Thursday, July 16, 2009

ेेआज का समय और हम

ेेआज का  समय और हम  

जो शास्त्र में लिखा है, वही सही है, उसे मानकर यह चलना भूल है। शास्त्र भी मनुष्य ने बनाए हैं, उस समय जैसी बुद्धि थी, ... जैसा चिन्तन था, वह कहा गया है। यह संसार विकासशील है, हमारे समय में जो बालक थे, वे आज के बालकों की तुलना में बहुत पीछे थे, आगे आने वाले बच्चे और भी बुद्धिगत योग्यता में आगे आएंगे।
मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पहले से बहुत बढ़ गई है। नए-नए विचार उत्पन्न हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए हैं। टेक्नोलोजी का इतना तेजी से विकास हुआ है कि हमारे विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।
पुराने विचार वर्तमान में लाभप्रद नहीं है। कई प्रकार की विसंगतियां उनसे उत्पन्न होती है।
ग्रन्थ भी मनुष्य ने ही बनाए हैं। भगवान तो लिखने आए नहीं हैं।
भगवान कृष्ण को भगवान माना, भागवत पुराण ही है। पुरानी घटनाओं पर आधारित है। इसमें लोगों ने विशेषताएं, शक्तियां बढ़ा-चढ़ाकर बताई है।
थे, तो वे भी मनुष्य ही।
मानव शरीरधारी कोई भी हो, उसकी सीमा होती है। महान शक्ति उसमें समा नहीं सकती है। सौ वाट के लट्टू में चार हजार वाट की पावर आ जाए तो वह फ्यूज हो जाएगा।
शरीर में शक्ति को सहन करने की एक सीमा है।
शास्त्र आप पढ़ते रहे।
शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे, यदि आपने सही तरीके से मुझे सुना है। इन विचारों पर मनन-चिंतन किया है। तो पुराने शास्त्र आपको प्रभावित नहीं करेंगे। पढ़कर देखें, पढ़ा करें, क्या नई बात आपको पता होती है, चिंतन करें, बुद्धि से परीक्षण करें, उचित लगे अभ्यास में लावे।
जितनी बातें हम सुनते हैं, अधिकतर अतिश्योक्ति होती है। सब मन को उलझाने के प्रयास हैं।
सृष्टि के दो भाग हैं।
एक ब्रह्म है, एक माया है। ब्रह्म शक्ति है। उसकी क्रियाशीलता माया है। माया में पांच महाभूत हैं। पांच महाभूतों से ही सारी सृष्टि और यह शरीर बना है। इसमें पृथ्वी, अग्नि, वायु, पवन और आकाश है। इससे बना हुआ शरीर या हर वस्तु, इस दृष्टि के साथ निरंतर घूम रही है। तो यह माया है। पंचमहाभूत है। इसका स्वभाव स्थिरता नहीं है। निरंतर गतिशीलता और परिवर्तन। वह इतना सूक्ष्म है कि हमको नज़र नहीं आता है। कण-कण में परिवर्तन हो रहा है। निरंतर हो रहा है। इस परिवर्तन के साथ, विकास समझिए, बनना, बिगड़ना, हर वस्तु का समान है। मनुष्य का भी यही स्वभाव है।
बचपन से बुढ़ापे तक गतिशीलता ही है। वृद्धावस्था में विकार होता है, इन्द्रियां थक जाती है। फिर शरीर का टिका रहना मुश्किल है। हमारे यहां सौ वर्ष की आयु अधिकतम मानी गई है। आज कोई कहे किसी की हजार-पांच सौ साल की आयु है, ... वे हिमालय पर रहते हैं, ... मात्र अतिश्योक्ति है। हमें अपनी बुद्धि से निर्णय करना है।
आप भी मेरी बात पर इसीलिए विश्वास मत करना कि आप मेरे प्रतिश्रद्धा रखत हैं। मेरे विचार मेरे लिए हैं।
आप सही तरीके से सोचें-
ळववक उंेजमत जमंबीमे ीवू जव जीपदा दवज ूींज जव जीपदाण्
निर्णय अपनी बुद्धि से लेना है। मनन चिंतन करके सही निर्णय पर पहुंचना है। सुनी-सुनाई बातें, केवल सुनाने के लिए होती है।
पुरानी कहावत है-
।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती है। करोड़ों में कोई एक संत होता है, ... कोई एक दार्शनिक, ... इसके लिए चित्त का निर्मल होना अत्यधिक आवश्यक है।
संसार एक विचित्र नाटक है। ।इेनतक क्तंउं कहा जाता है। विचित्र है। यहां अनेकों विचित्रताएं होंगी।
यदि हमें कोई भी व्यक्ति यह कहे कि यही सच है, तो जितनी शक्ति से वह कहेगा लोग उसे ही सही मानेंगे।
थोड़े दिन बाद दूसरा विचार आएगा, वह उसको खारिज कर देगा। यही प्रकृति का बड़ा नाटक है।
साधक कहता है, वह साधना करता है। प्रकृति के नियम के अनुसार, साधना आवश्यक ही नहीं है। स्वाभाविकता आनी चाहिए। साधना मात्र प्रयास है, यह स्वाभाविकता के निकट है।
म्ििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू जींज दव मििवतज पे तमुनपतमकण्
मििवतजेए (प्रयास) तो करने हैं, यदि नहीं करते हैं तो कर्म की प्रकृति के खिलाफ जाते हैं। कर्म तो करना ही है। पर अंत में जाकर- सच्ची साधना स्वाभाविकता ही है। बालक स्वाभाविक है। वह अपना आचरण बाह्य दबावों से नहीं बदलता है। विचित्रता संसार रूपी नाटक की विशेषता है।एक भी अंग इसका अनावश्यक नहीं है। परन्तु इसमें उलझने के स्थान पर तटस्थ रहो। तटस्थता केवल वर्तमान में रहने से आती है। यदि वर्तमान में नहीं है तो हर विचार हमें धक्का देगा, सोचने पर मजबूर करेगा।
... साधु-संतों की चर्चा व्यर्थ है।
जिन्हें हम साधु समझते हैं, वास्तविक साधु नहीं है।
लाखों करोड़ों में कोई एक साधु होता है।
सब अपने-अपने स्वार्थों से चिपटे लोग हैं, ... यह भी उदरपूर्ति साधन है, इसीलिए बने हुए हैं।

- हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा है।
पुराने ग्रन्थों के चार्वाक को भी ऋषि माना है। उनकी भी परंपरा रही हैं। जब तक जीना है, सुख से जीना है। कर्ज लेकर भी घी को पीना है। सुख से रहना है। एक बार शरीर भस्म हो गया फिर किसने उसे देखा है। यही संसार की विचित्रता है।
जितने दर्शन उतने विचार, ... जितनी संप्रदाय उतनी ही पद्दतियां है। यही संसार की विचित्रता है। सही-गलत के चक्कर में मत पड़ो। संसार लीला क्षेत्र है। प्रकृति का आनंद लो। तटस्थता बनी रहे। स्थितप्रज्ञ रहते हुए सांसारिक कर्म करो, यही सार है। भागकर कहीं जाना नहीं है।

वाचिक मौन, मौन नहीं होता है। परन्तु मानसिक मौन मन का मौन है। मानसिक मौन जब एक सीमा तक पहुंच जाता है, तब उस मन में तरंगे जैसी निकलती है। वो सीधी दूसरे के मन को जाकर उसे वे प्रेरणा देती है। वह भी इसी प्रकार मौन रहकर के, मौन होने से जो वह महान शक्ति है, उसके द्वारा आने वाली तरंगों से  दूसरे व्यक्ति को, मन की तरंगों द्वारा प्रभावित कर देता है।
वह संदेश उन तक पहुंचा देता है जिससे उनकी मानसिक स्थिति अपने आप ही एक विशेष स्थिति में पहुंच जाती है, उन्हें अटूट शांति मिलती है। संतोष होता है। उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है।

किसी के भविष्य को जानने का प्रयास मत करो, पता भी लग जावे तो बोलो मत, पूर्वाभास होता है, तो इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परन्तु यह भी बाधक है। पहले एक दो बातें सही होंगी, फिर तीसरी बात गलत हो जाएगी। प्रकृति किसी को भी अपने रहस्य को जानने का अवसर नहीं देती है। कोई भी जान भी लेता है तो उसका मुंह बंद करा देती है, उसे हटा देती है।

‘मैं’ का अर्थ, गीता में भक्ति मार्गियों ने भगवान कृष्ण के लिए किया है। भगवान मानकर उनकी पूजा करो ‘शरणा गति में जाओ’
- ‘मैं का अर्थ, मैं शरीर धारी नहीं हं। यह तो पंच महाभूतों का बना है। स्वभाव है, वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्यवहार और आध्यात्मिकता में परस्पर विरोधी बातें हैं।
मैं का अर्थ, अंतर्मुखी होना पड़ेगा। तभी सामंजस्य का पता लगता है।

याद रखना। जो भी समस्या आपके सामने आएगी। उसका मुकाबला सीना तानकर करना। फिर वह कभी आएगी ही नहीं। यदि पीठ दिखाई तो फिर वह हावी होती जाएगी। कहां तक भागते फिरोगे। भागकर जावेगे भी कहां, मेरे सामने अनेक समस्याएं आई, मैं नहीं भागा। समस्याएं इसीलिए आती है कि हमें अपनी योग्यता का परिचय देने का मौका मिलता है। इससे मुझे जीवन में सफलताएं मिलीं।
निडर होकर मुकाबला करना होगा।
भागकर चले जान चाहो तो कहां जाओगे, हमारे भीतर से अंदर का डर निकल जाना चाहिए। इसीलिए भीतर किसी तरह की आसक्ति नहीं रहे।
आसक्ति नहीं होने से जो भी चीज चाही है, हमारे पास आएगी, जिस क्षण उसे जाना है, चली जाएगी।
आपका इस पर वश नहीं चलेगा।
समुद्र में लकड़ियां लहरें ले आती है, एक जगह इकट्ठी हो जाती है। फिर हवा का झोंका आता है, बिखर जाती है।
वर्तमान में हर चीज मेरी है।
जब संबंध टूटेगा।
टूट जाएगा, बस आसक्ति नहीं होनी चाहिए। चिंता नहीं होनी चाहिए। यही सार है। हमेशा मुस्कराते रहो।  प्रसन्न रहो। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहो। जहां आत्मविश्वास नहीं है वहीं दूसरे का सहारा लिया जाता है। चाहे बीमार पड़ने पर बार-बार चिकित्सा व चिकित्सक का हो। भोगने में विश्वास करो। भागने में नहीं। शारीरिक विकार है, हमें भोगना है। शांति के साथ भोगना हैं। प्रसन्नता रहे, जैसा सुख है, वैसा ही दुख है।
भगवान शंकर का प्रतीक इसी बात का है।
खुद विष पी गए, पर गले से भी नीचे नहीं उतरने दिया।
अर्जुन को मोह हुआ था, ... हमारे भाई-बन्धु मारे जाएंगे। मृत्यु को कोई पसंद नहीं करता। भगवान ने उससे कहा- ‘तुम इन विचारों से कर्तव्य से हट रहे हो। धर्म से विचलित हो रहे हो। तुम्हे युद्ध करना है। लोग कुछ भी कहें। प्रकृति को तो युद्ध चाहिए। जो बना है, वह बिगड़ेगा ही। प्रकृति में जो पैदा हुआ है, ... वह रहेगा, ... नष्ट भी होगा।
जितनी सृजन की आवश्यकता है, उतनी ही नाश की भी है। सृष्टि की गति के लिए नाश भी आवश्यक है।
परिस्थिति से भागना नहीं है, मुकाबला करो।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहा था- स्थितिप्रज्ञ बनकर युद्ध करो। यही सार है।

Monday, July 13, 2009

पूज्य स्वामीजी

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समर्पण का पथ

               
यहां मात्र विधि है। सब स्वीकार है मुझे
    प्रकृति ने जो दिया है
    जो सौंपा है
    श्रेष्ठतम है।मैं कहाँ तक बदलूंगा, मेरा सामथ्र्य ही बहुत कम है।कहीं तो मुझे रुकना ही होगा।जो भी मुझे आज मिला है ,कल मैंने ही तो यह चाहा था।तब हम साधना का प्रारंभ कर सकते हैं।यहां लड़ना किसी से नहीं है।न निंदा न वंदना।न कोई चाहत।
स्वामी जी कहा करते थे,याचक मत बनो।तुम अनिष्ट की कल्पना कर-कर ही टूट जाते हो।तूफ़ान आता है,पेड. किस तरह सामना करता है,पूरा हिल जाता है,पर वह गिड़गिड़ता नहीं है।

योग के नाम पर प्रारभ में ही पूरा बल छोड़ने और छूटने पर होता है। यहा उसकी कोई जरूरत ही नहीं है।तुम तो बस जो विधि तुमने ली है उस पर चलते रहो जिसे छूटना होगा वह स्वतः छूटता चला जाएगा। साधना के नाम पर साधक को लड़ने के लिए तैयार किया जाता है।यह योग का मार्ग है।    संकल्प का मार्ग है, संघर्ष करना है
    पहला संघर्ष- काम से
    काम के विरूद्ध  रहना है, जब विवाह किया है,तब आप योग की तैयारी में नहीं जासकते।पर सब जगह उल्टा पाठ पढ़ाया जारहा है।गृहस्थ का मार्ग दूसरा होगा,उसका मार्ग गृहस्थी से ही जाएगा।उसे अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह से निभानी ही होंगी।
    इसीलिए  योगी  जो भी साधन अपनाता है वह गृहस्थ के प्रतिकूल है।भारत की हजार साल की गुलामी का मुख्य कारण यही रहा कि हमने मूढ़ता में आकर गृहस्थ के विरुद्ध ही रास्ता पकड़ लिया।  शक्ति का मूल केन्द्र नाभि के पास है।उसे जागृत होना है।परन्त परम्परागत  साधना  मूलाधार के विरूद्ध है।हमारी सारी साधनाओं का प्रारंभ इसी मूलाधार के विरुद्ध ही रहता है।यही गलती हमें कहीं का नहीं रहने देती।
     गहरी सांस लेना सीखें।प्राण वायु नाभि तक जाए ,विचार कम से कम हों, मस्तिष्क की क्रिया पर कम से कम दबाब डाला जाए।इससे स्वाभाविक रूप से उर्जा का विकास होगा।उर्जा का विकसित होना  कोई पाप नहीं है।
होना  यही चाहिए-    यह जगत परमात्मा की लीला भूमी है। सब उसी का  ही है, शिव और शक्ति का मिलन  है यहाँ
    किसके खिलाफ जाना है?
    किससे कब लड़ना है?
    - उसका उपभोग करो, काम शक्ति परमात्मा की देन है।उसके आभारी रहो। तुमने असहयोग किया ,क्या इ्र्रश्वर खुश होगा,यह तुम्हारी भूल है।जो भी परमात्मा ने दिया है ,साधन सामग्री है।
    उपयोग करो
    रूपांतरण करो
    - जो भी है, उसे स्वीकार करो। सामथ्र्य का सदुपयोग ही साधना का प्रारंभ है।
    समग्र स्वीकार
     मांगो मत, प्रयास करो। जो भी क्रिया है उसमें अपने आपको पूरा लगादो। कर्तुम, अकर्तुम ,अन्यथा कर्तुम, यही होगा।होगा,नहीं होगा,कुछ तीसरा होगा। परन्तु यहां तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है। लेकिन सजगता में रहो- होश में रहो
    संसार और मोक्ष- विपरीत नहीं है
    जाल  सनातन से रहा है
    किससे छुटकारा
    मुक्ति किसी की नहीं होती, कहां जाओगे ,जो भी गया लौटके बताने नहीं आया,इस दुनिया से बेहतर कोई भी जगह नहीं है।
    संसार रसमय है, ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां परमात्मा न हो
    जब सब जगह परमात्मा है
    तो फिर किसे छोड़कर कहां जाना है-
    सब जगह जो भी है स्वीकार है, अच्छा मिला उसके अनुग्रही बनो।मन माफिक नहीं हुआ ,उसकी इच्छा तुमनत ही तो की थी।।तुम भी तो अपने बच्चों के हर काम पूरे नहीं कर पाते हो।उसकी भी मजबूरी रही होगी।तुम्हारा प्रयास कम रहा होगा।कम से कम सोचो।कोई संघर्ष नहीं होना है।
    तब मन का अनावश्यक भटकाव कम होने लगता है
    - सबको प्रकृति ने अपने कार्य से भेजा है।  हम सब इसरंगमंच के पात्र है
     जो ‘रोल’ हमेें दिया गया है, उसको वैसा ही करता है।
    शैतान भी उन्हीं ने बनाया है, उसका भी कार्य होना है।हम कौन उसका खेल बिगाड़ने वाले होते हैं।

,जहां समर्पण होता है, वहां मन की उहापोह भी खो जाती है
    अहंकार कभी भी समर्पण नहीं होने देता है, वह हर जगह कुतर- कुतर  करता है।वह किसी की बात स्वीकार ही नहीं करता।जब दूसरा चाहे वह गुरू ही क्यों नहो वह उस वक्त भी  इसमें नई बात क्या है? यह तो मुझे पहले से ही पता है, यह तो उस किताब में भी लिखा है मानकर अपनी ग्राहकता को रोक देता है।पत्थर की तरह जो रात दिन नदी में भीगा रहने बाद भी सूखा रहता है।
    बुद्धि अनेक उत्तर अपने पास रखती है
    -सीस देय ले जाए- कबीर ने कहा था, प्रेम बाजार में नहीं मिलता, शर्त है, सिर दे जाओ ।अहंकार कभी भी नहीं जाता।
    .. रावण के दस सिर थेे, दस गुना अहंकार, ... हांॅं
    तीर जब नाभि पर मारा गया, तब वह मरा..। अहम् की मृत्यु माम् के साथ लय में होती है। माम् का मूल स्थान नाभि पर है।अहम्, माम् में लय हो जाता है। मम् माया दुरत्या,  पार होनी कठिन है।परन्तु इस माम् की शरण ही पार कराने में समर्थ है।