जैसे हिरण नाभि कस्तूरी 1
आज सब जगह कोराना काल का प्रभाव है, हमारे प्रिय गुरुकुल के सहयोगी श्री भैरूलाल जुलानिया कोराना में चले गए। कुछ दिन पहले बहिन पार्वती चली गईं, अब बहिन भगवती चलीं गईं। एक भय का माहौल है, पूज्य स्वामीजी समझाते थे , सृष्टि के प्रारम्भ से सत्य और ऋत साथ आए है।
यही सृष्टि का आधार हैे। सत्य की विवेचना में हजारों ग्रंथ हैं। ऋत वह नियमन है , जिसके आधार पर सृष्टि निरंतर गतिशील हेैं। ऋत प्राकृतिक विधान है। नियमन है। स्वामीजी ने मनुष्य के दुख का कारण उसका बुद्धि चातुर्य ही बताया है। हमारे यहाॅं कहावत है , सब चलता है , हम किसी नियम को ही नहीं मानते।
अगर कोराना काल के प्रारम्भ से ही नियम को पूरा मानते तो आज यह समस्या विकराल नहीं होती।
अभी भी मित्रों को टीका लगवाने के लिए कहना पड़ता हेै। हर मृत्यु के पीछे कारण का पता लगाया तो जबाब यही मिला , नियमन का पालन ही नहीं था। यही दुख है, स्वामीजी ने कहीं नहीं कहा भगवान का नाम लेते रहो ,उनका एक ही वाक्य रहा , मांगना नहीं , सामना करो ,वे परमहंस की कहानी सुनाते थे। पागल के हाथी के सामने शिष्य नारायण स्रोत का जप करने लगा , तब महावत ने कहा हटजा , हाथी उठाकर फैंक देगां उसने महावत की बात नहीं मानी , वह पाठ ही करने लगा , घायल होगया। तब गुरु ने कहा , तूने महावत की बात क्यों नहीं सुनी , वह भी तो परमात्मा का ही कथन था।
दैव,दैव आलसी पुकारा , श्रुति का वचन है , उठो और सामना करो ,
उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत कठोपनिषद , यही पूज्य स्वामीजी की वह सीख है जो पिछले पचास साल से मार्गदर्शन कर रही हेै।
स्वामीजी का माग्र ऋत का ही मार्ग हैे।
टनंतयात्रा में उनका नीलकंठ से आप्त वचन है , तुम्हारा विवेक जाग्रत होना ही महत्वपूर्ण हेै। स्वामीजी कहते थे, विश्वास , अंधविश्वास की ओर ढकेल देता हेें विचार अगर सही दिशा में है , सोचने का तरीका सही है तो वह विवेक सौंप जाता है। तब गुरु की देशना अंतः करण में जग जाती है।
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यह कृति उसी देशना से उपजी है । कृति की प्रेरणा मित्र भैरूलाल जी के गुरुकुल के कार्यक्रम में अचानक उतर गई।
जब मेैं पहली बार गुरुकुल गया था , तब बस में वे मिले थे, वे महाविद्यालय के छात्र थे , और मेैं प्राध्यापक था , पत्नी साथ ही थी। बकानी की बस में तब प्रवेश पाना ही कठिन होता था। तब भैरूस्लाल जी ने अपनी भी सीट हमारे लिए छोड़दी और पास की सीट को खाली करा दिया। कंडक्टर से हमारा परिचय कराया। तब गुरुकुल में बस स्टोप था। यह आखिरी बस थी। भीड़ भी बहुत थी। स्वामीजी की कुटिया में तब गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, लाइट भी नहीं थी। बस से उतरते ही पाया , सामने दूर कुटिया के बरामदे में स्वामीजी बैठे हैं , उनके पास ही एक युवक खड़ा था , वह हमें उतरते देखकर तेजी से दौड़ा , कुछ ही देर में हम उसके साथ कुटिया की तरफ बढ़ रहे थे ं
, उसी ने बताया , वह बीरम है , पहले गुरुकुल के स्कूल में कर्मचारी था , अब सरकार की नौकरी में आगया है। स्कूल का कार्य समाप्त होते ही वह स्वामीजी की सेवा में आजाता हैं। स्वामीजी दोपहर से ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, पास वाले कमरे में आपके ठहरने की व्यवस्था , करादी है। वह हमें खाना खिलाकर रात को अपने घर चला जाएगा। वही बीरम , कालांतर में अपनी सेंवानिवृत्ति के बाद स्वामीजी को ही सेवार्नित होगए। बाद में स्वामीजी के महाप्रयाण के बाद एक गुरुपूर्णिमा के दिन स्वामीजी के संवा में ही चले गए। उनकी संवा , और भक्ति अनुपम है। संत बीरम जी वास्तव में सेवामूर्ति ही रहे।
मैं जब स्वामीजी से मिला था , तब नई नौकरी थी , विवाह हुआ ही था।स्वामीजी के पास कोई न पूजा थी , न कोई मंत्र , न वहाॅं ,किसी प्रकार का कोई बाह्य उपचार ही था। मेरा उनसे मिलने के प्रति आकर्षण का कारण यही था , क्या सन्यासियों के पास शक्ति होती है?जीवन में वास्स्तविक शांति क्या होती है? हम जिसे ईश्वर कहते हैं, क्या उन्हें इसका अनुभव भी होता है , या खाली ग्रंथ पाठ ही रहता है?
बचपन में अपने पिता को देखा था , वे गायत्री के उपासक थे , सुबह - शाम पूजा करते थे। दोपहर में ग्रंथ पाठ का उनका नियमित अभ्यास था। ग्यारह वर्ष की आयु में अलवर बड़े भाई साहब के पास चला गया। वहीं आगे की पढ़ाई हुई , बड़े भाई गृहस्थ संत थे। वे टूंडला के रामाश्रम सत्संग से जुड़े हुए थे। अलवर में उन दिनो अनेक संत आते-जाते रहते थे। भाई साहब अपने मित्रों के साथ अलवर की पहाड़ियों के स्थानो पर संतों की तलाश में जाते रहते थे। उनके साथ कई बार जाना हुआ। भाई साहब का घर एक प्रकार से आश्रम ही था। उनके अपने ही पुस्तकालय में श्रेष्ठ पुस्तकों का संग्रह था। वही परमसंत चतुर्भुज सहाय जी का पूरा साहित्य पढ़ा। पंडित मिहिलालजी जो भाई साहब के गुरु थे , उनसे वहीं मिलना हुआ।
भाईसाहब ही एक प्रकार से मेरे पहले गुरु थे। जिन्होंने बचपन की चित्त भूमि पर आध्यात्म के बीजों का रोपण कर दिया था।
बाद मेैं अलवर से अजमेर गया, वहाॅं से कोटा आगया था। कोटा में उन दिनो नगरपालिका की लाइब्रेरी के पुस्तकालयाध्यक्ष आचार्य बद्रीनारायण शास्त्री थे। वे संस्कृत ,आयुर्वेदऔरसाहित्य के महान विद्वान थे। वे महान तात्रिक थे। उन्होने तंत्र में दीक्षा दी। उनके यहाॅं हर मंगलवार को पूजा होती थी। वे देवी के असाधारण भक्त थे। जब वे प्रार्थना करते थे , भावावेश में उनकी छाती आरक्त हो जाती थी। उस जमाने के प्रसिद्ध तांत्रिक चंद्रास्वामी भी उनसे मिलने आए थे। उन्हीं दिनो में गीता भवन में प्रसिद्ध संत स्चामीी शरणानंद जी से मिलना हुआथा। बहिन के पास जो जालंधर में थी , उस जमाने महेष योगी वहाॅं आए थे , उनसे भी मिलना हुआ।
मैं, सन् 1969 में ही झालावाड़ आगया था। तब गोदाम की तलाई पर घर था , वहीं अमरनाथ गंभीर भी रहते थे, वे गुरुकुल में रहा करते थे ,वे झालावाड़ रियासत में शिक्षा मंत्री थे , पर हर शनीवार को झालावाड़ आजाते थे। उन्होंने कई बार गुरुकुल चलने का आग्रह किया था। वे स्वामीजी की चर्चा करते थे। पर संयोग से मैं नहीं मिल पाया। फिर वहाॅं से देहली जाना होगया। फिर राज्य सरकार के आदेश से जुलाई 1971 में पुनः झालावाड़ आगया था।
पर स्वामीजी से मिलना जुलाई 1972 में ही विवाह के बाद हो पाया। प्रकृति का अपना ही अनश्ुाासन है, बाद में जाना यहाॅं सब नियति पूर्व में तय कर देती है , बाद में उसी पूर्वनिर्धारित मार्ग पर चलना ही होता है।यही विधि है , एक मित्र ने पूछा था , क्या हमारा जीवन मरण , यश , अपयश , हानि लाभ , सब विधि के हाथ में ही है? विधि ही वह नियम है , जिसका नियमन हमने ही किया हे। हम ही अपने कर्मो , संकल्पों के आधीन ही है। विधि की रचना भगवान नहीं करते। हम ही रचना करके भूल जाते हैं। यही स्वामीजी ने समझाया था , हमें परम स्वंत्रता है , हम ही अपना अच्छा- बुरा खुद चयन करते हैं , पर हम भूल जाते हेैं।
मेैं अपनी स्वामीजी से मुलाकात की चर्चा कर रहा था।
काॅलेज खुल चुके थे , जुलाई 1972 की एक दोपहर में माणकजी की दुकान पर अचानक मिलना हुआ ,मेैं वहाॅं पर घर के लिए किराने का सामान लेने गया था। वहीं दुकान के अंदर स्वामीजी बैठे हुए थे। उन्होंने माणकजी से पूछा क्या ये मजिस्ट्रेट हैं? स्वामीजी से माणकजी ने कहा नहीं काॅलेज में पढ़ाते हेंै। तब स्वामीजी ने रघुनंदन आचार्य के घर आने को कहा। मेैं शाम को अपनी साइकिल से वहाॅं पहुंचा , लौटते समय उनका थैला , साइकिल पर था, हम दोनो पैदल मंगलपुरा अपने घर चल पड़े थे।
उस दिन उनसे मेरा पहला सवाल यही था , क्या जीवन में ईश्र को पाया जा सकता है? मैंने तब विवेकानंद को पढ़ा था। स्वामीजी के चेहरे पर तब अजीब सी शांति थी। उनका चेहरा आकर्षक था। वे कुछ देर मुझे देखते रहे , बोले हाॅं, वह शक्ति है, छोटी सी धास के तिनके से लेकर , विशाल प्राणियों तक , जड़ , चेतन सब जगह वही है। इसी जीवन में , इसी शरीर में उसे जाना जा सकता है।
वहाॅं कोई संकोच नहीं था। नहीं कोई ग्रंथ था।
मैंने पूछा , घर चलेंगे , उन्होंने अपना थैला उठाया और चल दिए थे । सन 72 में हम मिले थे , सन 2000 में वे अपना थैला सौंपकर अपनी अंतिम यात्रा पूरी कर चले गए। थैले में दो चश्मे , एक आधा कुरता , एक आधी धोती ,कुल उनकी भौतिक संपत्ति यही थी।और उनके सानिध्य में उपजी आत्म्कृपा की अठूट संपत्ति, जो एक वसीयत और विरासत की तरह अविच्छिन्न है। वो कह रहे थे , पोखर की तरह मत रहना , पानी सड़ जाता है। कूप का जल जितना उलीचा जाता है , उतना ही आ जाता है।
उस दिन मनीशा को मैसेज था , अंकल आपने लिखना क्यों बंद कर दिया , मेैंने उससे कहा अब किसी को जरूरत नहीं रही,, उसने कहा मुझे तो है, तभी योगवषिश्ठ की उक्ति याद आगई , अगर एक भी जिज्ञासु शेष हो तो , मौन मत रहना।
लगा मनीशा के माध्यम से महाशक्ति ही इस अड़तालीस साल की यात्रा पर ले आई है। बहिन पार्वती चली गईं। भीलवाड़ा प्रवास में जब स्वामीजी पधारते थे , तब बृजेश अपने बच्चों के साथ घर पर स्वामीजी से मिलने आती थी।
तब मनीशा बहुत छोटी लड़की थी। पार्वती जी उसकी नानी थीं।
सत्संग और स्वाध्याय ही साधनसूत्र हैं , मन अचानक गुरुकुल में स्कूल के बड़े दरवाजे से होता हुआ , उस कुटिया की देहली पर अचानक पहुंच गया है।
उस दिन छीतरसिंह जी का फोन था , आप एक दिन कें लिए आजाओ , सुबह भोजन कर शाम को निकल जाना , यहाॅं कोई डर नहीं। मेैंने कहा मेरा तो मन रहता ही वहीं हेंै। बस तन को ही अब वहाॅं रखना हें , सूरदास का पद है , ऊधो मोहे ब्रज बिसरत नाहीं , उस कुटिया में बिताया एक- एक पल एक विद्युत की किरण की तरह कौंध गया है।
शायद यही ध्यान हो , उस दिन बहिन पार्चती का भीलवाड़ा से फोन था , भाई साहब स्वामीजी के पास उनके अंतिम समय में , जोेएक माह आपके घर रहने का अवसर मिला , मेैं उसे भूल ही नहीं पाती हॅंूूं , रोज याद कर लेती हूॅं श्री मद् भागवत में प्रसंग है, ,कृष्ण जब जारहे थे , जब उद्धव ने कहा था , मेैं आपके साथ जीवन भर साथ रहा , पर नहीं समझ पाया , तब भागवत के अंतिम अध्याय में कृष्ण , उद्धव को अपने शाश्वत रूप का दर्शन कराते हैं। महापुरुष हमारे पास ही रहते हैं , हमारे साथ रहते हैं , पर अपने प्रमाद में अपने ही अहंकार के चश्मे को संभालते रह जाते हेै। जीवन भर अपनी निरपेक्ष दृष्टि खोए रखते है।
उनकी देशना ही उनकी विररासत है। वह मेरे पास धरोहर की तरह आज भी सुरक्षित है।
वे मेरे मित्र रघुनंदन आचार्य के यहाॅं ठहरे थे , वहाॅं से वे मेरे साथ चले आए थे। साईकिल पर थैला टाॅंग लिया था। वह थैला आज भी मेरे पास अपनी अटूट संपत्ति की तरह सुरक्षित है।
उसके कुछ दिन बादही हम , दोनो पति-पत्नी उनकी कुटिया पर गए थे।
उस कुटिया में कोई तस्वीर नहीं थी। न कोई ग्रंथ था। न किसी प्रकार की पूजा थी। बस एक तखत था , आले में ट्रांजिस्टर रखा हुआ था। कुछ स्वास्थ्य संबंधी पत्रिकाएॅंॅं आती थीं। समाचार पत्र भी, नियमित आता था। न कोई पूजा पाठ, न मंत्र जाप , पर एक शांति थी। एक अपरिहार्य आकर्षण था मन न जाने क्यों उस कुटिया में खिंच गया था।
वहीं तब स्वामीजी के अभिन्न मित्र गंगारामजी पटेल मिले , ये गौरीशंकर के पिता थे। उनकी ही छोड़ी गई भूमि पर गुरुकुल है। वे दोपहर में नियम से कुटिया पर आतेथे।, सलावद से बंशीलालजी आते थेो , स्वामीजी तब चाय खुद ही बनाते।बकानी से केसरीरलाल जी की पत्नी कभी पैदल तो कभी बस से आजाती थीं, जब दोचार लोग आजाते तब भेाजन वही बनातीं। स्वामीजी भोजन एक ही बार करतेथे , बकानी के परिवार वहाॅं से अपना टिफिन भिजवादेते थे।
डाह्या भाई रामगंजमंडी के गुजराती स्कूल के प्रधानाघ्यपक थे , मूलचंदजी दरवेश भवानीमंडी में रहते थे , पोस्ट मास्टर कन्हैयालाल जी भवानी मंडी में रहते थे , ये सभी लगभग हर इतवार को गुरुकुल बस से आजाते थे।
ग्ुारुकुल स्वामीजी ने सरकार को सौंप दिया था। स्कूल में बीरम , स्थाई कर्मचारी होगया था। वह स्कूल से अवकाश मिलते ही कुअिया का कार्य संभाल लेता , वही बीरम देव कुछ वर्ष पूर्व गुरु पूर्णिमा उत्सव समाप्त कर , अपना काम पूरा कर अनंत में विलीन होगया।
हमारा नया विवाह था। गृहस्थी की अपनी समस्याएॅं थीं। तभी स्वामीजी मिले थे। घर -गृहस्थी की हर बात पूछते थे। नई नौकरी थी। एक दिन कहीं से आए , कुछ धन राशि भेंट में मिली थी। आए बोले ,घर के बुजुर्ग की तरह बोले , इसे रखो , खर्च मत करना , तब से घर की समस्याएॅं अपने आप हल होती चली गईं।
पर मेरी ही गलती थी , मैं स्वामीजी की यात्रा का साक्षी तो रहा , पर मेरे ही पूर्वकृत संस्कारों के प्रभाव से ही मैं ैं स्वयं उस यात्राके पुण्य लाभ से तब वंचित ही रहा। पर उनका कहीं भी सायास इस यात्रा पर साथ ले चलने का आग्रह नहीं रहा। वे यही कहते थे , मेरे जाने के बाद ही मेरी बातंे समझ के साथ ले जाएंगी। जो कुछ भी सार तत्व हे , तुम्हें ं सोंप दिया है। तुम्हारे ताले की चाबी मेरे पास है , अभी समय नहीं आया , धैर्य रखो , प्रतीक्षा करो ? लगन मत छोडना , समय आने पर अपने जग जाओगे।
सच बात यह है कि अगर पारस पत्थर भी हाथ में आजाए , तो इसकी कीमत हम नहीं कर पाते। साधारण पत्थर समझकर उसे भी कूड़े के ढेर पर डाल जाते हैं। अज्ञान से बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। हमारी इस आज की दुनिया में बहुत भीड़ है , धन है , शोहरत है , मन वहीं अटक जाता है।
तब स्वामीजी ने छोटी सी कहानी सुनाई्र थी वह आज भी याद है। एक चूहा , रोटी की तलाश में गया , मकान मालिक नया पिंजड़ा लाया था , चूहा उसका अंदाज नहीं लगा पाया , वह घुसा तो समझ गया , मामला गड़बड़ है । पीछे मुड़ा तब तक उसकी पूॅंछ कट गई थी।
वह अवाक था क्या किया जाए।
तब तक दूसरा चूहा उधर आगया था , वह बोला क्या हुआ?
वह चूहा शांत स्वर में बोला भगवान के दर्शन हो गए थे।
वह दूसरा चूहा बोला , मुझे भी करादे।
वह उसे पिंजडें के पास ले गया, वह घुसा तब तक खटका उठ गया था , वह लौटा , तब तक पूॅंछ कट गई थी।
उसने पूछा , यह क्या कर दिया।
वह पहला चूहा बोला , चुप रह। सबसे यही कहना , जब खटका गिरा तब तुझे , कौन याद आया था,भगवान ही याद आए , बस इतना ही , जब पूॅंछ कटे तब यह कहने से बेहतर है , सबकी पूॅंछ कट जाए।
तबसे सभी एक दूसरे की पूॅंछ कटाने के लिए उत्सुक होकर घूमते हैं।
बड़े मजे की बात है , जिसको कुछ नहीं पता , वही सबसे अधिक ईश्वर को बेचते हेंैं। उनके खरीददार बढ़ते ही जाते हेैं।
यह भीड़ उन्हीं की है। हम जनम लेते हैं , अकेले आते है। , फिर भीड़ ही हमारा मार्ग दर्शन करती है। हम बस उसके अंग बनकर अंत तक बहते रहते हैं। उस भीड़ से बाहर निकलकर अपने आप से मिलना , अपनी पहचान का पता करना ही आत्मज्ञान का पथ है।उस अकेले पन में ही आत्मकृपा का द्वार खुलता है।
