Wednesday, July 10, 2013

गुरु तत्व


गुरु तत्व


साधना में गुरु का महत्व क्या है? इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। परमहंस के जीवन की अंतिम कहानी है, वे गले के कैंसर से पीड़ित थे, उस रात बहुत कष्ट था, पानी भी निगलना कठिन हो गया था, नरेन्द्र ने जो बाद में विवेकानन्द बने, उन से कहा आप मां से अर्चना कर लें, कम से कम इतना तो हो जाए, वे चुप हो गए, ध्यानस्थ हो गए, आंखें खोल कर बोले, अब मुझ से मत कहना .............. तेरी बात मान कर मैं ने मां से कहा था, वह बोली, तेरे मुंह से कब तक. बोलेगा, अरे पचासों हैं, उन के मुंह में तू ही तो बोलता है, उन के मुंह से तू ही खाता है।

स्वामी जी ने कहा था, लोग कहते हैं, विवेकानन्द को परमहंस ने शक्तिपात किया था, पर कहां और कब? कहना कठिन है। पर सच यही है, जब वे अमेरिका में थे तो पहले दिन शिकागो की धर्म सभा में बोलने का अवसर आया था, वे नहीं बोले, चुप रह गए, अपने भीतर आश्वस्त नहीं हो पाए, फिर दुबारा बोले, तो बोलते ही गए, अन्त समय तक बोलते रहे। 1994 में वे अमरीका गए थे, 2002 में दुनिया से चले गए। इस आठ साल में बहुत काम किया। शक्ति.पात तो उसी दिन हुआ था, जब वे पूरी तरह गुरु को समर्पित हो गए थे।

वही आखिरी और पहला दिन होता है। पुनर्जन्म हो जाता है। पुराना पूरा धुल जाता है, भीतर के सारे आश्रय जो बाहर थे खो जाते हैं, उस निराश्रय की आखिरी घड़ी में ही वह घटना घटती है, जब गुरु स्वयं वहां आ जाता है। पूरण परमानन्द, वह पूरा है। अधूरा नहीं है। वह पूरा ही बना कर जाता है।

स्वामी जी कहते थे, मैं शिष्य नहीं बनाता, पर लोग आगे का वाक्य नही सुन पाते थे कि,” मैं गुरु बनाता हूं।“

जो मैं हूं, वही तो तुम हो, मैं जाग गया हूं, तुम भी जाग सकते हो। जो जागा हुआ है, जागृत है, वही गुरु है। जहां भी ये मिल जाए, वहां रुक जाना, वहां सवाल मत करना, बस चुप हो जाना।

जहां मौन है, भीतर जगह बन गई है, वहीं तो अतिथि आ सकते हैं। हम तो बाहर-भीतर सब जगह सामानों से भरे हुए हैं, जगह ही नहीं है। चाहते हैं, सब यहां आ जाएं, कैसे आएंगे? जगह तो दो।

गुरु के लिए भी जगह तो देनी होगी।

यही तो किया, गुरु पूर्णिमा आई, वहां चले गए। दर्शन किया, बातें की,, भेंट चढ़ाई, आ गए। ऐसे ही तो मिलने को जाते हैं, रास्ते पर चले जाते हैं। एक रूटीन है, बस निभ गया। अब अगले साल आएंगे, बातेंचीतें होंगी, मन लगेगा। गुरु भी जानते हैं, वे कुछ नहीं कहते।

जो वहीं है, पर सोए हुए हैं, वे चाहते हैं कि उन की लोरियों से और भी सो जाएं।

हजारों गुरु हैं, जो लोरी ही सुना रहे हैं। वे स्वयं सोए हुए हैं, उन के पास जाओगे, और सो जाओगे।

यह माया की रात बहुत गहरी है, ‘या निशा सर्व भूतानां’ जाग्रति संयमी. जो वास्तविक गुरु है, वही जागा हुआ है। जो जागा हुआ है, न वहां विचार हे, न विकार है, वहां तो पूर्ण प्रकाश है। एक दर्पण है, जहां तुम्हें अपना सही चेहरा दिख जाता है। उसे तुम्हारे चेहरे से कुछ लेना-देना नहीं है। वहां एक दिया है जो तुम्हारी कांपती बाती को जला देता है। वहां वह शान्त आग है, जहां तुम्हारे विकार जलने लगते हैं।

जहां तुम्हें ऐसे गुरु मिलें, वहां ठहर जाना।

जानते हो, तुम्हारे पास एक वृत्त है, जो तुम हो, उस का एक केन्द्र है,, जहां तुम्हारे संस्कार है, वहां से निरन्तर विकारों के व्यूह पैदा होते रहते हैं। जो तुम हो, जो तुम्हारी पहचान है।

रमण महर्षि कहते थे-  साधना है, अपने आप को जानो, यह जानना क्या है? अपने विचारों को जानो, देखो, यही तो तुम हो विचारों का बदलना ही तुम्हारा परिवर्तन है।

इसी लिए गुरु के पास जाओ, तो वहां धन की, वस्तुओं की भेंट मत ले जाओ, जिस से पास अनन्त वैभव है, वहां इस की क्या कीमत?

गुरु को भेंट करनी है, तो तुम्हारा अपना मन है।

तुम्हारा जो वृत्त है, जो सर्किल तुम्हारा अपना है, उस में जगह अपने गुरु को दो। साल में एक दिन के भण्डारे के लिए नहीं, रोजमर्रा की जिन्दगी में, उन्हें भी एक हिस्सा दो, अपना समय दो।

सच यह है कि आज की दुनिया में, हम अपनी पहचान खो देते हैं। हमारे पास बहुत सारी बातों के लिए समय है। टी.वी. सीरियल के लिए समय है, घण्टों देखेंगे, कोइ टोक दे तो वह दुश्मन है। पर अपने पति, पत्नी, मां-बाप, बच्चों के लिए समय नहीं है। यह शिक्षा व कर्म जो आवश्यक तो है, पर वहीं जहां यह जीवन ही बन जाता है। मकड़ी की तरह जाला बनाते हैं, और उसी में डूब जाते हैं।

अपने इस जीवन वृत्त को रोज देखें, जो कचरा है उसे उठाएं, कम्पयूटर की तरह देखें, अपडेट करते रहें तथा जो कचरा इकट्ठा हो गया है, उसे हटाते जाएं। इसी को सफाई कहते हैं।

स्वामी जी कहते थे, यह सफाई साल में एक दिन यहां आने से नहीं हो जाती। गुरु कोई सफाई कर्मचारी नहीं है, लोग यहां आते हैं, गले तक विकारों से भरे आते हैं, और अपनी सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहां आते हैं, क्या साधना इसी लिए की जाती है?

संसार में सफलता, प्रयत्न से मिलती है। शास्त्र कहता है, निरन्तर कर्मरत रहो, भाग्यवादी मत बनो।

परन्तु जो शान्त है, साधक है, उस का चित्त निर्मल होता है, वहां संकल्प चला जाता है, उस का विवेक उसे सही रास्ता दिखाता है, यह क्यों नहीं समझते? पर  हम निरन्तर विकारों को और अधिक, और अधिक जमा करते चले जाते हैं। हमेशा याद रखो, विचार ही विकार है। विकारों को देख कर मत डरो, घबराओ मत, विचारों को कम करते जाओ। यही ध्यान रहे, विचार ही पाप है। तब वही विचार उठेगा, जिसे पूरा होना है, तभी तुम्हें पता लगता है कि कुछ शक्ति तुम्हारे पास है।

कुछ दिन पहले एक बाबा. आए थे, वे तीसरे नेत्र की चर्चा कर रहे थे,  जब धंधा नहीं चला तो बाबा बन गए। उन्हों ने बाबा बनकर  करोड़ों रुपए कमाए, हम लोग तो मानो तैयार बैठे हैं।

अरे! जब गाय खरीदने जाते हैं, तो उस की पूंछ देखते हैं। बैल के दांत गिनते हैं, पर गुरु की पहचान का हमारे पास कोई आधार ही नहीं है। जैसे हम लुटने को ही तैयार बैठे हैं।

‘मो को कहां ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में’

जो गुरु है, वहां कोई अहंकार नहीं होगा, वहां .किसी आडंबर को जगह ही नहीं है। न ही वहां अहंकार होगा, न ही वहां हीन भावना होगी।

वहां तो ईश्वरत्व जागा हुआ है। हिमालय में भगवान शिव का एक स्थान है, जो जागेश्वर कहलाता है। वहां वे जागे हुए हैं। कहानी है। जो हमारा शिव तत्व है, वह सदा जगा रहता हे।

गुरु वही है, जो साधक का तीसरा नेत्र खोल देते हैं। विवेकी का पथ )त का पथ है। जो सही है, वही पथ है। अब साधक का मन भटकता नहीं है, उस के भीतर से उसे निरन्तर टोकने वाला पैदा हो गया है, जो उसे सचेत करता रहता है।

जब तक यह तीसरा नेत्र नहीं खुलेगा, हमें उस परमात्मा के दर्शन नहीं होंगे।

गीता का प्रारम्भ होता है, अर्जुन मानता है कि वह कार्यष्य दोष से ग्रसित है, समूढ चेता है, मोह ग्रस्त है, कार्पण्य दोष, भयग्रस्त, मानव का स्वभाव है। जहां मन भीतर ही भीतर कम्पायमान है, वह अनिर्णय की स्थिति में आ जाता है। अर्जुन भगवान कृष्ण को गुरु के रूप में स्वीकार करता है, यह शिष्य की गुरु के पास पहली उपस्थिति है। इस के पूर्व अर्जुन कृष्ण का सखा था, उस ने कहा था, सेना के मध्य में मेरा रथ खड़ा कर दो।

यह दूसरा वाक्य महत्वपूर्ण है।

गुरु भी तो हमारी ही तरह तो होते हैं। जितने हम सामान्य हैं, वे तो हम से भी अधिक सहज और सामान्य हैं।

तब उन की पहचान कैसे हो?

बस उस का सामीप्य, मानो चुम्बक ने लोहे को अपने पास खींच लिया हो। वहां तो मात्र आनन्द रहता है। जिस का बाहर में पहचान प्रेम है। वहां हृदय खिले हुए गुलाब की तरह मुखरित है। तब यह खिंचाव साधक को उन के समीप ले आता है।

तब वे अर्जुन की तरह पहली बार कहते हैं-

‘‘शिष्यसतेऽहं शाधि मां त्वा प्रयत्नम्।।’’ 2/7

मैं आप से पूछता हूं, जो कुछ निश्चय लिया हुआ, कल्याण कारी साधन हो वह मेरे लिए कहिए, क्यों कि मैं आप का शिष्य हूं, आप की शरणागति में हूं, मुझे शिक्षा दीजिए।

‘प्रयत्नम्, अर्जुन, गुरु की शरणागति में है। तब गुरु-शिष्य के भीतर उस के वृत्त में जगह ले लेता है।’

मन से ही मन की युति सम्भव है। शरीर और मन का संयोग तो है, पर यह टूटा हुआ है। जहां शरीर है, वहां प्राण तो रहते हैं, पर मन नहीं रहता। मन और प्राण की युति ही तो योग है। और शिष्य और गुरु का यहां मेल मन के धरातल पर रहता है। वही परम योग है। वही भक्ति है, वही रस है, वही ज्ञान है।

तभी कृष्ण पूछते हैं, कि अर्जुन तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ है या नहीं?

तब अर्जुन कहता है- ‘नष्टो मोहः स्मृति लब्धा’, आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है, मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, मैं संशय रहित हुआ हूं।

यहां गीता में सारा परिदृश्य स्पष्ट हो गया है। गुरु वही है, जो ब्रह्मनिष्ठ भी हो, तथा श्रोत्रिय भी, जो सामान्य तो है, परन्तु अत्यन्त विशिष्ट भी।

तब भगवान अर्जुन को उस की प्रार्थना पर -

‘दिव्यं, ददामि, ते चक्षुः पश्य मे योगम ऐश्वरम्।।’ 11/8

मैं तेरे को दिव्य अलौकिक चक्षु देता हूं, इस से तू मेरे प्रकाश को देख।

कुछ नए बाबा भी आए, वे तीसरी आखिरी बात कह गए। वे शिष्यों की तीसरी ऑंख खोलने की दुकान ही खोल बैठे। जो वास्तविक गुरु है, वे कहते नहीं, पर साधक की तीसरी आंख खोल जाते हैं। जो विवेक है। गुरु का लक्ष्य रहता है, वह शिष्य के विवेक को जागृत करे। जो विवेकी है, वही गुरु होता है।

जो वास्तविक गुरु होते हैं, वे शिष्य नहीं बनाते। वे तो गुरु बनाते हैं। वे शिष्य का विवेक ही जागृत कर देते हैं। यही शिव नेत्र है। यह कब खुलता है, कहना कठिन है?

पूज्य स्वामी जी ने ‘अनन्त यात्रा’ में जहां चूड़ाला कुंभ का भेष रख कर गुरु रूप में नीलकण्ठ को उपदेश दिया है। वहां उस की वर्णना है। गुरु की कृपा से ही यह खुलता है। आप कितने ग्रन्थ पढ़ लो, लिख लो, साधना अन्धी ही रहेगी। प्रकाशतो तभी मिलता है, जहां सांप-सीढ़ी के इस खेल में गुरु की सीढ़ी आप को उपलब्ध हो जाती है।

स्वामी जी कहते थे, यह मार्ग बहुत सीधा है, पर कठिन तो है। मैं यही कहता हूं, मेरे पास आ कर पूछो, मुझे देखो, वे हमें हमारी गलतियों पर बहुत डांटते थे, पर हम समझ ही नहीं पाते थे, वे कहा करते थे, छोटी सी भी भूल बहुत पीछे ले जाती है। निरन्तर सजग रहो। जागे रहो, यही ध्यान है। जो जितना वर्तमान में रहेगा, उतने ही गहरे ध्यान में रहेगा। ध्यान तो आचरण रहे, यह कोई जीवन से अलग कोई विशिष्ट विधि नहीं है। हर जगह वे सजग थे। एक सी चाल में, छोटे-छोटे कदमों में उन्हें वर्षों चलते देखा है। निगाह पांच फीट से दूर भी नहीं जाती थी।

स्वामी के साथ रह कर सीखा है, जहां पूरा विश्वास हो, वहीं जाओ, जब जाओ, पूरी तरह जाओ, अपने आप को आधा-अधूरा रख कर मत जाना, वे शान्त है, चुप रहो, जब वे कहें, तब बोलो, जो वो कहते हैं, सुनो, उन्हें तुम्हारी भेंट की कोई जरूरत नहीं है, दे सको तो मन दे आओ, जाना बहुत सालों के बाद जाना।

गुरु के पास तो कैसे जाओ, यही तो भागवत में रास पंचाघ्यायी में समझाया है।

कृष्ण गोपियों के वस्त्र उठा कर ले गए, वस्त्र जो आवरण हमारी चेतना पर है, हम जिन अवधारणाओं को ले कर जी रहे हैं, उसी बोझ को सब जगह ले जाते हैं।

भीतर रत्ती भर भी जगह नहीं होती है। बस घाट के पत्थर की तरह गंगाजल को छू लेते हैं।

गुरु तो वही है, जो शिष्य में ही समा जाते हैं। बस एक बार ”वहॉं रहना“. हो जाए, हम अपने आप को गिरवी रख दें, बस प्रेम के लिए, वे तो .अनंत प्रेमी हैं, खाली पात्र होगा तो भर जाएगा। पर हम ही अगर भरा पात्र ले कर जाएं, गन्दा पात्र ले कर जाएं, तो वहां तो अमृत भी है तो बह जाएगा। या विष बन जाएगा। ‘स्वाति’ नक्षत्र तो एक ही है, पर उस की बूंद जो गिरती है, उस का फल अलग हो जाता है। गुरु की सेवा, संगत की सेवा है, प्राणी. मात्र की सेवा है, और उन की भेंट अपना मन है, मन की निर्मलता है, जितना शु( चित्त होगा, उतनी ही गुरु- अवतरण की जगह बनती चली जाएगी।

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Wednesday, January 30, 2013












            पूज्य स्वामीजी की साधना पर यह आलेख दिया जा रहा हैं
ब्रह्मनिष्ठ   ब्रह्मलीन परमसंत  स्वामी रामेश्वराश्रम जी महाराज                               विरचित



    संदेश- सिद्धान्त
    और
    साधना   

   
   

    1- जीवन का उद्देश्य                               
    2- दर्शन                                   
    3- साधन तत्व                           
    4ऋ वर्तमान में रहना                       
    5- हमारा व्यवहार                       
    6- जीवन जीने की कला               
    7- अपने बारे में                       
    8 -योग साधना और अध्यात्म               
    8- विधि-  एकाग्रता, सफाई,  अन्तर्मुखता   






वर्तमान में रहना












वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, यह हमें समझना होगा
जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिब(ता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी  दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
    छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाह्य में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रुक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
    अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
    हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद  समस्या खड़ी करते हैं।तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
    क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
    यही त्याग है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
    बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।श में रहे।
    प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही है। ये नाभि में उठती है। नाभि में विकारों के बीज है। वे बीज सूक्ष्म है। वहां मात्र स्पंदन है। वो धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
    जैसे कुछ लोग सो रहे है, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में है, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।
    लहरें अनवरत उठ रही है धीरे धीरे यह अनुभव हो जाता है कि पकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
    चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है उसके सबसे समीप अन्र्तमन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहा जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नही है।यहा तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, जानने का माध्यम नही है। अभ्यास यही करना है। नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, वहीं वासनाएं जन्म लेती है। उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
    इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते है, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते है। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते है। यहां आकर भाव दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती है, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती है, उन्हें पोषण मिल जाता है, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती है, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती। व्यवहार अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
   
   
    इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरूकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग है। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बु( जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
    उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। जससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां  किसी प्रकार का दमन नहीं है। अभ्यास का  लक्ष्य है, मात्र साक्षी रहना। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।   
रास्ता यही है

    स्मृति अनवरत चिन्तन से बनती है कोई व्यक्ति आया, बातचीत हुई। भूल गए उसको तो कोई बात नहीं। परन्तु यदि उसकी बार बार याद आती रहे, वह धीरे धीरे गहरी हो जाती है। वह संस्कार बन जाती है।
कांच के ऊपर तो जो वस्तु आई उसका प्रभाव नहीं रहता, परन्तु मन तो कांच नहीं है, वहां चित्र बनता है अंकित हो जाता है ?वह भी कब। उसका बार बार स्मरण रहे। किसी ने कोई बात कहंी और ध्यान नहीं दिया तो बात बाहर ही रह गई। वह जब याद दिलावे तो भी हल्की ही याद आती है। और कोई बात कही, ध्यान नहीं दिया तो वह भीतर चली गई।गिलास में पानी है, रंग डाल दो। कुछ हवा में उड़ जायेगा, कुछ सतह पर फैल जायेगा, कुछ नीचे जाकर बैठ जायेगा। इसी प्रकार हमारे ऊपर घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, वह मन रूपी कांच पर इसी प्रकार असर डालती है।
    कोई तो आई और ऊपर से निकल गई। और कोई वहीं फैल गई। कोई नीचे जाकर फैल गइ्र्र। वही संस्कार बन जाती है। जो ऊपर उड़ गई, उसका पता ही नहीं। जो ऊपर सतह पर फैल गई, वह कुछ दिन ठहरी और चली गई। जो नीचे जाकर बैठ गई, वह संस्कार बन गई। वहीं से वासनाएं उत्पन्न होती है।
इसालिए
   
प्रारम्भिक अवस्था में वर्तमान में रहने के लिए मन पर उठने वाली वृत्यिों का अवलोकन आवश्यक है,
यह तो शुरू में कुछ दिन लगातार अवलोकन करने की जरूरत है। इससे आदत पड़ जाती है, विचार न उठने की। अवलोकन तो विचार उठने की स्थिति है। इससे क्या होता है, विचार धीरे धीरे उठना कम हो जाता है। उसके बाद की स्थिति जो है, वह हमेशा रहने की है। हमेशा अवलोकन नहीं होता। दिन में काम करते समय अवलोकन करते रहोगे तो काम करने में बाधा पड़ेगी।
    शुरू की अवस्था और बाद की अवस्था में अन्तर है। बच्चों की पढ़ाई शुरू करते समय पहले स्लेट पेन्सिल लेकर बैठाया जाता है।
    यही प्रारम्भिक स्थिति है।
    बाद में वह किताब देखते ही पढ़ने लग जाता है। यह बाद की स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए अवलोकन शुरू की स्थिति है।
    अवलोकन रहते रहते बाद में यह स्थिति आ जाती है कि विचार उठना बन्द हो जाता है।
    इस स्थिति में रहना है। यह स्थिति हमेशा रहेगी। अवलोकन हमेशा नहीं रहेगा।
    वैसे क्रिया के लिए श्रेष्ठ समय रात का है।
    साईकिल चलाते समय जब सीखा जाता है, तब ध्यान हैण्डिल पर रहता है, ध्यान वहीं टिका रहता है। बाद में, सीखने के बाद इतनी सावधानी की जरूरत नहीं रहती।
    बाद में यह आदत में आ जाता है। फिर कुछ करना नहीं पड़ता, रहना पड़ता है।यदि बात ढंग से समझ में आ गयी और अमल में आने लग गयी तो जल्दी ही सब हो जाता है। चाहिए यही, अभ्यास बना रहे।
    हम चाहते भी हैं, करते भी हैं, पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। और बातों में रस आता है। जो काम दस मिनट में होता है, यहां घंटो लगा देते हैं। व्यर्थ का कार्य और फालतू बातें करते है। फालतू कामों में अपने आपको लगाये रखते हैं, दिमाग में जितना फालतू बातों का जमघट होगा, स्थिरता उतनी ही दूर रहेगी। दिमाग पर  फालतू चीजों का जो बोझा डाला है, वह बाधा डालेगा ही....।
जो चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा।  इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक संसार भी है। काम भी होगा, बदस्तूर होगा। नहीं कैसे रहेगा संसार। जो कहते हैं- संसार असार है, उनका कहना है, प्रतिक्षण यह भूत में जा रहा है, इसीलिए आप आज कितना भी करो, कल उसका क्या महत्व हो, कुछ पता नहीं। हजारो सालों की बात आज कितनी सही है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता, वह तो बदलती ही जायेगी।
    यहां जो कर्म होगा, इसमें किसी तरह के संस्कार नहीं बनेंगे ?
क्योंकि हर चीज आयेगी और कांच के सामने से निकल जायेगी। प्रवेश द्वार अन्दर होगा ही नहीं। स्मृति तक बन जाती है, जब वह अनदर पहुंच जाती है।   इधर से आये, उधर से गये। हमने देखा ही नहीं। अन्दर पहुंचेगा ही नहीं, बोलते समय देखा है, घड़ी से घंटे बज उठते है। घंटे बज रहे है। कानों ने भी सुना था, पर बातें करते समय कोई पूछे कब बजे, पता ही नहीं रहता। वह वहीं के वहीं रह गया।
वर्तमान में रहने का मतलब है जो देखें, सुनें, वह वहीं के वहीं से वापिस लौअ जाये। अन्दर नहीं पहुंचे।
अन्दर पहुंचते ही वे संस्कार बन जावेंगे। जो बातें सुनी, वहीं छोड़ जाओं।इसके बाद जब यह स्थिति निरन्तर बनी हुई हो, तब शरीर वही काम करता है, जो शरीर के द्वारा प्रकृति को कराना होता है। उसमें वह सुन भी लेता है। कर भी लेता है। तो उसको आगे का संस्कार नहीं बनता। अपने आप ही सब कार्य होते रहते है। प्रकृति आगे सब कार्य करवाती है।इससे शांति मिलती है ?पहले का कितना भी हो। नया नहीं बनना चाहिए। कितनी भी बड़ी पूंजी हो, अगर नया नहीं बनता है तो खतम होना चाहिए। स्वाभाविक बात है। सबसे जो मोटी बात है, इतने चक्कर में पड़ने के बजाय वर्तमान में रहो। अपना सब काम करते जाओं, जरा भी आगे पीछे मत घूमो।

शुरू में जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए  एकाग्रता का  अभ्यास करना चाहिए। अवलोकन करना उसके बाद का अभ्यास है। इस स्थिति में लाने के लिए यहां शुरू की क्रिया है, इससे जो स्थिति बनेगी, वह वर्तमान में रहने की अवस्था होती है। और अगर यह समझ गए हो तो यह सब शुरू से करने की जरूरत नहीं हैं। इसीलिए प्रारम्भ में कह गई परम्परागत साधनों का अपना महत्व है।बगर आगे का समझे जो कर रहे हो उसे छोड़ना उचित नही है। उसके साथ ही अवलोन का अभ्यास शुरु कर देना चाहिए।अवलाकन का अभ्यास बढ़ने के सयासथ नाद श्रवण शुरु हो जाता है। तब परम्परागत साधन अपने आप छूटने लग जाता है।
    यह बात सही है कि विचार तो अवलोकन करते ही ढेर से चले आते है। इतनी बातें, इतना कचरा, साधक घबड़ा जाता है।निरन्तर ध्यान रहने से वह क्रिया शिथिल होती जाती है। इस स्थिति में ढेर जो आता है, वह आना बन्द हो जायेगा। निरन्तर ध्यान रहेगा। शिथिल होते होते नाद सुनाई पड़ता है। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। वह जिन्हें यह समझने में नहीं आता है, उन्हें पहले यह कहा जाता है। नाद सुनते सुनते अपना कर्म चलता रहता है, यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। तब चिन्तन इसका होता ही नहीं है।

जहां करने का ध्यान आया। वहीं हट गए, फिर संसार आया। फिर मन का सहारा लो। फिर मन से दूसरी वस्तु का सहारा लो।सि(ान्त तो बहुत छोटा है ?
उलझा रखा है लोगों ने। जांच कर देखते हैं, शास्त्र में यह लिखा है या नहीं। इसमें न तो वर मांगना है, न सहारा लेना है, न आशीर्वाद है, न गुरू है, न कोई अलौकिक खेल है, यहां बस शांति है। यह भी नहीं है, यह छोड़ो, यह करो, जो है जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, ठीक है।


हमारा व्यवहार

आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
    संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
    हमारी चाय पीने की आदत है।
    चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
    इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
    वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
    इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
    इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
    मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
    इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के    आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
   
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को  इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
        मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी  है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
    बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
    प्रकृति का भी यही नियम है।
    प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
    प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
    जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
    और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते  रहते है।
    और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
    याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
    उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
    पहला कत्र्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
 आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
    इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
    साधना का सार ,यही है,    अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
    साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
    और उसी के साथ बताया  है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
    परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
    इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
    तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
    कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
    यह बात जरा कठिन है।
    काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
    वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
    बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
    उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चैबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
    तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
    यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
    मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
    इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।



जीवन जीने की कला

सांसारिक जीवन और धन की उपादेयता रहेगी।
 व्यवहार के लिए धन की जरूरत है। संग्रह भी करो। सब काम करते रहो। बस चिंतन समाप्त करो।

प्रारम्भिक अवस्था में वाणी पर निगाह आवश्यक है। इससे दूसरों की आलोचना  रुक जाती है। वाणी का संयम रखने में जिहृा का संयम भी है। कम बोलना और स्वाद पर मन का नहीं जाना- यही अभ्यास है। सब से अधिक फिसलने वाली चीज जिहृा है। बोलते ही मन अधिकांश आलोचना मंे चला जाता है। और मन वर्तमान को हर जाता है। यहां गड़बड़ होने से मन हर जाता है।
ब्रहृाचर्य  का आत्म साक्षात्कार  से कोई सम्बन्ध नहीं है।
वह जो समझ रहे थे, इसमें ऐसा होगा, वह लिखते रहे। बाद में  जो भी लिखते रहे। लेकिन भूखे मरो, यह भी कोई लाभ है। शरीर  इन्द्रियों पर आधारित है। सब इन्द्रियां सही काम करेगी, तभी शरीर चलेगा। ब्रहृाचर्य का पालन करो, खूब माल खाओ। रस तो बनेगा। फिर क्या होगा। नियम यही है। दुराचारी मत बनो। व्यभिचारी मत बनो। उचित है कि भोजन की मात्रा पर निगाह रहे। रसना पर स्वतः ही निगाह हो जावेगी।
शास्त्र कहता है ,उचित आहार।
गृहस्थ की ऊपर ही इन सन्यासियों का जीवन चलता है।वास्तविक साधक गृहस्थ ही है।
छोड़ना और छूटना:-
    मैने तो कभी नहीं कहा- यह छोड़ों, यह मत छोड़ो। क्योंकि मैं मानता नहीं हूं कि इससे व्यवधान पड़ेगा। हां, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता गया तो इसकी स्मृति ही नहीं होगी। वह स्वयं तुम्हारा छूट जावेगा। यही अच्छा है।
वर्तमान में रहने का अभ्यास नहीं करना पड़ता?
जहां क्रिया शुरू करो, वह चक्कर में पड़ जायेगा। प्रकृति को जो चाहिए, वह कराती रहेगी। वह मालिक है। वह नाटक करा रही है। पात्र वही देती रहेगी। वर्तमान मे रहने के लिए बाह्य साधन की जरूरत नहीं है। किसी भी चीज की आसक्ति नहीं रहे।
परम्परागत साधनों की भी प्रारम्भ में जरूरत रहती है।   
यदि हम आज कहें कि कोई जरूरत नहीं है तो जो लोग पीछे रह गये हैं यही मान बैठे हैं, कितने लोग छोड़ बैठेंगे। उससे लाभ नहीं, अहित ही होगा। वे कुण्ठा में ही रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि वह स्वयं आकर अनुभव करे कि जो हमने किया, उसकी जरूत नहीं थी। परन्तु यह सब नाटक इसी तरह चलेगा। ना, करते हुए भी लोेग करते रहेंगे, करके ही हट सकते हैं। कोई बहुत बड़ा मकान बनाना होता है तो , उसके लिए पेड़ा भी  बनाना पड़ता है, मकान बनाने के बाद पेड़ा  हटाना पड़ जाता है। मूर्ति पूजा, भक्ति का स्थान इसी तरह ही है।
विचार, उसकी क्रिया मस्तिष्क में प्रतीत होती है- इस विचार को नाभि में ले जाना  संभव है !इसीलिए तो यह क्रिया है कि विचार धीरे धीरे जैसा कि मन का स्वभाव है, जो कि विचित्र है, जैसे कि अपन किसी चीज को पकड़ने लगते हैं तो वह भाग जाता है। तो इसी तरह से वर्तमान में हरेक व्यक्ति का मस्तिष्क ही काम कर रहा है। वहीं से विचार उठते है। हम सोचते हैं कि दिमाग से सोच रहें है, परन्तु वहीं उसे विचारों को अवलोकन करना प्रारम्भ करते हैं, क्या हो जाता है कि जो विचार करने की जो वहां क्रिया चलती है, वो क्रिया को वो नीचे सरकता जाता है।
 वहां उसे पकड़ने की कितनी कोशिश करो, पकड़ में नहीं आता है, वह धीरे धीरे नीचे सरकता जाता है। जितना विचार रहित मन होता जायेगा उतना ही वह धीरे धीरे नीचे सरकते सरकते अन्त में जाकर नाभि में विलीन हो जायेगा। जब जाकर उस मन की ऊपरी सतह पर जो हमारा वर्तमान मन है, उसका प्रयास समाप्त हो जाता है।
    जो यह लहरें टकराने का सवाल है, वह अन्तर्मन से टकराती है। और यही से फिर वो ऊपर उठत उठते वापिस दिमाग में आ जाती है, और यहां आकर फिर क्रियाएं प्रारम्भ हो जाती है। तो फिर वह किस प्रकार नीचे खिसकता जाता है, इसका भी अनुभव हो जाता है।
करने सइसकी पहचाने होती है, जैसा मेरा अनुभव है, वह मैं कह सकता हूं, पर आपको अभ्यास करना होगा। साधन वही है। कोई अलग साधन नहीं है। रास्ता एक ही है। मेन रोड़ एक ही है। दूसरा रास्ता नही है। मेन रोड को पहुंचने वाले बाई पास से होंगे।
हां, बाह्य मन नीचे आते आते समाप्त हो जाता है, अन्तर्मन जो हमेशा जागृत रहता है, उसकी अनुभूति हो जाती है कि वहां प्रकृति किस प्रकार कार्य करती है। उसका ज्ञान हो जायेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म दर्शन जो यन्त्र होता है, उसको बारीक से बारीक चीज नजर आती है। वहां जाकर सूक्ष्म से सूक्ष्म लहरें किस प्रकार कार्य करती है। इसकी अनुभूति होती है। इसी से भविष्य का आभास हो जाता है।
    जब यह अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है तो वहीं से यह आभास होता है कि यह घटना होने वाली है तो अपने को देखना चाहिए कि प्रयोग करके सचमुच यह घटना होती है या नहीं। यदि होती है तो फिर अपना विश्वास दृढ हो जाता है, फिर और प्रयास करो, इस प्रकार प्रयास करो तो और भविष्य की धटनाएं पता हो जाएगी। इस प्रकार बढ़ते जाओ तो कई बातें आगे की पता हो सकती है।
    फिर यह स्थिति आती है कि आज से आगे साल, दो साल, पांच साल बाद की घटनाओं का आभास होने लग जाता है ? परन्तु फिर उनका प्रचारहुआ, कहने की आदत हो गई तो प्रकृति को मौका मिलेगा, टाँग पकड़कर नीचे फैंकने का। अतः कहना भी हो तो संकेत में, ताकि और कोई नहंी समझे।
हम इस मार्ग पर  चलकर आत्म विश्वास पा सकते हैं।
प्रयास नाम से शून्य हो, खाली पुस्तके पढ़ने तथा चर्चा करने से कुछ भी नहीं होगा। कुछ किया नहीं तो क्या होगा !कई बार कहा है- जबान पर जो नियमन चाहिए वह तो होता नही। दवाई भी खाते जाओ, परहेज भी नहीं करो। दैनिक जीवन में कितनी गड़बड़ करते हैं, पता नही। कभी सोचा है, पहले परहेज करो, तब दवा फायदा करेगी।
जो बातें गलत हाती है, जबान से होती है, जबान का मन का- गहरा संबंध है। जब तक जीभ पर काबू नहीं है, तब तक मन पर काबू पाना कठिन है।
    हम दिनभर जो बातें करते है, उसके बारे में सोचना चाहिए। हम जो वादे करते हैं, वो कितने पूरे करते हैं, सोचा है ?
    इससे संकल्प शक्ति कम होती है। ज्यादा बोलने से शक्ति क्षीण हो जाती है। अनावश्यक बोलना, ज्यादा बोलना, इसमें तारीफ भी दूसरे की करनी होती है, बुराई भी होती है, बुराई ज्यादा होती है, सच्ची कम, झूंठी ज्यादा होती है। इस प्रकार की जो बातें हैं, वे बाधक है। बाधाएं पहले हटानी चाहिए।
    प्रयास यही है, प्रयास करो।
    मैने जो बाते कही हैं, वे पहले जानने का प्रयास करो। जो बातें कही है, उन्हें गहराई से सोचो, तभी आगे जाकर कुछ हो सकेगा।
अपने बारे में

इंजिनियर वायंगनकर सर्वप्रथम मेरे गुरू बने, जिन्होंने मेरे बचपन की स्मृतियों को परिपुष्ट कर सत्पथ का मार्ग दिखाया। बचपन से ही मैंने  अपने मन रूपी अश्व को संयम की वल्गा से कसना प्रारम्भ किया। निरन्तर प्रयासरत हो अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण किया।
    मैं घर के अंदर ही घर से विरक्ति का अभ्यास करने लगा। घर में बारहों मास बार त्यौहार, पर्व उत्सव, शादी विवाह जैसे कार्यक्रम आयोजित होते रहते थे। उससमय मैने प्रायः उस मोह से विलग रहने के लिये अपनी इन्द्रियों को कसना प्रारम्भ किया। मैं कभी भूख नहीं है कहकर खाने का समय टाल देता। कभी भोजन के समय घर से बाहर निकल जाता। कभी व्रत का बहाना बना लेता। ऐसी क्रियाएं अपनाकर मैं नित्य प्रति के स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी रसनेन्द्रिय की साधना करने लगा था। धीमे धीमे आहार की मात्रा भी कम करता गया। कई बार दशहरा दीवाली के अवसर पर तो खुद शुरू से ही   ध्यान रखता कि भोजन कम से कम लेना है। गरिष्ठ या मीठा भोजन तो लेना ही नहीं  है।
    भोजन के साथ कपड़े का शौक भी कम करता गया। मेरा भी विचार दृढ़ हो चुका था कि जब सन्यास लेंगे तो दूसरों पर आश्रित होना पड़ेगा।  जब दूसरों पर आश्रित रहेंगे तो कपड़ा कहां से जुड़ेगा ? कपड़े मांगना पड़ेंगे। या धन संग्रह करना पड़ेंगा। इसलिये मैने अपने वस्त्र घटाना प्रारम्भ कर दिये। एक जोड़ी कपड़ा और वह भी सादा सूती वस्त्र और जिस शक्ति से भगवान को मिलता है उस शक्ति से मन जो इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इकाई है वह अपने भीतर जागृत कर ब्रह्यंड के नियमो को जान लेता है और यही वास्तविक साधना है।
 मेरी साधना आगे बढ़ती रही और एक दिन मेरी यह भावना बढ़ी कि अगर भगवान हैं तो उनके दर्शन होने चाहिए। एक बार मेरी चाल में 2-3 जने साथ रहते थे वे तीनो काम से कहीं चले गये थे। मैं अकेला था तो मैने तय कर लिया था कि या तो मैं रहूंगा या भगवान के दर्शन करूंगा। मैने अंदर से कमरा बंद कर लिया और पानी की सुराही रख ली और गहरे ध्यान मे चला गया। मेरी वह एक समाधि की अवस्था थी। एक दिन गुजर गया, दो दिन गुजर गये तीसरे दिन संभवतः किसी ने कुण्डा खटखटाया और तब मुझे कुछ आभास भी हुआ वह चला गया। तीन दिन मैं भूखा प्यासा इस संकल्प के साथ बैठा रहा और अचानक एक क्षण ऐसा आया कि मैने देखा जिस भगवान शिवजी की पूजा किया करता था वे भगवान दिखाई देते हैं एक भावना होती है एक प्रतिमा सामने खड़ी है और वह अपने होठों से कुछ कह रहे हैं। लेकिन क्या कह रहे हैं मैं समझ नहीं पाया। मैने चाहा दोनों हाथों से चरण स्पशकरूं, मैने दोनो हाथ बढ़ाने चाहे उनके पांव पकड़ने चाहे तभी वह दृश्य समाप्त हो गया और वह प्रतिमा वहां से हट गई और मैने देखा कि कुछ बीड़ियों का ढेर वहां रखा था। तत्पश्चात मुझे ध्यान आया कि मुझसे तो उठा ही नहीं जा रहा। मैने कुण्डा खोला और मैं गिर पड़ा।मुझे लोगों ने बताया कि तुम्हारा कमरा तीन दिन से बंद था। तुम इतने बीमार हो गये थे तो तुमने कहा क्यों नहीं। मैने उनसे कहा कि पानी पिला दो, चाय पिला दो। लेकिन अन्दर से मेरा मन यह जानने का उत्सुक हो गया था कि यह सब क्या है और क्या करना है । रात्रि के समय प्रश्न हुआ । वह दूसरा स्वप्न था उसमें मैने देखा कि  स्त्री की आकृति में कुछ देवियां दिखाई दी और उसने कहा कि जो कुछ तुमने देखा है वह तुम्हारी शक्ति है, तुम्हारे संकल्प से जो तुमने आकृति चाही थी, सोची थी वहीं तुम्हें दिखाई पडी । वह शक्ति तुम्हारी है ।

    साधना का लक्ष्य आत्मविश्वास होता है । अगर साधना सही होती है तो आत्मविश्वास आगे बढता चला जाता है । जो शक्ति परमात्मा की है वहीं मन स्वयं पा लेता है । अनुभव कर सकता है
एक बार इंजिनियर सा0 ने मुझसे पूछा तुमने सन्यास लेने की धारणा बना रखी है यह तो ठीक है। परन्तु इसके लिये क्या कोई प्लेटफार्म भी बनाया है ? क्या उसकी कोई आधारशिला भी है ? मैने कहा कोई आधारशिला नही है। तब उन्होंने समझाते हुए कहा तो तुम इसके बारे में पूर्व से ही तैयारी करो। बिना अभ्यास वृति धारण किये सन्यास ले लेना गलत होगा।
    मैने जिज्ञासा वश पूछा मैं कौनसा आधार तैयार करूं ? उन्होंने उत्तर दिया ”मनुष्य के जीवन में दो महतती आवश्यकताएं 1. भोजन 2. वस्त्र। तुम पहले तो इस धारणा को पुष्ट बनाओ कि मुझे सन्यास लेना ही है। और जब धारणा संकल्प के रूप में परिवर्तित हो जाये तब प्रयत्न प्रारम्भ करो और तभी लक्ष्य प्राप्ति की आशा करो ?
    सर्वप्रथम  तुम अपने भोजन और बाद में कपड़ों पर नियन्त्रण करना सीखे। यदि तुमने जीवन में अगर इन दो महती आवश्यकताओं पर पूर्ण नियन्त्रण कर लिया तो तुममें सन्यासवृत्ति अपनाने की पूर्ण शक्ति आ जाएगी। और तभी तुम्हारा सन्यास भी सफल हो सकेगा।
   
    भोजन के साथ कपड़े का शौक भी कम करता गया। मेरा भी विचार दृढ़ हो चुका था कि जब सन्यास लेंगे तो दूसरों पर आश्रित होना पड़ेगा।  जब दूसरों पर आश्रित रहेंगे तो कपड़ा कहां से जुड़ेगा ? कपड़े मांगना पड़ेंगे। या धन संग्रह करना पड़ेंगा। इसलिये मैने अपने वस्त्र घटाना प्रारम्भ कर दिये। एक जोड़ी कपड़ा और वह भी सादा सूती वस्त्र
और जिस शक्ति से भगवान को मिलता है उस शक्ति से मन जो इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इकाई है वह अपने भीतर जागृत कर ब्रह्यंड के नियमो को जान लेता है और यही वास्तविक साधना है।
    इंजिनियर सा0 ने एक और प्रश्न किया था कि तुम बड़े होकर संसार को क्या दे सकोगे ?
    मैने उत्तर दिया था मैं गुरूकूल की स्थापना करूंगा। भारत के नौनिहालों को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में निष्णात करूंगा। बच्चों को स्वयं पढ़ांऊगा तथा प्रकृति से जो कुछ भी मिलेगा वह सबमें बाटूंगायद्यपि मैं सन्यास संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर उन्हें नहीं दे पाया था। क्योंकि उस समय इस विषय पर मेरी जानकारी न्यून थी। फिर भी मेरी लगन को देखते उन्होंने कहा था कि तुम्हें वास्तव में सचचा सन्यासी बनना है तो कम एवं स्वाद रहित आहार पर ही संतुष्ट रहना होगा। शरीर श्रम, अस्वाद, सवंत्र भय वर्जन, अपरिग्रह, असग्रह आदि गुणों को जीवन में स्थिर करना पड़ेगा। ये सन्यासधर्म के आधार स्तंभ है। मेरे भावी जीवन में मेरा और उनका 10-12 वर्षों तक ही सामीप्य रहा। तथापि उनका मार्गदर्शन मेरे जीवन में एक वांछित क्रान्तिकारी परिवर्तन ला गया। वे वास्तव में एक निष्काम कर्मयोगी थे। गबन के केस की अग्नि परीक्षा में वे निर्दोष साबित हो चुके थे। उन्हें पुनः नौकरी पर ले लिया गया था। तथापि बाद में वे स्वयं इससे स्तीफा देकर अपना स्वतंत्र व्यवसाय करने लगे थे। मैने उनके जीवन दर्शन से जो कुछ सीखा वह निम्नानुसार है -
1.    यह कि नाम और मंत्र जप, मन को एकाग्र करने के लिये किया जाता है।
2.    प्रत्यक्ष नाम और मंत्र में कोई शक्ति नहीं होती।
3.    परन्तु जिनका मन एकाग्र हो गया है उनकी शक्ति ही अक्षरों द्वाराा महान कार्य कर सकती है। यदि मंत्र या जप के अक्षरों के बिना मन को एकाग्र करके बहिमुर्खता से अन्तर्मुखी बनने का मार्ग सुलभ हो जाता है तो वह अत्यधिक लाभकारी हो सकता है।
4.    इससे मानसिक व शारीरिक सहनशक्ति बढ़ती है। इनके द्वारा छोटे मोटे प्रयोग करके देखा जा सकता है। और यही साधना बिना किसी परिश्रम के या स्पष्ट ही कहा जाये तो शरीर की सहायता के बिना की जाये तो मानव मन की मानसिक शक्ति     महान कार्य कर सकती है। सावधानी इस बात की रहे कि जो कुछ भी किया जाये वह मात्र परमार्थ के लिये हो। सेवा के लिये     हो। प्रकृति के कार्यों में सहयोग देने के लिये हो।
5.    ऐसा करने से साधक प्रकृति के निकट पहुंच जाता है। प्रकृति के कार्यों को जानकारी हो जाती है। संसार में मानव के रूप उसकी स्थिति क्या है ? उसका स्थान क्या है ? कत्र्तव्य क्या है ? उसका स्थान क्या है ? इन सब बातों से वह भिन्न होकर इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना अभिनय कुशलता पूर्वक कर     सकता है। और यही मानव जीवन की उपलब्धि है।    
 ये थे कुछ बाह्य जगत से अन्तर्जगत में प्रविष्ट होने के उपाय, जो मुझे गुरू के नाते माननीय इंजीनियर सा0 से प्राप्त हुए। उनका जीवन मेरे लिये खुली पुस्तक के समान था। वे अंतर बाहर से एकीकृत थे। उनके जीवन से मुझे हर प्रकार का दिशाबोध मिला।  वे कहते एक समय में सोचो और एक ही समय में निश्चय कर लो। ज्ीपदा वदबम ंदक कमबपकम वदबमण् इसमें तुम्हारा जो निश्चय होगा ठीक ही होगा। हमेशा सफलता की और बढ़ते चले जाओगे।
    एक दिन उन्होंने ”अम्बर मंच फैक्ट्री“ देखने का प्रोग्राम बनाया। मुझे साथ लेकर चले। स्टेशन पर पहुंचने में करीब पौन घंटा लग गया। ट्रेन स्टार्ट होने का समय हो चुका था। जब टिकिट लेने खिड़की पर गये तो पता चला कि उनकी जेब में बटुआ ही नही है। मुझे लेकर वे ट्रेन पर गयैं जैसे ही हम फाटक तक आये। एक सज्जन त्वरित गति से अपनी कार से उतर कर हमारे पास आये। और हमें घसीटते हुए से प्लेटफार्म पर ले गए। सलून डिब्बा खड़ा था। उन सज्जन के पीछे इंजिनियर सा0 और सबके पीछे मैं। हम सब उस डिब्बे में बैइ गये।  गार्ड़ ने हरी झंडी बताई और गाड़ी चल दी। दादर स्टेशन पर जिस ट्रेन से जाना था वह गाड़ी खड़ी थी। मगर वह सलून उसे पार करता हुआ चला गया। हमें लाने वाले सज्जन रेल्वे के आफिसर सुपरिन्टेन्डेन्ट थे। हम लोग समय से पूर्व ही अंबर मैच फैक्ट्री पहुंच गये थे।
    हमने वहां पहुंचकर फैक्ट्री देखी और वापस लौटे। इस समय तक भी रूपये हमारे पास नही थे। और हमें बम्बई लौट आना था। इसकी चिंता मुझे बड़ी सता रही थी। पर उन्हें न थी। उन्हें पूर्ण विश्वास था। इसी बीच मैने देखा कि कम्पनी की कार ही हमें बम्बई छोड़ने के लिये वहां के प्रबंधक ने अपने आप भेज दी थी। कम्पनी प्रबंधक के विचार से इंजिनियर महो0 को वापसी में ट्रेन की देरी से  असुविधा एवं कष्ट हो सकता था।
    इन सब बातों का सारांश बतलाते हुए उन्होंने मुझसे कहा देखो संकल्प शक्ति बड़ी बलवान होती है। जो काम पैसे से नहीं हो सकता  वह मात्र संकल्प शक्ति से ही पूरा हो जाता है। हम इस शक्ति के द्वारा भौतिक साधनो का भी आसानी से लाभ उठा सकते हैं। उनसे मेरी अन्तिम मुलाकात ह्नदय विदारक स्थिति में हुई। समाचार मिला कि उनके पेट में फोड़ा हुआ है और वे अस्पताल में भर्ती है। जब मैं वहां पहुंचा वे बेड़ पर लेटे थे। पेट का आपरेशन किया जा चुका था। डाॅक्टर कहने लगे आप्रेशन सफल हुआ है। अब उनका स्वास्थ्य ठीक है। छुट्टी भी शीघ्र ही मिल जाएगी। उनकी पत्नी ने उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना में एक कथा का आयोजन कर डाला। जाते समय कह गई कि तुम भी कथा में आना। भोजन भी वहीं करना। शनिवार, उनकी अस्पताल से छुट्टी का दिन तय कर दिया था। जब में जाने लगा तो वे बोले - कहां घर जाना ? अब समय हो चुका है। अब मुझे घर नही जाना है। मैने कहा आप कैसी बातें करते हैं। डाॅक्टर आपको छुट्टी दे चुके है। उन्होंने कहा डाॅक्टर क्या जाने ? जिस दिन उन्हें अस्पताल से घर लाना था। मैं भी उन्हें लिवाने अस्पताल गया। किन्तु मैने देखा उनका परिवार शोक संतप्त हो उनकी लाश ले जाने के लिये खड़ा था। उन्हें भविष्य का इतना ज्ञाान था। वे भविष्य दृष्टा थे। सच्चे साधक थे।
अन्तर्मुखी बनो !!

    जब कभी इंजिनियर सा0 से मिलना होता घंटो, धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों पर चर्चाएं होती रहती। मेरे अनेक प्रश्नों के उत्तर कभी संक्षिप्त और कभी विस्तृत रूप से देकर वे मुझे समझने क प्रयास करते। परन्तु इस विस्तृत संसार की गुत्थी, अपरिक्व मन कभी सुलझा न सका। इसका कारण पूछने पर उन्होंने बतलाया कि तुम बाह्य संसार में जिस वस्तु को खोज कर रहे हो, वह उसमें है ही नहीं, जिसे ढूंढा जाये ? अनुभव किया जाये। और इसिलिये यदि इस संसार की गुत्थी सुलझाना है तो बहिर्मुखी होने के स्थान पर अंतर्मुखी बनो।
    बहिर्मुख और अंतर्मुखी ये दो शब्द मेरे लिये अपरिचित थे। कई दिनों की गहरी मानसिक खोज करने पर धीरे धीरे विदित हुआ कि बाह्य संसार भी निरंतर परिवर्तनशील है हमारा शरीर और मन भी निरंतर परिवर्तनशील और अस्थिर है। वह स्थिर और शाश्वत शक्ति का पता नही लगा सकता। इसे जानने के लिये जब वास्तविक ज्ञान का पता लगाया तब मालूम हुआ कि इन्द्रिय और मन से परे हमें यात्रा करनी होगी।
    परन्तु इन दोनों से परे कैसे जाया जाय ? और जाने वाला कौन है ? यह नहीं समझ पाया था ? इंजिनियर सा0 ने समझाने का प्रयास करते हुए कहा। इन्द्रियां बहिर्मुखी है। बाहर ही बाहर देखती है। अनुभव करती है। सुख दुख भोगती है। परन्तु सुख दुख की अनुभूति इन्द्रियां स्वयं नहीं बल्कि मन करता है। और भोगे हुए विषयों को बीज रूप से संग्रहित कर अपने मन में संस्कारों का अगाध भण्डार बना लेता है। अनुकूल वातावरण मिलने पर संस्कार रूपी बीज बार बार अंकुरित होते है। फलते फूलते हैं। और नये अनुभव प्राप्त कर उन्हें भी बीज रूपी संस्कार बनाते रहते है। ये बीज और संस्कार की क्रिया अनवरत चलती रहती है और मनुष्य दिन रात इनके कारण वास्तविकता के सागर में इतस्ततः भटकता रहता है। इनसे छुटकारा पाने के लिये मन के अंदर समाविष्ट संस्कार तथा वासनाओं का जब तक क्षय नहीं होता मन की दुर्बलता कम नहीं होती।
    मन को बलवान और सशक्त बनने के लिए इन वासनाओं से छुटकारा पाना आवश्यक है। परन्तु संस्कार मन को बैचेन करते रहते हैं। और इन्द्रियां बाह्य विषयों को अंदर तक ले जाकर मन के अंदर की वासनाओं को उछालने का प्रयास करती है। मन की स्थिरता के लिये प्राचीनकाल से ही असंख्य )षि मुनियों ने अनेक प्रकार के प्रयोग किये हैं। नाम जप, मंत्र जप, यौगिक क्रियाएं नवधा भक्ति, प्राणायाम तथा समाधि तक की क्रियाओं में मन का उलझाकर उसे नियंत्रित करने एवं अनुशासन में लाने का प्रयास किया है। परन्तु प्रत्यक्ष में मन की अनुभूति आज तक किसी को नहीं हो पाई है। और न भविष्य में किसी को होने की संभावना है।
    यदि मानव इस मन के दूसरे क्रियाकलापों को समझने में सक्षम हो जाये तो ही वह इसको नियन्त्रित कर सकता है। नियंत्रित मन, महान शक्तिशाली हो सकता है। वह अपनी इच्छा मात्र से बड़े बड़े कार्य निमित्त मात्र में कर सकता है और अंततोगत्वा अपने उद्गम स्थान प्रकृति से भी परे उस परम पिता परमात्मा रूपी महान शक्ति में अपने आप को समाविष्ट कर सकता है।
    परन्तु यह वाचिक विद्वत्ता केवल विचारों तक ही सीमित रहती है तो इससे कुछ भी लाभ होने की संभावना नही है। यदि मन को समझना है तो उसे नियंत्रित करना ही होगा। सर्वप्रथम मन के क्रिया कलापों पर ध्यान रखो। केवल मन के द्वारा ही मन का निरीक्षण करें। मन के द्वारा ही अपने आप को समझने का प्रयास करो। इसके लिये किसी बाह्य साधन की आवश्यकता नही है। यदि मन ने किसी बाह्य साधन का अवलंबन किया तो वह साधन मन से भी अधिक शक्तिशाली बनकर मन को अपना गुलाम बना देगा।
    इसलिये जप, तप, पूजापाठ, यौगिक क्रियायें आदि समस्त साधनों का त्याग करके केवल मन द्वारा ही मन का निरीक्षण करते रहने पर मन में निरन्तर उठने वाली असंख्य विचारधाराएं घटती जाऐगी।
मन का निवास स्थान मस्तिष्क है। यह मस्तिष्क में अवस्थित होकर अहर्निश चिंतन प्रक्रिया करता रहता है। सोचना इसका मुख्य विषय है। उसका इन्द्रियों से संबंध धीमें धीमें टूटना प्रारंभ हो जाता है। परन्तु क्रियाशील मन इस स्थिति को बरदाश्त नहीं करता। वह कहीं न कहीं चिपकने के लिये निरंतर प्रयास करता रहता है।
    ऐसी स्थिति में बाह्य मार्ग अवरु( हो जाने से वह मस्तिष्क से कण्ठ, कण्ठ से ह्नदय से नाभि तक चला जाता है। परन्तु गतिशील होने के कारण यह किसी एक स्थान पर टिक नही पाता। जहां भी जिस स्थिति में रहता है, निरन्तर चक्राकार घूमता रहता है। हर किसी विषय को पकड़कर उसके साथ तेजगतिवान होने लगता है। पर किसी वस्तु की पकड़ से बाहर यदि वह अपने आप में स्थिर रहने के लिये बाध्य हो जाता है तो उसकी गति धीरे धीरे मंद पड़ती जाती है। जैसे जैसे गति मंद होती जाती है वैसे वैसे वह नाभि तक खिंचता हुआ चला जाता है। परन्तु संसार रूपी इस विशाल सागर पर उठने वाली विकारों की लहरें जो निरन्तर नाभि पर टकराकर काम,क्रोध, लोभ, ईष्र्या आदि को उछालने का प्रयास करती रहती है। जबकि बाह्य विषय उसे अपनी और आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों ओर की रस्साकशी में वह अधिकतर बाह्य विषयों की ही ओर खिंचता हुआ चला जाता है। और धीरे धीरे साधन च्युत होकर सांसारिक कार्यों में उलझता रहता है। उससे बचने का एक मात्र उपाय है शरीर याने कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियों को समान रूप से बाह्य संसार में सक्रिय बनाना।
    निरन्तर उसके द्वारा प्रकृति के इस महान कार्य में सहयोग किया जाए तथा वृत्तियों की लहरों का नाभि पर होने वाले आघात को सहन करते हुए मन की गति को बढ़ने न दिया जाये। निरन्तर इसी प्रकार के कार्य का अभ्यास मन को शांति और शक्ति प्रदान करता है। रस्साकशी में निर्बल बना हुआ मन स्वयं अपने आप सबल बनता जाता है। और शरीर और इन्द्रियों के द्वारा होने वाले निकट या दूरस्थ कार्य केवल अपने संकल्प अपने आपसे ही सफलतापूर्वक संपन्न कर सकता है।
    जैसे जैसे मन मस्तिष्क से नीचे उतरने लगता है उसकी शक्ति बढ़ना प्रारम्भ होती है। कुछ छोटे मोटे कार्य वह अपने संकल्पबल से ही कर सकता है। परन्तु कर्म करने का अभिमान या अंहकार बढ़ना प्रारम्भ हो जाता है। उसे अपनी अल्प शक्ति ज्ञात होने पर भी, आपने शक्ति प्रदर्शन करने के मोह से वह बच नहीं पाता और इसी प्रकार धीरे धीरे पतन की राह पर बढ़ता हुआ वह अपनी शक्ति क्षीण करता जाता है।
    इसीलिये मन को नियंत्रित करना चाहिए। ये प्रयोग निरंतर किये जा सकते हैं। मन अपने आपको याने अंतर्मन या आत्मशक्ति का अनुभव करने लगता है। संसार में ऐसे व्यक्ति के लिये किसी प्रकार का आकर्षण शेष नहीं रह जाता। वह विचार या वृत्तियां रहित मन तथा सक्रिय शरीर और इन्द्रियों के द्वारा सांसारिक क्रिया कलापों को उत्कृष्ट तरीकों से निभाता हुआ अपना जीवन अपनी इच्छानुसार प्रकृति के निर्देशों पर चलाता है। इसी का दूसरा नाम जीवन मुक्तावस्था है। परन्तु यह नाम भी काल्पनिक है। मुक्ति नाम की कोई स्थिति नही है। न संसार कोई वस्तु है जो कि फल फूल कर मन को संसार में उलझा सकता है।
    इन तमाम उलझनों से बचने के लिये मनुष्य के लिये जीवन जीने का मात्र तरीका वर्तमान मे जीने का है। वर्तमान में जीवन जीने वाला व्यक्ति न क्षण भर पीछे जाता है और न एक क्षण आगे की सोचता है। चिंतन और चिंता, भूत का चिंतन एवं भविष्य की चिंता दोनों से परे वह मात्र वर्तमान में याने भूत भविष्य की संधि में ही रहता है। और इस कारण वह तमाम बंधनों से मुक्त,विकारों से मुक्त, आकांक्षाओं से मुक्त, एक स्वच्छंद शांत और आनंददायक जीवन जीता है। जीने की अवधि उसकी अपनी इच्छानुसार है। इसका नियंता वह स्वयं है अन्य कोई नही है।

    उन्होंने मुझे समझाया कि जप, तप और प्राणायाम आदि जो परम्परागत साधनाऐं है ंयह इस लिये महत्वपूर्ण हैं कि इसमें हमारी लगन रहती है और इससे अधिक इसकी कोई महत्ता नहीं है । समय आने पर सब छूटता चला जाता है । महत्वपूर्ण चीज है निरन्तर वर्तमान में रहना और अन्तर्मुखी होना और यही सही साधना है । मनुष्य इस मनुष्य शरीर में विराट की महानशक्ति का स्वयं अनुभव प्राप्त कर सकता है । जितना वह शक्ति के नजदीक जाता है उतना ही वह इस महाशक्ति से जुडता जाता है । मेरे जीवन में वे एक पथ  उनका मार्गदर्शन  हमेशा मेरे साथ रहा।
गुरूकूल छूटते ही बाहर का संपर्क स्वतःकम होने लग गया था। शेष रह गए थे, कुछ परिचित परिवार जो अपने आप जुड़ गए थे। एक बार सत्यामित्रानंद जी ने कहा था - आप गृहस्थियों के यहां क्यों इहरते हैं, सन्यासियों को आश्रम बनाकर रहना चाहिए। मेरा लक्ष्य स्पष्ट था। गृहस्थियों को ही धार्मिकता की आवश्यकता है। अगर हर परिवार की सुख, शांति, समृ( मेरे भाग्य से हो जाता है तो मेरे लिए यह बहुत है। धर्म की आवश्यकता उन्हीं को है। वे अशांत है। उनकी समस्याएं हैं, मैं अगर उनकी जरा सी भी सेवा कर सका तो यही मेरे लिए बहुत है। आश्रम में रहकर, प्रवचन देना। मुफ्त का खाना मुझे पसंद नही था। भारत में साधु सन्यासियों की संख्या एक करोड़ के आस पास है। यह किस पर  बोझ है। इतना सारा खर्चा तो गृहस्थ उठातें हैं ये कौनसा कम करते हैं। मेरा सीमित क्षेत्र रहा। जहां मुझे निरंतर कार्य करना था। शरीर से, मन से, जहां आवश्यकता हुयी धन से, मैं सेवा से पीछे नहीं हटा। मैने जो सोचा उस पर अमल किया। यही ध्यान रखा, व्यवहार सबके प्रति समान प्रेमव्रत होना चाहिए।

मैं अब अपने शरीर से तो नहीं , अपने विचारों के द्वारा आपकी सेवा अवश्य कर सकता हँ।मेरी  भावनाएँ ओर मेरी साधना के तरीके आप लागों तक पहुँच जाएँ; अन्तर्यात्रा के प्रकाशन के समयद्ध,इसमें थोड़ा सा भी आप अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे तो आपको लाभ होगा।
” हर व्यक्ति सब कुछ नहीं  कर सकता। यदि आपका और मेरा मानसिक सम्बन्ध जुड़ा रहेगा,वह इन ;पुस्तकों के द्ध माध्यम से जुड़ा रहेगा ताक उससे निरन्तर आपका सम्बन्ध मेरे साथ जुड़ा रहेगा।इसमें मेरी शक्ति का अंश आपके भीतर पहुँचता जाएगा।उसी के द्वारा आपकी बु(ि शु( और निर्मल होगी।आपको जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।उसी के आधार पर आप जीवन में कार्य करने लग जाएंगे।परम पिता परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना है किजो भी यहाँ आया है उसे  भौतिक सुख तो उसे उसके भाग्य के आधार पर मिलेंगे ही, उनमें वृ(ि भी हो, परन्तु आत्म ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने में भी सहायता मिले।
योग साधना और अध्यात्म
पूज्य स्वामीजी ने अपने साधन ग्रन्थ अनंतयात्रा में योग  सम्बन्धी साधना पर विचार करते हुए  चूड़ाला और शिखिध्वज आख्यान में कहा है कहा है-
”अनेक प्रकार की यौगिक साधना करने के पश्चात मैं भी इसी प्रश्न से जूझ रही हूंॅं कि क्या योग सूत्र द्वारा वर्णित अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति किसी को हो सकती है या मात्र भ्रम ही है? हां, अपनी साधना के आरंभ में जब मैं अपने गुरूदेव कीर्तिकेय के मार्गदर्शन में योग विधा सीख रही थी। तब मन बहुत शांत एवं प्रसन्न रहता था। यौगिक शक्तियों का भी कुछ आभास होता था। अनेक रंगों के प्रकाश नजर आते थे, कभी अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों के जलने की खुशबू आती थी। बिस्तर पर लेटे- लेटे आकाश में बडी ऊंचाई तक उड़ते हुए पहंुचने का आभास होता तो कभी गहरे समुद्र तल तक जाने की अनुभूति। मन में उठने वाले अच्छे बुरे सभी संकल्प तुरन्त पूरे हो जाते। परिणाम में जहां शुभ संकल्पों की सिद्धि से मन में प्रसन्नता होती वही अशुभ संकल्पों की पूर्ति से विषाद उत्पन्न होता। इसी अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक शक्ति बढ़ने का भी संकेत मिलता तथा अनेक बार इसके प्रयोग भी सफल हुए।
’”प्रयास पूर्वक की गई इस प्रकार की साधना हठयोग का ही एक अंग है। सफलता मिलने पर भी ये सिद्धियां स्थाई नही होती है। कुछ समय तक अपना प्रभाव दिखाकर निरन्तर खर्च होने वाली मानसिक शक्ति कमजोर पड़ने लगती है। प्रतिक्रिया स्वरूप मन और इन्द्रियां अधिक तेजी से विषय वासनाओं में लिप्त होने लगती है तथा कभी -कभी साधक रसातल तक पहुंच जाता है।
श्खििघ्वज द्वारा अपनी असफलता की चर्चा होने पर पूज्य स्वामीजी ने योग साधना की कमियों को संकेत करते हुए कहा है-
“”आपने महल छोड़ते समय राज्य व परिवार तो छोड़ा, किन्तु उनका चिन्तन नही छोड़ा। यहां आकर मन की ऊपरी सतह से आप ध्यान आदि के द्वारा मन को वास्तविकता से दूर हटाने तथा लम्बे समय तक उसे बाहर टिकाने का प्रयास किया, साथ ही मन की नीचे की सतह जो आत्मा की महान शक्ति के निकट होने के कारण अत्यन्त शक्तिशाली है, उसकी पूर्ण उपेक्षा की। परिणाम वही हुआ जो होना था। चिन्तन के विषय ऊपरी सतह से छिपकर धीरे -धीरे नीचे की ओर आकर जम गये तथा ब्रह्म रूपी सर्वव्यापी उस महान शक्ति की गतिशीलता से उसमें उठने वाली लहरों के धक्कों की वजह से नीचे बैठी हुई गंदगी एकाएक अपने विकृत रूप में ऊपरी सतह पर आकर स्वप्न के रूप में आपके सम्मुख प्रकट हो गई।’   
”‘प्रश्न का उत्तर पाकर भी उसकी सत्यता के बारे में आपको शंका होना स्वाभाविक ही है। यदि वास्तविकता जानना ही चाहते हैं तो अपने स्वप्न को याद करके उसमें से किसी व्यक्ति या वस्तु को केन्द्र बिंदु मानकर उसी पर निरंतर चिंतन प्रारम्भ कीजिये। चिंतन का विषय यदि व्यक्ति हुआ तो आपके अंतर्मन द्वारा उसका अंतर्मन प्रभावित होगा तथा पूर्व की अपेक्षा अधिक स्वप्न रूप से प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारे सामने उपस्थित होकर तुम्हारा संदेह दूर करेगा।’“
एक पात्र नीलकंठ के प्रश्न के उत्तर में कहा है-
    ‘    मानसिक शक्ति के प्रयोग करने की अभी तुम्हारी योग्यता नहीं है, एक ही बिन्दु पर बिना बाधा के निरन्तर मन को केन्द्रित करने पर मन शक्तिशाली बन जाता है तथा अंतर्मन द्वारा विराट शक्ति से जुड़ने पर साधक की मनोकामना की भी पूर्ति होती है।”
असुरक्षा तथा भय की भावनाओं के उन्मूलन के लिए मुझे क्या करना चाहिए।“ मैने पूछा।
    ”सर्वप्रथम अपने समस्त दैनिक कार्य सम्पन्न करते समय मन को उसी कार्य में एकाग्र रखते हुए किंचित मात्रा भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।“ रानी ने कहा।
    प्रारम्भ में कठिनाइयां आ सकती हैं किन्तु धीरे धीरे निरन्तर प्रयास से सफलता मिल सकती है। फिर दिन में खाली समय में या रात्रि को निद्रा आने के पूर्व प्रयास करके मन को विचार रहित अवस्था में लाना चाहिए तब अकस्मात निद्रावस्था में पहुंचकर भी कुछ ऐसे स्वप्न दिखेंगे जिनमें दारूण दुखदायक परिस्थितियों में भी मन अविचलित रहता हुआ प्रतीत होगा। प्रत्यक्ष मौत आने वाले प्रसंग जैसे किसी ऊंचे पहाड़ की चोटी से नीचे कंदराओं में हिंसक जंतुओं के बीच हाथ पांव बांधकर धकेल दिया जाना, किसी देवता के सामने वेदी पर मस्तक रखकर तीक्ष्ण शस्त्रा से उस पर प्रहार होना या जलते हुए अग्नि कुण्ड में फेंक दिया जाना। ऐसे स्वप्न देखते समय भी मन में डर के स्थान पर यदि प्रसन्नता का अनुभव हो, स्वप्न टूटने पर भी मन देर तक शांत रहे तो समझना चाहिए कि मन धीरे धीरे स्थिर होता जा रहा है। शक्तिशाली होता जा रहा है तथा साधक मानसिक शक्ति के प्रयोग करने में सक्षम होता जा रहा है।
    ”मन को विराट के साथ किस प्रकार जोड़ा जाता है ? वह जुड़ा है या नहीं, यह कैसे जाना जाता है तथा विराट से क्या तात्पर्य है ?“ मैने रानी से पूछा।
    इस समस्त संसार कोे नियंत्रित करने वाली उस महान शक्ति का ही नाम विराट है, वही विराट शक्ति समस्त संसार का संचालन करती है तथा साधक जब निर्विचार अवस्था को पार करके धीरे धीरे अंतर्मन से शरीर तथा सांसारिक कार्यों को करने लग जाता है, तब वह यह अनुभव करने लगता है कि प्रत्येक कार्य में जो कत्र्तव्य बनकर उसके सामने उपस्थित होता है, वह उसके विचारों के अनुकूल हो या प्रतिकूल वह उसे निरासक्त भाव से उत्कृष्टता पूर्वक सम्पन्न करता है। कार्य सम्पन्न होते ही वह तुरंत उसे भूल जाता है। मन अत्यंत शांति तथा आनन्द की अवस्था को अनुभव करता है और तब उसे अपने आपको विराट के साथ जुड़ने का अनुभव होता है। ऐसी अवस्था में प्रकृति के कार्य में अपनी इच्छानुसार छोटे मोटे प्रयोग करने की इच्छा जागृत होती है। कुछ साधक लीलावश सावधानी से प्रयोग करके प्रकृति के नियमानुसार अनुकूल- प्रतिकूल फल शांति तथा धैर्य के साथ मांगकर अपने अनुभव अन्य साधकांे को मार्गदर्शन हेतु बताते रहते है। अंत समय में वे अपना नश्वर शरीर बड़े प्रसन्न मन से सहज रूप में त्याग कर उस महाशक्ति में प्रवेश कर जाते है।“
स्वप्न और साध्न तत्व
” स्वप्नों द्वारा एक तरफ जहां मनुष्य अपनी अतृप्त वासनाओं को तृप्त करके उनसे छुटकारा पाता है वहां यदि साधक इनका स्मरण रख के तथा सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा अपने अंदर के विकारों का पता लगाकर उनके मूल उन्मूलन का प्रयास करता है तो  वह शुद्ध ह्नदय व्यक्ति शीघ्रताशीघ्र शुद्ध तथा सरल हृदय होकर परमपिता परमात्मा की इस सृष्टि का उद्देश्य तथा उसमें अपनी भूमिका का वास्तविक ज्ञान पाकर कत्र्तव्यनिष्ठ आसक्ति व अहंकार से शून्य बनकर, जीवन को सुख शांति से बिताता हुआ अन्य साधकों का मार्गदर्शन करता हुआ अहर्निश आनन्द की स्थिति में अपना समस्त जीवन बिताता है।“.
हठयोग की अनावश्यकता
 आसन, प्राणायाम आदि समस्त क्रियायें मात्र शारीरिक व्यायाम ही है, स्वास्थ्य के लिए ये आवश्यक भी है किन्तु योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ना। यौगिक साधना करने वाले साधक यह मान्यता लेकर साधना प्रारम्भ करते हैं कि वे एक इकाई के रूप में अलग हैं तथा उन्हें उस महान शक्ति से जुड़ना है परन्तु यह सरासर गलत है। शक्ति के साथ शक्ति से ही जुड़ा जा सकता है। भौतिक शरीर से नही। योगाभ्यास प्रारम्भ करते समय आसन की स्थिरता तथा शारीरिक संतुलन के लिए योगासन सहायक होते हैं और प्राण की गति को शरीर के साथ मिलकर संतुलन बनाए रखने में रेचक, कुंभक आदि प्राणायाम सहायता करते हैं। किन्तु इनकी गति मात्र जड़ समाधि तक ही है, आगे नहीं।
जोड़ने की क्रिया इससे भी संभव नही है और जो महत्वपूर्ण प्रश्न है, वह यह है कि क्या हम जुड़े हुए नही है ? प्रत्येक मानव यहां तक कि संसार की प्रत्येक जड़ चेतन वस्तु विराट का ही एक अंग है। जोड़ना अर्थात योग एक काल्पनिक स्थिति है, असत्य है, शरीर और विराट को विभाजित करने वाली मन नाम की एक शक्ति स्वयं विराट द्वारा ही इस संसार रूपी लीला को आनन्ददायक बनाने के लिए निर्मित की गई है। परन्तु मानव सदुपयोग के स्थान पर उसका दुरूपयोग करके अनेक प्रकार के कष्ट भोगता है तथा अनेक प्रकार के काल्पनिक साधन अपनाकर आसन, प्राणायम व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य आदि सर्वथा अनुपयोगी एवं असंभव मान्यताओं का निष्ठापूर्वक बड़ी कठोरता से पालन करता है। गुरू और संतों के पास सुरक्षा के लिए दौड़ता है और भक्ति तथा तंत्र के द्वारा भविष्य में या मरणोपरांत कुछ विशेष उपलब्धि की झूठी आशा में अपना वर्तमान जीवन अत्यन्त दुख एवं कष्टों में बिताता है।
    योग साधना के प्रति मनुष्य को आकृष्ट करने के लिए ही कुछ बुद्धिमान साधकों ने इसका सहारा लिया है, पूर्व के साधक यह जान गए थे कि बिना किसी स्वार्थ सिद्धि के कोई भी मनुष्य साधना की ओर आकृष्ट नही होगा। हां यदि मानव मानसिक क्रिया द्वारा धीरे -धीरे अपने मन को स्वयं नियंत्रित कर लेता है और इस प्रयास में सफलता प्राप्त करके वह अंतर्मुखी होकर निष्काम भाव से कर्मयोगी बन जाता है अर्थात पाप, पुण्य, लाभ, हानि, अच्छा, बुरा सभी विचार त्याग कर निरन्तर मात्र कार्य के साथ जुड़ा रहने पर उसे कुछ मानसिक शक्तियां अवश्य प्राप्त होती है।“
‘भौतिक लाभ या परिवर्तन किसी भी प्रकार से संभव नही है, न कोई अदृश्य होकर आकाश मार्ग से भ्रमण कर सकता है न परकाया प्रवेश। मानसिक शक्ति से वह बहुत दूर की बातें जान सकता है, भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, मानसिक संदेश भेजकर किसी को शुभ कार्य के लिए प्रेरित कर सकता है। उसके द्वारा अपने किसी इच्छित परन्तु निष्काम या परोपकारी कार्य को सम्पन्न करा सकता है। किसी दूसरे के लिए स्वप्न निर्माण करके उसे अपनी जानकारी दे सकता है।
“‘निष्काम तथा आत्मकल्याण से प्रेरित साधक शीघ्र ही यह जान लेता है कि उसे विराट के साथ निरन्तर जुड़ा होने के कारण स्वतः ही सब कुछ प्राप्त है। अधिक प्राप्त करने हेतु किसी से सहयोग की अपेक्षा करना मात्र उसका भ्रम ही है, वह उसमें नही फंसता तथा किसी भी परिस्थिति में विचलित नही होता है तथा विराट द्वारा निर्दिष्ट कार्य को निष्काम कर्म द्वारा करता हुआ इस जीवन लीला को आनन्द पूर्वक सम्पन्न करता है।’