पूज्य स्वामीजी से यह प्रसंग एक वात्र्ता के पूछा गया था,सवामीजी संस्ािठत धर्म के खिलाफ रहे, वे उपनिषद कालीन ऋषि की तरह सदा अधिक से अधिक मौन में रहते थे ,प्रश्न पूछने पर सवाल का उत्तर उनका उनकी अनुभव यात्रा से निकल कर आताथा।आज आध्यात्म की दुनिया में बहुत कुहासा है,”अन्तर्यात्रा“ से कुछ अंश हम आपके लिए देते रहेंगे ,आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेंगे।
नरेन्द्रनाथ
क्या छोड़ा क्या पाया ?
स्वामीजी कहा करते हैं कि मैंने आज तक किसी को अपना शिष्य नही बनाया, न ही कोई पंथ चलाया, न ही कोई गद्दी बनायी, न ही भण्डारा किया। लोग आते हैं, वे कहते हैं दुनियां से थक गये, दुख ही दुख, घर-बार छोड़ना चाहते हैं, कुछ छोड़ आये हैं, धर्म की शरण में जाना चाहते हैं। कुछ कहने हैं- वे हरिद्वार हो आये, तीर्थयात्रा कर आये। कुछ कहते हैं- संन्यास लेना चाहते हैं, उनको दीक्षा की जरूरत है। और जब मैं उन्हें कहता हूं कि छोड़ने की जरूरत नहीं है, जिसे छोड़ना है, वह तुम्हारे पास है, जो तुमसे चिपटा हुआ है। वह जब तुम चाहोगे, स्वतःछूट जाएगा। चाहना तुम्हारी है, छूटना उसको है तो वे निराश हो जाते है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि बहुत पहले, जब उन्होंने सन्यास लिया था, और एक गुरूकुल शुरू किया था, तब लोग आते थे कहा करते थे, गांवों में हम तुम्हारा प्रचार करेंगे, लोगो के शिष्य बनने से तुम्हें जो आमदनी होगी आधा-आधा बांट लेंगे। स्वामीजी कहा करते हैं। न तो तब किसी को शिष्य बनाया और न अब। जब मैं किसी से कहता तो वे नाराज हो उठते थे। और यही सुनने में आता था, हम तुम्हारा विरोध करेंगे- और लोगों से कहेंगे, तुम कुछ नहीं जानते। तो यह सब ऐसे ही चलता रहता है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।
स्वामीजी ने कभी भी दमन को साधन नहीं बनाया। और यही कारण है कि जब भी कोई उन्हें मिलता है तो वह तथाकथित संन्यास धारण की परिधि मे उन्हें समझ नहीं पाता। दरअसल हजारों साल से धर्म के नाम पर जो अनुशासन सौपा गया, उसने मनुष्य को इतना जड़ बना दिया है कि वह सहज हो ही नहीं पाता। मनुष्य चेतना और पदार्थ का समवाय है। और शरीर जो प्राप्त हुआ है, उसकी स्वतन्त्रता अपने आप में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। इसीलिए जब मनुष्य के विकास की चर्चा होती है या दूसरी और मनुष्य के स्वरूप की खोज की जाती है तो जो चीज है-अपने सामने आती है, वह उसका शरीर ही है। बाहर और भीतर जो कुछ भी घट रहा है वह शरीर के धरातल पर ही है। बाहर की बाहृा घटनाओं की प्रतिक्रिया इन्द्रियों के माध्यम से भीतर पहुंचती है। और भीतर जो कुछ भी हो रहा है, वह इसी शरीर के माध्यम से बाहर व्यक्त होता है। इसीलिये भीतर तक पहुंचने के लिए वह माना गया कि शरीर को नियंत्रण में लेना आवश्यक है। दरअसल यह एक भ्रान्ति है। और जब तक इस भ्रान्ति को नहीं समझा जाए तब तक भीतर तक प्रवेश संभव नहीं होगा। प्रकृति का यह नियम है कि बाहृा में कितना भी बड़ा परिवर्तन किया जाये, वह तभी तक कारगर होगा, जब तक कि उस पर बल लगा हुआ है। ज्यों ही बल हटाया जायेगा, वह क्रिया अपने आप समाप्त हो जायेगी। यही कारण है कि बाहृा में जो परिवर्तन होता है और हम जिसे स्वभाव मान बैठते है। वह क्षणिक उत्तेजना पाकर ही टूट जाता है। यह स्थिति तथाकथित जो भी बाहृा अनुशासन को, दमन को इस साधना मार्ग पर जो आरोपित करते हैं, स्वीकार करते हैं, उनके साथ घटती रहती है।
प्रायः लोग चर्चा करते हैं और कहते हैं कि अगर मनुष्य अपने शरीर के प्रति जागरुक हो जाता है, सजग हो जाता है तो वह जान जाता है, इस शरीर के बारे में जो संवेग बिन्दु हैं, जहां पर कि शक्तियों के स्रोत हैं और जिनके माध्यम से वृत्तियां प्रकट होती हैं, और अगर हम यह जान पाये तो हम इन वृत्तियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे और नाड़ी संस्थान पर प्रभुत्व स्थापित करने के बाद हम भीतर के आवेग, संवेग और व्यवहार पर नियंत्रण पाने में समर्थ हो जायेंगे। इस आधार पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम की आधार शिला रखी गई हैं। यह जो विधि है, यह दमन की है। और यह मान लिया गया है कि दमन के द्वारा जो निषेध का मार्ग है, वह धार्मिक यंत्र में बहुत सहयोगी है। इसी आधार पर हजारांे साल से गृहस्थ की अपेक्षा संन्यास की स्थापना की गयी। और इसी रुप में धार्मिक यन्त्र के लिये सम्पूर्ण जगत को अस्वीकार किया गया, पर वास्तविकत्ता यह है कि हम यह नहीं मानते कि शरीर की जितनी निंदा की जाय, शरीर की जितनी चर्चा की जाय, शरीर रहेगा, और शरीर की अपने आप की सत्ता नही है, जो कुछ भी घटता है, वह भीतर घटता है। और जब तक भीतर की पहचान नही होगी, तब तक यह पता नही चलता कि बाहर क्यों सब कुछ घट रहा है। हम ये मान कर चलते हैं कि काया के नियंत्रण से चित्त वृत्तियों का शोधन हो जायेगा। यह मानते चले आ रहे हैं और हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं। हजारों साल से हजारों आदमी यही कहते चलें आ रहे हैं, लेकिन शरीर के इस अत्यधिक नियंत्रण से जो प्राप्तव्य है, मन की शांति स्थिरता, सृजनशील मन जहां प्रसन्नता है, क्या वह प्राप्त हो सकता है ?
यह कहा जाता है कि जो नाड़ी संस्थान है, वह मन का अनुचर नही है। संवेग प्राप्त होकर नाड़ी संस्थान में प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, और वहां मन कुछ कर नहीं पाता है, तब तक शरीर उत्तेजना में चला जाता है और वह सबकुछ घट जाता है, जो कि नहीं घटना चाहिए था। लेकिन अगर किसी संवेग को, किसी वृत्ति का निरीक्षण किया जाये और गहराई में जाकर स्पष्ट रूप से पाया जाय तो वहां ऐसा कुछ नही है।
स्वामीजी कहा करते हैं कि प्रकृति के द्वारा उठने वाली लहरें नाभि से गति लेकर जहां चित्त है, वहां ये निरन्तर धक्का दे रही है और यह स्पंदन चित्त पर आकर अधिक स्थूल रूप धारण कर लेता है, यही विचार का जन्म है। और ये लहरें ऊपर उठकर स्नायुओं द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती हैं, और शरीर बाहृा व्यवहार कर उठता है। जब तक उठने वाली लहर का जागरूक अवलोकन न हो, एक अवांछनीय सजगता न हो, तब तक व्यवहार के कारण की अन्वीक्षा नही हो सकती।
इसीलिये इस मार्ग पर जहां से प्रारम्भ होता है, वह बाहर नही भीतर की ओर जाना है। स्वामीजी कहा करते है कि अन्तर्मुखी हो जाओ, जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा, तो छोड़ने और पकड़ने की रूचि नहीं रहे।
लोग कहते हैं कि मै तो खामोश बैठा था, कुछ कहना भी नहीं चाहता था, पर ऐसा कुछ हुआ, ऐसा शब्द आया कि मैं अपने वश में नहीं रहा और क्रोध में जो कुछ मैं नहीं कहना चाहता था, वह सब निकल गया। अघटित, घटित हो गया। यहीं आकर कहा जाता है कि मन का वाणी पर कोई नियंत्रण है तो ऐसा नहीं कहा जाता। लेकिन यह बात गहराई से सोचें और वह जो प्रक्रिया देह पर घटी है, वाक यन्त्र पर घटी है, यहीं से प्रारम्भ करें और भीतर की ओर चलें, डुबकी लगायें संवेग के साथ तो पता चलता है न अच्छा, न बुरा, मात्र साक्षी ध्यान को पायेंगे, उस क्षण एक धक्का सा लगेगा। एक लहर सी आयी और समाप्त हो गयी थी। यह लहर अहर्निश आ रही है और मन इन लहरों पर तैरते हुए तिनको की तरह है। और जब साक्षी ध्यान बढ़ जाता है तो अचानक वह घट जाता है, जो अकल्पनीय है। जो छूटना था, वह तो स्वतः छूट जाता है, यह पता भी नहीं चलता कि कब छूट गया। इसीलिये छोड़ने और छूटने की अधिक चिन्ता यहां नहीं करनी है। बस करना, इतना ही है, जो भीतर का सागर है, वहीं बस, एक डुबकी लगानी है। अपने आपको बस छोड़ देना है। बिना किसी सहारे के, बिना किसी आलम्बन के, बिना किसी आश्रय के, चेतना सागर में लगायी हुई एक डुबकीवह सब छुड़ा देती है, जिसे छुड़ाना है।
Sunday, May 24, 2009
Sunday, May 3, 2009
सार्थकता की खोज
मित्रां ेने प्रश्न पूछा है,वर्र्तमान में कैसे रहा जाए? मन तो निरन्तर या तो स्मृति में या किसी कल्पना में रहता है। अनावश्यक विचारणा उसका स्वभाव है।विचारणा उठती रहती है निरन्तर स्मृति के सहयोग से।और स्मृति सघन होती रहती है अवधारणा का सहयोग पाकर , हम हमेशा इसी प्रवाह में रहते हैं।हमारा स्वभाव है अगर हमने किसी के प्रति अपनी राय नहीं रखी तो हम विचारक नहीं हैं।
पर क्या हमारी अपने बारे में यह राय उचित है?इसी बात पर आज यहाँ विचार किया गया है।
सार्थकता की खोज
कल रात हम लौट रहे थे, यही सवाल बार-बार उठ रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है, आखिर हम पैदा ही क्यों हुए हैं ? जब जगत ही असार है, फिर इस जगत के साथ हमारा संबंध क्या है ?
स्वामीजी से जब चर्चा में यह सवाल उठा, वे यही कहते हैं कि वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
उस दिन चर्चा में वे बोले- जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिबद्धता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाहृा में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रूक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।
स्वामीजी कहा करते है, ‘हम अपने तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से जीने का प्रयास ही नहीं करते हैं।’
साक्षी भाव ‘होने’ की कला है।
आप अन्तःकरण की पवित्रता चाहते हैं। जीवन में निर्मलता चाहते हैं, पवित्रता चाहते हैं, शांति चाहते हैं। पर अपनी बनी, बनायी अवधारणाओं को छोड़ नहीं पाते।
अगर छोड़ना ही है तो इस अवधारणा को छोड़ना होगा जिसने हमें रुग्ण मानसिकता दी है।
यही त्याग है।
तब वह व्यक्ति, वह परिस्थिति अपने सहज रूप में सामने आएगी। वह वर्तमान में उपस्थिति देगी, और अपने आपको भी वर्तमान में रहने में सहायता देगी।
चित्त की सरलता सहज ही प्राप्त हो जाएगी। अन्तःकरण में पवित्रता प्राप्त होती जाएगी।
त्याग वस्तु का नही है। न ही वस्त्र का। न ही भोजन का। न ही स्त्री, सन्तान, घर द्वार का है।
जिसने छोड़ा उसने क्या पाया है ?
धर्म की, कर्मकाण्ड की यही जटिलता है। वह उलझा अधिक रहा है। वह छोड़ने पर अधिक बल देता है। छूटने पर कम।
जो बलात छोड़ा जाता है, क्या वह छूट पाता है ?
बार-बार लौट-लौट कर आता है।
बहुत पुरानी कहानी स्वामी सुनाया करते हैं-
राजा जनक के दरबार में ऋषि आत्म-ज्ञान की चर्चा करने गए थे। चर्चा चल रही थी। तभी सेवक ने आकर कहा- नगर के पश्चिमी छोर पर आग लग गई है। चर्चा चलती रही। जनक ने आग बुझाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद फिर सूचना आई-आग आगे बढ़ती जा रही है। काबू में नहीं आ रही है। जनक आदेश भिजवाते रहे। तभी सूचना आई- आग अतिथिशाला तक आ पहुंची है। तभी ऋषि विचलित हुए, उठने लगे। जनक ने पूछा- क्यों ? बोले ”कमण्डल वहीं रह गया है।” जनक बोले मेरा तो राज्य जा रहा है, आपको अपने कमण्डल की पड़ी है।
ऋषि, जो संसार छोड़ आए थे, कमण्डल नहीं छोड़ पाए।
स्वामीजी कई बार कहते हैं, उनसे लोगों ने पूछा शराब छोड़ दें, सिगरेट छोड़ दें, मांसाहार छोड़ दें, आदि-आदि। तब उनका उत्तर यही रहता है, तुम अपना काम करते रहो, जिसे छूटना है वह अपने आप छूट जाएगा।
तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वह ही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
त्याग सेवा सौंप जाता है।
सेवा की नहीं जाती, हो जाती है। यह मनोदशा प्राप्त होते ही-जो शरीर का कार्य है, वह सेवा कहलाती है।
सभी सेवा की चर्चा करते हैं। तथाकथित सेवा अंहकार ही सोंपती है। मन को जटिलता देती है। साक्षी भाव मे देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना, साधना का रहस्य है। प्रतिफल है।
और तब जीवन में जग उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। यह सिद्धि है, यही निर्वाण है, यही मोक्ष है। यही साक्षात्कार है। प्रेम दूसरे को खींचता है। यहां आकर्षण है। वह आकर्षित करता है। पर अब यह जान लिया जाता है कि दुरूपयोग नहीं करना है, वरन दूसरे के मनोजगत में यही भाव उपस्थित करने का प्रयास करना है। आकर्षण जो ग्रह नक्षत्रों में था, वह शरीर में आ जाता है। यहां लोहा सोना नहीं होता, वरन पारस दूसरे को पारस बनाने लग जाता है। जो खुद जागता है, दूसरे को जगाता है।
स्वामीजी कहते हैं- दूसरे के चित्त मंे यही मनोभाव जागृत स्वतः होने लग जाते हैं, वसुधैव कुटुम्बकम ओढ़ा नहीं जाता, पाया जाता है, हुआ जाता है। यही मानव धर्म है।
यही जीवन की सार्थकता है।
नरेन्द नाथ
पर क्या हमारी अपने बारे में यह राय उचित है?इसी बात पर आज यहाँ विचार किया गया है।
सार्थकता की खोज
कल रात हम लौट रहे थे, यही सवाल बार-बार उठ रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है, आखिर हम पैदा ही क्यों हुए हैं ? जब जगत ही असार है, फिर इस जगत के साथ हमारा संबंध क्या है ?
स्वामीजी से जब चर्चा में यह सवाल उठा, वे यही कहते हैं कि वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
उस दिन चर्चा में वे बोले- जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिबद्धता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाहृा में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रूक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद समस्या खड़ी करते हैं।
स्वामीजी कहा करते है, ‘हम अपने तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से जीने का प्रयास ही नहीं करते हैं।’
साक्षी भाव ‘होने’ की कला है।
आप अन्तःकरण की पवित्रता चाहते हैं। जीवन में निर्मलता चाहते हैं, पवित्रता चाहते हैं, शांति चाहते हैं। पर अपनी बनी, बनायी अवधारणाओं को छोड़ नहीं पाते।
अगर छोड़ना ही है तो इस अवधारणा को छोड़ना होगा जिसने हमें रुग्ण मानसिकता दी है।
यही त्याग है।
तब वह व्यक्ति, वह परिस्थिति अपने सहज रूप में सामने आएगी। वह वर्तमान में उपस्थिति देगी, और अपने आपको भी वर्तमान में रहने में सहायता देगी।
चित्त की सरलता सहज ही प्राप्त हो जाएगी। अन्तःकरण में पवित्रता प्राप्त होती जाएगी।
त्याग वस्तु का नही है। न ही वस्त्र का। न ही भोजन का। न ही स्त्री, सन्तान, घर द्वार का है।
जिसने छोड़ा उसने क्या पाया है ?
धर्म की, कर्मकाण्ड की यही जटिलता है। वह उलझा अधिक रहा है। वह छोड़ने पर अधिक बल देता है। छूटने पर कम।
जो बलात छोड़ा जाता है, क्या वह छूट पाता है ?
बार-बार लौट-लौट कर आता है।
बहुत पुरानी कहानी स्वामी सुनाया करते हैं-
राजा जनक के दरबार में ऋषि आत्म-ज्ञान की चर्चा करने गए थे। चर्चा चल रही थी। तभी सेवक ने आकर कहा- नगर के पश्चिमी छोर पर आग लग गई है। चर्चा चलती रही। जनक ने आग बुझाने का आदेश दिया। कुछ देर बाद फिर सूचना आई-आग आगे बढ़ती जा रही है। काबू में नहीं आ रही है। जनक आदेश भिजवाते रहे। तभी सूचना आई- आग अतिथिशाला तक आ पहुंची है। तभी ऋषि विचलित हुए, उठने लगे। जनक ने पूछा- क्यों ? बोले ”कमण्डल वहीं रह गया है।” जनक बोले मेरा तो राज्य जा रहा है, आपको अपने कमण्डल की पड़ी है।
ऋषि, जो संसार छोड़ आए थे, कमण्डल नहीं छोड़ पाए।
स्वामीजी कई बार कहते हैं, उनसे लोगों ने पूछा शराब छोड़ दें, सिगरेट छोड़ दें, मांसाहार छोड़ दें, आदि-आदि। तब उनका उत्तर यही रहता है, तुम अपना काम करते रहो, जिसे छूटना है वह अपने आप छूट जाएगा।
तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वह ही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
यही त्याग है।
त्याग सेवा सौंप जाता है।
सेवा की नहीं जाती, हो जाती है। यह मनोदशा प्राप्त होते ही-जो शरीर का कार्य है, वह सेवा कहलाती है।
सभी सेवा की चर्चा करते हैं। तथाकथित सेवा अंहकार ही सोंपती है। मन को जटिलता देती है। साक्षी भाव मे देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना, साधना का रहस्य है। प्रतिफल है।
और तब जीवन में जग उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। यह सिद्धि है, यही निर्वाण है, यही मोक्ष है। यही साक्षात्कार है। प्रेम दूसरे को खींचता है। यहां आकर्षण है। वह आकर्षित करता है। पर अब यह जान लिया जाता है कि दुरूपयोग नहीं करना है, वरन दूसरे के मनोजगत में यही भाव उपस्थित करने का प्रयास करना है। आकर्षण जो ग्रह नक्षत्रों में था, वह शरीर में आ जाता है। यहां लोहा सोना नहीं होता, वरन पारस दूसरे को पारस बनाने लग जाता है। जो खुद जागता है, दूसरे को जगाता है।
स्वामीजी कहते हैं- दूसरे के चित्त मंे यही मनोभाव जागृत स्वतः होने लग जाते हैं, वसुधैव कुटुम्बकम ओढ़ा नहीं जाता, पाया जाता है, हुआ जाता है। यही मानव धर्म है।
यही जीवन की सार्थकता है।
नरेन्द नाथ
Saturday, May 2, 2009
पूज्य स्वामीजी
पूज्य स्वामीजी की वात्र्ताओं के क्रम में यह लेखमाला की तीसरी कड़ी यहाँ दी जारही है।आप इस संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें।यहाँ मनुष्य की उसके स्वयं से जुड़ने की तथा उसकी अन्तर्यात्रा की पहचान ही संकल्पित है।
साधन सन्दर्भ
स्वामीजी से प्रायः जिज्ञासु जब भी मिलते हैं, वे क्या करें ? यही पूछते रहते हैं। वे साधना की ओर किस तरह बढ़ें, यही जिज्ञासा रहती है।
स्वामीजी कहा करते है-
”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिक्ता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।”
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसका सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।
इसलिए आवश्यक है कि काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है कि विचारणा ही नही रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभव-कर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है। अनुभव और अनुभव कर्ता पृथक हो जाते हैं। इसलिए हम पाते है, हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते हैं। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य में मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है, निसंकल्पता, एक गहरा मौन, यही तो हमारा ध्येय है।
ध्यान-योेग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा जगत भागवत-भाव की प्राप्ति होती है, वहीं जीवन भागवत-कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है, वहां है- सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भगवत इच्छा ही प्राणी की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अन्त में जाकर यह भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहां निन्दनीय नहीं है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।
इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग्र करना लक्ष्य नही है, हम चाहते हैं- उसको बर्फ बनाना, जिससे कि फिर कभी कोई लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही, और नहीं अब तक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमे, कुविचार से हटाते हुए उस संकल्प-हीनता को सौंपता है, जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत्कर्म है, यही हमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं-
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर संभव नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है, तभी तक दुख है। पर जाने कैसा भटकाव है ? प्राणी दुख भोगता हुआ भी सुख की भूल- भुलैया में इतना उलझा रहता है कि वह छोड़ते हुए भी छोड़ नहीं पाता है और अगर प्रयास भी करता है तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्धियों की तलाश में, हठयोग में, या सुख की कामना में ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है, गुरूडम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन में अभ्यास सत्संग द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यानयोग ही सहज और सुगम वह मार्ग है, जो सन्तों का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।
पहला कदम
जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´छा कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।
अन्त में
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्ध और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है, जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद, जो कल तक संगी था- कहीं दूर चला गया है।
साथ ही ”अशुद्ध संकल्प” जो पर-निन्दा तथा पर-अहित में थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कत्र्तव्य- परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुदिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से तनाव से भरा हुआ था, खाली हो गया है। वह गहरी शान्ति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे, वे भी बदल रहे हैं। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कत्र्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कत्र्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं स्वतः ही कम होने लगते हैं।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
और भी आगे, अगर साधन-यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है कि ज्यों-ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन होती जाती है।
सधन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था, वह स्वतः छूटता चला जा रहा है। जो पाना था, वह स्वतः प्राप्त हो रहा है।
साधन यात्रा में यह पड़ाव ही है।
इसमें रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही हैं। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते हैं।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे, और आगे, जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो” है स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है, तब भाषा भी उसे प्रकट करने में असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है, वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नहीं है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतन्त्रता हर साधक का जन्म सिद्ध अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन-यात्रा का प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। यहां प्रारम्भ तो दिखता है, पर अन्त नहीं। इसलिए अनन्त धैर्य और अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।
अ
साधन सन्दर्भ
स्वामीजी से प्रायः जिज्ञासु जब भी मिलते हैं, वे क्या करें ? यही पूछते रहते हैं। वे साधना की ओर किस तरह बढ़ें, यही जिज्ञासा रहती है।
स्वामीजी कहा करते है-
”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि वह अपनी आंतरिक्ता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही नहीं पाते।”
प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसका सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।
इसलिए आवश्यक है कि काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है कि विचारणा ही नही रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभव-कर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है। अनुभव और अनुभव कर्ता पृथक हो जाते हैं। इसलिए हम पाते है, हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते हैं। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य में मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है, निसंकल्पता, एक गहरा मौन, यही तो हमारा ध्येय है।
ध्यान-योेग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा जगत भागवत-भाव की प्राप्ति होती है, वहीं जीवन भागवत-कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।
यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है, वहां है- सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं?
यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भगवत इच्छा ही प्राणी की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अन्त में जाकर यह भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। अतः प्रयत्न यहां निन्दनीय नहीं है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।
इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।
इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।
सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग्र करना लक्ष्य नही है, हम चाहते हैं- उसको बर्फ बनाना, जिससे कि फिर कभी कोई लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही, और नहीं अब तक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमे, कुविचार से हटाते हुए उस संकल्प-हीनता को सौंपता है, जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत्कर्म है, यही हमारा ध्येय है।
साधक कहते हैं-
दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर संभव नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है, तभी तक दुख है। पर जाने कैसा भटकाव है ? प्राणी दुख भोगता हुआ भी सुख की भूल- भुलैया में इतना उलझा रहता है कि वह छोड़ते हुए भी छोड़ नहीं पाता है और अगर प्रयास भी करता है तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्धियों की तलाश में, हठयोग में, या सुख की कामना में ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है, गुरूडम के भटकाव में भटक जाता है।
नहीं, हमें इसी जीवन में अभ्यास सत्संग द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यानयोग ही सहज और सुगम वह मार्ग है, जो सन्तों का साध्य पथ रहा है।
इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।
पहला कदम
जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।
बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।
सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´छा कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।
दूसरा कदम
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।
इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।
तीसरा कदम:-
साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।
नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।
फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।
अन्त में
स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।
अशुद्ध और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।
यह वह स्थिति है, जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद, जो कल तक संगी था- कहीं दूर चला गया है।
साथ ही ”अशुद्ध संकल्प” जो पर-निन्दा तथा पर-अहित में थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।
साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कत्र्तव्य- परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुदिता, प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम आंतरिक है।
साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से तनाव से भरा हुआ था, खाली हो गया है। वह गहरी शान्ति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे, वे भी बदल रहे हैं। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।
वह कत्र्तव्य कर्म से जुड़ता है।
कत्र्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं स्वतः ही कम होने लगते हैं।
व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।
और भी आगे, अगर साधन-यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है कि ज्यों-ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन होती जाती है।
सधन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था, वह स्वतः छूटता चला जा रहा है। जो पाना था, वह स्वतः प्राप्त हो रहा है।
साधन यात्रा में यह पड़ाव ही है।
इसमें रहते हुए और आगे बढ़ना है।
बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही हैं। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते हैं।
सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।
आगे, और आगे, जो साधन यात्रा का पड़ाव है।
”जो” है स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है, तब भाषा भी उसे प्रकट करने में असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है, वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नहीं है।
यह हर साधक का अधिकार है। स्वतन्त्रता हर साधक का जन्म सिद्ध अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।
साधन-यात्रा का प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। यहां प्रारम्भ तो दिखता है, पर अन्त नहीं। इसलिए अनन्त धैर्य और अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।
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ृृृृृृृअन्तर्यात्रा पूज्य स्वामीजी के सानिध्य में लिखा गया पहला ग्रन्थ है।यहाँ स्वामीजी के विचार तथा उनसे पूछे गए सवालों के उत्तर जो प्राप्त हुए थे वे दिए गए हैं।यह पहले ही बता चुके हैं कि स्वामीजी ने अपना कोई स्वतंत्र पंथ नहीं चलाया , वे एक अनन्य खोजी थे, निरन्तर मौन में रहे, आपने प्रश्न पूछा तो उत्तर दे दिया अन्यथा वे मौन ही रहते थे। उनकी कुटिया सभी के लिए हमेशा खुली रहती थी।वहाँ जाति, संप्रदाय , का कोई भेद नहीं था।
साधना की ओर
यह प्रश्न और कहीं नहीं, हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधना क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। परन्तु अगर उत्तर नहीं से आए...तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है,जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है, तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास सब उसी के रूप हैं। पेट की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं हैं। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बहिर्मुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरन्तर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है। वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता। उसे प्रशांिन्त की स्थिति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अन्त प्रशान्ति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके सम्पूर्ण जीवन की यात्रा है।
विश्राम, मन की स्थिरता हैं, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्तर्मुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है। यहां सुख भी है, शान्ति भी है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य सम्भावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की सम्भावना। दैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं है। यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है।
और इन सब आवश्यकताओं का एक लम्बा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यों चाहता हूं ? मैं आखिर जीवित ही क्यो हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं, आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नहीं है, चलता रहता है। पढ़ना रोज पढ़ना नौकरी तक। नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देंगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए, इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा, तब तुष्टि किसे ?
अकसर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे इन सबके पीछे जो भीड़ है, वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार ! उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए। यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और संकल्प पूर्ति का अभाव दुख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख !
सुख अल्प है, दुःख अनन्त है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है। एक बड़े आधार की खोज, जो दुख दूर करेगा अनवरत सुख देगा।
अनन्त सुख !
और यही नही मिलता है।
शेष रह जाता है विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यहीं से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज शान्ति की खोज !
जहां अमृत है !
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो, इसके पूर्व ही हजारों कामनाएं पैदा हो जाती हैं। क्या वे सब पूरी हो पाती हैं ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती हैं।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा, प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावाही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है, वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में समाज में, धन में मकान मेे, यश में हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नही है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है। हमेशा कल में ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है, उनसे कुछ मांगता है और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है, वहीं वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है, उसका कभी नहीं हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है, परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कभी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका रहा है।हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है, उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है, उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है- अपने को छोड़कर, पराये सुख की खोज करना।
जो स्वभाव है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण ही तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख दुखी के उद्धार के लिए आता है। उसकी समझ को जाग्रत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ‘जो है’ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है। खोजी होता है।
‘जो’ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था, अभी भी जीवन में था, पर बुद्धि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही, अविवेक छूटता है। विवेक ‘जो’ है, उसके प्रति आदर भाव तथा जो नहीं है, उसके प्रति अनादर भाव का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है, वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते हैं। विवेक के जाग्रत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है,वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बाधक है, जो स्मृतियों तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नही होगी, तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी-कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती। अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती हैं। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह मे डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति में प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत हैं। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा, वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा, बिम्ब रहा। जाते ही जल, फिर वही दर्पण का दर्पण !
यही तो प्रशांत मन है।
जो है उसी पर ध्यान केन्द्रित रहे, यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहा है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है, क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर मन और संसार सब बदल रहे हैं। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर प्रतिरूप ही हैं। जो निरन्तर बदल रहा है, वह सत्य नहीं है। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है। उसी का ही चिन्तन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह तो है, उस पर जब ध्यान पहुंचता है, तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान जो है उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है वह मन है। तभी तो सारा बह्माण्ड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान आन्तरिक अवलोकन ही कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यन्त्र रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान, एकाग्रता नहीं है। एकाग्रता मन की बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मन्त्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। परन्तु एकाग्रता को ही साधना-यात्रा स्वीकारने से साधक, साधन पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा, यह मन्त्र, यह नाम, फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनःऔर अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान” एकाग्रता नही है।
ध्यान सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन है। हम जो भीतर हैं, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही-सही विश्वसनीय पहचान ही ध्यान प्रक्रिया है। हम जो है, एक स्थिर इकाई नही हैं। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आंतरिकता नहीं है।
मन के संकल्प-विकल्प की अनवरत श्रंखला है। इसी श्रंखला, इसी विचारणा का सतर्कतापूर्वक किया गया अवलोकन ही ध्यान है।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नही ंरखना है। बनी बनायी पूर्व निर्धारित को क्या देखना। जो बात तय कर ली जाय, जैसे कोई नाम, कोई रूप, उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही हैं, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर सम्पूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः स्थिरता प्रदान करता है।र्
िस्थरता ही साधना का लक्ष्य है।
मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह नींद है।
सच है, हम जागते हुए भी सोए रहते हैं। कोई पूछे तो हमें लगता है, हम कहीं और थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधन स्वयं प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलायेगा।
मन की गति असाधारण है। क्षणभर मे ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती हैं। चित्र ही चित्र ! न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे हैं। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम मन मान बैठे हैं। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती हैं। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियों के साथ असहयोग करे तो मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है,न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पायेंगे। जो कुछ है, भीतर है। अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ है। उसे बाहर तो आने दें। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंदलाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं। और अस्वीकार करने लग जाते हैं। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते हैं। यह क्या है, यह तो पागलपन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नहीं है। यह अज्ञान है। यहां हमारी जागरूकता यही है कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम हैं, हाजरी रहे।
छात्र कक्षा मे आते है। पर जरा पूछो तो लगता है- यहां थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान” गायब होने का नाम नही, साक्षत अनुभवन है। जो कुछ है,विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नहीं है। हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन छूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञानरूपी कूड़ा कचरा जलकर राख हो जाता है। बंधन वे पाश जिनसे हमने अपने आप को बांध रखा है, टूट जाते हैं। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते सी शेष रह जाता है, खुला आकाश, निरभ्र और शांत, जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रखकर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं हैं, वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती हैं। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवदेच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख-दुख के झंझावात से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। वही भगवद् इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाये रखती है।
शास्त्रों में इसे ही ”योगमाया” कहा जाता है। यही मोक्ष अभिलाषा है, यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा संसार से पलायन नही है।यह संसार के प्रति सभी संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आभ्यान्तरिक प्रश्न के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशान्त रखता है- उसे दूर करने का है। इसलिए यहा व्यक्त्तिव का सम्पूर्ण रूपांतरण है। यहां आभ्यन्तर तथा बाहृा जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म की साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्म भाव से ऊपर उठकर आत्मानुभव ही नहीं, बल्कि साथ ही उस परमात्म भाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहीं और भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल को भी तो स्थिर नही रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया जल है। सदा अपने को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्योंकि वही तो इसका रस है। जब तक इसे संसार की समझ नहीं होती, तब तक मन का अपना जो स्वरूप है, वहां लौटना असम्भव है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार, और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं हैं। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती हैं। ज्यों-ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यों-त्यों हम भगवतकृपा के हकदार बनते चले जाते हैं।साथ ही, जितनी भगवत्कृपा हम पर होगी उतनी ही निम्न प्रकृति की शुद्ध होेती रहेगी यह साधारण नियम है। इसीलिए बहिर्जगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जायेगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन का छोड़ा ही छूटा है और मन का ग्रहण किया चिपटाता है।
चित्त शुद्धि और भगवत् कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते हैं। यही साधना यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति है- उस विराट शांति की, जिसके लिए हम इस अन्तर्यात्रा पर गतिशील हैं।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिसमें, जिस संसार की उपस्थिति है, उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
यही वह स्थिति है, जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान पर अनासक्ति, भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा ! तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक नहीं रह जाते हैं, वरन आचरण में स्वतः ही आ जाते हैं। यही तो भगवत्कर्म है, जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करता है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठ कला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अन्त हे। यही तो मोक्ष है।
इसलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है। और साथ ही इस शरीर में भगवत्कर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती हैं, वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती हैं। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है, वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए अवलोकन के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से ही विक्षोभ का अन्त संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है, तभी संकल्प त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां हैं। जन्म-जन्म के संस्कार हैं।
स्थिरता के लिए वांछनीय है-इन स्मृतियों का असहयोग। साधक को स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। मन का बार बार स्मृतियों में जाना तनाव ही लाता है। सच तो यह है कि स्मृति ही पाप है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है वह अशुभ ही अधिक है। सुखद है। यह वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी ! जब तक यह ताला बन्द है मन का शांत भाव में आना असम्भव है।हर साधक प्रयोगशाला है। उसे चाहिए अनन्त धैर्य, अनन्त प्रतीक्षा, साधन के प्रति गहरा विश्वास ! जब तक विश्वास नहीं होगा- सफलता नहीं मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगतापूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। निरन्तर सजगतापूर्वक की गई मन की यह निगरानी स्थिरता अवश्य देगी। यहां कोई दबाव नहीं है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाहृा-आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन जो जरूरी है, उसको ही छोड़ना है- इसी से ‘जो’ है उस स्वरुप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है- आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है- क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक रही, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो सम्पूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ‘जो’ जरूरी नही है उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही- साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी है।
जहां भी रहें, जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहें। हम वहीं रहें, उसी क्षण में रहें।
स्मृतियों तथा आकांक्षाओं से जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है, वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी, हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिन्दगी से पलायन नहीं है। वरन जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है।
साधना की ओर
यह प्रश्न और कहीं नहीं, हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधना क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। परन्तु अगर उत्तर नहीं से आए...तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है,जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है, तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास सब उसी के रूप हैं। पेट की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं हैं। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बहिर्मुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरन्तर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है। वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता। उसे प्रशांिन्त की स्थिति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अन्त प्रशान्ति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके सम्पूर्ण जीवन की यात्रा है।
विश्राम, मन की स्थिरता हैं, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्तर्मुखी यात्रा है।
यह भी मनुष्य की मांग है। यहां सुख भी है, शान्ति भी है।
पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।
मनुष्य सम्भावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की सम्भावना। दैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं है। यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है।
और इन सब आवश्यकताओं का एक लम्बा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।
सवाल फिर खड़ा होता है।
यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यों चाहता हूं ? मैं आखिर जीवित ही क्यो हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं, आखिर किसलिए ?
पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नहीं है, चलता रहता है। पढ़ना रोज पढ़ना नौकरी तक। नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देंगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए, इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा, तब तुष्टि किसे ?
अकसर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।
मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे इन सबके पीछे जो भीड़ है, वह क्या चाहती है ?
तुष्टि का अगाध भण्डार ! उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए। यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।
संकल्प पूर्ति सुख देती है, और संकल्प पूर्ति का अभाव दुख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है।
मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख !
सुख अल्प है, दुःख अनन्त है।
इसीलिए ईश्वर की खोज है। एक बड़े आधार की खोज, जो दुख दूर करेगा अनवरत सुख देगा।
अनन्त सुख !
और यही नही मिलता है।
शेष रह जाता है विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यहीं से साधन यात्रा शुरू होती है।
स्थायी सुख की खोज शान्ति की खोज !
जहां अमृत है !
कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।
एक कामना की पूर्ति हो, इसके पूर्व ही हजारों कामनाएं पैदा हो जाती हैं। क्या वे सब पूरी हो पाती हैं ?
वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती हैं।
और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।
वस्तु में सुख तलाशा, प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।
लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावाही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।
सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।
मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है, वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में समाज में, धन में मकान मेे, यश में हर जगह ढूंढा जाता है।
सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?
इस सवाल पर वह सोचता ही नही है।
यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?
और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है। हमेशा कल में ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।
उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।
इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है, उनसे कुछ मांगता है और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।
जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है, वहीं वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है, उसका कभी नहीं हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है, परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कभी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका रहा है।हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।
लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है, उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है, उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है- अपने को छोड़कर, पराये सुख की खोज करना।
जो स्वभाव है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।
जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण ही तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।
यही विडम्बना है।
दुख दुखी के उद्धार के लिए आता है। उसकी समझ को जाग्रत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।
इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ‘जो है’ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है। खोजी होता है।
‘जो’ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था, अभी भी जीवन में था, पर बुद्धि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही, अविवेक छूटता है। विवेक ‘जो’ है, उसके प्रति आदर भाव तथा जो नहीं है, उसके प्रति अनादर भाव का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है, वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते हैं। विवेक के जाग्रत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है,वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं अपने पास ही है।
अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बाधक है, जो स्मृतियों तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नही होगी, तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।
वह सोचता है कि जो दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी-कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती। अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती हैं। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।
कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह मे डूबता चला जाता है।
कामना निवृत्ति ही शांति में प्रवेश कराती है।
यहां सरोवर की लहरें शांत हैं। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा, वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा, बिम्ब रहा। जाते ही जल, फिर वही दर्पण का दर्पण !
यही तो प्रशांत मन है।
जो है उसी पर ध्यान केन्द्रित रहे, यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहा है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है, क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर मन और संसार सब बदल रहे हैं। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर प्रतिरूप ही हैं। जो निरन्तर बदल रहा है, वह सत्य नहीं है। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है। उसी का ही चिन्तन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह तो है, उस पर जब ध्यान पहुंचता है, तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है।
इसीलिए ध्यान जो है उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है वह मन है। तभी तो सारा बह्माण्ड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान आन्तरिक अवलोकन ही कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यन्त्र रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान, एकाग्रता नहीं है। एकाग्रता मन की बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मन्त्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। परन्तु एकाग्रता को ही साधना-यात्रा स्वीकारने से साधक, साधन पथ को ही छोड़ बैठता है।
हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा, यह मन्त्र, यह नाम, फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनःऔर अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।
”ध्यान” एकाग्रता नही है।
ध्यान सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन है। हम जो भीतर हैं, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही-सही विश्वसनीय पहचान ही ध्यान प्रक्रिया है। हम जो है, एक स्थिर इकाई नही हैं। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आंतरिकता नहीं है।
मन के संकल्प-विकल्प की अनवरत श्रंखला है। इसी श्रंखला, इसी विचारणा का सतर्कतापूर्वक किया गया अवलोकन ही ध्यान है।
अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।
बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नही ंरखना है। बनी बनायी पूर्व निर्धारित को क्या देखना। जो बात तय कर ली जाय, जैसे कोई नाम, कोई रूप, उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही हैं, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर सम्पूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।
यह अवलोकन ही क्रमशः स्थिरता प्रदान करता है।र्
िस्थरता ही साधना का लक्ष्य है।
मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह नींद है।
सच है, हम जागते हुए भी सोए रहते हैं। कोई पूछे तो हमें लगता है, हम कहीं और थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधन स्वयं प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलायेगा।
मन की गति असाधारण है। क्षणभर मे ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती हैं। चित्र ही चित्र ! न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे हैं। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम मन मान बैठे हैं। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती हैं। मूलधन ब्याज कमा लेता है।
मन अगर स्मृतियों के साथ असहयोग करे तो मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।
यही हमें करना है।
यहां न कुछ अच्छा है,न बुरा।
अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पायेंगे। जो कुछ है, भीतर है। अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ है। उसे बाहर तो आने दें। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंदलाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं। और अस्वीकार करने लग जाते हैं। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते हैं। यह क्या है, यह तो पागलपन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नहीं है। यह अज्ञान है। यहां हमारी जागरूकता यही है कि हमारी उपस्थिति बनी रहे, जहां हम हैं, हाजरी रहे।
छात्र कक्षा मे आते है। पर जरा पूछो तो लगता है- यहां थे ही कहां, कहीं और थे। गायब।
”ध्यान” गायब होने का नाम नही, साक्षत अनुभवन है। जो कुछ है,विश्वसनीय साक्षात्कार यहां है।
यही ध्यान उस विराट आनन्द स्रोत से हमें जोड़ देता है, जो हमारा साध्य है। इसीलिए ध्यान मात्र प्रक्रिया ही नहीं है। हर प्रकार की क्रिया का यहां अन्त भी है।
यहां सब प्रकार के बंधन छूट जाते हैं। ज्ञान की अग्नि उठते ही अज्ञानरूपी कूड़ा कचरा जलकर राख हो जाता है। बंधन वे पाश जिनसे हमने अपने आप को बांध रखा है, टूट जाते हैं। संसार के प्रति उमड़ती हुई कामनाओं के बादलों के हटते सी शेष रह जाता है, खुला आकाश, निरभ्र और शांत, जहां फिर कोई अभाव नहीं।
अगर हमारे पास थोड़ा सा अवकाश हो, और हम अपने आपको सामने रखकर देखें तो पाऐंगे, हमारे भीतर जो आकांक्षाएं हैं, वे दो विभिन्न रास्तों पर चलना चाहती हैं। ज्वार सा उमड़ता है।
यही वह द्वन्द है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। भोगेच्छा और भगवदेच्छा भोगेच्छा संसार की ओर ले जाती है, यह सांसारिक सुख को ही जीवन की उपलब्धि मानती है।
दूसरी ओर इस सुख-दुख के झंझावात से उठकर फिर शांति की ओर बढ़ने की इच्छा उमड़ती है। वही भगवद् इच्छा है, जो मनुष्य को सांसारिक जगत में व्याकुल बनाये रखती है।
शास्त्रों में इसे ही ”योगमाया” कहा जाता है। यही मोक्ष अभिलाषा है, यही साधन यात्रा में साधक के मन में प्रयत्न उपस्थित करती है।
साधन यात्रा संसार से पलायन नही है।यह संसार के प्रति सभी संबंधों की तलाश है।
यहां जो प्रयत्न है, वह उस समझ पर आधारित है, जो उसे आभ्यान्तरिक प्रश्न के लिए प्रेरित करती है। वह अधूरापन जो उसे हर समय अशान्त रखता है- उसे दूर करने का है। इसलिए यहा व्यक्त्तिव का सम्पूर्ण रूपांतरण है। यहां आभ्यन्तर तथा बाहृा जीवन का एक ऐसा परिवर्तन है कि यहां देह परमात्म भाव के साथ ही परमात्म कर्म की साधन बन जाती है। इसीलिए साधन यात्रा की उपलब्धि सांसारिक देहात्म भाव से ऊपर उठकर आत्मानुभव ही नहीं, बल्कि साथ ही उस परमात्म भाव को जीवन तक भी ले जाना है।
आज के मनुष्य के सामने उसका अशांत मन ही कष्टकर है। वह पाता है कि अपने समस्त भौतिक प्रयत्नों के बाद भी वह विक्षोभ से बाहर नहीं निकल पाता है, वह इसी विक्षोभ को दूर करने के लिए कभी जगत में पूरी तरह बैठना चाहता है तो कभी इससे दूर कहीं और भागना चाहता है। मन जो बीमार है, अशांत है, एक पल को भी तो स्थिर नही रह पाता है। कभी अतीत में तो कभी भविष्य में दौड़ता ही रहता है। कितनी हिंसा भरी है। कितना गंदलाया जल है। सदा अपने को छोड़ परायी खिड़की में झांकता ही रहता है। क्योंकि वही तो इसका रस है। जब तक इसे संसार की समझ नहीं होती, तब तक मन का अपना जो स्वरूप है, वहां लौटना असम्भव है।
यह जो विक्षोभ है, उसका जनक यह संसार, और उसकी ओर ले जाने वाली आकांक्षाएं हैं। यही हम जान पाए है। अभिलाषा ही कारण है जो कार्य में परिणत होती हैं। ज्यों-ज्यों हम निम्न प्रकृति से मुक्त होने लगते हैं, त्यों-त्यों हम भगवतकृपा के हकदार बनते चले जाते हैं।साथ ही, जितनी भगवत्कृपा हम पर होगी उतनी ही निम्न प्रकृति की शुद्ध होेती रहेगी यह साधारण नियम है। इसीलिए बहिर्जगत में छोड़ने और छूटने के प्रति यहां अत्यधिक आग्रह नहीं है। जो कुछ छूटना है स्वतः ही होता जायेगा। जब हम इस यात्रा पर बढ़ेंगे। छोड़ता और ग्रहण करता मन ही है। मन का छोड़ा ही छूटा है और मन का ग्रहण किया चिपटाता है।
चित्त शुद्धि और भगवत् कृपा का पारस्परिक संबंध है। जितनी अधिक स्थिरता हम प्राप्त करते जाते हैं, उतनी ही अधिक भगवत कृपा हम प्राप्त करते हैं। यही साधना यात्रा है। इच्छा रूप ही संसार है और इच्छा निवृत्ति ही मोक्ष है। यही विक्षोभ का अन्त है। और प्राप्ति है- उस विराट शांति की, जिसके लिए हम इस अन्तर्यात्रा पर गतिशील हैं।
यह स्थिति जीवन और जगत से पलायन नही है। यहां जिसमें, जिस संसार की उपस्थिति है, उसका अभाव तो है, परन्तु अब जगत के प्रति जो अब तक संबंध था, वह भी तो परिवर्तित है।
यही वह स्थिति है, जहां साधक जीवन और जगत के प्रति सही संबंध स्थापित कर पाता है। आसक्ति के स्थान पर अनासक्ति, भोगेच्छा के स्थान पर भगवत इच्छा ! तभी तो कर्म का स्वरूप ही बदल जाता है।
यहां जगत के प्रति त्याग और सेवा ही शेष रह जाती है। ये शब्द मात्र शाब्दिक नहीं रह जाते हैं, वरन आचरण में स्वतः ही आ जाते हैं। यही तो भगवत्कर्म है, जो साधक को साधन यात्रा प्रदान करता है। यह स्थिति पलायन नही है। वरन जीवन की सही स्वीकृति है। जीवन कुशलता से जीने के लिए है और योग उसकी श्रेष्ठ कला है। अभिलाषाओं से सन्यास ही तो विक्षोभ का अन्त हे। यही तो मोक्ष है।
इसलिए हमें इसी जीवन में भगवत कृपा प्राप्त करनी है। और साथ ही इस शरीर में भगवत्कर्म से युक्त करना है।
अशांत मनुष्य के लिए उसका मन ही भार है। वह अनुकूलता की तलाश में इधर से उधर भटकता रहता है। उसका अशांत मन, कामनाओं की पूर्ति के लिए भटकता फिरता है।
प्रतिकूलताएं जहां उसे दुख देती हैं, वहीं अनुकूलताएं उसे गुलाम बनाती हैं। यही कारण है कि वह स्थिर नहीं रह पाता है। इसीलिए स्थूल देह की अपेक्षा मन जो है, वही महत्वपूर्ण है। इस मन का नियमन ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए अवलोकन के अलावा दूसरा कोई प्रयत्न नही है। इसी से ही विक्षोभ का अन्त संभव है। सच तो यह है कि अभिलाषाओं का ही नाम चित्त है। जब यह सांसारिक पदार्थों की इच्छा से रहित हो जाता है, तभी संकल्प त्याग संभव है। जो कुछ भी अतीत है, वहां मात्र स्मृतियां हैं। जन्म-जन्म के संस्कार हैं।
स्थिरता के लिए वांछनीय है-इन स्मृतियों का असहयोग। साधक को स्मृति मात्र से ही असहयोग सफलता देगा। मन का बार बार स्मृतियों में जाना तनाव ही लाता है। सच तो यह है कि स्मृति ही पाप है।
जो कुछ भी अतीत का संग्रहित है वह अशुभ ही अधिक है। सुखद है। यह वर्तमान पर अपनी काली छाया छोड़ता है। सच तो यह है कि हम स्मृतियों को ही ध्यान मान बैठे है। जमा की गई पूंजी ! जब तक यह ताला बन्द है मन का शांत भाव में आना असम्भव है।हर साधक प्रयोगशाला है। उसे चाहिए अनन्त धैर्य, अनन्त प्रतीक्षा, साधन के प्रति गहरा विश्वास ! जब तक विश्वास नहीं होगा- सफलता नहीं मिलेगी।
स्पष्ट है, ध्यान सजगतापूर्वक किया गया आंतरिक अवलोकन है। निरन्तर सजगतापूर्वक की गई मन की यह निगरानी स्थिरता अवश्य देगी। यहां कोई दबाव नहीं है। वरन् जो कुछ है वह सहज है। यहां किसी प्रकार का बाहृा-आरोपण नही है। नहीं, नया कुछ सीखना है। वरन जो जरूरी है, उसको ही छोड़ना है- इसी से ‘जो’ है उस स्वरुप का ज्ञान हो जाता है।
जरूरी नहीं है- आज जो मौन मिला है, वह दीर्घ हो। हो सकता है- क्षणिक हो।
आज होश कम रहा, नींद अधिक रही, पश्चाताप नहीं करना है। पुनः यात्रा पर गतिशील रहना है। टुकड़े टुकड़े जोड़ते हुए कभी तो सम्पूर्ण पाया जा सकता है। इतना धैर्य अवश्य रखना है।
प्रायः ध्यान को हमने अपने जीवन से अलग कोई निश्चित अभ्यास मान लिया है। जो आरोपित है। जिसके लिए परिवार, तथा समाज से महत्ता प्राप्त होना आवश्यक है। यह विचारणा अनुचित है।
ध्यान तो ‘जो’ जरूरी नही है उसका छूटना है। असाधन का त्याग ही- साधन है। ध्यान, सहज और साधक की आवश्यकताओं के अनुरूप है, उसके लिए प्रिय और मंगलकारी है।
जहां भी रहें, जब भी रहें, यह सतर्कता बनी रहें। हम वहीं रहें, उसी क्षण में रहें।
स्मृतियों तथा आकांक्षाओं से जाना ही होश खोना है। नींद में जाना है, वर्तमान से पलायन है। सजगता बनी रहे। जागरूकता रहे। हर पल, हर क्षण हमारी, हमारे कर्म में मौजूदगी रहे। इसीलिए साधन, साधक के लिए जिन्दगी से पलायन नहीं है। वरन जिंदगी को सुचारू रूप से जीने की कला है।
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