

स्वामी जी ने कहा- स्मृति पाप है, प्रश्न यहां पैदा हो गया था। वह पाप क्यों है?

- दो ही बातें होंगी, या तो तुम अपने में रहना चाहोगे, ... या बाहर भटकते रहोगे। तुमने दान किया, तुम्हारे भीतर अहंकार जगा, ... तुमने सेवा में समय दिया, ... अहंकार जगा, ... तुम फिर भीतर से बाहर चले गए। बाहर की अनंतयात्रा है, ... घूमते रहो, ... मात्र बौद्धिक जिज्ञासाएं हैं, ... समाधान नहीं है। यह जो बाहर भटकाता है, ... यही पाप है। स्मृति एक पल भी वर्तमान में नहीं रहने देती। हर क्षण बाहर ले जाती है। इस कल से उस कल में दौड़ाती रहती है। सारा दोष संग्रह यहीं रहता है। अभिमान भी यीं ठहरता है। जो तुम्हारे ‘स्व’ से, तुम्हारे अपने ‘होने से’, तुम्हारे ‘आत्म’ से तुम्हे दूर ले जाए वही ‘पाप’ है।

‘पुण्य है, जो तुम्हें तुम्हारी निजता के पास लाए, तुम्हें तुम्हारे ‘स्व’ के पास लाए, तुम्हें तुम्हारा ‘आत्म’ अहसास कराए। वहां वर्तमान है। वहा मात्र होता है। इसीलिए कहा था- स्मृति पाप है। राग-द्वेष का संग्रह वहीं रहता है। मन का मुकाम वहीं है। वहां वह ठहरना अधिक चाहता है। एक क्षण भी हम अपनी स्मृतियों से बाहर नहीं आना चाहते हैं। बुढ़ापा क्या है। ‘स्मृतियों के टापू’ में निवास करना है। ‘बटुक’ का मतलब होता है, जो मात्र वर्तमान है। नित नूतन, नया, ... वही साधक का मन होना चाहिए। बूढ़ा मन तो बस अतीत का वजन ढोता रहता है।



दृश्य का चिन्तन ही पाप है

यह सच है, लहरें, सागर और हवा के संयोग से बनती है। जान था, शब्द ही ब्रह्म है। ‘बेखरी’ वाक की पहली अवस्था है, वहां मौन रहा जा सकता है, उसकी भी कीमत है, पर भीतर कंठ के पास आकर, विचारणा का स्रोत बहता रहता है, एक पल भी विराम नहीं आता है।

जाना, ध्यान किसी विषय या वस्तु या रूप पर एकाग्रता नहीं है, यह तो मात्र निर्विषय हो जाना होता है। पर क्या यह संभव है? अनुभव बताता है, ... एक संवेग बाहर से आता है, ... वह खींचकर ले जाता है, जब बाहर से नहीं आता है, तब भीतर का अनार सुलग उठता है, लहरें ही लहरें धक्का मारती है। बहाकर ले जाती है।

यही तो चित्त है, ... यह लहरों का आलय है, भीतर से मानो कोई धक्का दे रहा है।

कहा गया है, ... यहां का साधन, बर्फ हो जाना है, कोई तरंग ही नहीं उठे। जहां सरोवर है, जल है, वहां वायु आकर लहरें उठा देगी। परन्तु बर्फ में तरंगे नहीं आतीं।

और बाहर के वेग को सहन करने के लिए, भीतर चट्टान हो जाना है, लहरें आएँ, और टकरा-टकराकर लौट जावंे।

पर जाना, यह सिद्धान्त के रूप में, विधि के रूप में तो सही है, पर प्रयोग के स्तर पर, कठिन है।

हां, जहां भी हो,ं वहीं पर जो विचार उठ रहा है, मात्र देखंे, अवलोकन शुद्ध हो, हम बहंे नहीं, मात्र देखे,ं तो यह वेग कम होने लगता है। भीतर दोषदर्शन का संग्रह है।

यह वैर है, इसकी आग शांत नहीं होती है।

मात्र देखते रहो, देखते रहो, इसके साथ बहो मत, ... यह ठंडी होने लगती है।

क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...

गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,...

कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।

आज चाहे, ममता हो, परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ सब पलायन ही है।

यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,...

कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।

अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं।

गीता, यहां ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।

‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करे, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धि की स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।



कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः

मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।

... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करता है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो पर जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है।

आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,... परन्तु अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है।

... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है।

यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है।

... यह कहने से पूर्व की घटना है-

अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-

सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।

हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-

परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-

मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-

... गीता की यह भूमिका है...

यह संवाद चिंतन है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, यह निर्णय वह बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।

गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठा है।



अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे

यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता अपना कथन प्रारंभ करते हैं-

प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं; परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।

शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।

... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता...

पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।

संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।

- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती है, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है। गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा

आग मा पायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।

इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम्हें इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।

मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।

शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।

आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।

मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-

पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही साधन प्रणाली थी।

यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।

पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।

... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।

... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया ही पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।

... जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।

यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।

भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष; मूढ़ता हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में हैं यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।

पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।

इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।

... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन निर्विकारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है, अनित्य है आ गया पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो; विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस बनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।

भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।

जीवन का उद्देश्य

क्योंकि जब मुझे सफलता मिल गई। तब ओरों को क्यों नहीं मिल सकती ? मेरे अपने जीवन का प्रारम्भ ही बड़ी कठिनाई से बीता था। मुझे परिवार से किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिली। किसी सुविधा के यहां तक आया तब जिन्हें सुविधाएं प्राप्त है, वे तो थोड़ी सी लगन से अवश्य ही पहुंच सकते हैं।

जीवन का उद्देश्य, बाहर तलाश करने पर मनुष्य को नहीं मिलेगा। जब तक हम अंतर्मुखी नहीं होंगे । हमें नहीं मिलेगा नदी बह रही है, बाहर बहती जा रही है, कहां किसे पकड़ोगे, अन्तर्मुखी होने के बाद ही जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।

चौबीस घंटे मनुष्य इतनी अनर्गल बातें करता है, इतना व्यवहार करता है। बस यही मानकर चलता है कि यही करना उन्नत्ति है, यदि मानसिक शांति प्राप्त नहीं हुई है तो उन्नति नहीं हुई। जब तक शांति मिली नहीं तब तक पता ही नहीं चलेगा।

शुरू से जप जाप, पाठ आडम्बर भर दिये हैं, ये बहिर्मुखी क्रियायें हैं, इनसे कोई सफलता नहीं मिलेगी। रूढ़ियां हैं, करते जाओ...करते जाओ ये ही उपलब्धि हो गई है।

परन्तु जीवन का मुख्य उद्देश्य शांति है और निरन्तर शान्ति में रहने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, इसी मे जाना है।

जीना तो वैसे ही है, परन्तु सुख दुःख भोगते हुए शांति से जीना ही साध्य होना चाहिए।

एक बहुत बड़े पेड़ की छाया में पशु-पक्षी छाया पाकर शांति पा सकते है। इसी प्रकार इस व्यक्ति के सम्पर्क में आकर अन्य को भी शांति मिलती है। प्रकृति स्वयं इन्तजाम करती है।

जब तक शांति नहीं हैं, तब तक अपना विश्वास ही नहीं होता। बाहर शांति है ही नहीं, वहां संसार निरन्तर परिवर्तनशील है। बाहर से तो यही संबंध रखना है कि वर्तमान में रहो, अन्दर से जो प्रेरणा आये, वही करों।

विवेक जागृत होने के बाद, सही कार्य स्वतः चलता रहेगा।

कर्त्तव्य पालन होता रहेगा।

इससे अधिक कुछ भी नहीं है।

प्रश्न ः क्या हम असामाजिक नहीं होंगे ?

उत्तर ः नहीं, समाज को अधिक लाभ होगा। हमारी शक्ति होगी तो समाज को लाभ ही होगा। असामाजिक वह है, जिससे दुनिया को हानि पहुंचेगी।

यहा दुनियां के प्रति हमारा संबंध तटस्थता का रहेगा, जो जितना निकट आता जावेगा, वह लाभ लेता जावेगा।

छाया के स्वतः जाने की जरूरत नहीं होगी। जो छाया में आता जायेगा, वह लाभ लेता जायेगा।

प्रश्न ः आप आत्मा, परमात्मा, इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं ?

उत्तर ः शब्दों को भी किसी ने दिया है, शब्दों की चर्चा छोड़ो ? इससे क्या होगा। क्या लाभ होंगे।

जो शक्ति है, जो गति है, नाद है, लहरे हैं, उसी से सब होता है, उसी से हम जुड़े हुए है।

जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है।

उन्होंने उसे समझाने के लिए भाषा में अलग अलग शब्दों का चयन किया जो शक्तियांे को समझ नहीं पाये उन्होंने देवी देवताओं तथा धर्म गुरूओं का सहारा लिया। देवी देवताओं के प्रचार से पूर्व प्रणव का जप होता था। ओम क्या है, यह जो नाद है, उसके प्रतीक का स्वरूप वही चिन्ह बन गया, उसका ही जप प्रारम्भ हो गया।फिर देवी देवता आये तो उनकी पूजा शुरू हो गई। उन्होंने माना कि इससे कुछ लाभ होता है....लोग भी यही चाहते है, यह सब चलता रहा। शक्ति का कुछ नाम नहीं है, वहां मात्र उर्जा हैं। उन्होंने इस ध्वनि के आधार पर उसका नाम ओम दे दिया यह भी तो कल्पना ही रही।

यही प्रणव साधना है।

प्रश्न ः फिर जीव क्या है ?

उत्तर ः विकार सहित मन ही है। यह सुख दुःख भोगने के लिये ही है। यह भी व्याख्या ग्रन्थों के लिये ही है।

प्रश्न ः फिर आप क्या नाम देंगे ?

उत्तर ः यहां नाम की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य शरीर ही पर्याप्त है। अन्दर रहने से बाहर भीतर की सभी क्रियाओं का निरन्तर ज्ञान होता है, सीमित शक्ति है। इसका अहसास होता है। यदि कुछ होना है तो अन्दर से प्रेरणा आती है। यदि किसी शरीर के द्वारा प्रकृति को कार्य करवाना है, तो वह करवा लेती है।

प्रश्न ः फिर विकारों से मुक्ति नहीं होगी ?

उत्तर ः मृत्यु के समय ही मुक्ति हो पायेगी। वह तो निरन्तर है जैसे सांस की क्रिया है। सांस रूक गई तब मनुष्य शरीर छूट जाएगा। लहरों से ही विकार उत्पन्न होते है।

लहरें भी आएगी और विकार भी उत्पन्न होगें। लेकिन वर्तमान में रहने से इन्हें सहन करने की शक्ति रहेगी। यह किसी अन्य साधन से प्राप्त नहीं होगा। ‘तान तितिशस्व भारतः’ यहीं गीता में कहा गया है। तितिक्षा याने सहन करने की शक्ति यह तुम्हारे अन्दर उत्पन्न होनी चाहिये। यह केवल वर्तमान में रहने से ही उत्पन्न होती है।

प्रश्न ः मन तो जो विचार आ रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य किसी जगह लगाने से भी रूक जाते हैं, क्या इसमें लाभ नहीं होगा ?

उत्तर ः यह तो बहिर्मुखी क्रिया है। बहते जाओगे प्रवाह में। जो क्षण है, उससे दूर हटते जाओगे। जहां करने का सवाल आया हम दूर हट गये। जो कुछ हम कर रहे है, माया में ही तो कर रहे है। बाहर का सहारा रहा तो हम अपने मूल स्थान से हट जाऐगे। वर्तमान में रहने में न तो कोई क्रिया है, न ही स्थान से हटने का कोई कारण है।

वह जो महान शक्ति है....वहां गति है....तेज गति....लहरे ही लहरें यहां लहरें आयेगी......अन्तर्मन से टकरायेगी।

वही संस्कार है।

विकार तो उत्पन्न होंगे।

लेकिन सहनशीलता होने के कारण विकारों की भी अनुभूति होती है। लहरों की भी होती है। मालूम होता है कि किसी ने आकर धक्का दिया, हम तो अपने स्थान से नहीं हटे।

प्रश्न ः हमें हमारा तो अनुभव होता है, विकार ही विकार है आपको देखकर लगता है कि आप वास्तव में मुक्त है ?

उत्तर ः मुझे क्या होता है, यह आप कैसे जान सकते हैं ? जो आप अनुभव कर रहे है, वो आपके शरीर में भी है, जब तक मेरा शरीर है, मेरे भी रहेगा।

जैसे शरीर है तो इसमें हड्डियां भी है, मांस भी है, खून भी है। यह नहीं रहेगा तो क्या शरीर जीवित रहेगा, इसी के साथ मन भी है, विकार भी है। सब कुछ है, लहरें जो टकरायी है, उन्हीं को उत्तेजित करने के लिये ही है। यह मात्र कल्पना ही है कि उच्च कोटि के व्यक्ति के भीतर यह नहीं होगा। उसको भी लहरें टकरायेगी उसे अनुभूति होगी।

मात्र सहनशीलता ही वर्तमान में रहने से मात्र हो सकती है।

प्रश्न ः आपने एक बार कहा था, यह उसी प्रकार से है, बीज पड़े रहे, और अंकुरित नहीं हो पाए ?

उत्तर ः अंकुरित नहीं होना माने विचलित नहीं होना। विकार कोई वस्तु नहीं है। न ही कोई परिभाषा हो सकती है।

परन्तु लहरें टकराती है, एकदम क्रोध आता है। काम उठता है। यह कोई वस्तु है क्या बीज है क्या ?

बीज तो कोई वस्तु होती है, यहां तो ये मात्र लहरें है। इस प्रकार से विकार उत्पन्न होकर शरीर से काम करवाते है।

बीज का उदाहरण इसलिये दिया था, समझाने के लिए न तो बीज होता है न ही वह सड़ता है।

प्रकृति का कार्य है, लहरे उठाना शरीर का कार्य होता है विकारों में प्रभावित होकर क्रिया करना...जैसे कठपुतलियों को नचाते है, लहरें नचा रही है।

मनुष्य मात्र एक ही है, न तो वह साधारण है न वह असाधारण है। प्रयास करने पर वह अन्तर्मुखी हो सकता है।

प्रश्न विकार की देह मंे उपस्थिति कब तक रहेगी ?

उत्तर शरीर नष्ट होगा तब विकार समाप्त हो जावेंगे। सभी समाप्त होगा।

शरीर ही नहीं होगा तब विकार कहां होंगे ?

शरीर के साथ ही सब पैदा होता है उसी के साथ ही नष्ट होता है।

बचती तो मात्र शक्ति है।

वह शक्ति नए नए शरीर पैदा कर खेल खेला करती है।

प्रश्न ः जिसे आप संग्रह कहते है, वह इस शरीर में आता कहां से है ?

उत्तर ः संग्रह तो प्रकृति ने बना रखा है, पंच महाभूत उसने बना रखे है। वह तो अपनी गति के साथ नए-नए बनाती जाती है, मिटाती जाती है। यह जो पंचमहाभूत है, यही नाटक की सामग्री है। यह सब चीजें है जिससे मनुष्य बना है। यहां अच्छा बुरा कुछ नहीं होता.....। खाली जमीन पड़ी रहती है.....। वर्षा होते ही इतने पौधे-जीव जन्तु कहां से आ जाते हैं कहां चले जाते हैं.....। जब तक मनुष्य सुख दुःख से जुड़ा हुआ है, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। कोई घटना होगी वह विचलित हो जाएगा। शान्ति वह है जो निरन्तर बनी रहे.....। मन मात्र गति है। जब तक बाहर की गति भीतर नहीं आती तब तक शांति का अनुभव नहीं होता। परन्तु अन्तर्मुखी होने के बाद ही उसका अहसास होगा।

बाहर के विषयों में रस आता है, इसलिये मन बाहर खिंचता रहता है।

वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास होना चाहिये। उसके लिए लगन आवश्यक है.....। अ

प्रवचन सार

गुरुपूर्णिमा पर्व (1989)

आज गुरुपूर्णिमा का पर्व है। गुरु के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। वैसे मैं हमेशा से कहता आया हूं, न तो मैं किसी का गुरु हूं, न मैंने किसी को शिष्य बनाया है। परन्तु अनादिकाल से यह परम्परा चली आ रही है, यह कभी समाप्त नहीं होगी। यह चलती ही रहेगी।

- कहा है- गुरु, ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है। उसमें प्रकृति के ये तीनों गुण - उत्पत्ति, स्थिति व नाश ये तीनों गुण होते हैं। जिसमें यह क्षमता होती है। वह गुरु है। ऐसा गुरु, ब्रह्मनिष्ठ व श्रोत्रिय होता है।

ब्रह्मनिष्ठ का तात्पर्य है, जिसकी ब्रह्म में निष्ठा हो, सत्य में निष्ठा हो, जिसकी हर सांस सत्य की खोज में हो।

साथ ही वह श्रोत्रिय भी हो, श्रोत्रिय का अर्थ है, वह अपने विचार, जो साधना उसने की है, वह उसे दूसरों को भी बता सके, आत्मोन्नति के मार्ग पर दूसरों को भी ला सके।

आज वेश धारण करने वाले गुरु हैं। वेश धारण करने से, बहुत अधिक धन इकट्ठा करने से कोई गुरु नहीं हो जाता। गुरु में वास्तविक योग्यता होनी चाहिए। ‘महाभारत’ में गुरुओं के अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। आप लोगों ने टी.वी. पर महाभारत सीरियल देखा होगा, जहां गुरु दूर बैठे अपने शिष्यों के सारे हाल जानते हुए दिखाए गए हैं। प्राचीनकाल में हमारे गुरु इतने योग्य थे। आज उनकी बड़ी-बड़ी बातें हम सुनते हैं। प्रश्न उठता है- क्या वास्तव में आज ऐसे गुरु मौजूद हैं?

वास्तविक गुरु बनने के लिए क्या करना पड़ता है, मैंने अपने साठ से अधिक जीवन के वर्ष इसी बात को जानने में ईमानदारी से लगा दिए। सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए लगाए।

प्राचीनकाल से अनेक साधना पद्दतियां प्रचलित हैं। हमारे ग्रन्थों में लिखी है। भक्ति भी उनमें एक है। भक्ति नवधा प्रकार की बताई गई है। भक्ति से हम परमात्मा को प्रसन्न करते हैं। परन्तु जब भक्त भगवान की भक्ति में लगता है, तब भी द्वैत भाव रहता है। भक्त अलग है, भगवान अलग है। यह सब भी माया में घटता है। माया में जो कुछ भी नजर आता है। सब परिवर्तनशील है। यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। गुरु हो या हमारे माने हुए भगवान हो, वे भी अस्थायी है। परिवर्तनशील है। नाशवान चीज कभी सत्य को प्रकट नहीं कर सकती। सत्य ही सत्य को प्रकट करेगा। जितनी भी बाहरी चीजें हैं, जिनको हम इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं। सब नाशवान है। उनमें सत्यता नहीं होती।

सत्यता को आपको जानना है तो जितनी प्रकार की ये साधना पद्दतियां हैं, जिनमें ये नवधा भक्ति, योगाभ्यास वेदांत दर्शन उनसे भी परे जाकर देखना होगा। परन्तु इस प्रकार के गुरु आज नहीं है।

एक उदाहरण है-

राजा जनक को विदेही कहा जाता है। उनकी गीता में चर्चा है। एक दोपहर वे भोजन करके पलंग पर लेटे थे। उन्हें सपना आया कि सपने में वे कंगाल हैं। सात दिन से भूखे है। दाने-दाने को मोहताज हैं। एक जगह पंगत लगी हुई थीं, वहां गए, वहां से भी लोगों ने भगा दिया। फिर जहां झूठी पत्तलों का ढेर था, वहां गए कुछ मिल जाए, तभी एक सांड आया, उसने उठाकर दूर फेंक दिया, उसकी धमक से नींद खुल गयी। देखा, वह तो राजा जनक है, पलंग पर सो रहे हैं। स्वप्न में वे यह भी भूल गए थे कि वे ‘राजा’ हैं। दरबार में गए, सवाल पूछा- वह सत्य था या यह सत्य है? दरबारी चुप रह गए। तभी अष्टावक्र वहां पहुंचे। उन्होंने कहा- ‘राजा न तो वह सच था न यह सच है।’

आप जानते हैं, यहां आप बैठे हैं, भोजन के बाद आप निद्रा में चले जाएं तो यह दुनिया न जाने कहां चली जाएगी। वर्तमान की दुनिया का लोप वहां स्वप्न में हो जाता है।

कहने का तात्पर्य यही है, गुरु वही होता है, जो वास्तविकता पर पहुंचा हुआ हो। जैसे ही सवाल पूछा गया हो, उत्तर तत्काल भीतर से आता है। जिसमें वास्तविक साधना की हो। सत्य को जाना हो। सांसारिक सुखों का त्याग किया हो। दूसरों के मार्गदर्शन की क्षमता हो, समर्पित किया हो। यहां तो कलियुग में गुरु ही गुरु हैं, कहीं सच्चे गुरु हों भी तो वे किसी कौने में पड़े होंगे, ... परन्तु ऐसे आपको मिले तो वे ही आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं।

-मैं संक्षेप में दो बातें और कहना चाहूंगा।

आप दिन भर में जितनी भी बातें देखते हैं, इन्द्रियों के माध्यम से जो भी अनुभव करते हैं, उनका प्रभाव हमारे मन में संग्रहित होता जाता है। जो भी कार्य किया, कुछ देखा, इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी होता है, उसकी गूंज मन में बनी रहती है।

इन्द्रियों द्वारा भोगे गए विषय, संस्कार बनकर, नीचे उतरकर अंतर्मन में चले जाते हैं। जिस प्रकार बीज जो कोठे में साल दो साल पड़ा रहता है, पड़ा है तो पड़ा रहेगा, पर अनुकूल वातावरण मिलकर अनुकूल, मिट्टी, पानी, हवा पाकर अंकुरित हो जाता है।

इसी तरह हमारे द्वारा भोगे हुए जो विषय हैं, इनकी स्मृतियां है, संस्कार रूप में हमारे अंतर्मन में पहुंच जाती है। वहां वे सूखे बीच की तरह होती है। संसार घूम रहा है, तेज गति है। तेज गति से लहरे निरंतर उठती रहती है। जो नाभि स्थान पर आकर, जहां मन का मूल निवास होता है, वहां आकर टकराती है। वहीं हमारा अंतर्मन है, जहां हमारे द्वारा भोगे हुए विषयों के संसार हैं, वे लहरों से उफान खाकर ऊपर आते हैं। जागृत अवस्था में कई बार हम से ऐसा कुछ हो जाता है, जो संभव नहीं था, तब लोग कहते हैं, हम नहीं करते, पर प्रकृति करवा देती है। वास्तविकता यह है कि लहरें विकारों से टकराती है, जहां विषय भोग, बीज रूप में संग्रहित है, सूक्ष्म रूप में है। अंतर्मन अत्यधिक शक्तिशाली है, वह उन्हंे तीव्र गति से ऊपर फेंकता है।

-राजा जनक ने भी कभी ऐसा दृश्य देखा होगा।

उसका प्रभाव उनके भीतर अंकित रह गया। गहरी नींद में उनका नियंत्रण अपने ऊपर से उठ गया। वहां प्रकृति की लहरों ने उनके अंतर्मन पर ऐसी ठोकर मारी कि वही दृश्य सामने आ गया। वे स्वप्न में भिखारी बन गए।

हम दिन रात स्वप्न देखते हैं। हर रात न जाने किन परिस्थितियों में पहुंच गए थे।

इन्द्रियों के जो भोग निरंतर संस्कार बनकर अंतर्मन में जमा हो रहे हैं, इन्हें संस्कार न बनने दें, यही साधना है। बीच बनकर अंदर पहुंच जाएंगे, अंतर्मन में पहुंच जाएंगे, तो वे उगेंगे, तो वे अनुकूल वातावरण पाकर के उगेंगे। अब इस प्रकार, हमारे अनुभव के ही संस्कार बने, इन्हें कैसे रोका जाए, ... इनसे कैसे छुटकारा पाया जाए, यही साधना है।

प्राचीनकाल से अनेक प्रकार की साधनाएं चली आ रही है। साधना के नाम पर देवी-देवताओं की पूजा, मंत्र पाठ, यज्ञ, जप बताया जाता रहा है। नाम जप का बहुत प्रचलन है। रास्ते पर लाने के लिए साधन बताया था कि बार-बाहर नाम रटने से मन एकाग्र हो जाता है। परन्तु जीभ से तो नाम रटते रहते हैं, पर मन कहीं ओर लगा रहता है। संसार में भटकता है, फिर लहरों के धक्के लगते हैं, सभी विकार सतह पर आते रहते हैं।

मैं गुरु न होते हुए भी, ... अगर आप मेरे प्रति गुरु का भाव रखते हैं। आप में श्रद्धा हैं तो मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि साधना के नाम पर कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

मैंने पहले भी कई बार कहा है, फिर दोहरा देता हूं।

मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमक

प्रयास किए जाते हैं, यह जानने के लिए कि किसी प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है। हम जो भी साधना करते हैं, किसी चीज को प्राप्त करने के लिए, एक समय बाद स्वयं पता लगता है कि वह तो किसी प्रकार की साधना नहीं थी, ... उससे कोई लाभ नहीं मिला।

सही बात मैं आपको बतलाऊं-

वर्तमान में रहने की जो पद्दति आपको समझाई है। पहले भी बहुत कहा है किताबों में भी आया है, ... आप इस पर प्रयोग करे। इससे जीवन के हर क्षण में आपको मार्गदर्शन मिलेगा। आपकी सहनशक्ति बढ़ेगी। आप मानसिक शक्ति बढ़ेगी। कठिन से कठिन समस्याएं भी आएंगी, जो अपने आप विलीन होती चली जाएंगी। वर्तमान में रहने का प्रयास करें।

जो भी कार्य कर रहे हैं, हमारा मन उसी के साथ रहे, क्षणभर भी न आगे, न पीछे रहे, ...

आप लोग यहां आए, इतना कष्ट उठाकर, इतनी दूर से आए हैं, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

आपका मन



मन- हमेशा अतीत में या भविष्य में रहता है

वर्तमान में- मन विलीन हो जाता है

मन तो उर्जा है

उर्जा का विनाश नहीं होता

हां, कागज की दूसरी परत की तरह अंतर्मन होता है, जो विराट के नजदीक होने के कारण, अत्यधिक शक्तिशाली है

उसमें विलीन हो जाता है।वह महान उर्जा है।

वर्तमान में-मन नियंत्रित रहता है।वह अनावश्यक गति नहीं करता।परन्तु शक्तिशाली होता हैं





जीवन होता है,,जन्म और मृत्यु के बीच एक निरन्तर चलता हुआ खेल।

शरीर निरंतर बदलता है, कल में बच्चा था, युवा हुआआज वृद्धवस्था की पहली सीढ़ी पर पांव रखा हैबाल सफेद हो गए है,शरीर थका सा हैपर श्वास की गति वही है, ... एक क्षण भी विराम नहीं हुआ।

हां, जब क्रोध आया,श्वास तीव्र हो गई।

ध्यान में पाया श्वास मंद हो गया, ... धीमा,

पर श्वास-यथावत रहा

.. क्या प्राण श्वास ही है, ...

हॉ प्राण जीवनी शक्ति है, वह पोषण करती है, अंगों का संचालन प्राण उर्जा करती है।

स्वाजी ने- ‘उर्ध्वकुंभक प्राणायाम की चर्चा की है

मैं उसका अनुभव नहीं कर पाया, उनसे बहुत पूछा था पर वे चुप रह गए।

आनंद का और बुद्ध का उदाहरण देते रह,े आनंद तो उनका बड़ा भाई था, ... पर मैं तो नहीं, वे चुप रह जाते थे।

कहते थे, बुद्ध ने इसे अनापानसती कहा है। पर है, यह बहुत पुरानी विधि-

‘श्वास के साथ मन को ले आओ

मन एक साथ दो काम कर सकता है, अवधान मन को एक जगह लाना होता है, इसीलिए जो भी क्रिया हो वहां मन को अधिक से अधिक लाने का प्रयास करो, ध्यान रहे मन विपरीत अवस्था में न जा पाए, पर सजगता अवधान से अलग है, यहां हर क्रिया में सजगता रहती है। इसे ‘बोध कहो, होश कहो, तुम जहां भी हो, वहीं हो।

पर पहली सोच, ... श्वास के प्रति रखो.

‘आते हुए, जाते हुए, ... मन वहीं रहे, बोध रहे

हां, श्वास को बदलो मत, धीमी है, तेज है, हां तुम वहीं रहो,

क्रोध में हो, श्वास बदलंेगे, क्रोध हट जाएगा पर यह संघर्ष होगा।

हां,... श्वास पर सजगता रहेगी, ... विकार स्वतः बिखर जाएगा।

तनाव नहीं होगा।

‘श्वास एक ही है,

जितनी भीतर है, वही तो बाहर गई है,

हां सजगता रहे

वह आएगी, फैफड़ों से बाहर चली जाएगी

... पर धीरे-धीरे, सजगता उसके साथ, ... उसे नाभि तक ले जाएगी।

नाभि मन का मूल स्थान है।

वहीं पर उर्जा का अगाध भंडार है

श्वास धीरे-धीरे पेट तक आती है, वहां विचार नहीं है, स्मृति नहीं है, अतीत नहीं है, कल्पना नहीं है।

श्वास के साथ खोता हुआ मन, ...

स्वाभाविक युति को प्राप्त होता है

मन और प्राण की युति ही योग है।

यहां बलपूर्वक किया गया प्रयास नहीं है।

- हां श्वास को देखो

वह बाहर जाती है

पर तत्काल भीतर नहीं आती

क्षण तो क्षणिक होता है, जहां कुछ नहीं है, मात्र शून्य है

-भीतर आती है

भीतर से तत्काल बाहर नहीं जाती।

क्षण के क्षणांश में ठहरती है, वहां भी मुकाम है

वहां से लौटती है

-एक वर्तुल सा बन जाता है

उसमें रहना, मात्र वर्तमान को प्राप्त होता है

बंदर- बहुत चंचल होता है।उसका मन और मनुष्य का मन साम्य रखता है।वह स्थिर नहीं हो सकता

हां उससे आप आंख मिलाओ, पलक न झपकाओ तो वह ठहर जाता है, पर आपकी पलक झपकी, वह सामान उठाकर चल देता है,

इतनी सजगता रहे, ... यहां ध्यान आंख बंद करके नहीं होता है।

... सजगता है, ... चौकन्नापन, होश रहता है,

श्वास पूरी हो।अधूरी नहीं।

नाभि तक पहुंचे, ... वहां ठहरे वहां से फिर बाहर जाए।

वहीं पूर्णता है

मन, मस्तिष्क में रहता है

उसकी जाग्रति के लिए तेज श्वास, ... उथली श्वास आवश्यक है,

योगी कह रहा था, ... श्वास पेट पर नहीं ले जाना है

फैफड़ों को भरो-बाहर निकालो

धौकनी की तरह भरो

हां, जो ब्रह्मचर्य को मूल्य मानकर चल रहा है, वह अपनी कामवासना को दूर करने में सहायक होगा।

पर गृहस्थ उलझ जाएगा

न इधर का रहा न उधर का

मस्तिष्क मात्र सूचना का संग्राहक है, मन उतना ही जटिल गतिवान रहेगा

मन, श्वांस के साथ नीचे उतरता है, ... जब वह दोनों छोरों के बीच आकर ठहरता है, शक्ति का अनुभव होता है, नाभि उसका मूल स्थान है, ... वहां मात्र शक्ति है गति नहीं, ... प्राण उर्जा और मानसिक शक्ति दोनों ही युतवत हो जाती है,

श्वास गहरी हो, और गहरी व शिथिल, हां जब अब सजग होते जाते हैं, ... तब लगता है, श्वास थक सी गई है।

... श्वास भीतर गई, ... हम गवाह रहे, सजग हैं।

वह ठहरी, हम वहां रहे।

वह लौटी, ... हम सजग हैैं।

वह बाहर गई, ... ठहरी ... हम वहां रहे, अधिक से अधिक वहां सजग रहे, वह क्षणांश का क्षणहै।



यह अंतराल बड़ा हो सकता है...

यहां श्वास उर्ध्वमुखी है।

सहज प्राणायाम है..।

... यहां मात्र श्वास है, उसका केन्द्र बिन्दु विराट से जुड़ गया है, ... मन यहां स्वतः विसर्जित हो जाता है।

श्वास भीतर गई

साथ रहो।

साथ रहो।

वह जहां तक गई, सजगता रहे..।.

वहां वह रूकी, ... यह भी केन्द्र है, यह नाभि के पास है...।. वहां भी रूको, ... सजग रहो,..।.

वहां वह ठहरेगी, ... वहां उसके साथ रहो।

वह लौटी, ... साथ आना है, यह एक पूरा चक्र होता है,।

... एक दूसरे मे विलीन भी हो जाती है, वहां रहना है, वहां जो है, वही वर्तमान होता है,

वहां न मन होता है, न विचार न विकार है।

शक्ति केन्द्र के साथ रहने का सानिघ्य जो प्राप्त होता है, वह बहुमूल्य है।

... हां, यहां चित्त की शुद्धि-स्वतः उपलब्ध होती है।

मूल सिद्धान्त है- विकार ही विचार है

विचार ही विकार है

विचारों के कम होने से विकार अपने आप कम होने लगते हैं।





अप्रकाशित कृति गुरुवाणी से साभार





















No comments: