Wednesday, June 10, 2009

जीवन का स्त्रोत












मरने की कला

जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, वह उस दुनिया से अलग नहीं है जो हमारे भीतर है,
हमारे और दुनिया के बीच में जो बंटवारा है, वह अस्वाभिवक है, जैसी दुनिया से बाहर है, हम भी भीतर वैसे ही है।
हम बाहर प्रेम तलाश करते हैं, सहानुभूति पाना चाहते हैं, सहृदयता चाहते हैं, पर क्या वह हमारे भीतर भी है? कभी जाना। हम जैसे है, बाहर की दुनिया भी वैसी ही है।
जब हमारे भीतर मौलिक परिवर्तन होगा, हमारे विचारों में, हमारे भावों में, हमारे व्यवहार में, बाहर भी हम वैसा ही परिवर्तन पाएंगे।
हमें अपने आपको, अपने आपके द्वारा समझना है, कोई दूसरा हमें हमारे बारे में समझा नहीं सकता।
हमारी अपने बारे में गहरी समझ ही, हमें अपने बारे में सही बता सकती है, और कोई दूसरा नहीं।
-जब हम आदर्शों के हिसाब से जीवन शुद्ध कर देते हैं, हमने तो हमारा काम कर दिया, जिम्मेदारी पूरी कर दी, हम समझते हैं, हम भले हैं, पर यह मात्र भौतिकवादी क्रियाकलाप ही रहता है, इसमें भावना का पोषण छूट जाता है, यह मात्र एक औपचारिक घटना होकर रह जाती है। हम तब वास्तविकता के साथ जुड़ नहीं पाते हैं। न ही हम अपने आपको सही रूप में समझ पाते हैं।

-हमारे विचार, हमारी मन-स्थिति, हमारी धारणाएं जो हमारी जीवन शैली को बनाती है, वे टुकड़ों में बंटी हुई है। हमारे विचार परस्पर विरोधी विचार भी है, जहां हम रहते हैं हमें अपने भीतर इस अराजक स्थिति को देखना होगा। उन कारणों को पहचानना होगा जहां से यह सारी अनियमितता पैदा होती है।
अपने आपको जब हम देखने का प्रयास करते हैं, तब हम पाते हैं कि हमारा अपना नजरिया न दूसरों के प्रति वरन अपने प्रति भी पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। हम अपने आपको भी देखने में स्वतंत्र नहीं है। हमारे विचार, हमारी मान्यताएं, हमारे समाज व संस्कृति से प्रभावित है। हमारे भीतर जो मन है, जो दृष्टा है, वह स्वयं रंगा हुआ है। वह निर्मल नहीं है। स्वच्छ नहीं है। हमें कैसे देखना है, क्या देखना है, सब पूर्वाग्रह से ग्रसित है। यही हमारे भय का कारण है।
-पूर्वाग्रह से रहित होना, स्वतंत्र होने की पहली शर्त है। हमें अपने प्रति यह सजगता लानी होगी कि हम जिस प्रकार सोचते हैं, क्या सोचते हैं, क्यों सोचते हैं, हमारे विचार क्या हैं? न तो हमें उनकी निंदा करनी है न उसके साथ बढ़ना है। मात्र उन्हें स्पष्टता में, जैसे ही वे आ रहे हैं, उन्हें देखते रहना है। तब हम धीरे-धीरे यह समझने में सफल हो जाते है कि हमारे विचारों का ढांचा किस प्रकार का है, हम ऐसा ही क्यों सोचते हैं। तब हम अपने मन को विचारों की शृंखला से मुक्त कर पाने मे ंसफल हो पाते हैं।
गीता में भी कहा गया है- ‘श्रिप्रं भवति धर्मात्मां, या तो आप तुरंत बदल सकते हैं, या कभी नहीं, यह परिवर्तन शृंखला में नहीं होता है। मौलिक परिवर्तन त्वरित घटता है। उसके लिए आवश्यक है कि हम इस विधि के, इस प्रक्रिया को गंभीरता से ले- हम अपने जीवन को घटता हुआ देखें, हम अपने विचारों को देखें, ‘अपने क्रियाकलापों को देखें। तब हमारे और जिसे हम देखना चाहते हैं, उसके बीच दूरी नहीं होती है। यह इसी विचारों के कारण से होती है।
मेरे भीतर भय है, जब मैं अपने भय को सीधे देखता हूं, मुझमें और भय के भीतर कोई अंतराल नहीं है, न ही में भागना चाहता हूं, न ही लड़ना चाहता हूं, तब पाया भय मुझसे दूर नहीं रहता है। इस दूरी के टूटते ही, जो दिख रहा था, जो देख रहा था, दोनों में एक रूप होते ही समय का अंतराल विदा हो जाता है।
जीवन क्या है, मृत्यु क्या है, रहना क्या है?
हमारे जीवन का एक मात्र ध्येय अधिक से अधिक सुख पाना है। पर जहां सुख है, वहीं उसके पीछे भय और दुख भी छिपा हुआ है। सुख-शारीरिक है, मानसिक है बौद्धिक है स्वास्थ्य है, काम है, प्रशंसा है, सम्मान है, हमने सुख को ही जीवन की अनिवार्यता मान लिय है। हमने सुख को इतना महत्व क्यों दिया है? जीवन अनुभवों की एक अनवरत शृंखला है। हम उन अनुभवों को नहीं चाहते हैं, जो दुखात्मक है। बीमारी है, असफलता है, मृत्यु है, नाश है, नहीं चाहते हैं। जहां सुख मिल सकता है, संभावना भी है, वहां हम उसे पाने के लिए भागते हैं, मंदिर में, पूजा में, तंत्र में, राजनेताओं के पास, धन लिप्सा में, सुंदर भोजन में, कहां नहीं जाते। हम सुख पाना चाहते हैं, सुख इसीलिए हमें खींचते हैं।
आखिर यह सुख कहां है? कहां रहता है, जाना जो भोग हुआ है उसकी मधुर छाप स्मृति पर रह जाती है, वह बार-बार उसकी पुनरावृत्ति चाहती है। जब भी अनुभव नया हो उसके पूर्व स्मृति उस क्षण को निकाल लाती है। वहां नया अनुभव नहीं होता, मात्र एक दोहराव रहता है, वह भी यांत्रिक सा हो जाता है।
... तब जो अनुभव विचार ने संग्रहित कर, बाहर फैंका था, वह विचार भय तथा दुख को भी संग्रहित कर निरंतर बाहर लाता रहता है। कल क्या होगा? आज यह दुख आया है, भोगा है,उसकी कटु स्मृतियां कल भी आ सकती है, यही भय है।

यही विचार जो सुख को जगाता रहता है, यही भय को, दुख को भी पैदा करता रहता है। हमारा सादा जीवन इन्हीं स्मृतियों का ही विकास है। एक निरंतर संघर्ष, दुख और सुख का बना रहता है। और हमारा जीवन हम ध्यान से देखें तो दुख से अधिक भरा हुआ है। जहां सुख है, वहां भय भी साथ रखा हुआ है।
हमारे अतीत में जहां सुख का संग्रह कम है, वहां भय और दुख की छाप अधिक संग्रहित है। प्रश्न उठता है, क्या हम इन सबको जो अतीत का हिस्सा बन चुका है, एक साथ हटा सकते हैं?
तब एक ही प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या विचार जो दुख और सुख को एक सातव्य एक निरंतरता प्रदान करता है, रूक सकता है, अप्रभावी हो सकता है कि वह दुख और सुख को स्थायित्व नहीं दे पाए, उसे आधार न दे पाए। हम यह जान चुके हैं कि विचार ही उसे आधार देता है, तब क्या विचार से मुक्त हुआ जा सकता है?
विचार तो रहेगा, तथ्यात्मक विचार के आधार पर बाह्य संसार चल रहा है, पर हम यहां मनोवैज्ञानिक विचार की बात कर रहे हैं जो मात्र हमारी स्मृति का भंडार है, अवधारणाओं का जनक है, अनावश्यक विचारणा यहा से निरंतर प्रभावित होती रहती है। भीतर हमारे अंतर्जगत में इस मनोवैज्ञानिक विचार के लिए कोई आधार नहीं है क्योंकि जहां यह सुखात्मक अवधारणा को रखता है वहीं यह भय और दुख का जनक भी है। जहां आवश्यक हो, वहां विचार का सहयोग ले, अन्यथा उससे अप्रभावित रहे। मात्र देखें। तब यह संभव हो जाता है कि हम वास्तविक अनुभव के साथ रहें, उसमें जीएं, तब विचार का अनावश्यक दखल कम होता जाता है। तब हम उस वास्तविक क्षण में जीने में समर्थ हो जाते हैं जो हमेशा ‘वर्तमान होता है।

मृत्यु क्या है, हम मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। जानते हैं, कहना कठिन है, जो सामने अभी था, वह नहीं रहा है। मात्र उसकी स्मृतियां रह जाती है। हर याद, उसके न होने की पीड़ा का दंश दे जाती है। कटुता खिन्नता हृदय दुखों के सागर में डूब जाता है। अपनी मौत का इतना दुख नहीं होता, जितना परिजन की मृत्यु का होता है। अपनी मौत का मात्र भय होता है। जबकि हम जानते हैं कि हम स्वयं मरने की ओर ही जा रहे हैं। हम मृत्यु शब्द से ही डरते हैं। हम इस बारे में विचार ही नहीं करते हैं। स्मृति हमेशा अतीत की होती है। मृत्यु भविष्य में है, अतः वहां कल्पना का आधार ही नहीं मिलता है।

मृत्यु- पंचमहाभूतों से जोे शरीर बना है, उसका स्वाभाविक विसर्जन है। इसीलिए बुढ़ापा, बीमारी, दुर्घटना जो मृत्यु के वाहक हैं,, भयभीत करते रहते हैं। हम पुनर्जन्म की चर्चा करते हैं, पर अभी तक उसका वैज्ञानिक आधार तलाश नहीं कर पाए हैं, पर हमारी मान्यताएं दृढ़ है।

हम चाहते हैं, मृत्यु टल जाए, हमारी पूजा, प्रार्थना, प्रार्थना यहां तक की ध्यान का भी अभिप्राय यही रहता है। हम दुख नहीं चाहते है। मृत्यु सबसे अधिक भयावह है, हम उससे दूर जाना चाहते हैं।

तब प्रश्न उठता है कि हम जो कुछ भी हमारा जाना गया है, हमारे भीतर स्मृति है, उससे मनोवैज्ञानिक रूप से उसके बोझ से उसकी आसक्ति से हट सकंे। उसके प्रति मर सकंे। यहां शारीरिक मृत्यु की बात नहीं है, हमारी जो आसक्ति है, जो चिपकाव है, यहां उसकी मृत्यु की बात हो रही है, क्या कभी हमने उस सुखात्मक क्षण को, अनुभव को, याद को जिसे हमने बहुत संभालकर अपने भीतर रख रखा है, क्या उसे हटने दिया है, क्या उसे अप्रभावी होने दिया है? क्या हम उसे भूल पाए हैं? लेकिन यदि हम उन सबके प्रति, हमारी सारी आसक्तियों के प्रति, अपने परिवार अपने पद, अपनी उपलब्धियों के प्रति मर सकंे, उन्हें भूल सकंे तब हम वास्तविक रूप से स्मृतियों के, उस जाल से बाहर आ सकते हैं, जो विचारणा का भंडार है। जहां अतीत हमेशा भविष्य की ओर प्रेरित करता रहता है, तथा स्वयं अतीत में ही है। उनका हम इन सबके प्रति मर सकें तब हम जीवन को समझ सकते हैं। तब जीवन जीने का अर्थ बदल जाता है। यहां जो अनुभव है, जो उससेे परे है, वह प्रेम है। यह प्रेम सुख-दुख से परे हैं।
यहां आने की प्रक्रिया ध्यान है। ध्यान यह वह नहीं है, जो सिखाया जाता है। ध्यान जो जाना गया है, जो ज्ञात का भंडार है, उसका खाली हो जाना है। यहां मन जो जाना गया है, जो स्मृतियों  का भंडार है, उसके अनुकरण में काम नहीं करता है, परन्तु मन स्वतंत्र होकर उसका प्रयोग भी करता है। यही मन का नियंत्रण कहा जाता है।
इसीलिए जीवन जीने की कला, वर्तमान में रहना है। यहां जो अतीत है, जो भविष्य है, दोनों के प्रति मर जाना है। तब मात्र वर्तमान में रहा जा सकता है। यहां आत्मा या शरीर का विभाजन नहीं है, शरीर बिना चैतन्य के जड़ है, चैतन्य को आधार शरीर का चाहिए। इस एकरूपताप में विभाजन गलत दृष्टि है। वर्तमान में जहां शरीर है, वहां मन है। वहीं चैतन्य है, यही वह स्वाभाविक अवस्था है जिसे ‘सहज’ कहा जाता है।

Sunday, June 7, 2009

जीवन का स्त्रोत

जीवन का स्त्रोत   
जीवन का स्त्रोत क्या है ,यह प्रश्न सभी चिंतकों को व्यथित करता रहा हैं।भगवान बुद्ध ने अव्याृत प्रश्न कहकर इसे पूछने पर मना कर दिया था।भारतीय दर्शन की यात्रा , मैं हूँ,मेरी सत्ता है, मैं चैतन्य हूँ, तथा अद्धैत वेदान्त तक आते - आते मैं आनंद भी हूँ,  गीता में भगवान ने ”मम माया दुरत्या कहकर परम सत्ता ”आत्म“ तक दी है।पूज्य स्वामीजी जहाँबुद्ध के आलय मत को मानते हुए परम चैतन्य को अत्यंत गत्यात्मक कहरहे हैं, वहीं वे केन्द्र की सत्ता को भी स्वीकृति दे रहे हैं, पर यहाँ जो केन्द्र है ,वह निरन्तर परिवर्तनशील है , जो अनेक ज्योतियों के एक थिर होने का अहसास भी कराता है।

कृपया आप इसे पढें ,अपनी प्रतिकिया दें,यहाँंस्थागत धर्म से हटकर भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन की विवेचना होरही हैं
.
साधकांे से हुई बातचीत के आधार पर
योग मात्र शारीरिक क्रिया प्रक्रिया का सामन्जस्य ही नही है, वरन योग सम्पूर्णता पाने की प्रक्रिया है। जो पूर्ण है, जहां किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं है। अभाव ही विक्षोभ का जनक है। वही दुख है। प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई कमी रहती है। कमी प्रकृति जन्य है। विषमता प्रकृति का स्वरूप ही है। आकांक्षा से गति उत्पन्न होती है, गति इस विषमता को हलचल देती है। एक स्फुरणा, पूर्णता की ओर बढ़ने की ललक, यही विकास यात्रा है। हम निरन्तर सम्भावना में है, रूपान्तरण में हैं, अपने आप को बदलने की प्रक्रिया में हैं।
यही कर्म का स्वभाव है। कर्म उस तरंग की स्वाभाविक गति है, जो चित्त सरोवर में उठी है। स्फुरणा क्यों ? क्या मात्र इसलिए ही नहीं कि वहां मात्र उद्वेलन ही है। सरोवर में आने वाली हर लहर एक छाप छोड़ जाती है। फिर उसी छाप पर, उसी  प्रभाव पर दूसरी लहर लाती है।यही तो संकल्पों का सिलसिला है, कारण है- संस्कार ! संस्कार ही वह छाप है, जहां नाभि से आने वाले स्पन्दन तरंग उत्पन्न करते हैं। इस तरह यन्त्र जो कि स्वचालित है, चलता रहता है। लहर उठती है, गिरती है, छाप बनती है, उस पर पुनःलहर उठती है। यह छाप ही वह संस्कर है जो कि संकल्पों की जनक है। हर संकल्प जो जितना गहरा होता है, उतना ही कर्म में ढल जाता है और कर्म की परिस्थिति भोग में होती है। भोगावस्था में वह तरंग पुनः टूटती है और उसका प्रभाव शेष रह जाता है। उस प्रभाव से पुनःतरंग उठती है।
यह एक लंबा सिलसिला है।
प्रश्न उठता है, फिर इस सिलसिले को योग में कैसे परिणित किया जाये ? योग-सम्पूर्ण रूपान्तरण ! अभाव का ही अभाव ! मात्र पूर्णता। यहां हैं गहरी शांति हार्दिकता तथा प्रेम।
शरीर मात्र जड़ ही नहीं है, वह परम चेतन्य के साथ जुड़कर चेतन तथा जड़ के साथ जुड़कर जड़वत हो जाता है। वह जड़ और चेतन का समवाय है, जो अद्भुत है, इसलिए ही रूपान्तरण संभव है। इस शरीर का सम्पूर्ण समर्पण ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। साधक कहते हैं कि वे ध्यान करते हैं कुछ कहते हैं जाप करते हैं, कुछ कीर्तन करते हैं, एक-एक इन्द्रिय को लेकर वे संयमित हो रहे है। वाणी जाप करती है, तब मन बाजार घूम आता है। हाथ से सुमिरिनी फिरती है, तब कान पड़ौस का बाजा सुनता है। घण्टे भर मौन रहे, पर आसन से उठते ही क्रोध से आग बबूला हो उठे हैं। इतना गुस्सा, यह कैसा योग हैं ? योग- जुड़ना। परम सत्य में लय भाव। यह मात्र एकांकी नही है, वरन यहां जुड़ना सम्पूर्ण है। टोटल....कुछ भी बाकी नहीं रखना। अपने आपको पूरा दे देना। चैबीस घंटे दे देना। तब जो कर्म है, वह भगवद कर्म में ढल जाता है।
यह कर्म कब संभव हो ?
प्रश्न उठ खड़ा होता है, यह कैसे संभव हो ? हम जो कुछ करते हैं, क्या वह सार्थक कर्म नही है? हां उत्तर सम्भवतः यही है। सार्थक कर्म पूर्णता देता है, जब कि निरर्थक कर्म मात्र अभाव और असंतोष सौंपता है। निरर्थक कर्म जन्म लेता है उन बातों से जो आज की नही है। आगे और पीछे का जो व्यर्थ का चिन्तन है, उसमें हम डूबे रहते है। वह इस प्रभाव का चित्त सरोवर पर सौंपता है, जिससे विक्षोभ जन्य लहरें उत्पन्न होती हैं, जहां मात्र अभाव ही है।
अतः आवश्यक है कि पहले निरर्थक कर्म से सार्थक कर्म की और बढ़ा जावे जो प्रकृति जन्य है, वही सहज है।
वही स्वाभाविक है। वह अपने आप पूरा हो जाता है। निरर्थक कर्म होता है, मन-तन के आगे और पीछे के चिन्तन में डूबने से। मन को जितना इससे हटाया जाकर वर्तमान में लाया जायेगा। उतना ही मन अपनी स्वाभाविक स्थिति में होगा।और मन जितनी शांत अवस्था में होगा, उतनी ही सक्रियता बढ़ेगी। साथ ही, उतनी ही सृजनात्मकता रहेगी। कर्म, सार्थकता पाएगा। कर्म, सार्थकता तभी पाता है, जब वह कर्म दुबारा न किया जावे यह भावना पूरी हो जावे। यही कर्म का रहस्य है। अन्यथा कर्म का भोग शेष रह जाता है। कर्म की स्वाभाविक परिणति लय है और जब कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है, तब वही योेग कहलाता है, अन्यथा कर्म की परिणति भोग में ही होती है।
कर्म भी साधन ही है। इसके स्वरूप को समझे बिना बचने का उपाय नही है। यह जगत, कर्म के ही ताने-बाने से बना हुआ है। अतः जगत से बाहर जाना तो संभव नही है। करोड़ो में कोई बिरला बाहर आ सकता है, परन्तु अपने भीतर से जगत को बाहर कर सकता है। जगत में रहते हुए भीतर के जगत से छुटकारा ! यही साध्य है। जगत आगे और पीछे के व्यर्थ के चिन्तन में उपस्थित रहता है वह तरंग पैदा करता है। जो कर्म को उपस्थित कर भोगों में बदल देती है।
अतः कर्मयोग का रहस्य यही है। कर्म का योग में रूपान्तरण ही साध्य रहे। चित्त सरोवर मे आने वाली हर लहर पर ध्यान रहे। उसका साक्षी भाव से निरीक्षण। निरर्थकता से बचा जाये। तभी गंदलाया जल स्थिर होना शुरू हो जाता है। और पारदर्शी तली उपस्थिति देती है।
यह स्थिति मात्र जड़ हो जाना नही है, वरन यह है- सम्पूर्ण सृजनात्मकता का अवतरण, टोटल रिवोल्यूशन सम्पूर्ण परिवर्तन दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण योग। यहां मात्र क्रिया का अन्त नही है, परन्तु क्रिया का सहज और स्वाभाविक रूपान्तरण है।
इसकी साधक में पहचान है, हार्दिकता और आचरण में निस्वार्थता।
कर्मयोग, साधक को अदभुत क्रिया शक्ति से जोड़ता है, जिसकी परिणति होती है, त्याग और सेवा में। उसका हर क्षण प्रकृति जन्य होने लगता है। जिससे प्रकृति से साधक की सम्प्रत्ति गहरी होने लगती है।
व्यक्तित्व की संरचना
प्रश्न     ः     यह माना जाता है कि शरीर जड़ और चेतन दोनो का समवाय है, शरीर में चेतना का प्रकाश कहां होता है, तथा चेतना किस प्रकार कार्य करती है इस सन्दर्भ में विवाद है। क्या मन, चित्त और आत्मा के बीच में भी अन्य किसी प्रकार के स्तर है।
स्वामी जी     ः     यह तो वही बता सकता है, जिसने सवाल खड़ा किया है। किताबों में पढ़ा होगा। प्रश्न अगर मन से आया है तो उत्तर उसी के पास होगा, उत्तर उसी से पूछा जाए मिल जायेगा। रमण महर्षि ने प्रश्न यही उठाया था और इसी की तलाश में रहे।
प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही हैं। ये नाभि में उठती हैं। नाभि में विकारों के बीज हैं। वे बीज सूक्ष्म हैं। वहां मात्र स्पंदन है। वे धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
जैसे कुछ लोग सो रहे हैं, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में हैं, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।लहरें अनवरत उठ रही हैं धीरे-धीरे यह अनुभव हो जाता है कि प्रकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है, उसके सबसे समीप अन्तर्मन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहां जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नहीं है। यहां तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, अभ्यास यही करना है कि नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, और वासनाएं जन्म लेती है, उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते हैं, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते हैं। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते हैं। यहां आकर भाव- दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती हैं, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती हैं, उन्हें पोषण मिल जाता हैं, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती हैं, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती स्वभाव में बदलाव व्यवहार की श्रेष्ठता अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे-धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
इसीलिए कहा है, स्वभाव बाद की स्थिति है। इसीलिए स्वभाव का पता तब तक नही चलता, जब तक क्रिया नहीं होती। आप चुप हैं, मौन हैं, पर बोलते ही शब्द बाहर आते ही जब क्रिया होती है, स्वभाव का पता चल जाता है। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नही आता है, क्योंकि वहां प्रतिक्रिया नही होगी। न भूत है, न भविष्य, न कल्पना है, न अतीत से संग्रहित कोई व्याख्या है। क्योंकि बाह्य, मन अनुपस्थित है। उसका काम होता है-स्मृति करना, कल्पना करना, चिन्तन करना, संग्रहित करना, रिकार्ड रूम नहीं रहा तब न अतीत रहा न भविष्य रहा, मात्र क्रिया, कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्वभाव सहज, साधारण बन जाता है। हां, यह भी नहीं होता कि निठल्लापन होता है, या पलायन। हां, अत्यधिक सृजनशीलता, और चित्त की नमनीयता वहीं संभव है। सवेंदनशीलता यही प्राप्त होती है। जो भी कार्य प्रकृति को करना है, वह कराती जायेगी, तथा कार्य स्वतः होता जायेगा।
मैं इतनी देर से चुप बैठा था, आपने प्रश्न पूछा मैं बोला। नही तो चुप रहता हूं। प्रश्न पूछा है तो क्रिया होती है। नहीं तो व्यवहार कुशलता नही रही। हम सब भीतर से जुड़े हुए हैं। व्यवहार ही सबके प्रति सही होना चाहिए। यहां इतने लोग आते हैं, पर आवश्यक नहीं है, बोला जावे। पर कोई प्रश्न पूछता है, तब उत्तर आ जाता है, अन्यथा मौन, व्यवहार का सही तरीका यही है। अन्तर्मुखी होने पर कर्म स्वतः प्रकृति जन्य हो जाता है, वहीं यह पहचान होती है।
इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरुकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग हैं। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बुद्ध जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया-तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। यह क्रिया तन्त्र को राजी रखने का तरीका नहीं है, वरन उसका सहज साक्षात्कार है। जिससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां दमन है, न क्षय की स्पर्धा। अभ्यास का क्रम है, मात्र साक्षी ध्यान। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।


Tuesday, June 2, 2009

जीवन भाष्य

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़स्वभाव ए आदतें और संस्कारएक्या हम अपने आपको जानते हैंहम निरन्तर बाह्य से जो प्रभाव ग्रहण करते हैंए वही तो कालांतर में हम होते चले जाते है जब पतंजलि ने वृत्तियों के निरोध को योग कहा था तब वह योग में प्रवेश के लिए पहला कदम ही थाएअन्तर्मन में प्रवेश द्वार का यह प्रारम्भ है।
साधकों से हुई बात.चीत के अंश
आदतें और स्वभाव उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं इसलिए उसका भी संस्कार है पर जिससे लहरें उठती हैए संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
हमारी चाय पीने की आदत है।
चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैंए उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहींए मानव मात्र की होती हैए टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गएण्ण्ण् कोई विचलित हुएए कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग.अलग। जो जितना निकट है उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है अनुभव किया है या जिन.जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है वही संस्कार रूप मेंए बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार
मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।
प्रश्नर संस्कार मृत्यु के बाद कहां रह जाते है
उत्तरर कहां रह जाते हैं कुछ कहा नही जा सकता। यहा इस जीवन में कम से कम एक कमरा मकान गली शहर की कल्पना तो है। हमारी जितनी कल्पनाएं हैं शरीर के साथ हैं। मन के साथ हैं। इसके बाद कुछ नहीं। वह स्वप्न सब कहां चला जाता है। इसका भी अस्त्तिव तब तक है जब तक शरीर और मन है। यहां से जाने के बाद यह भी गायब हो जाएगा। बड़ी विचित्रता है। कहंा जाते हैं कोई वस्तु तो है नहीं।
परन्तु प्रकृति के द्वारा एक वह संस्कारों का बीज तो है जिसे प्रकृति ने पैदा किया है।एकोऽहं बहुस्यामि जैसे एक चीज से हजारों रूप हो जाते है। यह विलीन हो जाते है। नाटक करने से लिए अपने आप पैदा हो जाते हैं। वापिस चले जाते हैं। वैसे बीच के समय में यह संस्कार रूपी बीज नाटक करने के लिए उसमे ऐसे पड जाते हैंए जो सब नाटक अपने साथ करते जाते हैं बनते जाते है बिगड़ते जाते हैंए सार कुछ नहीं।
जीवात्मा का स्वरूप
मृत्यु के बाद वो जो निकल जाता हैए उसमें वासनाएं होती हैंए संस्कार उसका एक छोटा सा पुन्ज उसे जीवात्मा कहते है।
ये सब पैदा हुए हैं जब से सृष्टि उत्पन्न हुई है।एकोऽहं बहुस्याम  स्वप्न में हम लेटते हैं। सोने के लिए अपन अकेले होेते हैं। और वहां भी वेदान्त कहता है इसमें आया है. स्वप्न क्यों पैदा होते हैं  जब लेटा.लेटा व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस करता है तो वह घबड़ा जाता है। क्योंकि वह अकेले में रहने का आदी नहीं है। और जब भय से कि वह अकेला है यह भावना पैदा होती है तो बहुस्याम की भावना पैदा हो जाती है। उसमें स्वप्न सृष्टि पैदा हो जाती है।
जो स्वप्न सृष्टि बनने के लिए प्रक्रिया है। अनेक व्यक्ति नजर आने चाहिएए अपने आप आ जाते हैं इसी प्रकार यहां तो अलग.अलग संस्कार है। इच्छायें हैं जो पुनःवहां से निकल जाता है। क्योंकि वह अलग अलग जीवात्मा तो है ही वह जीवात्मा जिसमें जितनी अधिक शक्ति होगी। इसमें ऐसे भी बहुत से व्यक्ति होतेे हैं जो कड़ी साधना के बाद शरीर छोड़कर जाते हैं जिनको हमने विद्वान माना है उनका अपना प्रकाश रहता है तेज होता है पर यहां चाहे सौ में अट्ठानवें टका तरक्की करलोए एक दो भी कमी रह गई तो प्रकृति के लिए यह काफी है नीचे खींच देने के लिए। वह वापिस खींच लेती है।
वहां तो जो सौ टका हुआए वही पास हो सकता हैए पूरा ही पकना होता है। हां जो भी किया है उसका लाभ तो मिलेगा। परन्तु जब तक शुद्ध सोना नही है तब तक उसको चक्कर काटने पड़ेंगे। प्रकृति उसे हटाएगी। जब तक वह सौ टन्च सोना हो जायेगा। उसे अपने हर जन्म की तब स्मृति रहेगी।
समान स्वभाव वाले लोग इकट्ठे हो जाते हैं वहां भी ऐसा होता होगा। पहले इच्छा हुई थी जीवात्मा कहां रहती है तब दिखाए जैसे जुगनू होते हैंए पांच सात झुण्ड में बड़ा प्रकाश होता है। तरह तरह से वो इधर.उधर आते जाते हैं। दिखा कई बार कई दिनों तक दिखता रहा। इच्छा न रहते हुए भी दिखता रहा। पर मन वहां भी नहीं लगा। विचारधारा शुरू हो गई फिर मन ने कहा छोड़ो तो छूट गई। इसी प्रकार दिखाया। फिर नहीं दिखा। अब उसकी आवश्यकता ही नहीं रही। जिज्ञासा भी नहीं रही। जहां जो इच्छा होगीए जानने की वह भी एक संस्कार बना देगी। वह भी खतरनाक होगी। जितना बचा जाएए उतना ही अच्छा।
जीवनमुक्त अवस्था
साध्य इसीलिए यही है। जीवनमुक्त अवस्था में यही होता है कि हमे हमारे शरीर मे रहते हुए शरीर से अलग अनुभव करते हुए हमारी इन्द्रियां हमारे शरीर में किस प्रकार काम करती हैंए इसका निरीक्षण करना है। यह करना हमने प्रारम्भ कर दिया तो संस्कार उठना कम हो जाता है। लहरें उठने की क्रिया धीरे.धीरे कम होती जाती है। संस्कारों में वासनाएं उत्पन्न करने की क्षमता कम हो जाती है। ये जो लहरें उठती रहती हैं प्रति क्षण फिर ये प्रभावित नहीं करती। यही सार है।