Friday, October 2, 2009

कविता

उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,

यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,

हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै

दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना

सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै

भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।

कविता,

उदासी
तुम उदास हो
कप्तान नहीं रहे
हम उदास नहीं
खिलाड़ी ही कब रहे,

यह होना ही
होने की संभावना में
मात्र बस खोना है;
सुबह से शाम
शाम से सुबह तक
चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,

हवा बहती है
क्या अहसान करती है,
धूप
सबके आंगन में बराबर ही बरसती है
वर्षा सी नहीं
आधे ही खेत को खाली भी रखती हैै

दृष्य ही है सार
सच भी यही है
पर दर्शक नहीं होे तुम
दृष्टा, समय के संग
भुजाएं तनी रखना

सोने की धड़ी यह नहीं
ढपली अपनी ही यहाॅं बजनी हैै
जो जागा है
जगा है
जगने को सजग है
वही बार-बार गिरकर
जिन्दगी को जीकर रहा हेै

भले ही काला, बदसूरत
घिनोना चींटा रहा हो वह।

पूज्य स्वामीजी


3
़पूज्य स्वामीजी द्वारा लिखितअनन्त यात्रा“ उपन्यास की तीसरी कड़ी प्रेषित है

    सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
    ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
    कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
    ”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
    हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
    आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
    उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
    उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
    करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
    रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
    कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
    ”कहां से आये हो ?“
    ”जम्बू द्वीप से“
    ”राज्य ? राजधानी ?“
    ”?“
    ”नाम बताओ ?“
    ”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
    ”पेशा ?“
    ”?“
    ”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
    उत्तर-नदारद
    ”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।


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    सतयुग के अंतिम चरण में किसी समृद्ध देश की राजधानी में राजभवन के बाहर विशाल पथ पर दो नौजवान युवक अपने यौवन में मदमस्त हुए मस्त हाथी की सी चाल से, निरुद्देश्य इतस्त्तः भ्रमण कर रहे थे। समय वही रात्रि का दूसरा पहर रहा होगा। पथ के दोनो तरफ बनी विशाल अट्टालिकाएं चमकदार रंग तथा चित्र विचित्र रोशनी से जगमगा रही थी। प्रत्येक अट्टालिका के निचले भाग में विशाल क्रय विक्रय भण्डार, देश विदेश के सुंदर वस्त्राभूषणों से भरे पड़े थे, जो अपनी आकर्षक साज सज्जा के कारण परिजनों को बरबस अपनी ओर अन्नतआकृष्ट कर रहे थे। आगन्तुक बड़ी देर तक अवाक् दृष्टि से सबकुछ देखते रहे। उनके व्यवहार से हर कोई व्यक्ति यह जान सकता था कि दोनो युवक इस देश के न होकर किसी अन्य देश के होने चाहिये।
    ऐसा ही एक भण्डार जिसमें अनेक प्रकार के खाधान्न बड़े सलीके से सजाये हुए, तरह तरह के शरबत तथा अन्य पेय पदार्थों के चषक बड़े आकर्षक ढंग से सजाये हुये थे। अंदर से बाहर, बड़े ही स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध पद्यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। दोनों युवक ठिठक कर खड़े हो गये भूख और प्यास विह्नल मित्र द्वय भण्डार गृह में प्रवेश के विचार से प्रसन्नता की मुख- मुद्रा में थे। एकाएक उनकी मुख मुद्रा उद्विग्नता में बदल गई दोनो एक दूसरे को ताकते रह गये।
    कारण स्पष्ट था। दोनो ही द्रव्य विहीन थे। हटो ! हटो। अकस्मात् इस आवाज से पौरजन अपने अपने स्थान पथ के किनारे अवाक् होकर खडे रहे राज भवन के विशालकाय खुले फाटक से चार सुदर्शन एवं सुसज्जित अश्वारोही जो सम्भवतः किसी राज पुरूष के अंगरक्षक से प्रतीत हो रहे थे, तेजी से अपने अश्व दौड़ाते आ रहे थे उनके पीछे पीछे एक सुदर सुसज्जित रथ था जो किसी संभ्रान्त परन्तु रोबदार राजपुरूष को ले जा रहा था, जैसे ही रथ आगे बढ़ा दोनों मित्रों के पास एक युवक जो राज्य कर्मचरी सा प्रतीत होता था, अपने साथी से कह रहा था ”मालूम होता है महा मात्य अमृतराय, रानी चूड़ाला से किसी गम्भीर विषय पर मंत्रणा करने पधारे होंगे।“
    ”पधारिये महाराज“, भण्डार के बाहर एक पीढ़े पर बैठ हुए सुदर्शन से किन्तु साधारण परिवेशवारी युवक ने खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर कहा ”आपके परिवेश से भासित होता है कि आप हमारी इस विनयपुरी में अजनबी है तथा यायावर के रूप में भ्रमण हेतु निकले प्रतीत होते हैं। क्या आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे ? मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।“ मित्रद्वय की स्वीकृति समय मुद्रा से प्रसन्न होकर वणिक पुत्र ने भोजन व्यवस्था का आदेश भृत्यों को दिया और पाद प्रक्षालन हेतु दोनों को अन्तरगृह में ले गया।
    हस्त प्रक्षालन के पश्चात दोनो युवकों को उच्चासन पर बिठाकर सामने चैकियां रखी गई। फलों के मधुर रसों के चषक, अनेक प्रकार के नमकीन चावल एवं मिष्ठान तरह तरह के फलों के मिश्रित पदार्थ आदि से भरे पूरे थाल देखकर दोनों ही मित्र प्रसन्नतापूर्वक भोजन पर टूट पड़े। बुद्धिमान वणिक पुत्र को समझने में देरी नहीं लगी कि दोनों बड़े भूखे थे तथा भोजन को शीघ्र से शीघ्र उदरस्थ करना चाहते थे।
    आधे से अधिक भोजन समाप्त होने पर कुछ शांति का अनुभव हुआ। ऐसा सोच वणिक ने प्रश्न किया ”महाराज“! आप किस देश के वासी हैंे, तथा इस देश में कब पधारे हैं ? यहां पधारने का प्रयोजन भी मालूम हो तो अकिंचन यथाशक्ति सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार है। मित्र द्वय और कोई नही अपितु मैं और मेरा मित्र अर्जुनदेव ही था, प्रश्न का उत्तर हम स्वयं नही जानते थे। अतः भोजन से हाथ रोककर एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
    उत्तर ढूंढने के प्रयास में मेरा मन परमपिता परमात्मा के इस विचित्र खेल के बारे में सोचते हुए सुझाने के लिए प्रार्थना कर ही रहा था कि उस अदृश्य शक्ति ने विचित्र ढंग से हमारी सहायता की।
    उत्तर देने के लिए जैसे ही मैंने मुंह खोला बड़े जोर का घंटा नाद करता हुआ एक रथ उस भण्डार गृह के बाहर स्थित हुआ और हम सबका ध्यान उसी ओर आकर्षित हो गया। परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होने के पूर्व ही एक बलवान सैनिक अधिकारी ने हमें भोजन समाप्त कर अपने साथ तुरंत चलने का आदेश दिया। आप समझ सकते हैं हमारी मानसिक दशा क्या हुई होगी ? किसी तरह हस्त मुख प्रक्षालन करके भी वणिक पुत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी भूल गये और सैन्याधिकारी के साथ रथ पर आरूढ़ हो गये।
    करीबन आधा घंटे की तेज दौड़ के बाद रथ ने राजपथ छोड़कर एक विशाल जंगलनुमा भूभाग में प्रवेश किया। उस स्थान पर सैनिक छोटे छोटे तंबुओं में विश्राम कर रहे थे। कुछ बाहर पहरा दे रहे थे तो कुछ नाच गाना मौज मस्ती में रंगरेलियां मनाते नजर आ रहे थे।
    रथ एक विशान भवन के पास रूक गया। दो सैनिक हमारी ओर दौड़ते हुए आये और हमें उस विशाल भवन के अनेक कमरों में से घुमाते हुए एक सुसज्जित कक्ष में लाकर खड़ा कर दिया गया।
    कमरे में एक छोटा अधिकारी तथा दो सहायक कर्मचारी थे। हम दोनो को प्रस्तुत किये जाने पर अधिकारी ने हमसे निम्नानुसार संवाद करना प्रारंभ किया -
    ”कहां से आये हो ?“
    ”जम्बू द्वीप से“
    ”राज्य ? राजधानी ?“
    ”?“
    ”नाम बताओ ?“
    ”नीलकंठ, अर्जुनदेव“
    ”पेशा ?“
    ”?“
    ”यहां किस मार्ग से तथा किस प्रयोजन से आये हो ?“
    उत्तर-नदारद
    ”हमारे देश में ओर विशेषकर राजधानी में बिना स्वीकृति के प्रवेश निषिद्ध है। जुर्म की सजा मौत है। कल अमात्य की स्वीकृति तक काल कोठरी में बंद रहोगे।“ और हमें उस राजपुरूष ने बिना हमारी बात सुने एक काल कोठरी में बंद कर दिया। हम थके तो थे ही, ऊपर से भरपेट भोजन भी किया था, अतः बिना इस बात का ध्यान किए कि हमें कैद कर लिया गया है तत्काल गहरी निद्रा में डूब गये।