प्रारभ्भ में
प्रारम्ीिाक अवस्था में रात को सोते समय कि जैसे आप बिस्तारर पर जाएं, शांत हो जाएं, देखें क्या विचार आरहे हैं, दिन भार की बातें सब समाप्त
विचार तो एक के बाद एक आते रहेंगे।े, पर ज्यों ही विचार आए कहना भाई बहुत होगया। विचार रुक जाएगा। तब दूसरा विचार आएगा। दो विचारों क बीच गैप रहेगा।
इस गैप को बढ़ाने का प्रयास करना।
निद्रा भी आ सकती है।
यदि आप जागरूक रहेंगे तो आपका र्वामान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाएगा।
स्ुबह उठते ही इस अभ्यास को कुछ देर करना हें
फिर दिन भर जो भी काम हो , क्रिया हो मन को उसी काम मं रखना है।
अब विचार के साथ आप लंबे नहीं जाएंगे।
यदि आप ध्यान देंगे तो दो बातें होंगी
या तो नींद आजाएगी।
या दो विचारे ंके बीच जो गैप है, उसे बढ़ाने का प्रयास किया जाए।
या तो नींद आजाएगी, नही ंतो इस गैप को ही अधिक से अधिक बढाने का प्रयास किया जाए।
फिर दिन भर यही अभ्यास रहे । जो भी काम हो , तब विचारों को नही आने दिया जाए। मन आपका उसी इंद्रिय के साथ रहे।
हमारा स्वभाव है, हम बिना लगातार सोचते हुए कोई काम नहीं कर सकते।
इसके लिए एक ही सावधानी है, मौन रहा जाए, जब तक जरूरी न हो बोला नहीं जाए।
मेरी स्थििति है, अंदर से धारा बहती है, मुझे सोचकर बोलना नही पड़ता।बाह्य मन का दबाब नहीं रहता, अंतर्ममन ही कार्य करता हैं
यही अभ्यास करना हैं
इससे
1 संकल्प शक्ति बढ़ती हे।
2 शांति मिलती हैं
3 पूर्वाभास होने लगता हैं
4 मन नियंत्रित होने लगता हें।
चिंतन करना मन का स्वभाव हे।पर होना यही चाहिए जब भी हम काम कर रहे हैं, वहॉं चिंतन न हो। जो भी कार्य चल रहा है, मन वहीं रहेंकार्य समाप्त होते ही मन वहॉं से स्वाभाविक रूप् से हट जाएगा।
परम्रागत जो साधनाएॅं हम सुनते है, उनकी जरूरत आज नहीं हैं। मन जब सिकुड़ता है, वह धीरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता ह।
संसार का वास्तविक ज्ञान तभी होता हैं
क्या करना है क्या नहंी करना हैं महाभारत में भगवान कृष्ण का उल्लेख होता हैं अभिमन्यु का प्रसंग हे। वह चक्रव्यूह में प्रवेश तो करना जानता था, पर उसके बाद का उसे ज्ञान नहीं था, भगवान कृष्ण जानते थे, पर वे चुप रहे, क्यों किवे जानते थे, उसकी मृत्यं यही होनी हैं। जबकि जयद्रथ वध में उन्होंने चक्र तक उठा लिया था। पर वे अभिमन्यु उनका इतना प्रिय था फिर भी चुप ही रहे।
आप एक विचार के साथ रही नही पाते हैं।
अनेक विचार आते रहते हें। र्वामान मे ंरहने का मतलब है, हमारा शरीर तो र्वामान में ही है, पर मन नहीं रहता।
क्यों, मन तो गति है। बाहर का संबंध टूटने पर वह धीेरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता है।
तभी उसे संसार का वास्तविक ज्ञान होता हे।
वह सत- असत, पाप -पुण्य के परे चला जाता है। संसार क्या है। ,
वह प्रकृति के रहस्य जान जाता हें
एक ही शक्ति है, वही सब करा रही हे।
जितने हमे भगवान विष्णं ुप्रिय हैं, उतने ही शिव हैं, सभी प्रकार के कार्य होते रहेंगे।
इस संसार में सब कुछ है।
हमें मात्र देखना हे। द्रष्टा बने रहना हे।
एक जैसा ही बना रहे , यह सं भव नहीं है।
सौ वर्ष बाद आज के विचार नहीं रहेंगे।
अंतर्मुखी होने के बाद समान भावना रह जाती है।
तब भी कोई व्यक्ति लगन के साथ काम करता है,
कभी -कभी उनके प्रयोग सफल हो जाते हैं,
वर्तमान में रहने की शक्ति आत्म विश्वास बनता है।
उसको यह विश्वास होता है, वह मैं सही सोच रहा हू।
प्रकृति का नाटक विचित्र है।
जैसे उसके मन में अचानक विश्वास आया फलाना व्यक्ति आया नहीं वह आगया। इस तरह विश्वास बढ़ते-बढ़ें संकल्प बनना शुरु हो जाता हेै।
स्वामीजी ने यहॉं झालावाड़़ नरेश के गुरुकुल आगमन की पूरी कहानी सुनाई।
फिर स्वामीजी ने उस लड़के की मृत्ये के पूवाभास की घटना सुनाई।
पूर्वाभस वर्तमान में रहने की सहज शक्तियॉं हैं।
वर्तमान में रहना-
हमें वही सुनते हैं, जो हम सुनना चाहते हैं।
लोग वही देखते हैं, जो उनकी वासना है।
साधना की जड़ मन है, मन तो गति है, हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं, बोलते हैं, हमारी बुद्धि उसी समय इस छाप को संग्रहित कर लेती हे। बुद्धि का दबाब , वर्तमान में रहने से कम हो जाता है। हमस ीधे अंतर्मन से व्यवहार करना शुरु कर देते हैं। बीच का दबाब अपने आप कम हो जाता हे।
प्रारम्ीिाक अवस्था में रात को सोते समय कि जैसे आप बिस्तारर पर जाएं, शांत हो जाएं, देखें क्या विचार आरहे हैं, दिन भार की बातें सब समाप्त
विचार तो एक के बाद एक आते रहेंगे।े, पर ज्यों ही विचार आए कहना भाई बहुत होगया। विचार रुक जाएगा। तब दूसरा विचार आएगा। दो विचारों क बीच गैप रहेगा।
इस गैप को बढ़ाने का प्रयास करना।
निद्रा भी आ सकती है।
यदि आप जागरूक रहेंगे तो आपका र्वामान में रहने का अभ्यास बढ़ता जाएगा।
स्ुबह उठते ही इस अभ्यास को कुछ देर करना हें
फिर दिन भर जो भी काम हो , क्रिया हो मन को उसी काम मं रखना है।
अब विचार के साथ आप लंबे नहीं जाएंगे।
यदि आप ध्यान देंगे तो दो बातें होंगी
या तो नींद आजाएगी।
या दो विचारे ंके बीच जो गैप है, उसे बढ़ाने का प्रयास किया जाए।
या तो नींद आजाएगी, नही ंतो इस गैप को ही अधिक से अधिक बढाने का प्रयास किया जाए।
फिर दिन भर यही अभ्यास रहे । जो भी काम हो , तब विचारों को नही आने दिया जाए। मन आपका उसी इंद्रिय के साथ रहे।
हमारा स्वभाव है, हम बिना लगातार सोचते हुए कोई काम नहीं कर सकते।
इसके लिए एक ही सावधानी है, मौन रहा जाए, जब तक जरूरी न हो बोला नहीं जाए।
मेरी स्थििति है, अंदर से धारा बहती है, मुझे सोचकर बोलना नही पड़ता।बाह्य मन का दबाब नहीं रहता, अंतर्ममन ही कार्य करता हैं
यही अभ्यास करना हैं
इससे
1 संकल्प शक्ति बढ़ती हे।
2 शांति मिलती हैं
3 पूर्वाभास होने लगता हैं
4 मन नियंत्रित होने लगता हें।
चिंतन करना मन का स्वभाव हे।पर होना यही चाहिए जब भी हम काम कर रहे हैं, वहॉं चिंतन न हो। जो भी कार्य चल रहा है, मन वहीं रहेंकार्य समाप्त होते ही मन वहॉं से स्वाभाविक रूप् से हट जाएगा।
परम्रागत जो साधनाएॅं हम सुनते है, उनकी जरूरत आज नहीं हैं। मन जब सिकुड़ता है, वह धीरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता ह।
संसार का वास्तविक ज्ञान तभी होता हैं
क्या करना है क्या नहंी करना हैं महाभारत में भगवान कृष्ण का उल्लेख होता हैं अभिमन्यु का प्रसंग हे। वह चक्रव्यूह में प्रवेश तो करना जानता था, पर उसके बाद का उसे ज्ञान नहीं था, भगवान कृष्ण जानते थे, पर वे चुप रहे, क्यों किवे जानते थे, उसकी मृत्यं यही होनी हैं। जबकि जयद्रथ वध में उन्होंने चक्र तक उठा लिया था। पर वे अभिमन्यु उनका इतना प्रिय था फिर भी चुप ही रहे।
आप एक विचार के साथ रही नही पाते हैं।
अनेक विचार आते रहते हें। र्वामान मे ंरहने का मतलब है, हमारा शरीर तो र्वामान में ही है, पर मन नहीं रहता।
क्यों, मन तो गति है। बाहर का संबंध टूटने पर वह धीेरे-धीरे अंतर्मुखी हो जाता है।
तभी उसे संसार का वास्तविक ज्ञान होता हे।
वह सत- असत, पाप -पुण्य के परे चला जाता है। संसार क्या है। ,
वह प्रकृति के रहस्य जान जाता हें
एक ही शक्ति है, वही सब करा रही हे।
जितने हमे भगवान विष्णं ुप्रिय हैं, उतने ही शिव हैं, सभी प्रकार के कार्य होते रहेंगे।
इस संसार में सब कुछ है।
हमें मात्र देखना हे। द्रष्टा बने रहना हे।
एक जैसा ही बना रहे , यह सं भव नहीं है।
सौ वर्ष बाद आज के विचार नहीं रहेंगे।
अंतर्मुखी होने के बाद समान भावना रह जाती है।
तब भी कोई व्यक्ति लगन के साथ काम करता है,
कभी -कभी उनके प्रयोग सफल हो जाते हैं,
वर्तमान में रहने की शक्ति आत्म विश्वास बनता है।
उसको यह विश्वास होता है, वह मैं सही सोच रहा हू।
प्रकृति का नाटक विचित्र है।
जैसे उसके मन में अचानक विश्वास आया फलाना व्यक्ति आया नहीं वह आगया। इस तरह विश्वास बढ़ते-बढ़ें संकल्प बनना शुरु हो जाता हेै।
स्वामीजी ने यहॉं झालावाड़़ नरेश के गुरुकुल आगमन की पूरी कहानी सुनाई।
फिर स्वामीजी ने उस लड़के की मृत्ये के पूवाभास की घटना सुनाई।
पूर्वाभस वर्तमान में रहने की सहज शक्तियॉं हैं।
वर्तमान में रहना-
हमें वही सुनते हैं, जो हम सुनना चाहते हैं।
लोग वही देखते हैं, जो उनकी वासना है।
साधना की जड़ मन है, मन तो गति है, हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं, बोलते हैं, हमारी बुद्धि उसी समय इस छाप को संग्रहित कर लेती हे। बुद्धि का दबाब , वर्तमान में रहने से कम हो जाता है। हमस ीधे अंतर्मन से व्यवहार करना शुरु कर देते हैं। बीच का दबाब अपने आप कम हो जाता हे।