गुरु तत्व
साधना में गुरु का महत्व क्या है? इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। परमहंस के जीवन की अंतिम कहानी है, वे गले के कैंसर से पीड़ित थे, उस रात बहुत कष्ट था, पानी भी निगलना कठिन हो गया था, नरेन्द्र ने जो बाद में विवेकानन्द बने, उन से कहा आप मां से अर्चना कर लें, कम से कम इतना तो हो जाए, वे चुप हो गए, ध्यानस्थ हो गए, आंखें खोल कर बोले, अब मुझ से मत कहना .............. तेरी बात मान कर मैं ने मां से कहा था, वह बोली, तेरे मुंह से कब तक. बोलेगा, अरे पचासों हैं, उन के मुंह में तू ही तो बोलता है, उन के मुंह से तू ही खाता है।
स्वामी जी ने कहा था, लोग कहते हैं, विवेकानन्द को परमहंस ने शक्तिपात किया था, पर कहां और कब? कहना कठिन है। पर सच यही है, जब वे अमेरिका में थे तो पहले दिन शिकागो की धर्म सभा में बोलने का अवसर आया था, वे नहीं बोले, चुप रह गए, अपने भीतर आश्वस्त नहीं हो पाए, फिर दुबारा बोले, तो बोलते ही गए, अन्त समय तक बोलते रहे। 1994 में वे अमरीका गए थे, 2002 में दुनिया से चले गए। इस आठ साल में बहुत काम किया। शक्ति.पात तो उसी दिन हुआ था, जब वे पूरी तरह गुरु को समर्पित हो गए थे।
वही आखिरी और पहला दिन होता है। पुनर्जन्म हो जाता है। पुराना पूरा धुल जाता है, भीतर के सारे आश्रय जो बाहर थे खो जाते हैं, उस निराश्रय की आखिरी घड़ी में ही वह घटना घटती है, जब गुरु स्वयं वहां आ जाता है। पूरण परमानन्द, वह पूरा है। अधूरा नहीं है। वह पूरा ही बना कर जाता है।
स्वामी जी कहते थे, मैं शिष्य नहीं बनाता, पर लोग आगे का वाक्य नही सुन पाते थे कि,” मैं गुरु बनाता हूं।“
जो मैं हूं, वही तो तुम हो, मैं जाग गया हूं, तुम भी जाग सकते हो। जो जागा हुआ है, जागृत है, वही गुरु है। जहां भी ये मिल जाए, वहां रुक जाना, वहां सवाल मत करना, बस चुप हो जाना।
जहां मौन है, भीतर जगह बन गई है, वहीं तो अतिथि आ सकते हैं। हम तो बाहर-भीतर सब जगह सामानों से भरे हुए हैं, जगह ही नहीं है। चाहते हैं, सब यहां आ जाएं, कैसे आएंगे? जगह तो दो।
गुरु के लिए भी जगह तो देनी होगी।
यही तो किया, गुरु पूर्णिमा आई, वहां चले गए। दर्शन किया, बातें की,, भेंट चढ़ाई, आ गए। ऐसे ही तो मिलने को जाते हैं, रास्ते पर चले जाते हैं। एक रूटीन है, बस निभ गया। अब अगले साल आएंगे, बातेंचीतें होंगी, मन लगेगा। गुरु भी जानते हैं, वे कुछ नहीं कहते।
जो वहीं है, पर सोए हुए हैं, वे चाहते हैं कि उन की लोरियों से और भी सो जाएं।
हजारों गुरु हैं, जो लोरी ही सुना रहे हैं। वे स्वयं सोए हुए हैं, उन के पास जाओगे, और सो जाओगे।
यह माया की रात बहुत गहरी है, ‘या निशा सर्व भूतानां’ जाग्रति संयमी. जो वास्तविक गुरु है, वही जागा हुआ है। जो जागा हुआ है, न वहां विचार हे, न विकार है, वहां तो पूर्ण प्रकाश है। एक दर्पण है, जहां तुम्हें अपना सही चेहरा दिख जाता है। उसे तुम्हारे चेहरे से कुछ लेना-देना नहीं है। वहां एक दिया है जो तुम्हारी कांपती बाती को जला देता है। वहां वह शान्त आग है, जहां तुम्हारे विकार जलने लगते हैं।
जहां तुम्हें ऐसे गुरु मिलें, वहां ठहर जाना।
जानते हो, तुम्हारे पास एक वृत्त है, जो तुम हो, उस का एक केन्द्र है,, जहां तुम्हारे संस्कार है, वहां से निरन्तर विकारों के व्यूह पैदा होते रहते हैं। जो तुम हो, जो तुम्हारी पहचान है।
रमण महर्षि कहते थे- साधना है, अपने आप को जानो, यह जानना क्या है? अपने विचारों को जानो, देखो, यही तो तुम हो विचारों का बदलना ही तुम्हारा परिवर्तन है।
इसी लिए गुरु के पास जाओ, तो वहां धन की, वस्तुओं की भेंट मत ले जाओ, जिस से पास अनन्त वैभव है, वहां इस की क्या कीमत?
गुरु को भेंट करनी है, तो तुम्हारा अपना मन है।
तुम्हारा जो वृत्त है, जो सर्किल तुम्हारा अपना है, उस में जगह अपने गुरु को दो। साल में एक दिन के भण्डारे के लिए नहीं, रोजमर्रा की जिन्दगी में, उन्हें भी एक हिस्सा दो, अपना समय दो।
सच यह है कि आज की दुनिया में, हम अपनी पहचान खो देते हैं। हमारे पास बहुत सारी बातों के लिए समय है। टी.वी. सीरियल के लिए समय है, घण्टों देखेंगे, कोइ टोक दे तो वह दुश्मन है। पर अपने पति, पत्नी, मां-बाप, बच्चों के लिए समय नहीं है। यह शिक्षा व कर्म जो आवश्यक तो है, पर वहीं जहां यह जीवन ही बन जाता है। मकड़ी की तरह जाला बनाते हैं, और उसी में डूब जाते हैं।
अपने इस जीवन वृत्त को रोज देखें, जो कचरा है उसे उठाएं, कम्पयूटर की तरह देखें, अपडेट करते रहें तथा जो कचरा इकट्ठा हो गया है, उसे हटाते जाएं। इसी को सफाई कहते हैं।
स्वामी जी कहते थे, यह सफाई साल में एक दिन यहां आने से नहीं हो जाती। गुरु कोई सफाई कर्मचारी नहीं है, लोग यहां आते हैं, गले तक विकारों से भरे आते हैं, और अपनी सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहां आते हैं, क्या साधना इसी लिए की जाती है?
संसार में सफलता, प्रयत्न से मिलती है। शास्त्र कहता है, निरन्तर कर्मरत रहो, भाग्यवादी मत बनो।
परन्तु जो शान्त है, साधक है, उस का चित्त निर्मल होता है, वहां संकल्प चला जाता है, उस का विवेक उसे सही रास्ता दिखाता है, यह क्यों नहीं समझते? पर हम निरन्तर विकारों को और अधिक, और अधिक जमा करते चले जाते हैं। हमेशा याद रखो, विचार ही विकार है। विकारों को देख कर मत डरो, घबराओ मत, विचारों को कम करते जाओ। यही ध्यान रहे, विचार ही पाप है। तब वही विचार उठेगा, जिसे पूरा होना है, तभी तुम्हें पता लगता है कि कुछ शक्ति तुम्हारे पास है।
कुछ दिन पहले एक बाबा. आए थे, वे तीसरे नेत्र की चर्चा कर रहे थे, जब धंधा नहीं चला तो बाबा बन गए। उन्हों ने बाबा बनकर करोड़ों रुपए कमाए, हम लोग तो मानो तैयार बैठे हैं।
अरे! जब गाय खरीदने जाते हैं, तो उस की पूंछ देखते हैं। बैल के दांत गिनते हैं, पर गुरु की पहचान का हमारे पास कोई आधार ही नहीं है। जैसे हम लुटने को ही तैयार बैठे हैं।
‘मो को कहां ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में’
जो गुरु है, वहां कोई अहंकार नहीं होगा, वहां .किसी आडंबर को जगह ही नहीं है। न ही वहां अहंकार होगा, न ही वहां हीन भावना होगी।
वहां तो ईश्वरत्व जागा हुआ है। हिमालय में भगवान शिव का एक स्थान है, जो जागेश्वर कहलाता है। वहां वे जागे हुए हैं। कहानी है। जो हमारा शिव तत्व है, वह सदा जगा रहता हे।
गुरु वही है, जो साधक का तीसरा नेत्र खोल देते हैं। विवेकी का पथ )त का पथ है। जो सही है, वही पथ है। अब साधक का मन भटकता नहीं है, उस के भीतर से उसे निरन्तर टोकने वाला पैदा हो गया है, जो उसे सचेत करता रहता है।
जब तक यह तीसरा नेत्र नहीं खुलेगा, हमें उस परमात्मा के दर्शन नहीं होंगे।
गीता का प्रारम्भ होता है, अर्जुन मानता है कि वह कार्यष्य दोष से ग्रसित है, समूढ चेता है, मोह ग्रस्त है, कार्पण्य दोष, भयग्रस्त, मानव का स्वभाव है। जहां मन भीतर ही भीतर कम्पायमान है, वह अनिर्णय की स्थिति में आ जाता है। अर्जुन भगवान कृष्ण को गुरु के रूप में स्वीकार करता है, यह शिष्य की गुरु के पास पहली उपस्थिति है। इस के पूर्व अर्जुन कृष्ण का सखा था, उस ने कहा था, सेना के मध्य में मेरा रथ खड़ा कर दो।
यह दूसरा वाक्य महत्वपूर्ण है।
गुरु भी तो हमारी ही तरह तो होते हैं। जितने हम सामान्य हैं, वे तो हम से भी अधिक सहज और सामान्य हैं।
तब उन की पहचान कैसे हो?
बस उस का सामीप्य, मानो चुम्बक ने लोहे को अपने पास खींच लिया हो। वहां तो मात्र आनन्द रहता है। जिस का बाहर में पहचान प्रेम है। वहां हृदय खिले हुए गुलाब की तरह मुखरित है। तब यह खिंचाव साधक को उन के समीप ले आता है।
तब वे अर्जुन की तरह पहली बार कहते हैं-
‘‘शिष्यसतेऽहं शाधि मां त्वा प्रयत्नम्।।’’ 2/7
मैं आप से पूछता हूं, जो कुछ निश्चय लिया हुआ, कल्याण कारी साधन हो वह मेरे लिए कहिए, क्यों कि मैं आप का शिष्य हूं, आप की शरणागति में हूं, मुझे शिक्षा दीजिए।
‘प्रयत्नम्, अर्जुन, गुरु की शरणागति में है। तब गुरु-शिष्य के भीतर उस के वृत्त में जगह ले लेता है।’
मन से ही मन की युति सम्भव है। शरीर और मन का संयोग तो है, पर यह टूटा हुआ है। जहां शरीर है, वहां प्राण तो रहते हैं, पर मन नहीं रहता। मन और प्राण की युति ही तो योग है। और शिष्य और गुरु का यहां मेल मन के धरातल पर रहता है। वही परम योग है। वही भक्ति है, वही रस है, वही ज्ञान है।
तभी कृष्ण पूछते हैं, कि अर्जुन तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ है या नहीं?
तब अर्जुन कहता है- ‘नष्टो मोहः स्मृति लब्धा’, आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है, मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, मैं संशय रहित हुआ हूं।
यहां गीता में सारा परिदृश्य स्पष्ट हो गया है। गुरु वही है, जो ब्रह्मनिष्ठ भी हो, तथा श्रोत्रिय भी, जो सामान्य तो है, परन्तु अत्यन्त विशिष्ट भी।
तब भगवान अर्जुन को उस की प्रार्थना पर -
‘दिव्यं, ददामि, ते चक्षुः पश्य मे योगम ऐश्वरम्।।’ 11/8
मैं तेरे को दिव्य अलौकिक चक्षु देता हूं, इस से तू मेरे प्रकाश को देख।
कुछ नए बाबा भी आए, वे तीसरी आखिरी बात कह गए। वे शिष्यों की तीसरी ऑंख खोलने की दुकान ही खोल बैठे। जो वास्तविक गुरु है, वे कहते नहीं, पर साधक की तीसरी आंख खोल जाते हैं। जो विवेक है। गुरु का लक्ष्य रहता है, वह शिष्य के विवेक को जागृत करे। जो विवेकी है, वही गुरु होता है।
जो वास्तविक गुरु होते हैं, वे शिष्य नहीं बनाते। वे तो गुरु बनाते हैं। वे शिष्य का विवेक ही जागृत कर देते हैं। यही शिव नेत्र है। यह कब खुलता है, कहना कठिन है?
पूज्य स्वामी जी ने ‘अनन्त यात्रा’ में जहां चूड़ाला कुंभ का भेष रख कर गुरु रूप में नीलकण्ठ को उपदेश दिया है। वहां उस की वर्णना है। गुरु की कृपा से ही यह खुलता है। आप कितने ग्रन्थ पढ़ लो, लिख लो, साधना अन्धी ही रहेगी। प्रकाशतो तभी मिलता है, जहां सांप-सीढ़ी के इस खेल में गुरु की सीढ़ी आप को उपलब्ध हो जाती है।
स्वामी जी कहते थे, यह मार्ग बहुत सीधा है, पर कठिन तो है। मैं यही कहता हूं, मेरे पास आ कर पूछो, मुझे देखो, वे हमें हमारी गलतियों पर बहुत डांटते थे, पर हम समझ ही नहीं पाते थे, वे कहा करते थे, छोटी सी भी भूल बहुत पीछे ले जाती है। निरन्तर सजग रहो। जागे रहो, यही ध्यान है। जो जितना वर्तमान में रहेगा, उतने ही गहरे ध्यान में रहेगा। ध्यान तो आचरण रहे, यह कोई जीवन से अलग कोई विशिष्ट विधि नहीं है। हर जगह वे सजग थे। एक सी चाल में, छोटे-छोटे कदमों में उन्हें वर्षों चलते देखा है। निगाह पांच फीट से दूर भी नहीं जाती थी।
स्वामी के साथ रह कर सीखा है, जहां पूरा विश्वास हो, वहीं जाओ, जब जाओ, पूरी तरह जाओ, अपने आप को आधा-अधूरा रख कर मत जाना, वे शान्त है, चुप रहो, जब वे कहें, तब बोलो, जो वो कहते हैं, सुनो, उन्हें तुम्हारी भेंट की कोई जरूरत नहीं है, दे सको तो मन दे आओ, जाना बहुत सालों के बाद जाना।
गुरु के पास तो कैसे जाओ, यही तो भागवत में रास पंचाघ्यायी में समझाया है।
कृष्ण गोपियों के वस्त्र उठा कर ले गए, वस्त्र जो आवरण हमारी चेतना पर है, हम जिन अवधारणाओं को ले कर जी रहे हैं, उसी बोझ को सब जगह ले जाते हैं।
भीतर रत्ती भर भी जगह नहीं होती है। बस घाट के पत्थर की तरह गंगाजल को छू लेते हैं।
गुरु तो वही है, जो शिष्य में ही समा जाते हैं। बस एक बार ”वहॉं रहना“. हो जाए, हम अपने आप को गिरवी रख दें, बस प्रेम के लिए, वे तो .अनंत प्रेमी हैं, खाली पात्र होगा तो भर जाएगा। पर हम ही अगर भरा पात्र ले कर जाएं, गन्दा पात्र ले कर जाएं, तो वहां तो अमृत भी है तो बह जाएगा। या विष बन जाएगा। ‘स्वाति’ नक्षत्र तो एक ही है, पर उस की बूंद जो गिरती है, उस का फल अलग हो जाता है। गुरु की सेवा, संगत की सेवा है, प्राणी. मात्र की सेवा है, और उन की भेंट अपना मन है, मन की निर्मलता है, जितना शु( चित्त होगा, उतनी ही गुरु- अवतरण की जगह बनती चली जाएगी।
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