Wednesday, January 30, 2013












            पूज्य स्वामीजी की साधना पर यह आलेख दिया जा रहा हैं
ब्रह्मनिष्ठ   ब्रह्मलीन परमसंत  स्वामी रामेश्वराश्रम जी महाराज                               विरचित



    संदेश- सिद्धान्त
    और
    साधना   

   
   

    1- जीवन का उद्देश्य                               
    2- दर्शन                                   
    3- साधन तत्व                           
    4ऋ वर्तमान में रहना                       
    5- हमारा व्यवहार                       
    6- जीवन जीने की कला               
    7- अपने बारे में                       
    8 -योग साधना और अध्यात्म               
    8- विधि-  एकाग्रता, सफाई,  अन्तर्मुखता   






वर्तमान में रहना












वर्तमान में रहो, उत्तर स्चयं तुम्हारे पास आ जायेगा। पर व्यवहार में कैसे रहा जाए। और जीवन की सार्थकता को किस प्रकार पाया जाए, यह हमें समझना होगा
जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आता है, उसके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखो, कोई प्रतिब(ता नही। कोई पूर्वाग्रह नहीं। यही त्याग है। जो भी  दुराग्रह है, बनी बनायी धारणा है, उसको छोड़ देना ही त्याग है। वह बुराई उसमें नहीं है। तुम अपने भीतर की बुराई को उस पर प्रक्षेपित कर रहे हो। तुम अपने भीतर का गंदलापन उसके अन्तर्जगत पर फैक रहे हो। शांत हो जाओ। निश्छल मन से स्वागत करो। यही त्याग है।
    छोड़ना और छूटना यहां नहीं है। यही छूटना है। बाह्य में जो कुछ भी परिवर्तन होगा, वह अर्थहीन है। जब बल समाप्त होगा, फिरकनी फिर रुक जाएगी। उससे भीतर बदलाव नहीं आता। वह भीतर से नहीं जुड़ता। कुछ किया जाना हो, कुछ होना भी हो, तो वह भीतर से ही होगा।
    अतः जब भी कोई व्यक्ति सामने आए....परिस्थिति सामने आए उसके बारे में कभी पूर्व धारणा मत रखो। पूर्व में धारणा का आधार स्मृति है और स्मृति ही पाप है। बार बार विषयों के चिन्तन से वासना, स्मृति-रुप धारण कर लेती है। और फिर स्मृति जब भी किसी की उपस्थिति होती है, अवधारणा प्रस्तुत करती हे। हमारा सारा व्यवहार उसी धारणा के आधार पर होता है। यही जीवन की जटिलता है।
    हम अपने भीतर इतना कचरा समेटे हुए हैं कि वह चाहते हुए भी नहीं छूटता। हम वर्तमान में रहना ही नहीं जानते। चाहते भी नही हैं। हमारा सारा कार्य, व्यवहार स्मृति से परिचालित है। यही तनाव का कारण है। यही विक्षोभ का कारण है। व्यक्ति को हम, व्यक्ति रूप में नहीं, स्त्री हरिजन, मुसलमान महाजन, अफसर नाना रूपों में देखते हैं। हर रंग, रुप,व्यवसाय जाति के प्रति हमारे पास अपनी धारणाएं है। हम उन्हीं सांचो में उसे देखते हैं, रखते हैं, और खुद  समस्या खड़ी करते हैं।तुम्हारा काम अन्तर्मुखी होकर मन की निश्चलता को प्राप्त करना है, अन्तर्मन को जीवन का कार्य व्यवहार सौंप देना है। वर्तमान में जीना सीखो। स्वभाव स्मृति में हैं, आदत स्मृति में है, वर्तमान में रहने का अभ्यास होते ही स्वतः छूट जाएगी, पेड़ के पत्ते कब गिरते हैं, उसे अहसास भी नहीं होता, जिसे छूटना है, वह छूट जाएगा, कुछ पता भी नहीं चलेगा।
    क्रिया साक्षी-भाव है। जो व्यक्ति उपस्थित हुआ है। परमात्मा ने ही उसे तुम्हारे पास भेजा है। कल वह क्या था, कोई मतलब नही। कल उसने क्या किया था याद रखना व्यर्थ है। आज अभी जब वह आया है, साक्षी भाव से साक्षात्कार करो, तुम खुद पाओगे, वह तुम्हें बदला हुआ मिलेगा। वही तुम्हें वर्तमान में रहना सिखला पाएगा।
    यही त्याग है।
छोड़ना क्या है, यह लोग समझ नहीं पाते हैं। जब मैं कहता हूं, अन्तर्मुखी हो जाओ, वर्तमान में रहने का अभ्यास करों। जो छूटना है, स्वतः छूट जायेगा। बाहर छोड़ने पकड़ने के चक्कर में मत पड़ो।
    बाहर जो भी किया जा रहा है, हो रहा है- उसका भीतर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कितने ही रंग के कपड़े पहन लो, घर छोड़कर जंगल में चले जाओ- माया तो भीतर है, वह कहां पीछा छोड़ेगी ? वह साथ ही तो चल रही है।श में रहे।
    प्रकृति की लहरें अनवरत उठ रही है। ये नाभि में उठती है। नाभि में विकारों के बीज है। वे बीज सूक्ष्म है। वहां मात्र स्पंदन है। वो धीरे धीरे उफनते जाते हैं, जैसे लहरें सभी के अन्दर उठ रही है, किसी को जल्दी उत्तेजित करती हैं, किसी को कम। यह व्यक्ति की बनावट, बुनावट पर निर्भर रहता है।
    जैसे कुछ लोग सो रहे है, कोई आकर आवाज देता है तो कोई एक आवाज पर, कोई दो आवाज पर, कोई चार आवाज पर उठ जाता है, और कोई होता है, उस पर असर ही नही होता- वह सोता रह जाता है। आवाज देने वाला एक ही होता है। संस्कार सूक्ष्म बीज रूप में है, लहरें टकरायी, टकराते टकराते कोई उफन जाता है, किसी पर कोई असर नही होता। यह उसी प्रकार से है कहीं बच्चों ! आवाज लगते ही उठ जाता है, कोई सोया रहता है। वासना जागृत ही नहीं होती।
    लहरें अनवरत उठ रही है धीरे धीरे यह अनुभव हो जाता है कि पकृति का कार्य यही है। हमें तो सहन करना है। सहन करने के लिए अपने स्थान पर स्थिर होकर रहना है।
    चेतन्य केन्द्र आत्मा है या यूं कहिए, वहां अवेयरनेस है वह है, उसका अनुभव हो जाता है उसके सबसे समीप अन्र्तमन ही है, मनोविज्ञान की भाषा में इसे अनकांशस कहा जा सकता है। यहा जानने का माध्यम कोई है नहीं, इन्द्रियों की पहुंच यहां तक नही है।यहा तक स्थूल शरीर की पहुंच नही रहती है। यह उसके परे की बात है, जानने का माध्यम नही है। अभ्यास यही करना है। नाभि से उठ रहे स्पंदनों को, जो चित्त पर आकर टकराते हैं तथा वहां स्थूलता ग्रहण करते हैं, वहीं वासनाएं जन्म लेती है। उस उफान को उस संवेग को, उस लहर को, उस तरंग को उस भाव दशा को गहरी जागरूकता के साथ, सतर्कता के साथ साक्षी भाव से अवलोकित करना है।
    इसी अन्तर्मन से स्पंदन आगे बढ़ते है, वे स्थूल शरीर से अभिव्यक्त होते है। नाभि से उठने वाले स्पंदन चित्त पर आकर टकरा कर स्थूलता ग्रहण करते है। यहां आकर भाव दशा शरीर के माध्यम से प्रकट होने लगती है। यहां आकर वासनाएं आकर ग्रहण करती है, स्पंदन तरंगों का रूप ग्रहण कर लेते हैं, वासनाएं विषयों के लिए लालायित रहती है, उन्हें पोषण मिल जाता है, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाता है तो वे ऊपर की ओर उठती जाती है, पर उन्हें फैलने के लिए जगह नहीं मिलती। व्यवहार अनुकरण से नहीं सीखी जाती। यदि हमारा क्रोधी स्वभाव है और उसकी हमें प्रतीती भी है, तो वर्तमान में रहने का अभ्यास होेने के बाद लहर जो उठी है, वह अनुभव होगी और लहर जिस प्रकार पत्थर पर टकरा कर वापिस लौट जाती है, वैसे ही मालूम होगा। टकराई व लौट गई, अन्तर्मुखी होेने के बाद वृत्तियां उठते हुए भी पनपती नही है। और धीरे धीरे बिल्कुल ही नहीं होती।
   
   
    इसीलिए वह बात गहराई से समझने की है कि हमें इस प्रक्रिया के प्रति जागृत होना है। जागरूकता की सबसे बड़ी यही जरूरत है। हम हजारों साल से शरीर के प्रति अत्यधिक सजग है। सारे शास्त्र यहीं आकर रूक गये हैं, जो आगे बढ़े वे भी काल भय से हमें छोड़ नहीं पाये। बु( जब बोले, तब तो शरीर से इतना लड़ चुके थे कि उनकी बात को भी स्वीकारते हुए जो उन्होंने करके छोड़ दिया था, वह भी उनके अनुयायी मानते गये। लोग कहते हैं कि मन, जो क्रिया तन्त्र है, वाक है, शरीर के इस पर नियंत्रण कर ले, और चित्त से उठने वाली तरंगों के प्रति असहयोग रखें तो साधना की ओर तेजी से बढ़ेंगे। यह सबसे बड़ा खतरा है।
    उपशमन, नियमन, नियंत्रण फिर उल्टी तरफ चलना है। शरीर के नियंत्रण व नियमन की जितनी चिन्ता होती है, शरीर उतना अधिक खतरनाक हो जाता है। वहीं जब क्रिया का स्वरूप स्पष्ट है तो मात्र साध्य अन्तर्मन से उठने वाली तरंगो के प्रति सहनशीलता को प्राप्त करना है। शरीर के नियंत्रण पर हजारों साल से जो बल दे रहे हैं, वह यह जानकर भी छोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे है। मन से असहयोग लेना है मन का निष्क्रमण भूत और भविष्य में है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही मन स्वतः अनुपस्थित हो जाता है। जससे वह स्वतः अनुपस्थित होने लग जाता है। यही पहली मंजिल है, न यहां  किसी प्रकार का दमन नहीं है। अभ्यास का  लक्ष्य है, मात्र साक्षी रहना। यही हमें जानना है, आगे गहरे समझना है। तभी साधना का रहस्य समझ में आता है। यही सार है। तभी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।   
रास्ता यही है

    स्मृति अनवरत चिन्तन से बनती है कोई व्यक्ति आया, बातचीत हुई। भूल गए उसको तो कोई बात नहीं। परन्तु यदि उसकी बार बार याद आती रहे, वह धीरे धीरे गहरी हो जाती है। वह संस्कार बन जाती है।
कांच के ऊपर तो जो वस्तु आई उसका प्रभाव नहीं रहता, परन्तु मन तो कांच नहीं है, वहां चित्र बनता है अंकित हो जाता है ?वह भी कब। उसका बार बार स्मरण रहे। किसी ने कोई बात कहंी और ध्यान नहीं दिया तो बात बाहर ही रह गई। वह जब याद दिलावे तो भी हल्की ही याद आती है। और कोई बात कही, ध्यान नहीं दिया तो वह भीतर चली गई।गिलास में पानी है, रंग डाल दो। कुछ हवा में उड़ जायेगा, कुछ सतह पर फैल जायेगा, कुछ नीचे जाकर बैठ जायेगा। इसी प्रकार हमारे ऊपर घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, वह मन रूपी कांच पर इसी प्रकार असर डालती है।
    कोई तो आई और ऊपर से निकल गई। और कोई वहीं फैल गई। कोई नीचे जाकर फैल गइ्र्र। वही संस्कार बन जाती है। जो ऊपर उड़ गई, उसका पता ही नहीं। जो ऊपर सतह पर फैल गई, वह कुछ दिन ठहरी और चली गई। जो नीचे जाकर बैठ गई, वह संस्कार बन गई। वहीं से वासनाएं उत्पन्न होती है।
इसालिए
   
प्रारम्भिक अवस्था में वर्तमान में रहने के लिए मन पर उठने वाली वृत्यिों का अवलोकन आवश्यक है,
यह तो शुरू में कुछ दिन लगातार अवलोकन करने की जरूरत है। इससे आदत पड़ जाती है, विचार न उठने की। अवलोकन तो विचार उठने की स्थिति है। इससे क्या होता है, विचार धीरे धीरे उठना कम हो जाता है। उसके बाद की स्थिति जो है, वह हमेशा रहने की है। हमेशा अवलोकन नहीं होता। दिन में काम करते समय अवलोकन करते रहोगे तो काम करने में बाधा पड़ेगी।
    शुरू की अवस्था और बाद की अवस्था में अन्तर है। बच्चों की पढ़ाई शुरू करते समय पहले स्लेट पेन्सिल लेकर बैठाया जाता है।
    यही प्रारम्भिक स्थिति है।
    बाद में वह किताब देखते ही पढ़ने लग जाता है। यह बाद की स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए अवलोकन शुरू की स्थिति है।
    अवलोकन रहते रहते बाद में यह स्थिति आ जाती है कि विचार उठना बन्द हो जाता है।
    इस स्थिति में रहना है। यह स्थिति हमेशा रहेगी। अवलोकन हमेशा नहीं रहेगा।
    वैसे क्रिया के लिए श्रेष्ठ समय रात का है।
    साईकिल चलाते समय जब सीखा जाता है, तब ध्यान हैण्डिल पर रहता है, ध्यान वहीं टिका रहता है। बाद में, सीखने के बाद इतनी सावधानी की जरूरत नहीं रहती।
    बाद में यह आदत में आ जाता है। फिर कुछ करना नहीं पड़ता, रहना पड़ता है।यदि बात ढंग से समझ में आ गयी और अमल में आने लग गयी तो जल्दी ही सब हो जाता है। चाहिए यही, अभ्यास बना रहे।
    हम चाहते भी हैं, करते भी हैं, पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। और बातों में रस आता है। जो काम दस मिनट में होता है, यहां घंटो लगा देते हैं। व्यर्थ का कार्य और फालतू बातें करते है। फालतू कामों में अपने आपको लगाये रखते हैं, दिमाग में जितना फालतू बातों का जमघट होगा, स्थिरता उतनी ही दूर रहेगी। दिमाग पर  फालतू चीजों का जो बोझा डाला है, वह बाधा डालेगा ही....।
जो चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा।  इसीलिए जब तक शरीर है, तब तक संसार भी है। काम भी होगा, बदस्तूर होगा। नहीं कैसे रहेगा संसार। जो कहते हैं- संसार असार है, उनका कहना है, प्रतिक्षण यह भूत में जा रहा है, इसीलिए आप आज कितना भी करो, कल उसका क्या महत्व हो, कुछ पता नहीं। हजारो सालों की बात आज कितनी सही है, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता, वह तो बदलती ही जायेगी।
    यहां जो कर्म होगा, इसमें किसी तरह के संस्कार नहीं बनेंगे ?
क्योंकि हर चीज आयेगी और कांच के सामने से निकल जायेगी। प्रवेश द्वार अन्दर होगा ही नहीं। स्मृति तक बन जाती है, जब वह अनदर पहुंच जाती है।   इधर से आये, उधर से गये। हमने देखा ही नहीं। अन्दर पहुंचेगा ही नहीं, बोलते समय देखा है, घड़ी से घंटे बज उठते है। घंटे बज रहे है। कानों ने भी सुना था, पर बातें करते समय कोई पूछे कब बजे, पता ही नहीं रहता। वह वहीं के वहीं रह गया।
वर्तमान में रहने का मतलब है जो देखें, सुनें, वह वहीं के वहीं से वापिस लौअ जाये। अन्दर नहीं पहुंचे।
अन्दर पहुंचते ही वे संस्कार बन जावेंगे। जो बातें सुनी, वहीं छोड़ जाओं।इसके बाद जब यह स्थिति निरन्तर बनी हुई हो, तब शरीर वही काम करता है, जो शरीर के द्वारा प्रकृति को कराना होता है। उसमें वह सुन भी लेता है। कर भी लेता है। तो उसको आगे का संस्कार नहीं बनता। अपने आप ही सब कार्य होते रहते है। प्रकृति आगे सब कार्य करवाती है।इससे शांति मिलती है ?पहले का कितना भी हो। नया नहीं बनना चाहिए। कितनी भी बड़ी पूंजी हो, अगर नया नहीं बनता है तो खतम होना चाहिए। स्वाभाविक बात है। सबसे जो मोटी बात है, इतने चक्कर में पड़ने के बजाय वर्तमान में रहो। अपना सब काम करते जाओं, जरा भी आगे पीछे मत घूमो।

शुरू में जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं, उन्हें इस स्थिति में लाने के लिए  एकाग्रता का  अभ्यास करना चाहिए। अवलोकन करना उसके बाद का अभ्यास है। इस स्थिति में लाने के लिए यहां शुरू की क्रिया है, इससे जो स्थिति बनेगी, वह वर्तमान में रहने की अवस्था होती है। और अगर यह समझ गए हो तो यह सब शुरू से करने की जरूरत नहीं हैं। इसीलिए प्रारम्भ में कह गई परम्परागत साधनों का अपना महत्व है।बगर आगे का समझे जो कर रहे हो उसे छोड़ना उचित नही है। उसके साथ ही अवलोन का अभ्यास शुरु कर देना चाहिए।अवलाकन का अभ्यास बढ़ने के सयासथ नाद श्रवण शुरु हो जाता है। तब परम्परागत साधन अपने आप छूटने लग जाता है।
    यह बात सही है कि विचार तो अवलोकन करते ही ढेर से चले आते है। इतनी बातें, इतना कचरा, साधक घबड़ा जाता है।निरन्तर ध्यान रहने से वह क्रिया शिथिल होती जाती है। इस स्थिति में ढेर जो आता है, वह आना बन्द हो जायेगा। निरन्तर ध्यान रहेगा। शिथिल होते होते नाद सुनाई पड़ता है। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। वह जिन्हें यह समझने में नहीं आता है, उन्हें पहले यह कहा जाता है। नाद सुनते सुनते अपना कर्म चलता रहता है, यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। तब चिन्तन इसका होता ही नहीं है।

जहां करने का ध्यान आया। वहीं हट गए, फिर संसार आया। फिर मन का सहारा लो। फिर मन से दूसरी वस्तु का सहारा लो।सि(ान्त तो बहुत छोटा है ?
उलझा रखा है लोगों ने। जांच कर देखते हैं, शास्त्र में यह लिखा है या नहीं। इसमें न तो वर मांगना है, न सहारा लेना है, न आशीर्वाद है, न गुरू है, न कोई अलौकिक खेल है, यहां बस शांति है। यह भी नहीं है, यह छोड़ो, यह करो, जो है जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, ठीक है।


हमारा व्यवहार

आदतें और स्वभाव, उठने वाली वृत्ति को पहचान देते हैं, जिससे जीवन की पहचान मिलती है।
    संस्कारों में यह चीज तो बीज रूप में रहेगी ही। अच्छी मिठाई भी खाते आ रहे हैं। लेकिन मिठाई के प्रति हमारी रुचि नहीं है। परन्तु मिठाई खाते आ रहे हैं, इसलिए उसका भी संस्कार है, पर जिससे लहरें उठती है, संस्कारों में से वृत्तियां वासनाएं जागृत करने में वह समान रूप से संस्कारों के भण्डार से टकराती है।
    हमारी चाय पीने की आदत है।
    चाय और मिठाई सामने आयी तो चाय पीने की वृत्ति जल्दी जागृत होगी, परन्तु मिठाई की जागृत्ति होकर भी उतनी नही होगी। परिणाम यह होगा कि चाय के लिए हाथ पहले बढ़ेगा, मिठाई के लिए नहीं। वृत्ति अपना स्वरूप स्वयं उजागर कर देती है।
    इस प्रकार जितने भोग भोग चुके हैं, उनके संस्कार रुपी बीज अन्दर हैं। पर यह सामुदायिक लहर जो उठती है। प्रकृति की वह एक व्यक्ति की नहीं, मानव मात्र की होती है, टकराते ही अंदर हलचल मचती है।
    वृत्तियां उफान खाकर ऊपर आ जाती है।
    इन्दिरा गांधी की मृत्यु से लहर उठी है। कोई शंात रह गए... कोई विचलित हुए, कोई उफान खाऐंगे। लहर तो एक ही है। चारों तरफ से उठी है। कर्म एक ही हुआ है। परन्तु प्रतिक्रिया अलग-अलग। जो जितना निकट है, उसकी अनुभूति उतनी ही गहरी होगी।
    इसी तरह से यही संस्कार है। हमने जीवन मंे जो जो भोगा है, अनुभव किया है या जिन-जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहा है, वही संस्कार रूप में, बीज रूप में उपस्थित होता है। प्रकृति उसमें वृत्तियां जागृत करके इस शरीर और इन्द्रियो द्वारा करने को प्रेरित करती है।
केवल संस्कार:-केवल संस्कार:-
    मृत्यु के बाद संस्कार शेष रह जाता है। संस्कारों का भण्डार अन्तर्मन में रहता है। उसका ही एक हिस्सा इन्द्रियां और मन हैं। यही एक शरीर छोड़कर जाता है। जिस शरीर में वह जाता है, वहीं प्राण की गति प्रारम्भ हो जाती है। बीच में कुछ नहीं रहता है। बीज रूप में यही संस्कार रहता है।
    इस जीवन में अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास किया तो अन्दर उसमें संस्कार नहीं बनते। संस्कारों के अनुकूल ही वह जहां जहां देख लेते हैं कि वासनाओं की पूर्ति होनी सहायक होती है, उस परिस्थिति में परिवार में जन्म हो जाता है।ये स्मृतियां जो है, संग्रह रूप में हमारे अन्दर है। वो हैं संस्कार ।क्या होता है, बैठे बैठे ही, अपने आप ही, अनायास ही उसमें वासनाएं उत्पन्न होती है, और क्यों होती है, कैसे होती हैं ? इसका कोई कारण नहीं। वह मनुष्य स्वयं नहीं करता, वह प्रकृति कराती है। मैं यह कहता हूं कि इस प्रकृति से हम इतने जुड़े हुए हैं कि कई हमारे अन्दर से आने वाले विचार अपने आप उठते है। उन संस्कारों के कारण यह प्रकृति उन संस्कारों को धक्का देती है, वहां धक्का मिलते ही वासना रूपी यह प्रवृतियां उठती है और वे इन्द्रियों में जाकर के विषयों के लिए प्रेरित कर देती है। उसी से मनुष्य सब कुछ करता है। यदि पूर्व संस्कार उसके अंदर नहीं होते, उसको ज्ञान नहीं होता तो वासनाएं उत्पन्न नहीं होती।मैं वही तो कहता हूं कि मनुष्य केवल स्मृतियां अपनी और उसे स्मृतियों के    आधार पर सुख दुख जितना भोगना है वही लेकर आता है। उतना ही भोगेगा हर हालत में। वह भोगने के लिए उसके पास स्वयं का साधन नहीं है, उसकी प्रकृति अपने आप जुटाएगी।
परन्तु जो भेागता है, और वह भोगना, इसलिए कि वह संस्कार और उसके अंदर वासनाएं शेष हैं, वह अपने भोग, वो सब पूरे करवाएगी। कुछ भी साधन नहीं होते हुए भी होगा।
   
मनुष्य जन्म के साथ क्या लाता है ? पूंजी के रूप में संस्कार और ब्याज के रूप में सुख दुख मिलता है। यहां मनुष्य को  इतना ही करना है कि यह जो उपरी मन है, इसकी गति को ठीक करके अन्तर्मन के द्वारा यह जानने का प्रयास करना है कि यहां हमें कैसा व्यवहार करना है कि जिसके द्वारा यह हमारी स्मृतियां और वासनाएं आगे न बढ़े। क्योंकि वे आगे बढ़ती जाएगी और वासनाएं इस प्रकार ही उठती रहेगी। तो कभी न कभी धोखा देगी। ये कभी नीचे ले जावेगी, कभी उपर ले जावेगी, यानी यह दुख बढ़ेगा। तो कभी न कभी ये धोखा देगी।
        मनुष्य के जीवन का साध्य सुख और शांति है, सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी  है ?बिल्कुल नहीं है, सुख होेगा तभी तो शांति मिलेगी। दुख में मनुष्य को शाांति कैसे रह सकती है ?सुख तो इन्दिय जन्य है, भोगों की प्राप्ति से प्राप्त संतुष्टि है। और संतुष्टि से शांति मिलती है। यदि वासनाएं बार बार इस प्रकार की प्रबल हो जाती है और सुख के पीछे मनुष्य पड़ा ही रहता है, तभी धोखा है। इसलिए अन्तर्मन से संबंध जोड़ने के बाद, यानी अन्तर्मन से व्यवहार होेने के बाद, वह सुख तो भोगेगा, परन्तु सुख के पीछे लालायित होकर पीछे नहीं पड़ेगा। यानी यह जो वासनाएं काम क्रोध आदि हैं, इससे छुटकारा होगा। इससे छुटकारा होने से संस्कारों में जो वासनाएं उत्पन्न होतीहै, ये वासनाएं उत्पन्न होगेी। बु(ि उसकी हमेशा स्थिर रहेगी। और प्रकृति के द्वारा जो कार्य दिया गया है, केवल वही कार्य वो सुचारू रूप से करेगा।
    बस, इतना ही सार है, इससे आगे कुछ नहीं। कोई सेठ साहब का नौकर है। यदि वह नौकर, जो काम कहा उसी काम को लापरवाही से करे। तो वह कार्य करे प्रिय नही होता है। परन्तु वह नौकर, यदि साहूकार की इच्छा जान करके उसको जा चाहिए, उसे पहले ही तैयार करता रहे तो साहूकार को प्रिया होता है।
    प्रकृति का भी यही नियम है।
    प्रकृति क्या चाहती है, क्योंकि यह सब नाटक प्रकृति का ही है।क्योंकि हम भी उस प्रकृति द्वारा निर्मित उसके पुर्ज ही है।
    प्रकृति चाहती है कि हम कुछ करें।
    जबकि हम,हमारे पूर्व संस्करों के अनुसार जो वासनाएं उत्पन्न होती है, उसके पीछे दौड़ते हैं। उसे पूरे करने के लिए चाहते है। प्रकृति के विरोध में हमारा व्यवहार होता है।
    और यह विरोध इसलिए होता है कि हम अपने मन के अधीन हो करके, उसकी ही बात मानते हुए , वह कहता है- यह अच्छा है, वह अच्छा है, करते  रहते है।
    और जो प्रकृति चाहती है, वह नहीं होता है।
    याद रहे सुख और शांति एक दूसरे के विरोधी नहीं है ?प्रयत्न का अध्किार प्रकृति ने दिया है।भौतिक जीवन में प्रयत्न अधिकार है।लक्ष्य हमारा हमें शांति प्राप्त करनी है, तो सुख और दुख दोनो समान स्थिति में पहुंचने के लिए उस स्थिति में पहुंचना पड़ेगा। आगे अन्तर्मन तक जाना पड़ेगा। परन्तु अन्तर्मन में जाने से पहले यह वर्तमान मन को हमें समाप्त करना है, तो उसके प्रयास के लिये सुखी रहना जरूरी है। इस समय यदि हम दुखी हैं तो यह मन विचलित है।
    उस अवस्था में पहुंचने के बाद सुख और दुख दोनो समान हो जाते है।
    पहला कत्र्तवय यह होगा कि हमें सुखी जीवन जीना है, उसके द्वारा शांति प्राप्त होती है। शांति के बाद आनन्द की स्थिति है, वह अन्तर्मन के द्वारा प्राप्त होती है।
 आनन्द की स्थिति में सुख दुख दोनों ही समान होते है।शांति, आनन्द के पहले की स्टेज है।शांति की अवस्था में सुख दुख दोनो का अनुभव होता है, परन्तु शांति होती है। क्योंकि सुख वहां ज्यादा होता है, दुख कम हो जाता है। आनन्द इसके बाद की स्टेज है, दोनो का समान रूप हो जाना चाहिए।
    इसके लिए केवल चर्चा करने से कुछ नहीं होता है, वह तो इसके लिए स्थिर रहकर अन्तर्मन तक जाना होगा।
    साधना का सार ,यही है,    अन्तर्मन से अपना व्यवहार करो, यही सार है।
    साधना हेतु जो साधन बताया है,इसमें पहला है- आत्मनिरीक्षण का। चित्त सरोवर पर उठने वाली लहरों का गहरी सतर्कता, जागरूकता के साथ अवलोकन जिससे क्रमशः संकल्प निवृत्ति आ जाती है।
    और उसी के साथ बताया  है- नाद श्रवण, ये दो अलग अलग बातें नहीं हैं। ये एक ही है। यदि मन से ऊपर उठने वाली वृत्तियों पर ध्यान रखा तो इससे भी नाद सुनाई देगा, यदि नाद पर ध्यान दिया तो वृत्तियां अपने आप शांत हो जावेगी। बात एक ही है।
    परन्तु दो उसके अलग अलग तरीके है।
    इस रास्ते से जाओंगे तो उधर पहसे जाओगे तो इधर पहुंचोगे।
    तो मन की स्थिरता और यह नाद, दोनो एक ही स्थिति है। परन्तु इससे होना क्या चाहिए।
    कि स्थिर बु(ि होते हुए भी हमारे व्यवहारिक कार्य बदस्तूर चलते रहने चाहिए।
    यह बात जरा कठिन है।
    काम करने लगते हैं, मन हट जाता है।
    वह नहीं हटे, इसी के लिए उसी स्थिति मंे जैसा नाद सुनाई पड़े सुनते जाओ, सुनते जाओ।
    बीच में बाधा नहीं पड़े तो अनन्य चिंतन जैसी स्थिति हो जानी चाहिए।
    उसी स्थिति में आगे जाकर धीरे धीरे यह स्थिति आती है कि चैबीस घंटे वैसा ही मन स्थिर रहता है, और तमाम कार्य सुचारू चलते रहते है।
    तो इसी से वह माम अनुस्मर यु( च वाली स्थिति आ जाती है।
    यु( भी चलता रहता है। शारीरिक कार्य भी चलते रहते है।
    मन चिंतन में एक ही जगह अपने आप में स्थिर रह जाता है।
    इसी को भक्ति भी कह सकते है। ज्ञान भी, निष्काम कर्म योग भी कह सकते है। नाम अलग अलग हैं, स्थिति एक ही है।



जीवन जीने की कला

सांसारिक जीवन और धन की उपादेयता रहेगी।
 व्यवहार के लिए धन की जरूरत है। संग्रह भी करो। सब काम करते रहो। बस चिंतन समाप्त करो।

प्रारम्भिक अवस्था में वाणी पर निगाह आवश्यक है। इससे दूसरों की आलोचना  रुक जाती है। वाणी का संयम रखने में जिहृा का संयम भी है। कम बोलना और स्वाद पर मन का नहीं जाना- यही अभ्यास है। सब से अधिक फिसलने वाली चीज जिहृा है। बोलते ही मन अधिकांश आलोचना मंे चला जाता है। और मन वर्तमान को हर जाता है। यहां गड़बड़ होने से मन हर जाता है।
ब्रहृाचर्य  का आत्म साक्षात्कार  से कोई सम्बन्ध नहीं है।
वह जो समझ रहे थे, इसमें ऐसा होगा, वह लिखते रहे। बाद में  जो भी लिखते रहे। लेकिन भूखे मरो, यह भी कोई लाभ है। शरीर  इन्द्रियों पर आधारित है। सब इन्द्रियां सही काम करेगी, तभी शरीर चलेगा। ब्रहृाचर्य का पालन करो, खूब माल खाओ। रस तो बनेगा। फिर क्या होगा। नियम यही है। दुराचारी मत बनो। व्यभिचारी मत बनो। उचित है कि भोजन की मात्रा पर निगाह रहे। रसना पर स्वतः ही निगाह हो जावेगी।
शास्त्र कहता है ,उचित आहार।
गृहस्थ की ऊपर ही इन सन्यासियों का जीवन चलता है।वास्तविक साधक गृहस्थ ही है।
छोड़ना और छूटना:-
    मैने तो कभी नहीं कहा- यह छोड़ों, यह मत छोड़ो। क्योंकि मैं मानता नहीं हूं कि इससे व्यवधान पड़ेगा। हां, अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ता गया तो इसकी स्मृति ही नहीं होगी। वह स्वयं तुम्हारा छूट जावेगा। यही अच्छा है।
वर्तमान में रहने का अभ्यास नहीं करना पड़ता?
जहां क्रिया शुरू करो, वह चक्कर में पड़ जायेगा। प्रकृति को जो चाहिए, वह कराती रहेगी। वह मालिक है। वह नाटक करा रही है। पात्र वही देती रहेगी। वर्तमान मे रहने के लिए बाह्य साधन की जरूरत नहीं है। किसी भी चीज की आसक्ति नहीं रहे।
परम्परागत साधनों की भी प्रारम्भ में जरूरत रहती है।   
यदि हम आज कहें कि कोई जरूरत नहीं है तो जो लोग पीछे रह गये हैं यही मान बैठे हैं, कितने लोग छोड़ बैठेंगे। उससे लाभ नहीं, अहित ही होगा। वे कुण्ठा में ही रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि वह स्वयं आकर अनुभव करे कि जो हमने किया, उसकी जरूत नहीं थी। परन्तु यह सब नाटक इसी तरह चलेगा। ना, करते हुए भी लोेग करते रहेंगे, करके ही हट सकते हैं। कोई बहुत बड़ा मकान बनाना होता है तो , उसके लिए पेड़ा भी  बनाना पड़ता है, मकान बनाने के बाद पेड़ा  हटाना पड़ जाता है। मूर्ति पूजा, भक्ति का स्थान इसी तरह ही है।
विचार, उसकी क्रिया मस्तिष्क में प्रतीत होती है- इस विचार को नाभि में ले जाना  संभव है !इसीलिए तो यह क्रिया है कि विचार धीरे धीरे जैसा कि मन का स्वभाव है, जो कि विचित्र है, जैसे कि अपन किसी चीज को पकड़ने लगते हैं तो वह भाग जाता है। तो इसी तरह से वर्तमान में हरेक व्यक्ति का मस्तिष्क ही काम कर रहा है। वहीं से विचार उठते है। हम सोचते हैं कि दिमाग से सोच रहें है, परन्तु वहीं उसे विचारों को अवलोकन करना प्रारम्भ करते हैं, क्या हो जाता है कि जो विचार करने की जो वहां क्रिया चलती है, वो क्रिया को वो नीचे सरकता जाता है।
 वहां उसे पकड़ने की कितनी कोशिश करो, पकड़ में नहीं आता है, वह धीरे धीरे नीचे सरकता जाता है। जितना विचार रहित मन होता जायेगा उतना ही वह धीरे धीरे नीचे सरकते सरकते अन्त में जाकर नाभि में विलीन हो जायेगा। जब जाकर उस मन की ऊपरी सतह पर जो हमारा वर्तमान मन है, उसका प्रयास समाप्त हो जाता है।
    जो यह लहरें टकराने का सवाल है, वह अन्तर्मन से टकराती है। और यही से फिर वो ऊपर उठत उठते वापिस दिमाग में आ जाती है, और यहां आकर फिर क्रियाएं प्रारम्भ हो जाती है। तो फिर वह किस प्रकार नीचे खिसकता जाता है, इसका भी अनुभव हो जाता है।
करने सइसकी पहचाने होती है, जैसा मेरा अनुभव है, वह मैं कह सकता हूं, पर आपको अभ्यास करना होगा। साधन वही है। कोई अलग साधन नहीं है। रास्ता एक ही है। मेन रोड़ एक ही है। दूसरा रास्ता नही है। मेन रोड को पहुंचने वाले बाई पास से होंगे।
हां, बाह्य मन नीचे आते आते समाप्त हो जाता है, अन्तर्मन जो हमेशा जागृत रहता है, उसकी अनुभूति हो जाती है कि वहां प्रकृति किस प्रकार कार्य करती है। उसका ज्ञान हो जायेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म दर्शन जो यन्त्र होता है, उसको बारीक से बारीक चीज नजर आती है। वहां जाकर सूक्ष्म से सूक्ष्म लहरें किस प्रकार कार्य करती है। इसकी अनुभूति होती है। इसी से भविष्य का आभास हो जाता है।
    जब यह अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है तो वहीं से यह आभास होता है कि यह घटना होने वाली है तो अपने को देखना चाहिए कि प्रयोग करके सचमुच यह घटना होती है या नहीं। यदि होती है तो फिर अपना विश्वास दृढ हो जाता है, फिर और प्रयास करो, इस प्रकार प्रयास करो तो और भविष्य की धटनाएं पता हो जाएगी। इस प्रकार बढ़ते जाओ तो कई बातें आगे की पता हो सकती है।
    फिर यह स्थिति आती है कि आज से आगे साल, दो साल, पांच साल बाद की घटनाओं का आभास होने लग जाता है ? परन्तु फिर उनका प्रचारहुआ, कहने की आदत हो गई तो प्रकृति को मौका मिलेगा, टाँग पकड़कर नीचे फैंकने का। अतः कहना भी हो तो संकेत में, ताकि और कोई नहंी समझे।
हम इस मार्ग पर  चलकर आत्म विश्वास पा सकते हैं।
प्रयास नाम से शून्य हो, खाली पुस्तके पढ़ने तथा चर्चा करने से कुछ भी नहीं होगा। कुछ किया नहीं तो क्या होगा !कई बार कहा है- जबान पर जो नियमन चाहिए वह तो होता नही। दवाई भी खाते जाओ, परहेज भी नहीं करो। दैनिक जीवन में कितनी गड़बड़ करते हैं, पता नही। कभी सोचा है, पहले परहेज करो, तब दवा फायदा करेगी।
जो बातें गलत हाती है, जबान से होती है, जबान का मन का- गहरा संबंध है। जब तक जीभ पर काबू नहीं है, तब तक मन पर काबू पाना कठिन है।
    हम दिनभर जो बातें करते है, उसके बारे में सोचना चाहिए। हम जो वादे करते हैं, वो कितने पूरे करते हैं, सोचा है ?
    इससे संकल्प शक्ति कम होती है। ज्यादा बोलने से शक्ति क्षीण हो जाती है। अनावश्यक बोलना, ज्यादा बोलना, इसमें तारीफ भी दूसरे की करनी होती है, बुराई भी होती है, बुराई ज्यादा होती है, सच्ची कम, झूंठी ज्यादा होती है। इस प्रकार की जो बातें हैं, वे बाधक है। बाधाएं पहले हटानी चाहिए।
    प्रयास यही है, प्रयास करो।
    मैने जो बाते कही हैं, वे पहले जानने का प्रयास करो। जो बातें कही है, उन्हें गहराई से सोचो, तभी आगे जाकर कुछ हो सकेगा।
अपने बारे में

इंजिनियर वायंगनकर सर्वप्रथम मेरे गुरू बने, जिन्होंने मेरे बचपन की स्मृतियों को परिपुष्ट कर सत्पथ का मार्ग दिखाया। बचपन से ही मैंने  अपने मन रूपी अश्व को संयम की वल्गा से कसना प्रारम्भ किया। निरन्तर प्रयासरत हो अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण किया।
    मैं घर के अंदर ही घर से विरक्ति का अभ्यास करने लगा। घर में बारहों मास बार त्यौहार, पर्व उत्सव, शादी विवाह जैसे कार्यक्रम आयोजित होते रहते थे। उससमय मैने प्रायः उस मोह से विलग रहने के लिये अपनी इन्द्रियों को कसना प्रारम्भ किया। मैं कभी भूख नहीं है कहकर खाने का समय टाल देता। कभी भोजन के समय घर से बाहर निकल जाता। कभी व्रत का बहाना बना लेता। ऐसी क्रियाएं अपनाकर मैं नित्य प्रति के स्वादिष्ट व्यंजनों से अपनी रसनेन्द्रिय की साधना करने लगा था। धीमे धीमे आहार की मात्रा भी कम करता गया। कई बार दशहरा दीवाली के अवसर पर तो खुद शुरू से ही   ध्यान रखता कि भोजन कम से कम लेना है। गरिष्ठ या मीठा भोजन तो लेना ही नहीं  है।
    भोजन के साथ कपड़े का शौक भी कम करता गया। मेरा भी विचार दृढ़ हो चुका था कि जब सन्यास लेंगे तो दूसरों पर आश्रित होना पड़ेगा।  जब दूसरों पर आश्रित रहेंगे तो कपड़ा कहां से जुड़ेगा ? कपड़े मांगना पड़ेंगे। या धन संग्रह करना पड़ेंगा। इसलिये मैने अपने वस्त्र घटाना प्रारम्भ कर दिये। एक जोड़ी कपड़ा और वह भी सादा सूती वस्त्र और जिस शक्ति से भगवान को मिलता है उस शक्ति से मन जो इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इकाई है वह अपने भीतर जागृत कर ब्रह्यंड के नियमो को जान लेता है और यही वास्तविक साधना है।
 मेरी साधना आगे बढ़ती रही और एक दिन मेरी यह भावना बढ़ी कि अगर भगवान हैं तो उनके दर्शन होने चाहिए। एक बार मेरी चाल में 2-3 जने साथ रहते थे वे तीनो काम से कहीं चले गये थे। मैं अकेला था तो मैने तय कर लिया था कि या तो मैं रहूंगा या भगवान के दर्शन करूंगा। मैने अंदर से कमरा बंद कर लिया और पानी की सुराही रख ली और गहरे ध्यान मे चला गया। मेरी वह एक समाधि की अवस्था थी। एक दिन गुजर गया, दो दिन गुजर गये तीसरे दिन संभवतः किसी ने कुण्डा खटखटाया और तब मुझे कुछ आभास भी हुआ वह चला गया। तीन दिन मैं भूखा प्यासा इस संकल्प के साथ बैठा रहा और अचानक एक क्षण ऐसा आया कि मैने देखा जिस भगवान शिवजी की पूजा किया करता था वे भगवान दिखाई देते हैं एक भावना होती है एक प्रतिमा सामने खड़ी है और वह अपने होठों से कुछ कह रहे हैं। लेकिन क्या कह रहे हैं मैं समझ नहीं पाया। मैने चाहा दोनों हाथों से चरण स्पशकरूं, मैने दोनो हाथ बढ़ाने चाहे उनके पांव पकड़ने चाहे तभी वह दृश्य समाप्त हो गया और वह प्रतिमा वहां से हट गई और मैने देखा कि कुछ बीड़ियों का ढेर वहां रखा था। तत्पश्चात मुझे ध्यान आया कि मुझसे तो उठा ही नहीं जा रहा। मैने कुण्डा खोला और मैं गिर पड़ा।मुझे लोगों ने बताया कि तुम्हारा कमरा तीन दिन से बंद था। तुम इतने बीमार हो गये थे तो तुमने कहा क्यों नहीं। मैने उनसे कहा कि पानी पिला दो, चाय पिला दो। लेकिन अन्दर से मेरा मन यह जानने का उत्सुक हो गया था कि यह सब क्या है और क्या करना है । रात्रि के समय प्रश्न हुआ । वह दूसरा स्वप्न था उसमें मैने देखा कि  स्त्री की आकृति में कुछ देवियां दिखाई दी और उसने कहा कि जो कुछ तुमने देखा है वह तुम्हारी शक्ति है, तुम्हारे संकल्प से जो तुमने आकृति चाही थी, सोची थी वहीं तुम्हें दिखाई पडी । वह शक्ति तुम्हारी है ।

    साधना का लक्ष्य आत्मविश्वास होता है । अगर साधना सही होती है तो आत्मविश्वास आगे बढता चला जाता है । जो शक्ति परमात्मा की है वहीं मन स्वयं पा लेता है । अनुभव कर सकता है
एक बार इंजिनियर सा0 ने मुझसे पूछा तुमने सन्यास लेने की धारणा बना रखी है यह तो ठीक है। परन्तु इसके लिये क्या कोई प्लेटफार्म भी बनाया है ? क्या उसकी कोई आधारशिला भी है ? मैने कहा कोई आधारशिला नही है। तब उन्होंने समझाते हुए कहा तो तुम इसके बारे में पूर्व से ही तैयारी करो। बिना अभ्यास वृति धारण किये सन्यास ले लेना गलत होगा।
    मैने जिज्ञासा वश पूछा मैं कौनसा आधार तैयार करूं ? उन्होंने उत्तर दिया ”मनुष्य के जीवन में दो महतती आवश्यकताएं 1. भोजन 2. वस्त्र। तुम पहले तो इस धारणा को पुष्ट बनाओ कि मुझे सन्यास लेना ही है। और जब धारणा संकल्प के रूप में परिवर्तित हो जाये तब प्रयत्न प्रारम्भ करो और तभी लक्ष्य प्राप्ति की आशा करो ?
    सर्वप्रथम  तुम अपने भोजन और बाद में कपड़ों पर नियन्त्रण करना सीखे। यदि तुमने जीवन में अगर इन दो महती आवश्यकताओं पर पूर्ण नियन्त्रण कर लिया तो तुममें सन्यासवृत्ति अपनाने की पूर्ण शक्ति आ जाएगी। और तभी तुम्हारा सन्यास भी सफल हो सकेगा।
   
    भोजन के साथ कपड़े का शौक भी कम करता गया। मेरा भी विचार दृढ़ हो चुका था कि जब सन्यास लेंगे तो दूसरों पर आश्रित होना पड़ेगा।  जब दूसरों पर आश्रित रहेंगे तो कपड़ा कहां से जुड़ेगा ? कपड़े मांगना पड़ेंगे। या धन संग्रह करना पड़ेंगा। इसलिये मैने अपने वस्त्र घटाना प्रारम्भ कर दिये। एक जोड़ी कपड़ा और वह भी सादा सूती वस्त्र
और जिस शक्ति से भगवान को मिलता है उस शक्ति से मन जो इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इकाई है वह अपने भीतर जागृत कर ब्रह्यंड के नियमो को जान लेता है और यही वास्तविक साधना है।
    इंजिनियर सा0 ने एक और प्रश्न किया था कि तुम बड़े होकर संसार को क्या दे सकोगे ?
    मैने उत्तर दिया था मैं गुरूकूल की स्थापना करूंगा। भारत के नौनिहालों को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में निष्णात करूंगा। बच्चों को स्वयं पढ़ांऊगा तथा प्रकृति से जो कुछ भी मिलेगा वह सबमें बाटूंगायद्यपि मैं सन्यास संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर उन्हें नहीं दे पाया था। क्योंकि उस समय इस विषय पर मेरी जानकारी न्यून थी। फिर भी मेरी लगन को देखते उन्होंने कहा था कि तुम्हें वास्तव में सचचा सन्यासी बनना है तो कम एवं स्वाद रहित आहार पर ही संतुष्ट रहना होगा। शरीर श्रम, अस्वाद, सवंत्र भय वर्जन, अपरिग्रह, असग्रह आदि गुणों को जीवन में स्थिर करना पड़ेगा। ये सन्यासधर्म के आधार स्तंभ है। मेरे भावी जीवन में मेरा और उनका 10-12 वर्षों तक ही सामीप्य रहा। तथापि उनका मार्गदर्शन मेरे जीवन में एक वांछित क्रान्तिकारी परिवर्तन ला गया। वे वास्तव में एक निष्काम कर्मयोगी थे। गबन के केस की अग्नि परीक्षा में वे निर्दोष साबित हो चुके थे। उन्हें पुनः नौकरी पर ले लिया गया था। तथापि बाद में वे स्वयं इससे स्तीफा देकर अपना स्वतंत्र व्यवसाय करने लगे थे। मैने उनके जीवन दर्शन से जो कुछ सीखा वह निम्नानुसार है -
1.    यह कि नाम और मंत्र जप, मन को एकाग्र करने के लिये किया जाता है।
2.    प्रत्यक्ष नाम और मंत्र में कोई शक्ति नहीं होती।
3.    परन्तु जिनका मन एकाग्र हो गया है उनकी शक्ति ही अक्षरों द्वाराा महान कार्य कर सकती है। यदि मंत्र या जप के अक्षरों के बिना मन को एकाग्र करके बहिमुर्खता से अन्तर्मुखी बनने का मार्ग सुलभ हो जाता है तो वह अत्यधिक लाभकारी हो सकता है।
4.    इससे मानसिक व शारीरिक सहनशक्ति बढ़ती है। इनके द्वारा छोटे मोटे प्रयोग करके देखा जा सकता है। और यही साधना बिना किसी परिश्रम के या स्पष्ट ही कहा जाये तो शरीर की सहायता के बिना की जाये तो मानव मन की मानसिक शक्ति     महान कार्य कर सकती है। सावधानी इस बात की रहे कि जो कुछ भी किया जाये वह मात्र परमार्थ के लिये हो। सेवा के लिये     हो। प्रकृति के कार्यों में सहयोग देने के लिये हो।
5.    ऐसा करने से साधक प्रकृति के निकट पहुंच जाता है। प्रकृति के कार्यों को जानकारी हो जाती है। संसार में मानव के रूप उसकी स्थिति क्या है ? उसका स्थान क्या है ? कत्र्तव्य क्या है ? उसका स्थान क्या है ? इन सब बातों से वह भिन्न होकर इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना अभिनय कुशलता पूर्वक कर     सकता है। और यही मानव जीवन की उपलब्धि है।    
 ये थे कुछ बाह्य जगत से अन्तर्जगत में प्रविष्ट होने के उपाय, जो मुझे गुरू के नाते माननीय इंजीनियर सा0 से प्राप्त हुए। उनका जीवन मेरे लिये खुली पुस्तक के समान था। वे अंतर बाहर से एकीकृत थे। उनके जीवन से मुझे हर प्रकार का दिशाबोध मिला।  वे कहते एक समय में सोचो और एक ही समय में निश्चय कर लो। ज्ीपदा वदबम ंदक कमबपकम वदबमण् इसमें तुम्हारा जो निश्चय होगा ठीक ही होगा। हमेशा सफलता की और बढ़ते चले जाओगे।
    एक दिन उन्होंने ”अम्बर मंच फैक्ट्री“ देखने का प्रोग्राम बनाया। मुझे साथ लेकर चले। स्टेशन पर पहुंचने में करीब पौन घंटा लग गया। ट्रेन स्टार्ट होने का समय हो चुका था। जब टिकिट लेने खिड़की पर गये तो पता चला कि उनकी जेब में बटुआ ही नही है। मुझे लेकर वे ट्रेन पर गयैं जैसे ही हम फाटक तक आये। एक सज्जन त्वरित गति से अपनी कार से उतर कर हमारे पास आये। और हमें घसीटते हुए से प्लेटफार्म पर ले गए। सलून डिब्बा खड़ा था। उन सज्जन के पीछे इंजिनियर सा0 और सबके पीछे मैं। हम सब उस डिब्बे में बैइ गये।  गार्ड़ ने हरी झंडी बताई और गाड़ी चल दी। दादर स्टेशन पर जिस ट्रेन से जाना था वह गाड़ी खड़ी थी। मगर वह सलून उसे पार करता हुआ चला गया। हमें लाने वाले सज्जन रेल्वे के आफिसर सुपरिन्टेन्डेन्ट थे। हम लोग समय से पूर्व ही अंबर मैच फैक्ट्री पहुंच गये थे।
    हमने वहां पहुंचकर फैक्ट्री देखी और वापस लौटे। इस समय तक भी रूपये हमारे पास नही थे। और हमें बम्बई लौट आना था। इसकी चिंता मुझे बड़ी सता रही थी। पर उन्हें न थी। उन्हें पूर्ण विश्वास था। इसी बीच मैने देखा कि कम्पनी की कार ही हमें बम्बई छोड़ने के लिये वहां के प्रबंधक ने अपने आप भेज दी थी। कम्पनी प्रबंधक के विचार से इंजिनियर महो0 को वापसी में ट्रेन की देरी से  असुविधा एवं कष्ट हो सकता था।
    इन सब बातों का सारांश बतलाते हुए उन्होंने मुझसे कहा देखो संकल्प शक्ति बड़ी बलवान होती है। जो काम पैसे से नहीं हो सकता  वह मात्र संकल्प शक्ति से ही पूरा हो जाता है। हम इस शक्ति के द्वारा भौतिक साधनो का भी आसानी से लाभ उठा सकते हैं। उनसे मेरी अन्तिम मुलाकात ह्नदय विदारक स्थिति में हुई। समाचार मिला कि उनके पेट में फोड़ा हुआ है और वे अस्पताल में भर्ती है। जब मैं वहां पहुंचा वे बेड़ पर लेटे थे। पेट का आपरेशन किया जा चुका था। डाॅक्टर कहने लगे आप्रेशन सफल हुआ है। अब उनका स्वास्थ्य ठीक है। छुट्टी भी शीघ्र ही मिल जाएगी। उनकी पत्नी ने उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना में एक कथा का आयोजन कर डाला। जाते समय कह गई कि तुम भी कथा में आना। भोजन भी वहीं करना। शनिवार, उनकी अस्पताल से छुट्टी का दिन तय कर दिया था। जब में जाने लगा तो वे बोले - कहां घर जाना ? अब समय हो चुका है। अब मुझे घर नही जाना है। मैने कहा आप कैसी बातें करते हैं। डाॅक्टर आपको छुट्टी दे चुके है। उन्होंने कहा डाॅक्टर क्या जाने ? जिस दिन उन्हें अस्पताल से घर लाना था। मैं भी उन्हें लिवाने अस्पताल गया। किन्तु मैने देखा उनका परिवार शोक संतप्त हो उनकी लाश ले जाने के लिये खड़ा था। उन्हें भविष्य का इतना ज्ञाान था। वे भविष्य दृष्टा थे। सच्चे साधक थे।
अन्तर्मुखी बनो !!

    जब कभी इंजिनियर सा0 से मिलना होता घंटो, धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों पर चर्चाएं होती रहती। मेरे अनेक प्रश्नों के उत्तर कभी संक्षिप्त और कभी विस्तृत रूप से देकर वे मुझे समझने क प्रयास करते। परन्तु इस विस्तृत संसार की गुत्थी, अपरिक्व मन कभी सुलझा न सका। इसका कारण पूछने पर उन्होंने बतलाया कि तुम बाह्य संसार में जिस वस्तु को खोज कर रहे हो, वह उसमें है ही नहीं, जिसे ढूंढा जाये ? अनुभव किया जाये। और इसिलिये यदि इस संसार की गुत्थी सुलझाना है तो बहिर्मुखी होने के स्थान पर अंतर्मुखी बनो।
    बहिर्मुख और अंतर्मुखी ये दो शब्द मेरे लिये अपरिचित थे। कई दिनों की गहरी मानसिक खोज करने पर धीरे धीरे विदित हुआ कि बाह्य संसार भी निरंतर परिवर्तनशील है हमारा शरीर और मन भी निरंतर परिवर्तनशील और अस्थिर है। वह स्थिर और शाश्वत शक्ति का पता नही लगा सकता। इसे जानने के लिये जब वास्तविक ज्ञान का पता लगाया तब मालूम हुआ कि इन्द्रिय और मन से परे हमें यात्रा करनी होगी।
    परन्तु इन दोनों से परे कैसे जाया जाय ? और जाने वाला कौन है ? यह नहीं समझ पाया था ? इंजिनियर सा0 ने समझाने का प्रयास करते हुए कहा। इन्द्रियां बहिर्मुखी है। बाहर ही बाहर देखती है। अनुभव करती है। सुख दुख भोगती है। परन्तु सुख दुख की अनुभूति इन्द्रियां स्वयं नहीं बल्कि मन करता है। और भोगे हुए विषयों को बीज रूप से संग्रहित कर अपने मन में संस्कारों का अगाध भण्डार बना लेता है। अनुकूल वातावरण मिलने पर संस्कार रूपी बीज बार बार अंकुरित होते है। फलते फूलते हैं। और नये अनुभव प्राप्त कर उन्हें भी बीज रूपी संस्कार बनाते रहते है। ये बीज और संस्कार की क्रिया अनवरत चलती रहती है और मनुष्य दिन रात इनके कारण वास्तविकता के सागर में इतस्ततः भटकता रहता है। इनसे छुटकारा पाने के लिये मन के अंदर समाविष्ट संस्कार तथा वासनाओं का जब तक क्षय नहीं होता मन की दुर्बलता कम नहीं होती।
    मन को बलवान और सशक्त बनने के लिए इन वासनाओं से छुटकारा पाना आवश्यक है। परन्तु संस्कार मन को बैचेन करते रहते हैं। और इन्द्रियां बाह्य विषयों को अंदर तक ले जाकर मन के अंदर की वासनाओं को उछालने का प्रयास करती है। मन की स्थिरता के लिये प्राचीनकाल से ही असंख्य )षि मुनियों ने अनेक प्रकार के प्रयोग किये हैं। नाम जप, मंत्र जप, यौगिक क्रियाएं नवधा भक्ति, प्राणायाम तथा समाधि तक की क्रियाओं में मन का उलझाकर उसे नियंत्रित करने एवं अनुशासन में लाने का प्रयास किया है। परन्तु प्रत्यक्ष में मन की अनुभूति आज तक किसी को नहीं हो पाई है। और न भविष्य में किसी को होने की संभावना है।
    यदि मानव इस मन के दूसरे क्रियाकलापों को समझने में सक्षम हो जाये तो ही वह इसको नियन्त्रित कर सकता है। नियंत्रित मन, महान शक्तिशाली हो सकता है। वह अपनी इच्छा मात्र से बड़े बड़े कार्य निमित्त मात्र में कर सकता है और अंततोगत्वा अपने उद्गम स्थान प्रकृति से भी परे उस परम पिता परमात्मा रूपी महान शक्ति में अपने आप को समाविष्ट कर सकता है।
    परन्तु यह वाचिक विद्वत्ता केवल विचारों तक ही सीमित रहती है तो इससे कुछ भी लाभ होने की संभावना नही है। यदि मन को समझना है तो उसे नियंत्रित करना ही होगा। सर्वप्रथम मन के क्रिया कलापों पर ध्यान रखो। केवल मन के द्वारा ही मन का निरीक्षण करें। मन के द्वारा ही अपने आप को समझने का प्रयास करो। इसके लिये किसी बाह्य साधन की आवश्यकता नही है। यदि मन ने किसी बाह्य साधन का अवलंबन किया तो वह साधन मन से भी अधिक शक्तिशाली बनकर मन को अपना गुलाम बना देगा।
    इसलिये जप, तप, पूजापाठ, यौगिक क्रियायें आदि समस्त साधनों का त्याग करके केवल मन द्वारा ही मन का निरीक्षण करते रहने पर मन में निरन्तर उठने वाली असंख्य विचारधाराएं घटती जाऐगी।
मन का निवास स्थान मस्तिष्क है। यह मस्तिष्क में अवस्थित होकर अहर्निश चिंतन प्रक्रिया करता रहता है। सोचना इसका मुख्य विषय है। उसका इन्द्रियों से संबंध धीमें धीमें टूटना प्रारंभ हो जाता है। परन्तु क्रियाशील मन इस स्थिति को बरदाश्त नहीं करता। वह कहीं न कहीं चिपकने के लिये निरंतर प्रयास करता रहता है।
    ऐसी स्थिति में बाह्य मार्ग अवरु( हो जाने से वह मस्तिष्क से कण्ठ, कण्ठ से ह्नदय से नाभि तक चला जाता है। परन्तु गतिशील होने के कारण यह किसी एक स्थान पर टिक नही पाता। जहां भी जिस स्थिति में रहता है, निरन्तर चक्राकार घूमता रहता है। हर किसी विषय को पकड़कर उसके साथ तेजगतिवान होने लगता है। पर किसी वस्तु की पकड़ से बाहर यदि वह अपने आप में स्थिर रहने के लिये बाध्य हो जाता है तो उसकी गति धीरे धीरे मंद पड़ती जाती है। जैसे जैसे गति मंद होती जाती है वैसे वैसे वह नाभि तक खिंचता हुआ चला जाता है। परन्तु संसार रूपी इस विशाल सागर पर उठने वाली विकारों की लहरें जो निरन्तर नाभि पर टकराकर काम,क्रोध, लोभ, ईष्र्या आदि को उछालने का प्रयास करती रहती है। जबकि बाह्य विषय उसे अपनी और आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों ओर की रस्साकशी में वह अधिकतर बाह्य विषयों की ही ओर खिंचता हुआ चला जाता है। और धीरे धीरे साधन च्युत होकर सांसारिक कार्यों में उलझता रहता है। उससे बचने का एक मात्र उपाय है शरीर याने कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियों को समान रूप से बाह्य संसार में सक्रिय बनाना।
    निरन्तर उसके द्वारा प्रकृति के इस महान कार्य में सहयोग किया जाए तथा वृत्तियों की लहरों का नाभि पर होने वाले आघात को सहन करते हुए मन की गति को बढ़ने न दिया जाये। निरन्तर इसी प्रकार के कार्य का अभ्यास मन को शांति और शक्ति प्रदान करता है। रस्साकशी में निर्बल बना हुआ मन स्वयं अपने आप सबल बनता जाता है। और शरीर और इन्द्रियों के द्वारा होने वाले निकट या दूरस्थ कार्य केवल अपने संकल्प अपने आपसे ही सफलतापूर्वक संपन्न कर सकता है।
    जैसे जैसे मन मस्तिष्क से नीचे उतरने लगता है उसकी शक्ति बढ़ना प्रारम्भ होती है। कुछ छोटे मोटे कार्य वह अपने संकल्पबल से ही कर सकता है। परन्तु कर्म करने का अभिमान या अंहकार बढ़ना प्रारम्भ हो जाता है। उसे अपनी अल्प शक्ति ज्ञात होने पर भी, आपने शक्ति प्रदर्शन करने के मोह से वह बच नहीं पाता और इसी प्रकार धीरे धीरे पतन की राह पर बढ़ता हुआ वह अपनी शक्ति क्षीण करता जाता है।
    इसीलिये मन को नियंत्रित करना चाहिए। ये प्रयोग निरंतर किये जा सकते हैं। मन अपने आपको याने अंतर्मन या आत्मशक्ति का अनुभव करने लगता है। संसार में ऐसे व्यक्ति के लिये किसी प्रकार का आकर्षण शेष नहीं रह जाता। वह विचार या वृत्तियां रहित मन तथा सक्रिय शरीर और इन्द्रियों के द्वारा सांसारिक क्रिया कलापों को उत्कृष्ट तरीकों से निभाता हुआ अपना जीवन अपनी इच्छानुसार प्रकृति के निर्देशों पर चलाता है। इसी का दूसरा नाम जीवन मुक्तावस्था है। परन्तु यह नाम भी काल्पनिक है। मुक्ति नाम की कोई स्थिति नही है। न संसार कोई वस्तु है जो कि फल फूल कर मन को संसार में उलझा सकता है।
    इन तमाम उलझनों से बचने के लिये मनुष्य के लिये जीवन जीने का मात्र तरीका वर्तमान मे जीने का है। वर्तमान में जीवन जीने वाला व्यक्ति न क्षण भर पीछे जाता है और न एक क्षण आगे की सोचता है। चिंतन और चिंता, भूत का चिंतन एवं भविष्य की चिंता दोनों से परे वह मात्र वर्तमान में याने भूत भविष्य की संधि में ही रहता है। और इस कारण वह तमाम बंधनों से मुक्त,विकारों से मुक्त, आकांक्षाओं से मुक्त, एक स्वच्छंद शांत और आनंददायक जीवन जीता है। जीने की अवधि उसकी अपनी इच्छानुसार है। इसका नियंता वह स्वयं है अन्य कोई नही है।

    उन्होंने मुझे समझाया कि जप, तप और प्राणायाम आदि जो परम्परागत साधनाऐं है ंयह इस लिये महत्वपूर्ण हैं कि इसमें हमारी लगन रहती है और इससे अधिक इसकी कोई महत्ता नहीं है । समय आने पर सब छूटता चला जाता है । महत्वपूर्ण चीज है निरन्तर वर्तमान में रहना और अन्तर्मुखी होना और यही सही साधना है । मनुष्य इस मनुष्य शरीर में विराट की महानशक्ति का स्वयं अनुभव प्राप्त कर सकता है । जितना वह शक्ति के नजदीक जाता है उतना ही वह इस महाशक्ति से जुडता जाता है । मेरे जीवन में वे एक पथ  उनका मार्गदर्शन  हमेशा मेरे साथ रहा।
गुरूकूल छूटते ही बाहर का संपर्क स्वतःकम होने लग गया था। शेष रह गए थे, कुछ परिचित परिवार जो अपने आप जुड़ गए थे। एक बार सत्यामित्रानंद जी ने कहा था - आप गृहस्थियों के यहां क्यों इहरते हैं, सन्यासियों को आश्रम बनाकर रहना चाहिए। मेरा लक्ष्य स्पष्ट था। गृहस्थियों को ही धार्मिकता की आवश्यकता है। अगर हर परिवार की सुख, शांति, समृ( मेरे भाग्य से हो जाता है तो मेरे लिए यह बहुत है। धर्म की आवश्यकता उन्हीं को है। वे अशांत है। उनकी समस्याएं हैं, मैं अगर उनकी जरा सी भी सेवा कर सका तो यही मेरे लिए बहुत है। आश्रम में रहकर, प्रवचन देना। मुफ्त का खाना मुझे पसंद नही था। भारत में साधु सन्यासियों की संख्या एक करोड़ के आस पास है। यह किस पर  बोझ है। इतना सारा खर्चा तो गृहस्थ उठातें हैं ये कौनसा कम करते हैं। मेरा सीमित क्षेत्र रहा। जहां मुझे निरंतर कार्य करना था। शरीर से, मन से, जहां आवश्यकता हुयी धन से, मैं सेवा से पीछे नहीं हटा। मैने जो सोचा उस पर अमल किया। यही ध्यान रखा, व्यवहार सबके प्रति समान प्रेमव्रत होना चाहिए।

मैं अब अपने शरीर से तो नहीं , अपने विचारों के द्वारा आपकी सेवा अवश्य कर सकता हँ।मेरी  भावनाएँ ओर मेरी साधना के तरीके आप लागों तक पहुँच जाएँ; अन्तर्यात्रा के प्रकाशन के समयद्ध,इसमें थोड़ा सा भी आप अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे तो आपको लाभ होगा।
” हर व्यक्ति सब कुछ नहीं  कर सकता। यदि आपका और मेरा मानसिक सम्बन्ध जुड़ा रहेगा,वह इन ;पुस्तकों के द्ध माध्यम से जुड़ा रहेगा ताक उससे निरन्तर आपका सम्बन्ध मेरे साथ जुड़ा रहेगा।इसमें मेरी शक्ति का अंश आपके भीतर पहुँचता जाएगा।उसी के द्वारा आपकी बु(ि शु( और निर्मल होगी।आपको जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।उसी के आधार पर आप जीवन में कार्य करने लग जाएंगे।परम पिता परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना है किजो भी यहाँ आया है उसे  भौतिक सुख तो उसे उसके भाग्य के आधार पर मिलेंगे ही, उनमें वृ(ि भी हो, परन्तु आत्म ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने में भी सहायता मिले।
योग साधना और अध्यात्म
पूज्य स्वामीजी ने अपने साधन ग्रन्थ अनंतयात्रा में योग  सम्बन्धी साधना पर विचार करते हुए  चूड़ाला और शिखिध्वज आख्यान में कहा है कहा है-
”अनेक प्रकार की यौगिक साधना करने के पश्चात मैं भी इसी प्रश्न से जूझ रही हूंॅं कि क्या योग सूत्र द्वारा वर्णित अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति किसी को हो सकती है या मात्र भ्रम ही है? हां, अपनी साधना के आरंभ में जब मैं अपने गुरूदेव कीर्तिकेय के मार्गदर्शन में योग विधा सीख रही थी। तब मन बहुत शांत एवं प्रसन्न रहता था। यौगिक शक्तियों का भी कुछ आभास होता था। अनेक रंगों के प्रकाश नजर आते थे, कभी अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों के जलने की खुशबू आती थी। बिस्तर पर लेटे- लेटे आकाश में बडी ऊंचाई तक उड़ते हुए पहंुचने का आभास होता तो कभी गहरे समुद्र तल तक जाने की अनुभूति। मन में उठने वाले अच्छे बुरे सभी संकल्प तुरन्त पूरे हो जाते। परिणाम में जहां शुभ संकल्पों की सिद्धि से मन में प्रसन्नता होती वही अशुभ संकल्पों की पूर्ति से विषाद उत्पन्न होता। इसी अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक शक्ति बढ़ने का भी संकेत मिलता तथा अनेक बार इसके प्रयोग भी सफल हुए।
’”प्रयास पूर्वक की गई इस प्रकार की साधना हठयोग का ही एक अंग है। सफलता मिलने पर भी ये सिद्धियां स्थाई नही होती है। कुछ समय तक अपना प्रभाव दिखाकर निरन्तर खर्च होने वाली मानसिक शक्ति कमजोर पड़ने लगती है। प्रतिक्रिया स्वरूप मन और इन्द्रियां अधिक तेजी से विषय वासनाओं में लिप्त होने लगती है तथा कभी -कभी साधक रसातल तक पहुंच जाता है।
श्खििघ्वज द्वारा अपनी असफलता की चर्चा होने पर पूज्य स्वामीजी ने योग साधना की कमियों को संकेत करते हुए कहा है-
“”आपने महल छोड़ते समय राज्य व परिवार तो छोड़ा, किन्तु उनका चिन्तन नही छोड़ा। यहां आकर मन की ऊपरी सतह से आप ध्यान आदि के द्वारा मन को वास्तविकता से दूर हटाने तथा लम्बे समय तक उसे बाहर टिकाने का प्रयास किया, साथ ही मन की नीचे की सतह जो आत्मा की महान शक्ति के निकट होने के कारण अत्यन्त शक्तिशाली है, उसकी पूर्ण उपेक्षा की। परिणाम वही हुआ जो होना था। चिन्तन के विषय ऊपरी सतह से छिपकर धीरे -धीरे नीचे की ओर आकर जम गये तथा ब्रह्म रूपी सर्वव्यापी उस महान शक्ति की गतिशीलता से उसमें उठने वाली लहरों के धक्कों की वजह से नीचे बैठी हुई गंदगी एकाएक अपने विकृत रूप में ऊपरी सतह पर आकर स्वप्न के रूप में आपके सम्मुख प्रकट हो गई।’   
”‘प्रश्न का उत्तर पाकर भी उसकी सत्यता के बारे में आपको शंका होना स्वाभाविक ही है। यदि वास्तविकता जानना ही चाहते हैं तो अपने स्वप्न को याद करके उसमें से किसी व्यक्ति या वस्तु को केन्द्र बिंदु मानकर उसी पर निरंतर चिंतन प्रारम्भ कीजिये। चिंतन का विषय यदि व्यक्ति हुआ तो आपके अंतर्मन द्वारा उसका अंतर्मन प्रभावित होगा तथा पूर्व की अपेक्षा अधिक स्वप्न रूप से प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारे सामने उपस्थित होकर तुम्हारा संदेह दूर करेगा।’“
एक पात्र नीलकंठ के प्रश्न के उत्तर में कहा है-
    ‘    मानसिक शक्ति के प्रयोग करने की अभी तुम्हारी योग्यता नहीं है, एक ही बिन्दु पर बिना बाधा के निरन्तर मन को केन्द्रित करने पर मन शक्तिशाली बन जाता है तथा अंतर्मन द्वारा विराट शक्ति से जुड़ने पर साधक की मनोकामना की भी पूर्ति होती है।”
असुरक्षा तथा भय की भावनाओं के उन्मूलन के लिए मुझे क्या करना चाहिए।“ मैने पूछा।
    ”सर्वप्रथम अपने समस्त दैनिक कार्य सम्पन्न करते समय मन को उसी कार्य में एकाग्र रखते हुए किंचित मात्रा भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए।“ रानी ने कहा।
    प्रारम्भ में कठिनाइयां आ सकती हैं किन्तु धीरे धीरे निरन्तर प्रयास से सफलता मिल सकती है। फिर दिन में खाली समय में या रात्रि को निद्रा आने के पूर्व प्रयास करके मन को विचार रहित अवस्था में लाना चाहिए तब अकस्मात निद्रावस्था में पहुंचकर भी कुछ ऐसे स्वप्न दिखेंगे जिनमें दारूण दुखदायक परिस्थितियों में भी मन अविचलित रहता हुआ प्रतीत होगा। प्रत्यक्ष मौत आने वाले प्रसंग जैसे किसी ऊंचे पहाड़ की चोटी से नीचे कंदराओं में हिंसक जंतुओं के बीच हाथ पांव बांधकर धकेल दिया जाना, किसी देवता के सामने वेदी पर मस्तक रखकर तीक्ष्ण शस्त्रा से उस पर प्रहार होना या जलते हुए अग्नि कुण्ड में फेंक दिया जाना। ऐसे स्वप्न देखते समय भी मन में डर के स्थान पर यदि प्रसन्नता का अनुभव हो, स्वप्न टूटने पर भी मन देर तक शांत रहे तो समझना चाहिए कि मन धीरे धीरे स्थिर होता जा रहा है। शक्तिशाली होता जा रहा है तथा साधक मानसिक शक्ति के प्रयोग करने में सक्षम होता जा रहा है।
    ”मन को विराट के साथ किस प्रकार जोड़ा जाता है ? वह जुड़ा है या नहीं, यह कैसे जाना जाता है तथा विराट से क्या तात्पर्य है ?“ मैने रानी से पूछा।
    इस समस्त संसार कोे नियंत्रित करने वाली उस महान शक्ति का ही नाम विराट है, वही विराट शक्ति समस्त संसार का संचालन करती है तथा साधक जब निर्विचार अवस्था को पार करके धीरे धीरे अंतर्मन से शरीर तथा सांसारिक कार्यों को करने लग जाता है, तब वह यह अनुभव करने लगता है कि प्रत्येक कार्य में जो कत्र्तव्य बनकर उसके सामने उपस्थित होता है, वह उसके विचारों के अनुकूल हो या प्रतिकूल वह उसे निरासक्त भाव से उत्कृष्टता पूर्वक सम्पन्न करता है। कार्य सम्पन्न होते ही वह तुरंत उसे भूल जाता है। मन अत्यंत शांति तथा आनन्द की अवस्था को अनुभव करता है और तब उसे अपने आपको विराट के साथ जुड़ने का अनुभव होता है। ऐसी अवस्था में प्रकृति के कार्य में अपनी इच्छानुसार छोटे मोटे प्रयोग करने की इच्छा जागृत होती है। कुछ साधक लीलावश सावधानी से प्रयोग करके प्रकृति के नियमानुसार अनुकूल- प्रतिकूल फल शांति तथा धैर्य के साथ मांगकर अपने अनुभव अन्य साधकांे को मार्गदर्शन हेतु बताते रहते है। अंत समय में वे अपना नश्वर शरीर बड़े प्रसन्न मन से सहज रूप में त्याग कर उस महाशक्ति में प्रवेश कर जाते है।“
स्वप्न और साध्न तत्व
” स्वप्नों द्वारा एक तरफ जहां मनुष्य अपनी अतृप्त वासनाओं को तृप्त करके उनसे छुटकारा पाता है वहां यदि साधक इनका स्मरण रख के तथा सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा अपने अंदर के विकारों का पता लगाकर उनके मूल उन्मूलन का प्रयास करता है तो  वह शुद्ध ह्नदय व्यक्ति शीघ्रताशीघ्र शुद्ध तथा सरल हृदय होकर परमपिता परमात्मा की इस सृष्टि का उद्देश्य तथा उसमें अपनी भूमिका का वास्तविक ज्ञान पाकर कत्र्तव्यनिष्ठ आसक्ति व अहंकार से शून्य बनकर, जीवन को सुख शांति से बिताता हुआ अन्य साधकों का मार्गदर्शन करता हुआ अहर्निश आनन्द की स्थिति में अपना समस्त जीवन बिताता है।“.
हठयोग की अनावश्यकता
 आसन, प्राणायाम आदि समस्त क्रियायें मात्र शारीरिक व्यायाम ही है, स्वास्थ्य के लिए ये आवश्यक भी है किन्तु योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ना। यौगिक साधना करने वाले साधक यह मान्यता लेकर साधना प्रारम्भ करते हैं कि वे एक इकाई के रूप में अलग हैं तथा उन्हें उस महान शक्ति से जुड़ना है परन्तु यह सरासर गलत है। शक्ति के साथ शक्ति से ही जुड़ा जा सकता है। भौतिक शरीर से नही। योगाभ्यास प्रारम्भ करते समय आसन की स्थिरता तथा शारीरिक संतुलन के लिए योगासन सहायक होते हैं और प्राण की गति को शरीर के साथ मिलकर संतुलन बनाए रखने में रेचक, कुंभक आदि प्राणायाम सहायता करते हैं। किन्तु इनकी गति मात्र जड़ समाधि तक ही है, आगे नहीं।
जोड़ने की क्रिया इससे भी संभव नही है और जो महत्वपूर्ण प्रश्न है, वह यह है कि क्या हम जुड़े हुए नही है ? प्रत्येक मानव यहां तक कि संसार की प्रत्येक जड़ चेतन वस्तु विराट का ही एक अंग है। जोड़ना अर्थात योग एक काल्पनिक स्थिति है, असत्य है, शरीर और विराट को विभाजित करने वाली मन नाम की एक शक्ति स्वयं विराट द्वारा ही इस संसार रूपी लीला को आनन्ददायक बनाने के लिए निर्मित की गई है। परन्तु मानव सदुपयोग के स्थान पर उसका दुरूपयोग करके अनेक प्रकार के कष्ट भोगता है तथा अनेक प्रकार के काल्पनिक साधन अपनाकर आसन, प्राणायम व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य आदि सर्वथा अनुपयोगी एवं असंभव मान्यताओं का निष्ठापूर्वक बड़ी कठोरता से पालन करता है। गुरू और संतों के पास सुरक्षा के लिए दौड़ता है और भक्ति तथा तंत्र के द्वारा भविष्य में या मरणोपरांत कुछ विशेष उपलब्धि की झूठी आशा में अपना वर्तमान जीवन अत्यन्त दुख एवं कष्टों में बिताता है।
    योग साधना के प्रति मनुष्य को आकृष्ट करने के लिए ही कुछ बुद्धिमान साधकों ने इसका सहारा लिया है, पूर्व के साधक यह जान गए थे कि बिना किसी स्वार्थ सिद्धि के कोई भी मनुष्य साधना की ओर आकृष्ट नही होगा। हां यदि मानव मानसिक क्रिया द्वारा धीरे -धीरे अपने मन को स्वयं नियंत्रित कर लेता है और इस प्रयास में सफलता प्राप्त करके वह अंतर्मुखी होकर निष्काम भाव से कर्मयोगी बन जाता है अर्थात पाप, पुण्य, लाभ, हानि, अच्छा, बुरा सभी विचार त्याग कर निरन्तर मात्र कार्य के साथ जुड़ा रहने पर उसे कुछ मानसिक शक्तियां अवश्य प्राप्त होती है।“
‘भौतिक लाभ या परिवर्तन किसी भी प्रकार से संभव नही है, न कोई अदृश्य होकर आकाश मार्ग से भ्रमण कर सकता है न परकाया प्रवेश। मानसिक शक्ति से वह बहुत दूर की बातें जान सकता है, भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, मानसिक संदेश भेजकर किसी को शुभ कार्य के लिए प्रेरित कर सकता है। उसके द्वारा अपने किसी इच्छित परन्तु निष्काम या परोपकारी कार्य को सम्पन्न करा सकता है। किसी दूसरे के लिए स्वप्न निर्माण करके उसे अपनी जानकारी दे सकता है।
“‘निष्काम तथा आत्मकल्याण से प्रेरित साधक शीघ्र ही यह जान लेता है कि उसे विराट के साथ निरन्तर जुड़ा होने के कारण स्वतः ही सब कुछ प्राप्त है। अधिक प्राप्त करने हेतु किसी से सहयोग की अपेक्षा करना मात्र उसका भ्रम ही है, वह उसमें नही फंसता तथा किसी भी परिस्थिति में विचलित नही होता है तथा विराट द्वारा निर्दिष्ट कार्य को निष्काम कर्म द्वारा करता हुआ इस जीवन लीला को आनन्द पूर्वक सम्पन्न करता है।’






   



   

gurukul men ek din




वाहक 2

वाहक 2 
इस अंक में हम गीता के अध्ययन में प्रवेश कर रहे हैं। वाहक के हर अंक में हम गुरुगीता के कुछ श्लोकों की चर्चा करेंगे। पूज्य स्वामीजी ने अपने प्रवचनो में गीता के आधार पर समझाने का प्रयास किया था।
पाप और पुण्य


दान-सेवा और बहुमूल्य शब्दों पर चर्चा हो रही थी।
स्वामी जी ने कहा- स्मृति पाप है, प्रश्न यहां पैदा हो गया था। वह पाप क्यों है?
- दो ही बातें होंगी, या तो तुम अपने में रहना चाहोगे, ... या बाहर भटकते रहोगे। तुमने दान किया, तुम्हारे भीतर अहंकार जगा, ... तुमने सेवा में समय दिया, ... अहंकार जगा, ... तुम फिर भीतर से बाहर चले गए। बाहर की अनंतयात्रा है, ... घूमते रहो, ... मात्र बौद्धिक जिज्ञासाएं हैं, ... समाधान नहीं है। यह जो बाहर भटकाता है, ... यही पाप है। स्मृति एक पल भी वर्तमान में नहीं रहने देती। हर क्षण बाहर ले जाती है। इस कल से उस कल में दौड़ाती रहती है। सारा दोष संग्रह यहीं रहता है। अभिमान भी यीं ठहरता है। जो तुम्हारे ‘स्व’ से, तुम्हारे अपने ‘होने से’, तुम्हारे ‘आत्म’ से तुम्हे दूर ले जाए वही ‘पाप’ है।
‘पुण्य है, जो तुम्हें तुम्हारी निजता के पास लाए, तुम्हें तुम्हारे ‘स्व’ के पास लाए, तुम्हें तुम्हारा ‘आत्म’ अहसास कराए। वहां वर्तमान है। वहा मात्र होता है। इसीलिए कहा था- स्मृति पाप है। राग-द्वेष का संग्रह वहीं रहता है। मन का मुकाम वहीं है। वहां वह ठहरना अधिक चाहता है। एक क्षण भी हम अपनी स्मृतियों से बाहर नहीं आना चाहते हैं। बुढ़ापा क्या है। ‘स्मृतियों के टापू’ में निवास करना है। ‘बटुक’ का मतलब होता है, जो मात्र वर्तमान है। नित नूतन, नया, ... वही साधक का मन होना चाहिए। बूढ़ा मन तो बस अतीत का  वजन ढोता रहता है।

दृश्य का चिन्तन ही पाप है
यह सच है, लहरें, सागर और हवा के संयोग से बनती है। जान था, शब्द ही ब्रह्म है। ‘बेखरी’ वाक की पहली अवस्था है, वहां मौन रहा जा सकता है, उसकी भी कीमत है, पर भीतर कंठ के पास आकर, विचारणा का स्रोत बहता रहता है, एक पल भी विराम नहीं आता है।
जाना, ध्यान किसी विषय या वस्तु या रूप पर एकाग्रता नहीं है, यह तो मात्र निर्विषय हो जाना होता है। पर क्या यह संभव है? अनुभव बताता है, ... एक संवेग बाहर से आता है, ... वह खींचकर ले जाता है, जब बाहर से नहीं आता है, तब भीतर का अनार सुलग उठता है, लहरें ही लहरें धक्का मारती है। बहाकर ले जाती है।
यही तो चित्त है, ... यह लहरों का आलय है, भीतर से मानो कोई धक्का दे रहा है।
कहा गया है, ... यहां का साधन, बर्फ हो जाना है, कोई तरंग ही नहीं उठे। जहां सरोवर है, जल है, वहां वायु आकर लहरें उठा देगी। परन्तु बर्फ में तरंगे नहीं आतीं।
और बाहर के वेग को सहन करने के लिए, भीतर चट्टान हो जाना है, लहरें आएँ, और टकरा-टकराकर लौट जावंे।
पर जाना, यह सिद्धान्त के रूप में, विधि के रूप में तो सही है, पर प्रयोग के स्तर पर, कठिन है।
हां, जहां भी हो,ं वहीं पर जो विचार उठ रहा है, मात्र देखंे, अवलोकन शुद्ध हो, हम बहंे नहीं, मात्र देखे,ं तो यह वेग कम होने लगता है। भीतर दोषदर्शन का संग्रह है।
यह वैर है, इसकी आग शांत नहीं होती है।
मात्र देखते रहो, देखते रहो, इसके साथ बहो मत, ... यह ठंडी होने लगती है।
क्लैव्यं मा स्म गम,... श्रुद्रं हृदय दौर्बल्यं...
गीता में संपूर्ण योजना- व्यथित मन को संप्रेषित है। अर्जुन योद्धा है,... उसकी मन की यह दुविधा क्यों हुयी,... विद्वानों ने बहुत विवेचना की है। उसके भीतर की ममता,... उसके भीतर के द्वन्द्व को, जो उसके सतोगुणी व्यक्तित्व पर अचानक तमस की छाया के आने से पैदा हुआ,... ममता,... गुरुजनों को लेकर है,... दूसरे कोई और होते तो तो वह लड़ जाता,... पर अचानक ममता,... परिजनों का वध,... उस द्वन्द्व को खड़ा कर देता है, जो आज के मानव मन की समस्या है,...
कृष्ण उस व्यथित मन से जो गांडीव रखकर, रथ के पिछवाड़े बैठ गया है,... पसीने में नहा गया है, उसका आत्मविश्वास खो गया है,...उसे मार्ग बताते हैं।
आज चाहे, ममता हो, परिस्थितियों की प्रतिकूलता हो, अपमान का भय हो, मनुष्य का मन पराजय की आकांक्षा से या कर्म की व्यर्थता से ऊबकर किसी अरण्य की शरण में जाना चाहता है।संगीत सुनने का नशा, डिस्को में बढ़ती भीड़,तरह-तरह के नशे,बाबाओं के प्रवचन की भीड़ सब पलायन ही है।
यह दुविधा हजारों वर्ष बाद भी आज वैसी ही है,...
कृष्ण कहते हैं- हे, अर्जुन नपुंसकता को मत प्राप्त हो,... शास्त्र ने मनुष्य को ‘पुरुष’ शब्द की संज्ञा दी है। पुरुष वही है, जो पुरुषार्थ करे,... और मनुष्य वही है, जिसके पास मन-नाम की शक्ति है। अर्जुन की मूल समस्या, उसकी दुविधा है, वह वृहत्तम जीवन मूल्य से जहां यह युद्ध-मानवता की रक्षार्थ या मूल्यों की रक्षार्थ था, वहां वह अचानक अपनी ‘वैयक्तिक’ समस्या से उत्क्रांत हो उठता है। उसके सारे तर्क,... समष्टिगत मूल्यों से हटकर नितांत व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह तक सीमित हो जाते हैं। व्यक्ति की आज भी यही समस्या है,... वह अपने लिए तथा समाज या परिवार के हित के बीच सामंजस्य नहीं पा रहा है। इस पराजित मन को, दुविधाग्रस्त मन को,... जो वास्तव में आत्मविश्वासी मन है,... जगाने के लिए एक धक्के़े की जरूरत थी,... राख में दबे अंगारे को उठाने की ताकत, इस एक शब्द में है- नपुंसकता को प्राप्त मत हो,... हृदय की दुर्बलता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
अनिर्णय ही जीवन का आधार बन गया है। ज्योतिषियों की भीड़, बाबाओं की जमात, इसी दुर्बलता के कारण पोषण पाते हैं।
गीता, यहां ‘कर्मयोग’ का आधार तलाश कर रही है।
‘उतिष्ठ’,... उठो, जागो, अनावश्यक विचारणा का परित्याग करो,... ‘सोचो,... खूब सोचो,... पर विचार जो दृढ़ हो जाए उस पर कायम रहो, उस पर बार-बार मत सोचो,... तभी हृदय की दुर्बलता कम होती है। हम किसी भी प्रकार की साधना करे, अगर हमारा आत्मविश्वास दृढ़ नहीं होता है,... तो वह साधना व्यर्थ है। आज की सबसे बड़ी समस्या, मानव की यही दुविधा है,... वह अनावश्यक विचारणा के दबाव में रहता है, सही निर्णय नहीं ले पाता है। निर्णय हमेशा बुद्धि की स्थिरता में होता है। विवेक के आलोक में होता है। गीता उस राह पर चलने के लिए संकेत करती है।

कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः
मेरा स्वभाव कृपणता दोष से दूषित हो गया है,... कायरता रूप दोष करके उपह्त स्वभाव वाला अर्थात् मेरी बुद्धि पर जड़ता छा गयी है, जिससे में अपने कर्तव्य के बारे में मूढ़ हो गया हूं।
... यह कार्पण्य दोष,... अत्यधिक विचारणा से ग्रस्त मनुष्य पर आ जाता है। उसकी निर्णय क्षमता चली जाती है। वह दिग्भ्रमित हो जाता है। क्या करना है, क्या नहीं करता है? वह तय नहीं कर पाता है। यह कायरता दोष नहीं है। ... कायर व्यक्ति के पास तो एक रास्ता होता है, भाग जाए। समर्पण कर दे। जो है वही भाग्य है। मान लो पर जहां चुनौती तो है,... सामना करने का सामर्थ्य भी है,... पर उत्साहहीनता है। उसका कारण सम्मोह, भय, ममता, करुणा, कुछ भी हो सकता है।
आज समाज इसी ‘कार्पण्प्य दोष’ से ग्रसित है। जानते हैं, समाने अमंगल हो रहा है, अशुभ हो रहा है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ से बुद्धि इतनी जड़ हो गई है कि विकल्प सूझता ही नहीं है। यही कार्पण्य दोष है। दिग्भ्रमित हो जाना,... यह भय से भी होता है,... परन्तु अर्जुन भयभीत नहीं है। वह मोहग्रस्त है।
... आज समाज भी मोहग्रस्त है, सुख लोलुपता में है, वह छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति को ही बहुत बड़ा मान रहा है,... उसे दूर का नहीं दिखाई पड़ता है।
यही कार्पण्प्य दोष है। बुद्धि पर जड़ता छा गई है। विचार ही कुंठित हो गया है। ... अनावश्यक विचारणा का दबाव है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। उसका मस्तिष्क एक कचरा पात्र बन गया है।
... यह कहने से पूर्व की घटना है-
अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा था-
सेनयोरुभयोर्मध्यं रथं स्थापय मेऽअच्युत ।।1. 21 ।
हे कृष्ण मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए-.. मेरा रथ - शब्द महत्वपूर्ण है। उसके लिए यहां कृष्ण मात्र सारथी है,... वह अपने अहंकार में है-
परन्तु वही अर्जुन जब दुविधाग्रस्त हो जाता है,... तब कहता है-
मैं आपका शिष्य हूं- आपकी शरण में हूं, मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए-
... गीता की यह भूमिका है...
यह संवाद चिंतन है। मनुष्य स्वभाव से दिग्भ्रमित है। क्या करना है,... क्या यह नहीं, यह निर्णय वह बुद्धिचातुर्य से करता है। यही दुख का कारण है। वह हर प्राप्त परिस्थिति का दुरुपयोग करता है। विवेक का अनादर करता है।
गीता का संदेश- प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग तथा विवेक का आदर है। विवेक का आदर ही बुद्धि के शत-प्रतिशत शुद्ध होने पर उसे विवेकी बनाता है। विवेकी ही स्थितिप्रज्ञ है। यही कर्मयोग की उपलब्धि है, यही ज्ञान योग की संपदा है। यही भक्ति की परिकाष्ठा है।

अशोच्यानन्वशाोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
यहां से श्री कृष्ण,... एक शिक्षक, एक गुरु,... एक अधिष्ठाता अपना कथन प्रारंभ करते हैं-
प्रायः हमारी दुविधा यही है कि हम दुखी होते हैं, शोकमग्न होते हैं; परन्तु अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
शोक होने के लिए- पहली बात तो यह है कि उससे जुड़ाव होना आवश्यक है। यह वस्तु मेरी है, यह व्यक्ति मेरा है,... इससे अलगाव हो गया है, यही दुख है। जो मेरा है, उससे ममता, आसक्ति, कामना हो जाती है। वह इच्छा पूर्ति नहीं करता है तो उससे ही दुख होता है, क्रोध आता है, पर जो अपना नहीं है, उसके प्रति कोई भाव जन्मता ही नहीं है।
... अब सवाल होता है जिससे प्रियता है, ममता है, उसके प्रति हमारा क्या लगाव हो? ... क्या आसक्ति उचित है?
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता...
पंडितजन, जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते हैं।
संसार में कहा जाता है, दो ही बाते हैं, सत और असत। सत का कभी अभाव नहीं होता तथा असत हमेशा परिवर्तनशील होता है। शरीर और शरीरी। देह और देही। क्षर और अक्षर। शरीर तो विनाशशील है, पर जो शरीर में रहता है, उसका विनाश नहीं होता है इसीलिए जो अविनाशी है, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है, तथा जो विनाशी है, परिवर्तनशील है वहां यह परिवर्तन स्वभाववश है।
- इसे हम यों समझ सकते हैं- जीवन में अच्छी-बुरी अनेक परिस्थितियां आती है, हानि-लाभ, मान-अपमान निरंतर आता है,... यह हमारे बूते का नहीं है। यह तो हमको स्वभाववश मिलता है। प्रारब्धवश है। कोई भी परिस्थिति नित्य नहीं है, वह सदैव परिवर्तनशील है। अतः उसका सामना करना ही सार है। सामना मात्र वर्तमान में रहकर ही हो सकता है। शोक हमेशा अतीत को लेकर होता है। जो गया सो गया। हमारे जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान यही है। हम प्रायः जो चला गया है, लौटकर नहीं आता है, उसका बार-बार चिन्तन कर, अपने वर्तमान को ही कलुषित करते रहते हैं। वर्तमान को ही विषाक्त बना देते हैं। सृजनात्मकता का ह्रास हो जाता है। प्रबंधन की क्षमता हमेशा वर्तमान में ही परिलक्षित होती है। साथ ही आज जो सामने कठिनाइयां आ रही हैं, परिस्थितियां विषम है, वे भी भयभीत नहीं कर सकती। क्योंकि यह बोध रहता है कि यह विनाशशील है, परिवर्तनशील है। आज है कल नहीं रहेगी। सामना करने की शक्ति बढ़ती है। गीता- कर्मयोग का ग्रन्थ है। यहां पलायन का गीत नहीं है। आज के समय की चुनौतियों का यहां सामना करने का स्पष्ट निर्देश हमें प्राप्त होता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख दुःखदा
आग मा पायिनोऽनित्यास्तांस्ति तिक्षस्व भारत।
इन्द्रियों के जो विषय, मन-बुद्धि, इन्द्रियों और बाह्य विषयों के संपर्क से ही शीत-उष्ण, अनुकूल और प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख के अनुभव होते हैं। ये आते-जाते हैं। ये अस्थिर तथा अनित्य है, तुम्हें इन्हें सहन करो, विचलित मत हो।
मात्रा-स्पर्शः, जिनसे माप-तोल होता है, जिनसे ज्ञान होता है। उन ज्ञान के साधन इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अंतःकरण का नाम मात्रा दिया गया है। इन्द्रियों और अंतःकरण से जिनका संयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। इन्द्रियों तथा अंतःकरण हम जिन बाह्य पदार्थों का ज्ञान होता है, वे मात्रा स्पर्श है।
शीतोष्ण सुख दुःख कार्य है। पदार्थों में सुख-दुख देने की शक्ति नहीं है। वह तो हमारे संबंध जोड़ देने पर होती है।
आगमा पायिनः, ये ठहरने वाले नहीं है, आने-जाने वाले हैं। अनित्य हैं, मात्र पदार्थ ही अनित्य नहीं है, जिनसे उनका ज्ञान होता है, इन्द्रियां और अंतःकरण भी अनित्य है। वे भी परिवर्तनशील है।इन्द्रियों और बाह्य पदार्थ से यदि सुख मिलता है, तो उसके प्रति राग होता है। यदि दुःख मिलता है तो उसके प्रति द्वेष होता है। सारा जीवन इसी तरह राग-द्वेष से प्रभावित रहता है। तनावपूर्ण बना रहता है। यहां पर यह कहा गया है कि विषय तो रहेंगे,... ज्ञान के साधन भी रहेंगे,... परन्तु जो करना है, वह यही है कि विषयों के प्रति अंतःकरण में जो राग-द्वेष होते हैं, उनसे अप्रभावित रहा जाए। इन्द्रियों द्वारा विषय भोग तो होगा, उससे सुख, दुख भी होगा, हम इन्द्रियों को विषय भोग से दूर नहीं रख सकते,... उन्हें रोकना असंभव है,... परन्तु विषयों के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर,... विवेक न खो जाए। ....अंतःकरण में राग-द्वेष का विकार होना ही दोषी है।
मात्रा स्पर्श में भी निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इसी को तितिक्षा कहा है। ... यह किस प्रकार संभव है-
पूज्य स्वामीजी का यह प्रिय श्लोक था। यही साधन प्रणाली थी।
यह मात्र एक चिन्तन का या, मनन योग्य सूत्र  ही नहीं है।पूरी साधन प्रणाली है। तितिक्षा सहन करना ही नहीं है। जब हम किसी अप्रिय बात को बर्दाश्त करते हैं, तो उसकी छाप हमारे अंतःकरण में अंकित हो जाती है। वही संस्कार रूप में बदल जाती है। यह निरंतर घटता रहता है। हम जहां भी होते हैं, जो भी छोटी से छोटी घटना हमारे सम्मुख होती है, उसका प्रभाव हमारे मन के द्वारा, चिंतन के द्वारा हमारे अंतःकरण में जमा होता रहता है। वह संस्कार रूप में, बीज रूप में इकट्ठा होता रहता है। जब भी अनुकूल वातावरण उसे मिलता है, वह अंकुरित हो जाता है। प्रश्न यह उठता है, इसे बीज बनने से कैसे रोका जाए।
पूज्य स्वामी कहा करते थे, दो बाते हैं, भीतर से जो संग्रह जमा है, संस्कार है वहां निरंतर ब्रह्माण्ड की अनंत लहरों से आघात होते रहते हैं। वहां अंतर्मन है। वह बहुत शक्तिशाली है, वहां भीतर का संग्रह जो जमा है, वह उफान खाकर ऊपर आ जाता है, मस्तिष्क उससे प्रभावित हो जाता है,... हमें यहां बर्फ हो जाना है। बर्फ पर लहरें नहीं बनती, चित्त की वृत्तियां निरंतर उठती रहती है। एक क्षण भी नहीं ठहरतीं। जाग्रत में विचारणा है,... निद्रा में स्वप्न आते रहते हैं। निरंतर विचारणा का ही प्रभाव रहता है। यही तो राग-द्वेष है। राग जो प्रिय प्रभाव अंकित हो गया है। तथा बाहर के जो संवेग हैं,... वे भी निरंतर मात्रा-स्पर्श होने से निरंतर अंतःकरण पर प्रभाव डालते रहते हैं। दोनों तरफ से निरंतर जैसे समुद्र टकरा रहा हो। इन दोनों वेगों को ही सहन करना,... तितिक्षा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के प्रारंभ में ही इस साधना सार की ओर संकेत किया है। अधिकांश ने यह शंका की है कि गीता के दूसरे अध्याय में 11 से 13 तथा 16 से 30 तक के श्लोकों में जहां देह और देही  की चर्चा्र है, वहाँ बीच में यह श्लोक कैसे आगया है।देह और देही के बीच  का संबंध ही मात्रा स्पर्श है।
... इन वेगों को किस प्रकार सहन किया जाए कि यह संस्कार रूप में राग-द्वेष में परिणित न हो,... मात्र वर्तमान में रहने से ही यह सध सकता है,... यह अनासक्ति या निर्विचारता मात्र चिन्तन के धरातल पर नहीं है। यह विचारणा का विषय नहीं है। ... वर्तमान में रहने का यहां तात्पर्य है कि कर्म के साथ पूरी संलग्नता हो; मन लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने देना चाहिए, मन विपरीत जाता है, चिन्तन करने से। हम देखते हैं, पर इन्द्रियां जहां वस्तु को देख रही है, वहां भी हम सोचते रहते हैं। हम सुनते हैं वहां भी सोचते रहते हैं। इन्द्रियां और मन की एकता नहीं रहती। मन, एक साथ दो काम कर सकता है। हम खाना खाते हुए गाना भी सुन सकते हैं।
... मन को एक ही जगह पर ले आना, एकाग्रता कहा जाता है। पर तितिक्षा उन क्रियाओं, अवस्थाओं में निर्विकारता का पाना है। यहां इन्द्रियां, मन, बुद्धि एकीकृत हो जाती है। तब क्रिया के साथ अंतर्मन लग पाता है। जो स्वाभाविक अवस्था कहलाती है। यह निर्विकार भाव ही वर्तमान में रहना है। यहां क्रिया तो हो रही है परन्तु उसके साथ चिन्तन नहीं चल रहा है। वह पहले हो सकता है,... बाद में क्रिया ही पूर्णता पर हो सकता है, परन्तु क्रिया के साथ मन का भटकाव नहीं होता है।
... जब विचार होता है,... तब विचार ही होता है।अन्यथा मन तो रहेगा पर संबंध टूटा रहेगा।
यही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।
भगवान ने गीता के प्रारंभ में ही साधन सूत्र दिया है। कार्पण्प्य दोष; मूढ़ता हृदय दौर्बल्यम,... आदि जो भी आज के मनुष्य की दुर्बलता है, उसके दुख का कारण है, उसका समाधान इस सूत्र में हैं यह मात्र एक चिन्तन प्रधान अवधारणा ही नहीं है। यही वास्तविक साधन सूत्र है।
पूज्य स्वामीजी की साधना प्रणाली का यही आधार रहा है।
इन दोनों प्रवाहों का प्रभाव कैसे कम किया जाए, यही मूल समस्या है। भीतर की हलचल भी अशांत कर जाती है, बाहर का धक्का भी जोरों से लगता है। अंतःकरण निरंतर विकारी बना रहता है। राग-द्वेष का संग्रह ही संस्कार है। वर्तमान में रहने की कला का अभ्यास निरंतर ‘सजगता’ में है, अवेयरनेस, वह भी ‘कॉन्सटेन्ट’,... निरंतर जैसे, नल से पानी की धार गिरती है। एक क्षण भी रूक गयी तो वह बूंद बन जाती है। यही वास्तविक ध्यान है। ध्यान सजगता है। यही क्रिया योग है। यहां मात्र चिन्तन परक कोई अवधारणा नहीं है। भीतर का स्पंदन उठा,... मात्र लहरें है, लहरों को शब्द तक आने से पूर्व, विचार की शक्ल में आना होता है, वहां सजगता रही, आने वाला विचार रुक जाएगा, उसके पीछे आने वाला कुछ दूरी पर ठहर जाएगा।
... वहां निरंतर ध्यान रहे, सजगता बनी रहे,... एक खालीपन निर्विकारता आने लगती है। यही पानी का बर्फ हो जाना होता है। बाहर घटना घटी, तुरंत प्रतिक्रिया होती है। टेलीविजन से आ रहे चैनल्स ने मस्तिष्क को कचरा पात्र बना दिया है। संवेग ही संवेग हैं, संग्रह कम होने के स्थान पर जमा होता जाता है। इसे कैसे कम किया जाए। यह कोई घंटेभर  आंख मींचकर एकाग्रता से कम होने वाला नहीं है। यह सध जाए, संबंध तो रहेगा, पर संग्रह जमा नहीं होगा, यह संभव हो जाता है-तितिक्षा से, इस वेग को सहन किया जाए। यहां सहन करना, अप्रभावित होने की क्षमता है। पता है, अनित्य है आ गया पथिक है, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, इसके प्रभाव को भीतर नहीं जाने देना है। यह भीतर जाता है, चिन्तन से, उस पर बार-बार सोचने से मात्र क्रिया हो, मन पूरी तरह क्रिया के साथ हो, पर प्रतिक्रिया नहीं हो; विचारणा का दबाव नहीं हो, उसी अवस्था में क्रिया योग हो जाती है। यहां जीवन और जगत से पलायन नहीं है। इन्द्रियों द्वारा विषयों का संपर्क रोका जाना संभव नहीं है, यह तो स्वाभाविक है। पर उसके द्वारा निरंतर उत्पन्न इस राग-द्वेष के संग्रह को रोका जा सकता है। वह मात्र वर्तमान में रहने से ही संभव है, और इसका साधन है, निरंतर सजगता; कॉन्सटेन्ट अवेयरनेस बनी रहे। तब हम साधन सूत्र को समझ सकते हैं, क्रिया में ला सकते हैं।
भगवान ने दूसरे अध्याय में,... देह और देही के इन ग्यारह से तीस तक श्लोकों के बीच में इस साधन सूत्र को इसीलिए पिरोया है, ताकि आगे जाकर इससे प्राप्त स्थिति, ‘स्थितिप्रज्ञता’ पर वे कह पाएं, ‘स्थितिप्रज्ञता’, साध्य है, वर्तमान में रहना, साधन सामग्री है, जो असाम्प्रदायिक, अजातीय, सार्वभौमिक, सार्वकालिक है। हजारों वर्ष बाद भी यह सूत्र आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रभावी है, जितना ‘अर्जुन’ के लिए था, जिसने भगवान कृष्ण की शरण में आकर, ‘कार्पण्प्य दोष’ से मुक्ति का उपाय चाहा था।
जीवन का उद्देश्य
क्योंकि जब मुझे सफलता मिल गई। तब ओरों को क्यों नहीं मिल सकती ? मेरे अपने जीवन का प्रारम्भ ही बड़ी कठिनाई से बीता था। मुझे परिवार से किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिली। किसी सुविधा के यहां तक आया तब जिन्हें सुविधाएं प्राप्त है, वे तो थोड़ी सी लगन से अवश्य ही पहुंच सकते हैं।
जीवन का उद्देश्य, बाहर तलाश करने पर मनुष्य को नहीं मिलेगा। जब तक हम अंतर्मुखी नहीं होंगे । हमें नहीं मिलेगा नदी बह रही है, बाहर बहती जा रही है, कहां किसे पकड़ोगे, अन्तर्मुखी होने के बाद ही जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।
चौबीस घंटे मनुष्य इतनी अनर्गल बातें करता है, इतना व्यवहार करता है। बस यही मानकर चलता है कि यही करना उन्नत्ति है, यदि मानसिक शांति प्राप्त नहीं हुई है तो उन्नति नहीं हुई। जब तक शांति मिली नहीं तब तक पता ही नहीं चलेगा।
शुरू से जप जाप, पाठ आडम्बर भर दिये हैं, ये बहिर्मुखी क्रियायें हैं, इनसे कोई सफलता नहीं मिलेगी। रूढ़ियां हैं, करते जाओ...करते जाओ ये ही उपलब्धि हो गई है।
परन्तु जीवन का मुख्य उद्देश्य शांति है और निरन्तर शान्ति में रहने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, इसी मे जाना है।
जीना तो वैसे ही है, परन्तु सुख दुःख भोगते हुए शांति से जीना ही साध्य होना चाहिए।
एक बहुत बड़े पेड़ की छाया में पशु-पक्षी छाया पाकर शांति पा सकते है। इसी प्रकार इस व्यक्ति के सम्पर्क में आकर अन्य को भी शांति मिलती है। प्रकृति स्वयं इन्तजाम करती है।
जब तक शांति नहीं हैं, तब तक अपना विश्वास ही नहीं होता। बाहर शांति है ही नहीं, वहां संसार निरन्तर परिवर्तनशील है। बाहर से तो यही संबंध रखना है कि वर्तमान में रहो, अन्दर से जो प्रेरणा आये, वही करों।
विवेक जागृत होने के बाद, सही कार्य स्वतः चलता रहेगा।
कर्त्तव्य पालन होता रहेगा।
इससे अधिक कुछ भी नहीं है।
प्रश्न    ः    क्या हम असामाजिक नहीं होंगे ?
उत्तर    ः    नहीं, समाज को अधिक लाभ होगा। हमारी शक्ति होगी तो समाज को लाभ ही होगा। असामाजिक वह है, जिससे दुनिया को हानि पहुंचेगी।
यहा दुनियां के प्रति हमारा संबंध तटस्थता का रहेगा, जो जितना निकट आता जावेगा, वह लाभ लेता जावेगा।
छाया के स्वतः जाने की जरूरत नहीं होगी। जो छाया में आता जायेगा, वह लाभ लेता जायेगा।
प्रश्न    ः    आप आत्मा, परमात्मा, इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं ?
उत्तर    ः    शब्दों को भी किसी ने दिया है, शब्दों की चर्चा छोड़ो ? इससे क्या होगा। क्या लाभ होंगे।
जो शक्ति है, जो गति है, नाद है, लहरे हैं, उसी से सब होता है, उसी से हम जुड़े हुए है।
जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है।
उन्होंने उसे समझाने के लिए भाषा में अलग अलग शब्दों का चयन किया जो शक्तियांे को समझ नहीं पाये उन्होंने देवी देवताओं तथा धर्म गुरूओं का सहारा लिया। देवी देवताओं के प्रचार से पूर्व प्रणव का जप होता था। ओम क्या है, यह जो नाद है, उसके प्रतीक का स्वरूप वही चिन्ह बन गया, उसका ही जप प्रारम्भ हो गया।फिर देवी देवता आये तो उनकी पूजा शुरू हो गई। उन्होंने माना कि इससे कुछ लाभ होता है....लोग भी यही चाहते है, यह सब चलता रहा। शक्ति का कुछ नाम नहीं है, वहां मात्र उर्जा हैं। उन्होंने इस ध्वनि के आधार पर उसका नाम ओम दे दिया यह भी तो कल्पना ही रही।
यही प्रणव साधना है।
प्रश्न    ः    फिर जीव क्या है ?
उत्तर    ः    विकार सहित मन ही है। यह सुख दुःख भोगने के लिये ही है। यह भी व्याख्या ग्रन्थों के लिये ही है।
प्रश्न    ः    फिर आप क्या नाम देंगे ?
उत्तर    ः    यहां नाम की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य शरीर ही पर्याप्त है। अन्दर रहने से बाहर भीतर की सभी क्रियाओं का निरन्तर ज्ञान होता है, सीमित शक्ति है। इसका अहसास होता है। यदि कुछ होना है तो अन्दर से प्रेरणा आती है। यदि किसी शरीर के द्वारा प्रकृति को कार्य करवाना है, तो वह करवा लेती है।
प्रश्न    ः    फिर विकारों से मुक्ति नहीं होगी ?
उत्तर    ः    मृत्यु के समय ही मुक्ति हो पायेगी। वह तो निरन्तर है जैसे सांस की क्रिया है। सांस रूक गई तब मनुष्य शरीर छूट जाएगा। लहरों से ही विकार उत्पन्न होते है।
लहरें भी आएगी और विकार भी उत्पन्न होगें। लेकिन वर्तमान में रहने से इन्हें सहन करने की शक्ति रहेगी। यह किसी अन्य साधन से प्राप्त नहीं होगा। ‘तान तितिशस्व भारतः’ यहीं गीता में कहा गया है। तितिक्षा याने सहन करने की शक्ति यह तुम्हारे अन्दर उत्पन्न होनी चाहिये। यह केवल वर्तमान में रहने से ही उत्पन्न होती है।
प्रश्न    ः    मन तो जो विचार आ रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य किसी जगह     लगाने से भी रूक जाते हैं, क्या इसमें लाभ नहीं होगा ?
उत्तर    ः    यह तो बहिर्मुखी क्रिया है। बहते जाओगे प्रवाह में। जो क्षण है, उससे दूर हटते जाओगे। जहां करने का सवाल आया हम दूर      हट गये। जो कुछ हम कर रहे है, माया में ही तो कर रहे है। बाहर का सहारा रहा तो हम अपने मूल स्थान से हट जाऐगे। वर्तमान में रहने में न तो कोई क्रिया है, न ही स्थान से हटने का कोई कारण है।
वह जो महान शक्ति है....वहां गति है....तेज गति....लहरे ही लहरें यहां लहरें आयेगी......अन्तर्मन से टकरायेगी।
वही संस्कार है।
विकार तो उत्पन्न होंगे।
लेकिन सहनशीलता होने के कारण विकारों की भी अनुभूति होती है। लहरों की भी होती है। मालूम होता है कि किसी ने आकर धक्का दिया, हम तो अपने स्थान से नहीं हटे।
प्रश्न    ः    हमें हमारा तो अनुभव होता है, विकार ही विकार है आपको देखकर     लगता है कि आप वास्तव में मुक्त है ?
उत्तर    ः    मुझे क्या होता है, यह आप कैसे जान सकते हैं ? जो आप अनुभव     कर रहे है, वो आपके शरीर में भी है, जब तक मेरा शरीर है, मेरे भी रहेगा।
जैसे शरीर है तो इसमें हड्डियां भी है, मांस भी है, खून भी है। यह नहीं रहेगा तो क्या शरीर जीवित रहेगा, इसी के साथ मन भी है, विकार भी है। सब कुछ है, लहरें जो टकरायी है, उन्हीं  को उत्तेजित करने के लिये ही है। यह मात्र कल्पना ही है कि उच्च कोटि के व्यक्ति के भीतर यह नहीं होगा। उसको भी लहरें टकरायेगी उसे अनुभूति होगी।
मात्र सहनशीलता ही वर्तमान में रहने से मात्र हो सकती है।
प्रश्न    ः    आपने एक बार कहा था, यह उसी प्रकार से है, बीज पड़े रहे, और अंकुरित नहीं हो पाए ?
उत्तर    ः    अंकुरित नहीं होना माने विचलित नहीं होना। विकार कोई वस्तु नहीं है। न ही कोई परिभाषा हो सकती है।
परन्तु लहरें टकराती है, एकदम क्रोध आता है। काम उठता है।      यह कोई वस्तु है क्या बीज है क्या ?
बीज तो कोई वस्तु होती है, यहां तो ये मात्र लहरें है। इस प्रकार से विकार उत्पन्न होकर शरीर से काम करवाते है।
बीज का उदाहरण इसलिये दिया था, समझाने के लिए न तो बीज होता है न ही वह सड़ता है।
प्रकृति का कार्य है, लहरे उठाना शरीर का कार्य होता है विकारों में प्रभावित होकर क्रिया करना...जैसे कठपुतलियों को नचाते है, लहरें नचा रही है।
मनुष्य मात्र एक ही है, न तो वह साधारण है न वह असाधारण है। प्रयास करने पर वह अन्तर्मुखी हो सकता है।
प्रश्न    विकार की देह मंे उपस्थिति कब तक रहेगी ?
उत्तर शरीर नष्ट होगा तब विकार समाप्त हो जावेंगे। सभी समाप्त होगा।
शरीर ही नहीं होगा तब विकार कहां होंगे ?
शरीर के साथ ही सब पैदा होता है उसी के साथ ही नष्ट होता है।
बचती तो मात्र शक्ति है।
वह शक्ति नए नए शरीर पैदा कर खेल खेला करती है।
प्रश्न    ः    जिसे आप संग्रह कहते है, वह इस शरीर में आता कहां से है ?
उत्तर     ः    संग्रह तो प्रकृति ने बना रखा है, पंच महाभूत उसने बना रखे है। वह तो अपनी गति के साथ नए-नए बनाती जाती है, मिटाती जाती है। यह जो पंचमहाभूत है, यही नाटक की सामग्री है। यह सब चीजें है जिससे मनुष्य बना है। यहां अच्छा बुरा कुछ नहीं होता.....। खाली जमीन पड़ी रहती है.....। वर्षा होते  ही  इतने पौधे-जीव जन्तु कहां से आ जाते हैं कहां चले जाते हैं.....। जब तक  मनुष्य सुख दुःख से जुड़ा हुआ है, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। कोई घटना होगी वह विचलित हो जाएगा। शान्ति वह है जो निरन्तर बनी रहे.....। मन मात्र गति है। जब तक बाहर की गति भीतर नहीं आती तब तक शांति का अनुभव नहीं होता। परन्तु अन्तर्मुखी होने के बाद ही उसका अहसास होगा।
बाहर के विषयों में रस आता है, इसलिये मन बाहर खिंचता रहता है।
वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास होना चाहिये। उसके लिए लगन आवश्यक है.....।               अ
प्रवचन सार
गुरुपूर्णिमा पर्व (1989)
आज गुरुपूर्णिमा का पर्व है। गुरु के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। वैसे मैं हमेशा से कहता आया हूं, न तो मैं किसी का गुरु हूं, न मैंने किसी को शिष्य बनाया है। परन्तु अनादिकाल से यह परम्परा चली आ रही है, यह कभी समाप्त नहीं होगी। यह चलती ही रहेगी।
- कहा है- गुरु, ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है। उसमें प्रकृति के ये तीनों गुण - उत्पत्ति, स्थिति व नाश ये तीनों गुण होते हैं। जिसमें यह क्षमता होती है। वह गुरु है। ऐसा गुरु, ब्रह्मनिष्ठ व श्रोत्रिय होता है।
ब्रह्मनिष्ठ का तात्पर्य है, जिसकी ब्रह्म में निष्ठा हो, सत्य में निष्ठा हो, जिसकी हर सांस सत्य की खोज में हो।
साथ ही वह श्रोत्रिय भी हो, श्रोत्रिय का अर्थ है, वह अपने विचार, जो साधना उसने की है, वह उसे दूसरों को भी बता सके, आत्मोन्नति के मार्ग पर दूसरों को भी ला सके।
आज वेश धारण करने वाले गुरु हैं। वेश धारण करने से, बहुत अधिक धन इकट्ठा करने से कोई गुरु नहीं हो जाता। गुरु में वास्तविक योग्यता होनी चाहिए। ‘महाभारत’ में गुरुओं के अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। आप लोगों ने टी.वी. पर महाभारत सीरियल देखा होगा, जहां गुरु दूर बैठे अपने शिष्यों के सारे हाल जानते हुए दिखाए गए हैं। प्राचीनकाल में हमारे गुरु इतने योग्य थे। आज उनकी बड़ी-बड़ी बातें हम सुनते हैं। प्रश्न उठता है- क्या वास्तव में आज ऐसे गुरु मौजूद हैं?
वास्तविक गुरु बनने के लिए क्या करना पड़ता है, मैंने अपने साठ से अधिक जीवन के वर्ष इसी बात को जानने में ईमानदारी से लगा दिए। सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए लगाए।
प्राचीनकाल से अनेक साधना पद्दतियां प्रचलित हैं। हमारे ग्रन्थों में लिखी है। भक्ति भी उनमें एक है। भक्ति नवधा प्रकार की बताई गई है। भक्ति से हम परमात्मा को प्रसन्न करते हैं। परन्तु जब भक्त भगवान की भक्ति में लगता है, तब भी द्वैत भाव रहता है। भक्त अलग है, भगवान अलग है। यह सब भी माया में घटता है। माया में जो कुछ भी नजर आता है। सब परिवर्तनशील है। यहां कुछ भी स्थाई नहीं है। गुरु हो या हमारे माने हुए भगवान हो, वे भी अस्थायी है। परिवर्तनशील है। नाशवान चीज कभी सत्य को प्रकट नहीं कर सकती। सत्य ही सत्य को प्रकट करेगा। जितनी भी बाहरी चीजें हैं, जिनको हम इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं। सब नाशवान है। उनमें सत्यता नहीं होती।
सत्यता को आपको जानना है तो जितनी प्रकार की ये साधना पद्दतियां हैं, जिनमें ये नवधा भक्ति, योगाभ्यास वेदांत दर्शन उनसे भी परे जाकर देखना होगा। परन्तु इस प्रकार के गुरु आज नहीं है।
एक उदाहरण है-
राजा जनक को विदेही कहा जाता है। उनकी गीता में चर्चा है। एक दोपहर वे भोजन करके पलंग पर लेटे थे। उन्हें सपना आया कि सपने में वे कंगाल हैं। सात दिन से भूखे है। दाने-दाने को मोहताज हैं। एक जगह पंगत लगी हुई थीं, वहां गए, वहां से भी लोगों ने भगा दिया। फिर जहां झूठी पत्तलों का ढेर था, वहां गए कुछ मिल जाए, तभी एक सांड आया, उसने उठाकर दूर फेंक दिया, उसकी धमक से नींद खुल गयी। देखा, वह तो राजा जनक है, पलंग पर सो रहे हैं। स्वप्न में वे यह भी भूल गए थे कि वे ‘राजा’ हैं। दरबार में गए, सवाल पूछा- वह सत्य था या यह सत्य है? दरबारी चुप रह गए। तभी अष्टावक्र वहां पहुंचे। उन्होंने कहा- ‘राजा न तो वह सच था न यह सच है।’
आप जानते हैं, यहां आप बैठे हैं, भोजन के बाद आप निद्रा में चले जाएं तो यह दुनिया न जाने कहां चली जाएगी। वर्तमान की दुनिया का लोप वहां स्वप्न में हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यही है, गुरु वही होता है, जो वास्तविकता पर पहुंचा हुआ हो। जैसे ही सवाल पूछा गया हो, उत्तर तत्काल भीतर से आता है। जिसमें वास्तविक साधना की हो। सत्य को जाना हो। सांसारिक सुखों का त्याग किया हो। दूसरों के मार्गदर्शन की क्षमता हो, समर्पित किया हो। यहां तो कलियुग में गुरु ही गुरु हैं, कहीं सच्चे गुरु हों भी तो वे किसी कौने में पड़े होंगे, ...  परन्तु ऐसे आपको मिले तो वे ही आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं।
-मैं संक्षेप में दो बातें और कहना चाहूंगा।
आप दिन भर में जितनी भी बातें देखते हैं, इन्द्रियों के माध्यम से जो भी अनुभव करते हैं, उनका प्रभाव हमारे मन में संग्रहित होता जाता है। जो भी कार्य किया, कुछ देखा, इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी होता है, उसकी गूंज मन में बनी रहती है।
इन्द्रियों द्वारा भोगे गए विषय, संस्कार बनकर, नीचे उतरकर अंतर्मन में चले जाते हैं। जिस प्रकार बीज जो कोठे में साल दो साल पड़ा रहता है, पड़ा है तो पड़ा रहेगा, पर अनुकूल वातावरण मिलकर अनुकूल, मिट्टी, पानी, हवा पाकर अंकुरित हो जाता है।
इसी तरह हमारे द्वारा भोगे हुए जो विषय हैं, इनकी स्मृतियां है, संस्कार रूप में हमारे अंतर्मन में पहुंच जाती है। वहां वे सूखे बीच की तरह होती है। संसार घूम रहा है, तेज गति है। तेज गति से लहरे निरंतर उठती रहती है। जो नाभि स्थान पर आकर, जहां मन का मूल निवास होता है, वहां आकर टकराती है। वहीं हमारा अंतर्मन है, जहां हमारे द्वारा भोगे हुए विषयों के संसार हैं, वे लहरों से उफान खाकर ऊपर आते हैं। जागृत अवस्था में कई बार हम से ऐसा कुछ हो जाता है, जो संभव नहीं था, तब लोग कहते हैं, हम नहीं करते, पर प्रकृति करवा देती है। वास्तविकता यह है कि लहरें विकारों से टकराती है, जहां विषय भोग, बीज रूप में संग्रहित है, सूक्ष्म रूप में है। अंतर्मन अत्यधिक शक्तिशाली है, वह उन्हंे तीव्र गति से ऊपर फेंकता है।
-राजा जनक ने भी कभी ऐसा दृश्य देखा होगा।
उसका प्रभाव उनके भीतर अंकित रह गया। गहरी नींद में उनका नियंत्रण अपने ऊपर से उठ गया। वहां प्रकृति की लहरों ने उनके अंतर्मन पर ऐसी ठोकर मारी कि वही दृश्य सामने आ गया। वे स्वप्न में भिखारी बन गए।
हम दिन रात स्वप्न देखते हैं। हर रात न जाने किन परिस्थितियों में पहुंच गए थे।
इन्द्रियों के जो भोग निरंतर संस्कार बनकर अंतर्मन में जमा हो रहे हैं, इन्हें संस्कार न बनने दें, यही साधना है। बीच बनकर अंदर पहुंच जाएंगे, अंतर्मन में पहुंच जाएंगे, तो वे उगेंगे, तो वे अनुकूल वातावरण पाकर के उगेंगे। अब इस प्रकार, हमारे अनुभव के ही संस्कार बने, इन्हें कैसे रोका जाए, ...  इनसे कैसे छुटकारा पाया जाए, यही साधना है।
प्राचीनकाल से अनेक प्रकार की साधनाएं चली आ रही है। साधना के नाम पर देवी-देवताओं की पूजा, मंत्र पाठ, यज्ञ, जप बताया जाता रहा है। नाम जप का बहुत प्रचलन है। रास्ते पर लाने के लिए साधन बताया था कि बार-बाहर नाम रटने से मन एकाग्र हो जाता है। परन्तु जीभ से तो नाम रटते रहते हैं, पर मन कहीं ओर लगा रहता है। संसार में भटकता है, फिर लहरों के धक्के लगते हैं, सभी विकार सतह पर आते रहते हैं।
मैं गुरु न होते हुए भी, ... अगर आप मेरे प्रति गुरु का भाव रखते हैं। आप में श्रद्धा हैं तो मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि साधना के नाम पर कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
मैंने पहले भी कई बार कहा है, फिर दोहरा देता हूं।
मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू  जींज दव मििवतज पे तमुनपतमक
प्रयास किए जाते हैं, यह जानने के लिए कि किसी प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है। हम जो भी साधना करते हैं, किसी चीज को प्राप्त करने के लिए, एक समय बाद स्वयं पता लगता है कि वह तो किसी प्रकार की साधना नहीं थी, ... उससे कोई लाभ नहीं मिला।
सही बात मैं आपको बतलाऊं-
वर्तमान में रहने की जो पद्दति आपको समझाई है। पहले भी बहुत कहा है किताबों में भी आया है, ... आप इस पर प्रयोग करे। इससे जीवन के हर क्षण में आपको मार्गदर्शन मिलेगा। आपकी सहनशक्ति बढ़ेगी। आप मानसिक शक्ति बढ़ेगी। कठिन से कठिन समस्याएं भी आएंगी, जो अपने आप विलीन होती चली जाएंगी। वर्तमान में रहने का प्रयास करें।
जो भी कार्य कर रहे हैं, हमारा मन उसी के साथ रहे, क्षणभर भी न आगे, न पीछे रहे, ...
आप लोग यहां आए, इतना कष्ट उठाकर, इतनी दूर से आए हैं, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
        आपका मन       

मन- हमेशा अतीत में या भविष्य में रहता है
वर्तमान में- मन विलीन हो जाता है
मन तो उर्जा है
उर्जा का विनाश नहीं होता
हां, कागज की दूसरी परत की तरह अंतर्मन होता है, जो विराट के नजदीक होने के कारण, अत्यधिक शक्तिशाली है
उसमें विलीन हो जाता है।वह महान उर्जा है।
वर्तमान में-मन नियंत्रित रहता है।वह अनावश्यक गति नहीं करता।परन्तु शक्तिशाली होता हैं


जीवन होता है,,जन्म और मृत्यु के बीच एक निरन्तर चलता हुआ खेल।
शरीर निरंतर बदलता है, कल में बच्चा था, युवा हुआआज वृद्धवस्था की पहली सीढ़ी पर पांव रखा हैबाल सफेद हो गए है,शरीर थका सा हैपर श्वास की गति वही है, ... एक क्षण भी विराम नहीं हुआ।
हां, जब क्रोध आया,श्वास तीव्र हो गई।
ध्यान में पाया श्वास मंद हो गया, ... धीमा,
पर श्वास-यथावत रहा
.. क्या प्राण श्वास ही है, ...
हॉ प्राण जीवनी शक्ति है, वह पोषण करती है, अंगों का संचालन प्राण उर्जा करती है।
स्वाजी ने- ‘उर्ध्वकुंभक प्राणायाम की चर्चा की है
मैं उसका अनुभव नहीं कर पाया, उनसे बहुत पूछा था पर वे चुप रह गए।
आनंद का और बुद्ध का उदाहरण देते रह,े आनंद तो उनका बड़ा भाई था, ... पर मैं तो नहीं, वे चुप रह जाते थे।
कहते थे, बुद्ध ने इसे अनापानसती कहा है। पर है, यह बहुत पुरानी विधि-
‘श्वास के साथ मन को ले आओ
मन एक साथ दो काम कर सकता है, अवधान मन को एक जगह लाना होता है, इसीलिए जो भी क्रिया हो वहां मन को अधिक से अधिक लाने का प्रयास करो, ध्यान रहे मन विपरीत अवस्था में न जा पाए, पर सजगता अवधान से अलग है, यहां हर क्रिया में सजगता रहती है। इसे ‘बोध कहो, होश कहो, तुम जहां भी हो, वहीं हो।
पर पहली सोच, ... श्वास के प्रति रखो.
‘आते हुए, जाते हुए, ... मन वहीं रहे, बोध रहे
हां, श्वास को बदलो मत, धीमी है, तेज है, हां तुम वहीं रहो,
क्रोध में हो, श्वास बदलंेगे, क्रोध हट जाएगा पर यह संघर्ष होगा।
हां,... श्वास पर सजगता रहेगी, ... विकार स्वतः बिखर जाएगा।
तनाव नहीं होगा।
‘श्वास एक ही है,
जितनी भीतर है, वही तो बाहर गई है,
हां सजगता रहे
वह आएगी, फैफड़ों से बाहर चली जाएगी
... पर धीरे-धीरे, सजगता उसके साथ, ... उसे नाभि तक ले जाएगी।
नाभि मन का मूल स्थान है।
वहीं पर उर्जा का अगाध भंडार है
श्वास धीरे-धीरे पेट तक आती है, वहां विचार नहीं है, स्मृति नहीं है, अतीत नहीं है, कल्पना नहीं है।
श्वास के साथ खोता हुआ मन, ...
स्वाभाविक युति को प्राप्त होता है
मन और प्राण की युति ही योग है।
यहां बलपूर्वक किया गया प्रयास नहीं है।
- हां श्वास को देखो
वह बाहर जाती है
पर तत्काल भीतर नहीं आती
क्षण तो क्षणिक होता है, जहां कुछ नहीं है, मात्र शून्य है
-भीतर आती है
भीतर से तत्काल बाहर नहीं जाती।
क्षण के क्षणांश में ठहरती है, वहां भी मुकाम है
वहां से लौटती है
-एक वर्तुल सा बन जाता है
उसमें रहना, मात्र वर्तमान को प्राप्त होता है
बंदर- बहुत चंचल होता है।उसका मन और मनुष्य का मन साम्य रखता है।वह स्थिर नहीं हो सकता
हां उससे आप आंख मिलाओ, पलक न झपकाओ तो वह ठहर जाता है, पर आपकी पलक झपकी, वह सामान उठाकर चल देता है,
इतनी सजगता रहे, ... यहां ध्यान आंख बंद करके नहीं होता है।
... सजगता है, ... चौकन्नापन, होश रहता है,
श्वास पूरी हो।अधूरी नहीं।
नाभि तक पहुंचे, ... वहां ठहरे वहां से फिर बाहर जाए।
वहीं पूर्णता है
मन, मस्तिष्क में रहता है
उसकी जाग्रति के लिए तेज श्वास, ... उथली श्वास आवश्यक है,
योगी कह रहा था, ... श्वास पेट पर नहीं ले जाना है
फैफड़ों को भरो-बाहर निकालो
धौकनी की तरह भरो
हां, जो ब्रह्मचर्य को मूल्य मानकर चल रहा है, वह अपनी कामवासना को दूर करने में सहायक होगा।
पर गृहस्थ उलझ जाएगा
न इधर का रहा न उधर का
मस्तिष्क मात्र सूचना का संग्राहक है, मन उतना ही जटिल गतिवान रहेगा
मन, श्वांस के साथ नीचे उतरता है, ... जब वह दोनों छोरों के बीच आकर ठहरता है, शक्ति का अनुभव होता है, नाभि उसका मूल स्थान है, ... वहां मात्र शक्ति है गति नहीं, ... प्राण उर्जा और मानसिक शक्ति दोनों ही युतवत हो जाती है,
श्वास गहरी हो, और गहरी व शिथिल, हां जब अब सजग होते जाते हैं, ... तब लगता है, श्वास थक सी गई है।
... श्वास भीतर गई, ... हम गवाह रहे, सजग हैं।
वह ठहरी, हम वहां रहे।
वह लौटी, ... हम सजग हैैं।
वह बाहर गई, ... ठहरी ... हम वहां रहे, अधिक से अधिक वहां सजग रहे, वह क्षणांश  का क्षणहै।

यह अंतराल बड़ा हो सकता है...
यहां श्वास उर्ध्वमुखी है।
सहज प्राणायाम है..।
... यहां मात्र श्वास है, उसका केन्द्र बिन्दु विराट से जुड़ गया है, ... मन यहां स्वतः विसर्जित हो जाता है।
श्वास भीतर गई
साथ रहो।
साथ रहो।
वह जहां तक गई, सजगता रहे..।.
वहां वह रूकी, ... यह भी केन्द्र है, यह नाभि के पास है...।. वहां भी रूको, ... सजग रहो,..।.
वहां वह ठहरेगी, ... वहां उसके साथ रहो।
वह लौटी, ... साथ आना है, यह एक पूरा चक्र होता है,।
... एक दूसरे मे विलीन भी हो जाती है, वहां रहना है, वहां जो है, वही वर्तमान होता है,
वहां न मन होता है, न विचार न विकार है।
शक्ति केन्द्र के साथ रहने का सानिघ्य जो प्राप्त होता है, वह बहुमूल्य है।
... हां, यहां चित्त की शुद्धि-स्वतः उपलब्ध होती है।
मूल सिद्धान्त है- विकार ही विचार है
विचार ही विकार है
विचारों के कम होने से विकार अपने आप कम होने लगते हैं।


अप्रकाशित कृति गुरुवाणी से साभार