Thursday, August 29, 2013

प्रारभ्भ में

प्रारभ्भ में

प्रारम्ीिाक अवस्था में रात को सोते समय कि जैसे आप बिस्तारर पर जाएं, शांत हो जाएं, देखें क्या विचार आरहे हैं, दिन भार की बातें सब समाप्त
विचार तो एक के बाद एक आते रहेंगे।े, पर ज्यों ही विचार आए कहना भाई बहुत होगया। विचार रुक जाएगा। तब दूसरा विचार आएगा। दो विचारों क बीच गैप रहेगा।
इस गैप को बढ़ाने का प्रयास करना।
निद्रा भी आ सकती है।
यदि आप जागरूक रहेंगे तो आपका र्वामान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाएगा।
स्ुबह उठते ही इस अभ्यास को कुछ देर करना हें
फिर दिन भर जो भी काम हो , क्रिया हो मन को उसी काम मं रखना है।

अब विचार के साथ आप लंबे नहीं जाएंगे।
यदि आप  ध्यान देंगे तो दो बातें होंगी
या तो नींद आजाएगी।
या दो विचारे ंके बीच जो गैप है, उसे बढ़ाने का प्रयास किया जाए।
या तो नींद आजाएगी, नही ंतो इस गैप को ही अधिक से अधिक बढाने का प्रयास किया जाए।
फिर दिन भर यही अभ्यास रहे । जो भी काम हो , तब विचारों को नही आने दिया जाए। मन आपका उसी इंद्रिय के साथ रहे।
हमारा स्वभाव है, हम बिना लगातार सोचते हुए कोई काम नहीं कर सकते।
इसके लिए एक ही सावधानी है, मौन रहा जाए, जब तक जरूरी न हो बोला नहीं जाए।
मेरी स्थििति है, अंदर से धारा बहती है, मुझे सोचकर बोलना नही पड़ता।बाह्य मन का दबाब नहीं रहता, अंतर्ममन ही कार्य करता हैं
यही अभ्यास करना हैं
इससे
1 संकल्प शक्ति बढ़ती हे।
2 शांति मिलती हैं
3 पूर्वाभास होने लगता हैं
4 मन नियंत्रित होने लगता हें।
चिंतन  करना मन का स्वभाव हे।पर होना यही चाहिए जब भी हम काम कर रहे हैं, वहॉं चिंतन  न हो। जो भी कार्य चल रहा है, मन वहीं रहेंकार्य समाप्त होते ही मन वहॉं से स्वाभाविक रूप् से हट जाएगा।

परम्रागत जो साधनाएॅं हम सुनते है, उनकी जरूरत आज नहीं हैं। मन जब सिकुड़ता है, वह धीरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता ह।
संसार का वास्तविक ज्ञान तभी होता हैं
क्या करना है क्या नहंी करना हैं महाभारत में भगवान कृष्ण का उल्लेख होता हैं अभिमन्यु का प्रसंग हे। वह चक्रव्यूह में प्रवेश तो करना जानता था, पर उसके बाद का उसे ज्ञान नहीं था, भगवान कृष्ण जानते थे, पर वे चुप रहे, क्यों किवे जानते थे, उसकी मृत्यं यही होनी हैं। जबकि जयद्रथ वध में उन्होंने चक्र तक उठा लिया था। पर वे अभिमन्यु उनका इतना प्रिय था फिर भी चुप ही रहे।

आप एक विचार के साथ रही नही पाते हैं।
अनेक विचार आते रहते हें। र्वामान मे ंरहने का मतलब है, हमारा शरीर तो र्वामान में ही है, पर मन नहीं रहता।
क्यों, मन तो गति है। बाहर का संबंध टूटने पर वह धीेरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता है।
तभी उसे संसार का वास्तविक ज्ञान होता हे।
वह सत- असत, पाप -पुण्य  के परे चला जाता है। संसार क्या है। ,
वह प्रकृति के रहस्य जान जाता हें
एक ही शक्ति है, वही सब करा रही हे।
जितने हमे भगवान विष्णं ुप्रिय हैं, उतने ही शिव हैं, सभी प्रकार के कार्य होते रहेंगे।
इस संसार में सब कुछ है।
हमें मात्र देखना हे। द्रष्टा बने रहना हे।
एक जैसा ही बना रहे , यह सं भव नहीं है।
सौ वर्ष बाद आज के विचार नहीं रहेंगे।
अंतर्मुखी होने के बाद समान भावना रह जाती है।
तब भी कोई व्यक्ति लगन के साथ काम करता है,
कभी -कभी उनके प्रयोग सफल हो जाते हैं,
वर्तमान में रहने की शक्ति आत्म विश्वास बनता है।
उसको यह विश्वास होता है, वह मैं सही सोच रहा हू।
प्रकृति का नाटक विचित्र है।
जैसे उसके मन में अचानक विश्वास आया फलाना व्यक्ति आया नहीं वह आगया। इस तरह विश्वास बढ़ते-बढ़ें संकल्प बनना शुरु हो जाता हेै।
स्वामीजी ने यहॉं झालावाड़़ नरेश के गुरुकुल आगमन की पूरी कहानी सुनाई।
फिर स्वामीजी ने उस लड़के की मृत्ये के पूवाभास की घटना सुनाई।
पूर्वाभस वर्तमान में रहने की सहज शक्तियॉं हैं।
वर्तमान में रहना-
हमें वही सुनते हैं, जो हम सुनना चाहते हैं।
लोग वही देखते हैं, जो उनकी वासना है।
साधना की जड़ मन है, मन तो गति है, हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं, बोलते हैं, हमारी बुद्धि उसी समय इस छाप को संग्रहित कर लेती हे। बुद्धि का दबाब , वर्तमान में रहने से कम हो जाता है। हमस ीधे अंतर्मन से व्यवहार करना शुरु कर देते हैं। बीच का दबाब अपने आप कम हो जाता हे।

हमारी पहचान


 हमारी पहचान

हम अपनी पहचान को पाना चाहते हैं। हम हमारी पहचान बताते हैं कि हम भौतिकवादी नहीं हैं, यह भौतिकवाद तो बहुत नीचे की बात है, हम आध्यात्मवादी हैं। हम अपने भीतर विश्वगुरु का अहंकार पालते हैं। हम सोचते हैं, दूसरों ने भौतिकवाद की यात्रा पर गति ली है। विज्ञान और तकनीकी से बहुत सारे काम लिए हैं। पर हम ने मनुष्य जीवन के उच्चतम स्तर आत्मज्ञान को पाया  है।

कई बार सवाल आता है, कि जीवन में हमें किस चीज की जरूरत है? एक सन्त कहते थे, जिन्हें रोजी-रोटी की जरूरत है, अध्यात्म विद्या उन के लिए नहीं है पर वे भाष्य उन्ही गरीब लोगों की काव्य चेतना का ही करते रहे, जिन्हें जीवन भर रोजी-रोटी के लिए ही प्रयास करना पड़ा था। संत अमीर तो होते नहीं थे। अजीब विसंगति है, वे गरीबों के अनुभव अमीरों को सुनाते रहे। खुद अमीरो के भगवान बन गए।

क्या जो गरीब है, निर्धन है, उस के लिए मार्ग भौतिकवाद से ही है, बचा है? क्या आध्यात्म मार्ग उन के लिए है, जो संसार में सुख से ऊब गए हैं।

सवाल इस प्रकार उलझ जाते हैं के रास्ता नहीं दिखता है, भ्रामक सवालों में सब से बड़ा सवाल आज यहीं है। हमारे बाह्य धार्मिक अनुष्ठान तथा धार्मिक क्रियाएं जो बहिर्मुखी हैं, हमें भौमिक सुख व सुविधा पाने के लिए ईश्वरीय प्रार्थना सिखाती हैं। भगवान आएंगे, हमारे दुख दूर करेंगे।

ज्योतिष, वास्तु, यज्ञ, सभी नए-नए कर्मकाण्डों के रूप हैं। जो भौमिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति पर टिके हैं। कुछ समझदार लोग आते हैं, इन्हें ही आध्यात्म विद्या का वाहक बताते हैं। जगह-जगह आध्यात्म के नाम पर ग्रन्थों का पारायण होता है। पाठ होता है। उन सब में एक ही बात छिपी रहती है, इस से आप के भौतिक सुख में उत्कर्ष प्राप्त होगा।तब विदेशी पूछते हैं, तब हमारा स्पष्ट भौतिकवाद क्या बुरा है? हम तो बु(ि बल की बात कर रहे हैं। आप हमें हेय क्यों बताते हैं? मात्र नंगा रहना, कम कपड़े पहनना, कम भौतिक वस्तुएं रखना, दरिद्रता में रहना ही क्या आध्यात्म है?

हजारों सालों से हम विचार कर रहे हैं, प्रयोग भी करते हैं। जानना चाहते हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारे )षि मुनियों ने एक बात बताई थी कि हम मात्र भौतिक सामग्री का संचयन ही नहीं हैं, हमारे भीतर  आत्म तत्व हैंजो परम हैं।  जीवन में उसको पाना, उसको जानना, हमारा सब से बड़ा लक्ष्य है, उन्हों ने इस को पाने के लिए रास्ते बताए, ये आध्यात्म विद्याएं कही जाती हैं।

कहा जाता है, ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’। हजारों सालों से इस तत्व की वर्णना, उपादेयता, पाने के मार्ग पर चर्चा हो रही है। सब ने अपने-अपने विचार से, अनुभव से इसे बताया। एक ही बात को जब अनेक प्रकार से कहा जाता है, तब मतभेद का आना स्वाभाविक है। लड़ाई-झगड़े भी हुए, हिंसाएं हुईं, लाखों मनुष्यों को इसी कारण से कि वे सही हैं, मार दिया गया।

सार तत्व यही है कि जब हम विषय, ज्ञान को, तथा मन, बु(ि के सहयोग से यह जो जगत हमें मिला है, जो पदार्थगत है, इस में बेहतर रहने की बात करते हैं। अपने लिए सुख-सुविधाएं जुटाते हैं, तो हम भौतिकवादी कहे जाते हैं।

इन भौतिकवादियों ने अतीत में, हमारे देश में भी बहुत बड़े काम भी किए, शिल्प, मूर्ति कला, नृत्य कला, संगीत, आयुर्वेद, आदि सभी विद्याएं जिन्हें शास्त्र अविद्या कहता है, भौतिकवादियों ने ही विकसित कीं। दर्शन में इन्हें ‘चार्वाक मत’ का माना जाता रहा है।

निस्संदेह पश्चिम के भौतिकवाद ने दुनिया को सुन्दर, सुविधाजनक बनाने में बहुत योगदान दिया है।

भौतिकवाद कोई हेय, गाली देने वाली चर्चा नहीं है। इस समय में बिना जीविकोपार्जन किए, शरीर की रक्षा नहीं हो सकती। हमारी दैनिक आवश्यकताओं कीपूर्ति होना आवश्यक है। शिक्षा, ज्ञान सभी जरूरी है। पूज्य स्वामी जी ‘प्रयत्न’ को इसी लिए जीवन में आवश्यक मानते थे। वे कहते थे, गृहस्थ आत्मज्ञानी सरलता से हो सकता है। विरक्त...के लिए तो बहुत कठिनाइयां हैं, इस आज के वातावरण में गृहस्थ ही अपने जीवन में भौतिकवाद और आध्यात्म दोनों का समन्वय कर जीवन को उत्कृष्ट बना सकता है।

शास्त्र ने इसी लिए जीवन के लिए, ‘अविद्या तथा विद्या’ दोनों को ही उचित कहा है, स्पष्ट कहा है, जो मात्र विद्या के उपासक हैं, वे तो और भी गहरे अन्धकार में जाते हैं।

हम स्पष्ट हैं।

हम न तो मात्र भौतिकवाद के उपासक हैं, न कोरे आध्यात्मवाद के। हमारी पहचान इसी लिए नहीं है कि हम आध्यात्मवादी रहे, हम ने आत्मज्ञान के पथ को पाया।

हमारी पहचान पूर्ण मनुष्य की है। हमारा शास्त्र पूर्ण मनुष्यता की बात करता है। वहां स्पष्ट कहा गया है कि जीवन के लिए ‘भौतिकवाद और आध्यात्म दोनों ही अपरिहार्य हैं।’ हमारे )षि गृहस्थ थे। ‘ईशावास्योेपनिषद’, ‘अर्थवा )षि ने अपने पुत्र के विवाह के बाद उसे सम्बोधित किया है, जो विरक्त हैं, वे आधे-अधूरे हैं, वे हमारी पहचान नहीं हैं। हमारी पहचान तो आत्मज्ञानी गृहस्थ हैं, जो ‘नारियल’ की तरह होते हैं, बाहर से ठोस, भीतर से तरल, वे अहर्निश इसी परमात्म शक्ति से जुड़े हुए रह कर, बाहर अपने सभी सांसारिक कार्य कुशलता से करते हैं।’

यह विद्या, यह जीवन जीने की कला, जो पूज्य स्वामी जी ने विकसित की, वह संक्षेप में बहुत छोटी है। ‘वर्तमान में रहना’, उन का आप्त वाक्य था। उन्हों ने अपनी साठ साल की कठोर साधना के बाद, जीवन जीने की इस शैली को विकसित किया था, जहां सामान्य व्यक्ति, गरीब हो या अमीर, किसी भी धर्म का हो, अपने आत्म से जुड़ कर, बाह्य जगत में जो भी कार्य मिला है, उत्कृष्टता पूर्वक कर के, जीवन में सुख, शान्ति व शक्ति पा सकता है।
स्वामी जी कहा करते थे, भगवान कृष्ण को हम ने पूर्णावतार माना है, उन के जीवन में प्रयत्न और पुरुषार्थ का गहना समन्वय था, यह विद्या ‘राजर्षि जनक’ ने विकसित की। सभी धर्मों ने समय-समय पर इन के महापुरुषों ने अपने-अपने इतिहास बोध से विकसित किया है। सार तत्व एक ही है, इसी जीवन में उस परमात्मिक शक्ति को पा कर, अपने जीवन को सुख-शान्ति, शक्तिमय बनाना।

यही हमारी पहचान है, शास्त्र को हम ने सही ढंग से नहीं पढ़ा, आधा-अधूरा रह कर मात्र अपने आप को ‘आत्मज्ञानी’ कहना, उस में अपनी भूमिका देखना, इस छव के लिए तरह-तरह के भेष धारण करना, मुद्राएं बताना, भूल है। आन्तरिक यात्रा तो सत्संग में प्राप्त होती है। जहां सांप-सीढ़ी के खेल में गुरु-ज्ञान की सीढ़ी, हमें विकारों के सांपों से बचाते हुए अपने लक्ष्य तक ले जाती है।