Monday, June 14, 2010

जीवन का उद्देश्य

जीवन का उद्देश्य

                बार  बार यह सवाल उठा करता है कि आखिर इस दुनियां का कारण क्या है ? यह दुनियां आई कहां से, और इस दुनियां में हमारी उत्पत्ति का कारण क्या है ?
     कोई कारण नहीं है, उस महान शक्ति की इच्छा हुई कि मैं अकेला हूं अनेक हो जांऊ, एक से अनेक होने की कामना ही यह फैलाव है और यह जब तक रहेगी तब तक फैलाव रहेगा, पर कामना होगी एक होना है।
    मुक्ति कभी किसी एक की नहीं होगी, स्वप्न जब शुरू होता है, जब खत्म होता है, देखा है- एक एक साथ कहां से आते हैं, कहां चले जाते हैं, यही उत्तर है, पर्दा एक ही साथ गिरेगा। कारण रहित कारण है।
    इतिहास भरा पड़ा है, हजारों साल हो गये, कितने बड़े साम्राज्य स्थापित हुए, सम्राट आये वंश चले, सब कहां चले गये, क्या परिवर्तन हुआ। कितने उपदेशक आये। कितने महान सन्त।बता सकते हो, कोई बड़ा परिवर्तन हुआ। आदमी जैसा हजार साल पहले था, उसमें आज कोई परिवर्तन आया है ? संसार की स्थिति वही है।
    जो आदि काल में था, वह आज चला आ रहा है। बनता बिगड़ता फिर बनना, फिर बिगड़ना, यही खेल है यही प्रकृति का स्वभाव है। हजारों साल का इतिहास इसी बात का गवाह है। उसका कोई कारण नहीं है। तथा किसी अभिप्रायः को तलाश करना व्यर्थ ही है।
    बहुत छोटी हमारी बु(ि है, तभी तो शास्त्र में नेति नेति कहा है
प्रयत्न
हमारा इस संसार में आने का क्या उद्देश्य है, और जो हम प्रयत्न करते हैं, उसकी क्या सीमा है ?
मनुष्य को प्रकृति ने कर्म करने का अधिकार दिया है, ताकि उसकी लगन बनी रहे। शरीर क्षणिक है- किसी भी समय बुलावा आ सकता है। किसी भी क्षण शरीर छूट सकता है। यहां कितना भी विकास किया जाए, कितना ही प्रयास करो- प्रकृति में क्या फर्क पड़ता है ?
    सभी नष्ट हो जाता है।
    मनुष्य को करने की स्वतन्त्रता है। करते जाओ, करते जाओ। अनुभव भी यही दृढ़ होता रहता है। यह सब मेरे करने से मुझे प्राप्त हुआ है। अनुभव सधन होता चला जाता हें सृष्टि में तो कोई फर्क नहीं पड़ता हैं
    एक दिन सब साफ हो जाता है।
    एक प्रयोगशाला आज बनायी, कल दूसरी, कल एक नया कारखाना, फिर दूसरा, बनते बिगड़ते सब रहते है। कभी एक धक्का लगता है- पूरा शहर साफ हो जाता है।
    यही सृष्टि का नियम हैं।
    इसके लिये बहुत अधिक उलझना, आपाधापी करना, अपनी महत्वकांक्षाओं के लिए तरह तरह की योजनाएं बनाना उचित नहीं है। मनुष्य को इतना ही करना चाहिए कि जब तक हम है हम अपना जीवन सुख और शांति से बितायें। उस शक्ति के साथ जुड़कर यह अनुभव करना है कि सृष्टि के अपने नियम हैं, वह अपने नियमों से चलती है- यही नाटक है। आज जो हमारी व्यक्तिगत इच्छा है, उस स्थिति में पहुंचने के बाद समष्टिगत हो जाती है। वह स्वयं सागर हो जाता है। बूंद जब सागर से मिल जाती है, तब उसे एहसास खुद हो जाता है कि वह सागर से अलग हैं ?
    आज आदमी आदमी के बीच तनाव हे।
    झागड़ा है, आपाधापी है। हर घर, हर परिवार में कष्ट है, दुख है हिंसा हैं।
    कारण है, हर व्यक्ति अपने आपको अलग मानता है। जब मैं अपने आपको अलग मानता हूं, तब तक ही मैं शत्रु हूं।
    तब तक वह जान जाता है कि वह भी नाटक का ही पात्र है, और उसे भी बस नाटक में भाग लेने के लिए उसी ने तैयार किया है। तब तक इस भावना में, उस भावना में कितना अन्तर है। जितनी हमारी बु(ि है, जितनी हमारी क्षमता है, उतनी ही गृहणशीलता होती है। कत्र्तव्य भावना की जागृति उतनी ही रहती हैं।
    हमें यह जानना होगा कि हमें यह जो मिला है, उसके पीछे अभिप्राय है। अभिप्राय- संस्कार है, वासनाएं है। संस्कार की पहचान अपेक्षित है, वांछनीय हैं वहीं वासनाओं का संग्रह है, भंडार है।
    इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक कर्म भी आवश्यक है। अतः जो होना है, वह यह प्रयत्न होना है कि वासनाओं का भंडार, संग्रह कम जाए- खाली हो जाए।
    जैसे जैसे वासनाएं कम होती जाती हैं, हम उस शक्ति के साथ जुड़ते जाते है। फिर वही कार्य, जो प्रकृति चाहती है- इस शरीर के द्वारा होता रहता है।
    यही सहज कर्म होता है।
    बाहृा परिवेश यहां प्रभावित नहीं करता है। फिर यही किसी को राजी नाराजगी का सवाल नहीं है। दूसरों की इच्छा से हम नहीं चलते है। जरूरी कार्य अपने आप हो जाता है। सच तो यह है कि हम सब अपने साथ अपनी अपनी दुकान लाए हैं, प्रयत्न यही है कि दुकान खाली हो जाए।
    अब तो जितना किराया जमा है, वह जब तक का जमा है, तब तक दुकान रखनी पड़ेगी- तब तक रहना होगा। रामकृष्ण परमहंस इसे काली का आदेश मानते थे। जब तक काली की इच्छा है, उसे कार्य करवाना है- वे रहेंगे। जब तक उस महान शक्ति की इच्छा है, उसे जो कार्य करवाना है- शरीर तब तक रहेगा।
जिस क्षण आवश्यकता नहीं होगी, वह नहीं होगा।
यहाँ भी एक नाटक ही चल रहा है,परन्तृ इस नाटक में चयन की स्वतन्त्रता है ं
यानी जो नाटक स्टेज पर होता है, और जो यहां होता है, उसमें थोड़ा अन्तर है। स्टेज पर स्वतन्त्रता नहीं है। वहां वही करना है, जो दे दिया गया है। यहाँ स्वतन्त्रता है।
मनुष्य को इस स्टेज पर अपनी इच्छानुसार करने का अधिकार है। उसके पास पुरुषार्थ है।उसे करने का अधिकार है।परन्तु  वह कितना भी करेगा, उसे प्रकृति के लिए क्षणभर में मिटाने में देर नहीं लगेगी। प्रकृति ने इतनी सी छूट दे रखी है। यह घोड़ा है, यह मैदान है, तुम इसे अपनी मर्जी के अनुसार चलाओ। पर यह समझता है, घोड़ा मेरा है, मैदान मेरा है, मैं मर्जी का मालिक हूं। जो कुछ हो रहा है, मेरी ही सामथ्र्य है, मैं शक्तिमान हूं।
    वह यह नहीं जानता है कि जो सफलता मिली है, वह प्रकृति की इच्छा से ही है, उसकी ही इच्छा से स्वतन्त्रता है। प्रकृति जब देखती है कि वह हद से बाहर हो गया है, वह समाप्त कर देती है।
    यहां प्रश्न इस बात का नही है कि जो भूमिका मिली है, वह छोटी है या बड़ी,  परन्तु हम हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका का ही चयन चाहते है।यही दुख का कारण है।
    रामकृष्ण परमहंस बड़े संत थे। उन्होंने बहुत त्याग किया। यहां तक कि अपनी पत्नी को भी त्याग दिया। सारा जीवन सत्य की खोज में लगा दिया। वे काली की शक्ति चाहते थे। शक्ति तो मिली, पर यह भी पता लगा कि इस स्टेज पर तुमको फल तो मिलेगा, पर उपयोग नही कर पाओगे, तो उपयोग के लिए दूसरों को ढूंढना पड़ा। शक्ति का सदुपयोग विवेकानन्दजी द्वारा हुआ।
    प्रकृति शक्तिशाली है। उसने मनुष्य की आयु भी तय कर रखी है। शरीर पंच महाभूतों से बना है। शरीर में इन महाभूतों का जरा भी संतुलन बिगड़ा- विकृति आ जाती है। आप बाहर से कितनी ही दवाएं खाएं, कितने ही बड़े चिकित्सक रख लें- विकृति का इलाज नहीं है।
    मनुष्य की सारी सत्ता, महत्वकांक्षा, प्रयत्न सब प्रकृति की दी गई छूट के भीतर ही रहता है।
    और इसी परिधि में वह कहता है- यह मैं कह रहा हूं, यह मैने किया है, यह मेरा है, मैं ही सब कुछ हूं।यही भूल है।
    करना यही है- प्रकृति के नाटक को ध्यान में रखते हुए, परिस्थिति को बदस्तूर चालू रखते हुए, यह ध्यान रखना कि यह जो कुछ हो रहा है- असार है। व्यवहार निभाते हुए यह ध्यान रखना है कि मैं बस, निभा रहा हूं, और मेरा कोई भरोसा नहीं है।
यह भय की स्थिति नहीं हैं ?
भय वही है, तभी तक है, जब तक यह विश्वास है कि हम अपने आप को बचा सकते हैं,  तभी तक भय है।यह विश्वास रखना चाहिए कि अनिष्ट तो होगा ही ं- और जब होना है, तब होकर ही रहेगा। तो उससे निर्भयता आ जाती है। मन को निश्चलता मिल जाती  है कि जो कुछ भी होने वाला है, वह तो होगा ही- हमें इस बीच अपने कार्य को करते रहना है।
    हां, सीमित ही स्वतन्त्रता है। नाटक में कितने ही बड़े बन जाओ, अभिनेता बन जाओ, नेता बन जाओ, सेठ बन जाओ, संत बन जाओ- पर अन्त में सब छूट जाता है, सबका नाश हो जाता है। यह ज्ञान होने के बाद फिर ज्यादा प्रपंच में मनुष्य नहीं पड़ता।परन्तु जानकारी सभी को है। पर वह मानता है,ऐसा कुछ किसी दूसरे के साथ ही होगा।
    इतने महान साम्राज्य स्थापित हुए। बड़े बड़े सम्राट हो गए। कहां गए सब खण्डहर ही खण्डहर रह गए है, उनके नाम तक नहीं रहे। ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हमारे ही सामने हुआ है। अब वह भी अलग अलग होने को जा रहा है। जब बढ़ने का वक्त आया, कितना बढ़ गया।
    इसीलिए कहा जाता है कि यह अहसास हो जाना चाहिए कि हमारी सीमित स्वतन्त्रता है। हम कुछ नहीं कर सकते, वास्तविकता यही है।परन्तु हमें निरन्तर कर्मरत रहना है। इसीलिए कर्म अवश्य करो। प्रयास अवश्य करो- जो होना है, होता रहेगा, प्रयास मत छोड़ो।
    बात बिल्कुल स्पष्ट है।
    परन्तु  हम स्पष्ट नहीं है, मतलब की बात पकड़ लेते है। बाकी छोड़ देते है। इस प्रकार काट छांटकर अपना रास्ता बना लेते है। वही गलत है। जो असार है, जिसे हम सही नहीं मानते, उस प्रपंच में पड़ना भी उचित नही हैं।
   
    करना जो है, अनादि काल से चला आ रहा है, चलता रहेगा। तुम्हें स्थिर बु(ि होकर के, अपनी बु(ि स्थिर करके जो पार्ट तुम्हें मिला है, अदा करना है। अदा तो करो, पर उसका स्मरण मत करो।
    जहां तुमने याद किया, वह तुम्हें सतायेगा।
    स्मृति ही पाप है।
    इसीलिये कहता हूं, वर्तमान मंे रहो।
    क्षणभर भी पीछे मत जाओ, न क्षण में आगे का सोचो।
    पाप और पुण्य की ये जो शास्त्रीय मान्यताएं है?ये जितनी भी कल्पनाएं हैं, तभी तक हैं,जब तक हम स्वयं अनतर्मुखी नहीं बनते है। जब स्वयं अन्तर्मुखी बनने लग जावेंगे तो हमें स्वयं से प्रेरणा मिलने लगेगी, यह काम हमें करना है। यह काम हमें नहीं करना है।
    उसमें यदि अच्छा बुरा हो जाता है तो वह जिम्मेदारी हमारी नहीं वह जो हमें पार्ट दिया है, वह हमें पूरा करना है।एक थानेदार यदि किसी अपराधी को पीटते समय यह समझे कि मै पाप कर रहा हूं तो वह काम करेगा नहीं। उसकी डयूटी पूरी होगी नहीं।
    वैसे पेड़ पौधों में हरेक में जीव है।काश्तकार कहेगा, मैं फसल काटूंगा तो पाप हो जावेगा तो इस तरह से यदि हम सोचेंगे तो अपना जीवन ही नहीं चलेगा।
    यह तो सब कार्य करते रहना चाहिए ,इसीलिए बार बार अर्जुन से कृकृष्ण ने यही कहा कि यु( करो। यु( माने हिंसा।
    याने एक आदमी किसी को मार दे तो हिंसा है। यु( में एक आदमी हजारों को मार देता है।तो वह कहां पाप माना जाता है।उसको तो बहादुर मानते है।
    तो यह कल्पना है हमारी, इसने हमें धीरे धीरे इतना संकुचित बना रखा है कि हम इससे बाहर देखना ही पसन्द नहीं करते।
    यह बुरा है, यह बुरा है, वह काम मत करो, इसका पानी मत पियो, इसका खाना मत खाओ, इससे दूर रहो, इतना हमें संकुचित बना रखा है कि जरा भी इधर उधर नहीं हो सकते है। इन सबसे अगर छुटकारा पाना है तो अन्तर्मुखी होना प्रारम्भ करो।
    जैसे जैसे अन्तर्मुखी होते जाओगे, वही मन, अन्तर्मुखी मन, जो और कुछ नहीं आत्मा की शक्ति है, इसके साथ हमें जुड़ने से पता चलेगा- स्थिति क्या है, हमें क्या करना है। यही गीता का उपदेश है।
जीवन का निश्चित उद्देश्य है। हमें अपना जीवन व्यवहार कुशलता के साथ, नैतिकता के साथ जीना है। यह उचित नही है कि छीना झपटी करें। दूसरों को सताएं। नैतिकता बनी रहे। दूसरों का अधिकार नहीं छीनें। अपना प्रयास करते रहें। अगर हम सही है, हमारा प्रयत्न सही है, तो व्यवहार कुशलता और नैतिकता अपने आप आ जाती है।
    जहां तक पहुंचना है, पहुंच जाते है।
    आवश्यकताएं - शारीरिक, मानसिक, बौ(िक अपने आप पूरी हो जाती है। यही जीवन का उद्देश्य है।
जब तक हम जीवित हैं - सुख से रहें, शांति से रहें।
इस संसार में हमारे जीवन का उद्देश्ययही  है ।

संस्कृति ः अवधारणा

संस्कृति ः अवधारणा
संस्कृति क्या है? यह प्रश्न आज सर्वाधिक विवादास्पद है। परन्तु अप संस्कृति क्या है, इसे परिभाषित किया जाना सरल हो गया है। बाजारवाद से मोहासक्त होते जा रहे व्यक्ति के भीतर आत्मघाती आत्म केन्द्रिकता, अजनबीपन, अमानवीयता का घुन व्यक्ति-जीवन को इतना खाली करता जा रहा है कि उसके पास उसका हृदय भी है,... वह इससे अनभिज्ञ हो गया है। विचार ही विकार है,... विकार मस्तिष्क की उपज है,... वहाँ की संपत्ति बुद्धि है। बुद्धि का विस्तार व्यापक तथा घना होता जा रहा है, जितना व्यक्ति बुद्धिमान होता है, उतना ही वह संवेदनहीन भी होता जाता है,... यह एक स्वाभाविक विकास है। ... वहां उसके पास और कुछ करने को बहुत समय रहता है,... पर अपने भीतर ‘रागात्मकता’ का विकास करने का अवकाश ही नहीं है।
अपसंस्कृति, प्रकृति के विरूद्ध खड़ी होती है, प्रकृति और बुद्धिमता का विरोध है। मनुष्य जितना बुद्धिमान होता जा रहा है, उतना ही वह प्रकृति का विध्वंस कर रहा है। यही अप- संस्कृति है। यह प्रकृति के प्रतिकूल खड़ी होती है, इसकी उपसंपदा है,विकृति, विनाश,यह बुद्धिजन्य ज्ञान की विकृतियों पर खड़ी होती है,जो सभ्यता का छिछला छोर होता है। यह व्यक्ति को तुच्छ, संकीर्ण, लोभ और दिशाहीन बनाती है। जब हम कहते हैं, वह व्यक्ति सुसंस्कृत है, तब आशय होता है व्यक्ति के पास आदर्श है, जीवन मूल्य है। वह समाज को उर्जावान तथा आस्थावान बनाने में समर्थ है, वैसे विचार रखता है।यह संभव है, व्यक्ति सभ्य हो, लेखक भी हो , पर सुसंस्कृत हो यह आवश्यक नहीं है।
यहां यह अवधारणा, संस्कृति को मूल्यपक्षता से सन्निहित करती है। जहां यह है वहीं संस्कृति है। संस्कृति मनुष्य जाति का वह ‘सामान्य; है जो उसके अनुभव जगत की सत्ता पर आधारित है। संस्कृति के लिए व्यक्ति और समाज का अधिक बुद्धिमान तथा सभ्यता का दास होना अनिवार्य नहीं है, सभ्यता बुद्धिजन्य ज्ञान पर आधारित है।
दरअसल हमारे यहां शब्दों की छेड़छाड़ बहुत है, अपने लाभ के लिए हम शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। अंग्रेजी भाषा और ईसायत का गहरा संबंध है। हमारे यहां ‘धर्म’ शब्द है, वहां रिलीजन है, जिसका अर्थ मजहब होता है। हमारे यहाँ संस्कृति शब्द है, उनके यहां ‘कल्चर’ शब्द है।
इस प्रकार ‘कल्चर’ शब्द संस्कृति का समानार्थी शब्द नहीं है। संस्कृति शब्द में ही उसका निहितार्थ निहित है। संस्कृति व्यक्ति और समाज को मूल्यवत्ता प्रदान करती है। उसे समाज में उपादेयता सौंपती है, व्यक्ति और समाज के भीतर अन्तर्सम्बन्धों में सामंजस्य लाती है।
हमारे यहाँ हमने सभ्यता को संस्कृति का पर्याय मानकर ही गांव के मुकाबले शहर को, दलित के मुकाबले  सवर्ण को, स्त्री के मुकाबले पुरुष को सुसंस्कृत करार दिया है। सभ्यता को ही मूल्यवान मानने के कारण हम आदिवासियों का ही शहरीकरण करना चाहते हैं। उन्हें संस्कृति की मुख्य धारा में लाना चाहते हैं। प्रायः ग्रामीण अंचलों के लिए, लोकभाषा तथा लोक संस्कृति शब्द बनाया गया है। ‘लोक’ क्या है? क्या ग्रामीणजन, आदिवासी ही लोक हैं। अगर ग्रामीण जन में लोक निवास करता है, तो शहरीजन के पास तो मात्र सभ्यता है, वहां तो संस्कृति की धारा कभी की सूख चुकी है?
जहाँ लोक हैं, वही संस्कृति है, जहां लोक है, वहां हृदय है, वहां संवेदना है। वहां मानव है, संभव है, वहां सभ्यता भी हो, पर सभ्यता की दासता  नहीं है। सभ्यता दैनिक जीवन जीने की एक कला है, सामग्री देने वाली व्यवस्था है, बस,... परन्तु जहां संस्कृति है, वह मानव जाति की अनुभवात्मक यात्रा का सामान्य सुरक्षित है। जिसमें बौद्धिक- शारीरिक श्रम, जीवन मूल्य, संस्कार, उसकी आध्यात्मिक चेतना के प्रयास उसकी अनुभव कला सभी सुरक्षित है। दर्शन की परिभाषा में महर्षि कणाद के वैशोषिक दर्शन के आधार पर वह उसका ‘सामान्य’ है। संस्कृति-अतीत की परंपरा में सुरक्षित रखती है, वर्तमान में जीना सिखाती है, तथा भविष्य के लिए आदर्श सौंपती है,... जीने की कला संभलाती है। जिस प्रकार वैशेषिक दर्शन में विशेष की अवधारणा है, उसी प्रकार, संस्कृति, सामान्य होते हुए भी अपने प्रकार में वर्गों के भीतर, समुदाय के भीतर जाकर, क्षेत्रीय रंगों में भी अभिव्यक्त होती है। यह उसका आंचलिक पसारा है।
सभ्यता को ही ‘संस्कृति’ मानते रहने के कारण हमारे यहां शासक वर्ग का व्यवहार तथा आचरण ही कृत्रिम-‘सांस्कृतिक होता चला गया है। ... मध्यकाल में संत मत के प्रचार-प्रसाद के साथ असभ्य व्यक्ति, अशक्त व्यक्ति की विराटता का दिग्दर्शन पहली बार हुआ था। यहां शासकों की संस्कृति से हटकर सामान्य जन की संस्कृति, उसका विश्वास मूल्यवान बना था। असामथ्र्य को, वंचित को आप असभ्य कह सकते हैं, परन्तु संस्कृति विहीन नहीं। मूल्य रहित नहीं, वह भी अपनी झोंपड़ी में, अपने परिवार के साथ वहीं संतोष पाता है, जो राजमहल में भी संभव  नहीं हो?
यहां हम सभ्यता, सभ्य और असभ्य शब्दों को संस्कृति की परिधी से बाहर जाकर विवेचित करना चाहते हैं। संस्कृति, मनुष्यता का वह सामान्य है, वह बोधक तत्व है, जो उसे इतिहास की परंपरा में इतिहास बोध सौंपता है। यह उसकी अपनी आंतरिक पूँजी है,यह उसकी श्रम के प्रति निष्ठा है, जिसके लिए उसे बाजार से जाकर कुछ खरीदना नहीं है, यह उसकी आंतरिक संवेदना है, जो सूक्ष्म है, व्यापक है, सघन है, जो उसके भीतर एक तरलता लाती है, जो उसकी हृदय की उपसंपदा है... साहित्य-कला का जन्म व उसकी सिद्धि सहृदय या कवि की हृदय की मुक्तावस्था में ही है,तो श्रमिक के श्रम की उपलब्धि उसके नवीन अध्यवसाय में है।
जिस प्रकार से संप्रदाय, धर्म नहीं है,... कर्मकांड आध्यात्म नहीं है, संस्कृति की धरती पर ही धर्म का वृक्ष खड़ा होता है। धर्म की परिभाषा है, जिसका वरण होता है, जो वरण करता है, धर्म वह धारणा, जो व्यक्ति इतिहास बोध से जन्म के साथ धारण कर लेता है। परंपरागत उसके विश्वास, उसके संस्कार जो उसे बेहतर इन्सान बनाने की ओर ले जाते हैं,।संप्रदाय सौंपा जाता है, यह बाह्य बुनावट है, जो उसे उसकी पहचान कराती है। एक धर्म में अनेक संप्रदाय हो सकते हैं, होते हैं, पर संस्कृति में उसके रंग-रूप, स्थानीय, क्षेत्रीय  आधार सभी की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से  हो सकती है, होती है, पर अप-संस्कृति उसका कोई हिस्सा नहीं है, यह सभ्यता और असभ्यता के बीच की कड़ी है। असभ्यता, का संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। संस्कृति, मानवीय है, वह आदर्श और व्यवहार का अपने आचरण के द्वारा संयोजन करना सिखाती है।
आज सांस्कृतिक पश्चिमीकरण के हथियार के रूप में  बाजारवाद का सबसे बड़ा हमला ‘संस्कृति’ की जड़ों पर हो रहा है। सांप्रदायिकता भी ‘संस्कृति’ की जड़ों में दीमक डालने का प्रयास करती है। यह संप्रदाय विशेष की संस्कृति के नाम पर प्रचारित करती है। उधर शासक वर्ग भी अपने अनुसार संस्कृति को परोसने का प्रयास करते हैं। इसकी पहली पहचान भाषा के स्तर पर होती है, हिन्दी भाषा के स्थान पर, मातृ भाषा के स्थान पर, अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व, सभ्यता की देन हैं, यहां बुद्धिगत बढ़ता व्यवसाय है। इसका संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध बाजारवाद है। टी.वी. पर बढ़ते सीरियल, सामाजिक विघटन को मूल्यांकित करने का प्रयास यह भी सभ्यता का ही एक परिचय है।
एक सुसंस्कृत व्यक्ति या समाज, असभ्य भी हो सकता है, सभ्यता, शिक्षा व प्रोद्योगिकी के इस्तेमाल होने से जुड़ी हुई है। संस्कृति का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह मनुष्य की मनुष्य होने की पहचान है, यह उसकी अपने परिवेश, अपनी प्रकृति के साथ संतुलित सामंजस्य रखने की भावना है।