Thursday, April 30, 2009
पूज्य स्वामीजी
पूज्य स्वामीजी
स्वामी रामेश्वराश्रमजी महाराज से मेरा परिचय जुलाई सन 1972 में हुआ था। तब स्वामी जी गुरूकुल चलाते थे। आवासीय व्यवस्था बन्द हो गई थी। परन्तु आंठवी कक्षा तक की कक्षाएं चल रही थी। स्वामीजी उसे सरकार को सौंपना चाहते थे। उन्हीं दिनों झालावाड़ नगर में मुलाकात हुई थी।
परंपरा से अलग, स्वामीजी की अपनी ही पहचान थी। सभी प्रकार की औपचारिकताओ, परंपराओं से परे स्वामीजी सुधी पाठक होते हुए भी धार्मिक-ग्रन्थों, उपदेशों, प्रवचन परंपराओं से मुक्त मिले। जमा पूंजी बस एक थैला और हर प्रश्न का उत्तर स्वयं के अनुभव से ही, यही स्वामीजी की विशेषता हमें खींचती ले गई।
तब से एक लंबा अरसा हो गया है, साथ रहने का,जिसे सत्संग कहा जाता है। हम सवाल पूछते रहे, अपने आपको समझते रहे, और स्वामीजी कुशल बागवान की तरह हमारे भीतर अंकुरित पौधे को सम्हालते रहे, अपनी कृपा वाणी से पल्लवित करते रहे।
यह पुस्तक इन्हीं औपचारिक बातचीत का संग्रह है। स्वामीजी ने कहीं सिलसिलेवार वार्ता नहीं की,न हीं यह प्रचलन माला है, वरन् एक साधक की डायरी के अंश हैं, जो स्वामीजी से इतने वर्षों के सानिध्य में जिज्ञासा वश प्राप्त होते रहे।
इस पुस्तक से पूर्व ”साधन यात्रा” प्रकाश में आई थी। यह छोटी सी पुस्तिका थी, तब जो स्वामीजी से समझा गया था, उसका विवरण था। इस पुस्तक के प्रारम्भिक दो अध्याय उसी पुस्तक से हैं। यह बात सन 1972 की है। पर उसके बाद यात्रा की गत्यात्मकता ने समझने की नयी दृष्टि दी।
वर्षों से साधक मन जिन सवालों से जूझता रहा और प्रश्न पाता रहा, यहां उन्हीं का समाधान जो पाया गया है, अभिव्यक्त हुआ है। जैसा कि पहले निवेदन किया- स्वामीजी शास्त्र चर्चा से प्रायः अप्रभावित ही रहे हैं। उनकी यात्रा निज की यात्रा है। अतः समाधान वहीं से है। यह यात्रा सहज की ओर है। हो सकता है कहीं दुहराव भी आ गया हो। स्वामीजी के स्वयं के व्यक्तित्व में ”मौन” ही प्रमुखता पाया है। शब्द के साथ अधिक खिलवाड़ नहीं है। प्रायः प्रश्नों का उत्तर वे सरलता से, अत्यन्त संक्षिप्तता के साथ देते हैं। उनकी ”समास” शैली ही यहां व्यक्त हुई है। कहीं कहीं उनसे जो बातचीत हुई, उसे उसी तरह से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
कहीं बातचीत ”प्रस्तोता” की भाषा पा गई है। पर प्रयास यही रहा है, जो स्वामीजी का कथन है, वही प्रस्तुत हो सके। स्वामीजी परंपरा से हटकर हैं। जहां योग, भक्ति, कर्मकाण्ड तथाकथित ध्यान परंपराएं अपना अर्थ खो देती हैं। यात्रा उनकी साधक की यात्रा है, और प्रयोेग, जो प्राप्त हुआ है, शरीर और जगत उसके साथ है। इसीलिए यहां कहीं शास्त्र की आवृत्ति नहीं है।
वेदान्त की जो दार्शनिक पृष्ठभूमि है, उसकी आचरण में अभिव्यक्ति स्वामीजी के सानिध्य में पाई जा सकती है। जहां यात्रा तो है, उसकी वास्तविक पहचान भी है, पर न स्वीकृति न अस्वीकृति, वरन उसके साथ तटस्थ साहचर्य है। आध्यात्मिक मानववाद की चरम निष्पत्ति कर्म में सेवा, आचरण में त्याग और अभिव्यक्ति में प्रेम है। यही स्वामीजी की पॅंूजी है, जिसे वे राजस्थान के पिछड़े इलाके बकानी के गांव मोलक्या में गरीब जनता के बीच मुफ्त प्रसारित कर रहे हंै। याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र, जनक, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि, जे. कृष्णमूर्ति तथा निसर्गदत्त महाराज स्वामीजी की चर्चा के विषय रहते हैं। स्वामीजी अपने आपको उसी परंपरा में स्वीकारते हैं, जो प्रयोगधर्मी है, सहज है। जहां प्राणीमात्र के प्रति मात्र प्रेम है और अपने आपको निःशेष भाव से सौंपने का निसर्ग भाव।
यह पुस्तक इसी प्रयोगधर्मिता को कहां तक अभिव्यक्त करने में सफल रही है, इसका आकलन सुधी साधकगण ही कर पायेंगे। मैं मात्र प्रस्तोता हूं। कहंी कुछ कमी रह गई हो तो वह मेरी है, उसे में स्वीकारता हूं। ”सारांश” पुस्तक के अन्त में दिया जाना था, पर प्रारम्भ में सायास ही दिया गया है, तथा ”एक यात्रा” जीवनीपरक नहीं है, न हीं इतिहास क्रम पर है, वरन् साधना की पृष्ठभूमि को संकेतित करने का प्रयास है। स्वामीजी स्वयं के बारे में मुखर नहीं होतेे हैं, अतः इतिहास क्रम की अवहेलना सहज ही है, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूंँ।
ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।
28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे। सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर बकानी ग्राम में ‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग 25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन् 1972 में संस्था को सरकार को सौंप दिया, आज जहां माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है।
निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश देते रहे। न अमीर न गरीब किसी प्रकार का कोई भेद वहां नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहें।
आपके निरन्तर सान्निध्य में कुछ प्रसन्न उभरते रहे, उन्हें दो दशक पूर्व लिपिबद्ध कर प्रकाशित किया था। यह पुस्तक तब सभी का आकर्षण का केन्द्र बन गई थी। कई वर्षों से अप्राप्त भी थी। जनवरी मध्य में स्वामी ने इसे पुनः प्रकाशित करने की आज्ञा दी थी।
उन्हीं की आज्ञा अनुसार उन्हें के चरण कमलों में अर्पित यह पुस्तक, ”अन्तर्यात्रा “पुनः प्रकाशित की जा रही है।
-डाॅ. नरेन्द्र नाथ
सारांश
कहा है न, अन्दर जो वासना रूपी संग्रह है, पहले का, उसे ”संस्कार” कहा जाता है। उसे प्रकृति स्वयं लहरों के द्वारा धक्के देती है। धक्के देती है, वहां वासनाएं उत्पन्न होती हैं, वह लगातार उठ रही हैं। कभी काम की, कभी क्रोध की, कभी अंहकार की, लगातार उठते हुए इस तरह से आकर धक्का देती हैं। जिनका संग्रह ज्यादा होगा, उफान उठता जायेगा, इच्छाएं जगेंगी, वृत्तियां उठेंगी फिर उसी के साथ प्रयत्न प्रारम्भ हो जाता है।
लेकिन यहंा तो संस्कार रूपी कुछ रहा नहीं। वह तो कभी का समाप्त प्रायः हो गया।
लहरें उठ रही हैं, वह अपना काम कर रही हैं, धक्का दे रही हैं, पर वहां कुछ न होने से उसका धक्का नहीं लग रहा है। धक्का न लगने से विचार नहीं उठते हैं। नहीं कोई आवश्यकता बची है। नहीं कुछ कहने की, नही कुछ करने की इच्छा होती है। दुकान खाली पड़ी है, तो ताला खोलकर बैठने से भी क्या लाभ है ?
दरअसल यहां मन तो है ही नहीं।
मन क्या है ?
जो लहरें उठ रही हैं जो विचार तरंगे उठ रही हैं, वही मन है। वहां लहरें उठ रही हैं, टकरा रही हैं, पर वृत्तियां नहीं उठ रही हैं।
लेकिन नाश नहीं है वह।
नाश या विग्रह दोनों स्थितियां गलत हैं।
नाश नहीं होगा। नाश होगा, तब शरीर समाप्त हो जायेगा। रहेगा जरूर। क्योंकि यहां संस्कार कुछ नहीं होतेे हुए भी उसमें विकार उत्पन्न करने की सामथ्र्य है। निष्क्रिय होते हुए भी रहेगा। यह स्थिति जब तक शरीर है, रहेगी।
पर यहां आने पर धक्के भी आवेंगे, पता भी लगेगा कि धक्के आ रहे हैं, लग रहे हैं, पर वृत्तियां नहीं उठेंगी।
साधारण मानव के संस्कार शेष रह जाते हैं।
वह संस्कार पूर्ति के लिए भटकता है।
चेतना व्यक्ति-परक है, वैयक्तिक है, हम एक व्यक्ति हैं और हम संसार का अनुभव भी कर रहे हैं और यह भी धारणा रख रहे हैं कि जागरूकता है, वह अलग स्थिति है और जागरूकता परमात्मा की शक्ति में ही है। इस प्रकार की जब तक हमारी भावना है वैयक्तिक इकाई में हैं, चेतना है।
उससे परे जाकर, मैं मौजूद तो हूं। इस शरीर के भीतर हूं और अनुभव भी कर रहा हूं कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूं। वह उस महान शक्ति का पुर्जा है। अपने आपको इस छोटे से शरीर में रहकर भी यह अहसास कि वह उस महान शक्ति का पुर्जा है तथा यह स्मृति निरन्तर जब बनी रहती है, वह जागरूकता या सजगता कहलाती है। अंग्रेजी में इसे ही ”अवेयरनेस” कहते हैं।
यह जो चेतना है। मैं सजग हूं। यह जो परिस्थितियां घर कर रही हैं, उनकी मुझे जानकारी है। तथा साथ ही यह भी महसूस होता है कि हम इस महान शक्ति से अलग हैं। छोटे से शरीर में अलग मौजूद हैं। संसार से संबंध रखे हुए हैं। हम आधार से अलग है। तथा आधार हमसे अलग है। यही भावना चेतना है। कांशियसनेस है।
परन्तु जागरूकता में मैं स्वतन्त्र हूं, यह संसार मेरे से अलग है, मैं इस संसार में रह रहा हूं। विषयों को भोग रहा हूं, इस प्रकार की भावना वहां नही है। वहां केवल एक ऊर्जा है, वह अपना इस प्रकार का यह नाटक करा रही है। यह स्वतः ही हो रहा है। अनादि काल से हो रहा है और इसका एक ही कार्य है हर चीज को बनाना बिगाड़ना। निरूद्देश्य, कोई उद्देश्य नहीं, कोई उपयोगिता नहीं, कोई उपलब्धि नहीं।
जैसे स्वप्न पैदा होता है। क्या होता है। कैसे विलीन होता है। इसका क्या फल होता है, क्यों दिखता है, कुछ पता नहीं ? उसमें सन्तोष क्या है ? कोई उपलब्धि नहीं ? उसी प्रकार से यह संसार है।
इसमें हमने अपने आपको समझते हुए भी सब कार्यों में अपने आपको लिप्त कर रखा है। लिप्त कराया है- उसी शक्ति ने ही। उस शक्ति ने हमें लिप्त कराया है, इसकी हमें जानकारी है। यही जानकारी चेतना है।
अलग इकाई की जानकारी उसके क्रियाकलाप, उसका ज्ञान यह चेतना है।
वहां तो सिनेमा हो रहा है। सिनेमा के पर्दे पर सब नाच रहे हैं, व्यवहार कर रहे हैं, उसका संचालन वहां से हो रहा है, उस पर्दे पर हम भी नाच रहे हैं, अन्य भी नाच रहें हैं, नाच देख भी रहे हें, अपने आपको देखते हुए भी उसका संचालन एक ही शक्ति से हो रहा है, इसका निरन्तर स्मरण यही अवेयरनेस है जागरूकता है, सजगता है।
कर्मकाण्ड से साधना नहीं हो सकती। उपासना से साधना नहीं हो सकती। ये तरीके हैं, जिन्होंने इन्हें ठीक समझा, अपनी तरफ से प्रतिपादित किया है। परन्तु समाधि नाम की स्थिति का कोई मतलब नही है। यह तो पत्थर बनना है। हम तो बराबर सक्रिय रहना चाहते हैं। जीवन का जो क्रियाकलाप है, उसमें यथा योग्य सहयोग देना है। उससे अलग छिटक कर पत्थर नहीं होना है।
इस साधना में कुछ करना ही नहीं है। जहां करने का सवाल आता है, वहां असफलता मिलती है।
हमें स्वाभाविक स्थिति में रहना है। स्वाभाविक का अर्थ है, शरीर का सक्रिय होना, मन का निष्क्रिय होना।
यह संसार निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील है।
समाधि के लिए आसन लगाओ, ध्यान लगाओ, समाधी में प्रविष्ट हो जाओ और पत्थर हो जाओ। समाधि के लिए जो भी क्रिया होगी, माया के ही अन्तर्गत होगी।
लेकिन यहां तो व्यवहार को स्वाभाविक रखना है। साधना में क्रिया आती है। यहां क्रिया का कोई महत्व नहीं है। वह जो स्वाभाविक क्रिया चल रही है, वही क्रिया है। मनुष्य जो अपने आपको अलग मानकर क्रिया करता है, उसके लिए कोई स्थान नहीं है।
वहां करना यही हैं कि बाहर से सब वृत्तियों को, जो विषयों से जुड़ी हुई हैं, उनसे अलग होना है। वह अलग होता है, चिन्तन न करने से। चिन्तन होता है- मन के द्वारा। इन्द्रियां विषयों को भोगती हैं, लेकिन इन्द्रियां मन से जुड़ी हुई है। मन जब धीरे धीरे विचार रहित स्थिति तक आता है, स्थिर होता है, तो उसका संबंध वृत्तियों से, इन्द्रियों से टूट जाता है। विषयों से इन्द्रियां जब संबंध तोड़ लेंगी, मन से भी अपने आप टूट जाता है। मन से संबंध जुड़ता है, वृत्तियों के उठने से। मन में जो वृत्तियां उठती हैं, वह विषयों के लिए प्रेरित करती है। वृत्तियों को नहीं उठने देना है।
यहां वृत्तियों को बलपूर्वक रोकना नहीं है। विरोध न दमन है, न दबाव और न बाह्य अनुशासन है। उसके लिए जो प्रारम्भिक प्रयास है, वह है सजगता पूर्वक वृत्तियां जो उठ रही हैं, उन्हें देखा जाये। मन में वृत्तियां उठना अपने आप समाप्त हो जायेगा। उसके बाद जो स्थिति आती है। उसे आप कुछ भी कहें, सहज समाधि कहें, जीवनमुक्त अवस्था कहें, नाम कुछ भी दे दीजिए। वहां की पहचान है, देह का कृत्य ही सेवामय हो जाता है। शरीर का कर्म ही सेवामय हो जाना साधना का रहस्य है।
तब जीवन में जब उठता है प्रेम। मन में त्याग, शरीर सेवामय, सम्पूर्ण जीवन प्रेममय हो जाता है। प्रेम दूसरे को खींचता है, यहां आकर्षण है। यहंा लोहा सोना नहीं होता वरन पारस, दूसरे को पारस बनाने लग जाता है।
जो खुद जागता है, वह दूसरे को जगाता है।
यही जीवन की सार्थकता है !
यही मानव धर्म है।
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